गुरु शिष्य की कहानियाँ

गुरु शिष्य की कहानियाँ 

सतीश शर्मा  


 पारसमणि की परख

एक बार एक गुरु ने अपने शिष्य की परीक्षा लेने और उसे ज्ञान का महत्व समझाने के लिए उसे एक साधारण सा दिखने वाला पत्थर दिया। गुरु ने कहा, "बेटा, मैं तुम्हें यह पत्थर दे रहा हूँ। तुम इसे बाज़ार में लेकर जाओ और इसका उचित मूल्य पता करके आओ, लेकिन ध्यान रखना, इसे बेचना मत।"सब्जी वाले का अनुभवशिष्य पत्थर लेकर बाज़ार गया और सबसे पहले एक सब्ज़ी वाले के पास पहुँचा। उसने सब्ज़ी वाले से पत्थर का मूल्य पूछा। सब्ज़ी वाले ने पत्थर को ध्यान से देखा और बोला, "यह सब्ज़ी को एक तरफ दबाकर रखने के काम आ सकता है। मैं इसके तुम्हें ज्यादा से ज्यादा पाँच रुपये दे सकता हूँ।" शिष्य ने पत्थर नहीं बेचा और आगे बढ़ गया। इसके बाद शिष्य एक ऑफिस में काम करने वाले व्यक्ति के पास गया। उस व्यक्ति के कागज़ात हवा से उड़ रहे थे। उसने पत्थर को देखा और खुश होकर बोला, "यह कागज़ दबाने (पेपर-वेट) के बहुत काम आएगा। मैं इसके पचास रुपये दे दूँगा।" शिष्य ने फिर भी उसे नहीं बेचा। अंत में, शिष्य एक जौहरी (सुनार) की दुकान पर गया। सुनार ने जैसे ही उस पत्थर को अपने विशेष यंत्र से देखा, उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने तुरंत झुककर कहा, "अरे! यह तो पारसमणि है। इसके छूने से लोहा भी सोना बन जाता है। इसका मूल्य तो अनमोल है, लेकिन मैं इसके बदले तुम्हें पाँच लाख रुपये दे सकता हूँ।

 शिष्य हैरान और खुश होकर तुरंत अपने गुरु के पास लौटा। उसने सारी बात गुरु को बताई और पूछा कि ऐसा कैसे संभव है कि एक ही पत्थर का मूल्य अलग-अलग जगह पर इतना अलग था।गुरु ने मुस्कुराते हुए समझाया, "बेटा, यह पत्थर तुम्हारी और मेरी बुद्धि का प्रतीक है। पहला व्यक्ति सब्ज़ी वाला था, जो इसके गुण नहीं जानता था इसलिए उसने इसे केवल पाँच रुपये का समझा। दूसरा व्यक्ति कागज़ का काम करने वाला था, जिसने इसे पचास रुपये का आँका। लेकिन तीसरा व्यक्ति सुनार था, जो इसकी परख रखता था, इसलिए उसने इसे पारसमणि माना।"गुरु ने आगे कहा, "ठीक इसी तरह, जो लोग अज्ञानी हैं वे तुम्हारे ज्ञान की कोई कीमत नहीं समझेंगे, लेकिन जो ज्ञानी और गुणी लोग हैं, वे तुम्हारी वास्तविक क्षमता और मूल्य को पहचान लेंगे।

यह कहानी हमें यह सिखाती है कि हमारे जीवन में एक सच्चे गुरु (शिक्षक) का होना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि एक गुरु ही हमारे अंदर छिपी हुई असली प्रतिभा और कीमत को पहचानता है और हमें सही मार्गदर्शन देता है।

बुद्धिमान गुरु और उनके लालची चेला 

यह एक बुद्धिमान गुरु और उनके लालची चेले की कहानी है,जो हमें यह सिखाती है कि मुसीबत के समय हमेशा विवेक से काम लेना चाहिए, बिना सोचे-समझे किसी बात पर राजी नहीं होना चाहिए।  

कहानी के अनुसार, एक बार एक गुरु और उनका चेला घूमते-घूमते एक अनजाने नगर में पहुँचे। वहाँ के लोगों से उन्हें पता चला कि उस जगह का नाम 'अंधेर नगरी' था और वहाँ का राजा एक महा मूर्ख था। उस राज्य की सबसे अजीब बात यह थी कि वहाँ हर चीज़—चाहे वह अच्छी हो या खराब—'एक टके' (एक ही दाम) में मिलती थी।  

गुरुजी समझ गए कि यह राज्य खतरनाक हो सकता है और उन्होंने तुरंत वहाँ से निकल जाने का फैसला किया। लेकिन चेला लालची था और उसे सस्ता खाना बहुत पसंद आया, इसलिए उसने रुकने का मन बना लिया।  गुरुजी ने उसे बहुत समझाया, लेकिन चेला नहीं माना,तब गुरुजी उसे वहीं छोड़कर चले गए। 

चेला उस राज्य में खूब मज़े से खा-पीकर मोटा हो गया। एक दिन बारिश के कारण राज्य की एक दीवार गिर गई। न्याय करते-करते मामला राजा तक पहुँचा। अंत में, मंत्री को दोषी पाया गया और उसे फाँसी की सज़ा सुनाई गई। लेकिन मंत्री बहुत पतला था, इसलिए उसके गले में फाँसी का फंदा फिट नहीं बैठा। राजा ने हुक्म दिया कि किसी ऐसे मोटे आदमी को ढूँढकर लाया जाए जिसकी गर्दन फंदे में आ सके । 

मोटा होने के कारण सैनिकों ने चेले को पकड़ लिया और उसे फाँसी पर चढ़ाने की तैयारी करने लगे。 चेला घबरा गया और उसने अपने गुरु को याद किया। गुरुजी मौके पर पहुँचे और स्थिति को भांपकर चेले के कान में कुछ फुसफुसाया। 

इसके बाद एक नाटक शुरू हुआ।  गुरु और चेला दोनों आपस में झगड़ने लगे और कहने लगे कि पहले फाँसी पर मैं चढूँगा। यह देखकर राजा हैरान रह गया और उसने पूछा कि बात क्या है! तब गुरुजी ने एक चालाकी भरी बात कही—"यह कोई साधारण समय या संयोग नहीं है। जो भी आज इस शुभ मुहूर्त में फाँसी पर चढ़ेगा, वह सीधा चक्रवर्ती राजा बनेगा और दुनिया का सबसे शक्तिशाली सम्राट कहलाएगा। " 

मूर्ख राजा यह सुनकर लालच में आ गया। उसने सोचा कि यह मौका हाथ से नहीं जाना चाहिए। मूर्ख राजा ने कहा कि वह खुद फाँसी पर लटकेगा ताकि सम्राट बन सके, इस तरह, चालाक गुरु और चेले की युक्ति से राजा खुद ही फाँसी पर चढ़ गया और राज्य की मुसीबत टल गई। 


"कभी झूठ मत बोलना।"

एक बार एक प्रसिद्ध संत अपने शिष्यों को ज्ञान दे रहे थे। उसी समय एक कुख्यात चोर उनके आश्रम में पहुंचा और संत से बोला, "महाराज, मैं एक पापी और चोर हूं, लेकिन आज से मैं आपको अपना गुरु मानता हूं।" संत ने मुस्कुराकर उसे अपना लिया और कहा, "तुम्हारी मर्जी, लेकिन तुम मुझसे जो भी सीखोगे, उसे जीवन भर याद रखना।"

चोर ने कहा, "ठीक है।" संत ने उसे केवल एक मूल मंत्र दिया, "कभी झूठ मत बोलना।"

चोर ने हामी भर ली और खुशी-खुशी वहां से चला गया। उस रात वह चोरी करने के इरादे से एक महल में घुसा। संयोग से, उस राज्य की रानी की नजर उस पर पड़ गई। रानी ने आश्चर्य से पूछा, "तुम यहां कैसे आए?"

चोर अपने गुरु के वचनों का पक्का था, इसलिए उसने बिना डरे सच बता दिया, "मैं चोरी करने के इरादे से यहां आया हूं।" रानी उसकी ईमानदारी और सच्चाई से इतनी प्रभावित हुई कि उसने चोर को बहुत सारे सोने-चांदी के आभूषण दे दिए। 

अगले दिन, चोर महल के राजा के दरबार में पेश हुआ। राजा ने गुस्से में पूछा, "तुमने चोरी क्यों की?" चोर ने फिर से बिना किसी झिझक के सच उगल दिया। राजा भी रानी की तरह उस चोर के सत्य बोलने की निष्ठा पर मुग्ध हो गया। राजा ने उससे प्रसन्न होकर उसे क्षमा कर दिया और अपने राज्य का एक बड़ा अधिकारी नियुक्त कर दिया। 

गुरु के बताए मार्ग और उनके एक छोटे से उपदेश का पालन करने से एक चोर का जीवन भी पूरी तरह बदल सकता है। गुरु का ज्ञान ही हमें सही राह दिखाता है और भवसागर से पार लगाता है। 


अंगूठी और अहंकार की कहानी

एक बार छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपने गुरु, समर्थ रामदास स्वामी को बहुत सम्मान के साथ एक कीमती हीरे की अंगूठी भेंट की। गुरु रामदास ने उस अंगूठी को ले लिया और अपने एक शिष्य को पोटली में रखकर साथ चलने को कहा।जब वे रास्ते से जा रहे थे, तो गुरु जी अपने घोड़े को बहुत तेजी से भगाने लगे।उनके पीछे-पीछे दौड़ते हुए शिष्य को बहुत परेशानी हुई।वह समझ गया कि गुरुजी इतनी तेजी से इसलिए भाग रहे हैं क्योंकि उन्हें डर है कि कोई इस कीमती अंगूठी को छीन या चुरा न ले।रास्ते में एक बड़ा झरना (नदी) आया।शिष्य ने मौका देखकर उस हीरे की अंगूठी को चुपके से पानी में फेंक दिया।जब वे सुरक्षित स्थान पर पहुंचे, तो समर्थ रामदास ने शिष्य से अंगूठी के बारे में पूछा। शिष्य ने बताया कि उसने अंगूठी को पानी में फेंक दिया है। गुरुजी ने हैरान होकर कारण पूछा।शिष्य ने बहुत सुंदर जवाब दिया, "गुरुजी, जिस कीमती वस्तु के पास होने से आपके मन में भी मोह और चिंता पैदा हो गई थी, उस लालच को ही मैंने नष्ट कर दिया। अब हम सब चिंता मुक्त हैं।"यह सुनकर समर्थ रामदास बहुत प्रसन्न हुए और बोले, "तुमने बिल्कुल सही किया。 असली ज्ञान यही समझता है कि धन-दौलत और हीरे-जवाहरात मन में अशांति पैदा करते हैं, हमें उनसे हमेशा दूर रहना चाहिए।


सफलता का सच्चा मंत्र 

एक दिन एक जिज्ञासु शिष्य ने अपने ज्ञानी गुरु से पूछा, "गुरुदेव, सफलता प्राप्त करने की सबसे बड़ी गारंटी क्या है? मैं ऐसा क्या करूं कि मुझे अपने लक्ष्य में शत-प्रतिशत सफलता मिले?"

गुरु ने शिष्य को कोई सीधा उत्तर नहीं दिया, बल्कि उससे कहा, "कल सुबह तुम मुझे नदी के किनारे मिलो, वहीं तुम्हें तुम्हारे प्रश्न का उत्तर मिलेगा।" 

अगले दिन सुबह शिष्य नदी के किनारे पहुँचा। गुरुदेव पहले से ही वहां मौजूद थे। गुरु ने शिष्य से कहा, "चलो, हम नदी में थोड़ा अंदर चलते हैं।"

दोनों नदी में उतर गए। जब पानी कमर तक आ गया, तो अचानक गुरु ने शिष्य का सिर पकड़कर पानी के अंदर डुबो दिया। शिष्य ने शुरुआत में सोचा कि गुरुजी कोई परीक्षा ले रहे होंगे। लेकिन जब कुछ पल बीत गए और गुरु ने उसका सिर पानी से बाहर नहीं निकाला, तो वह छटपटाने लगा। वह अपनी पूरी ताकत लगाकर पानी से बाहर निकलने की कोशिश करने लगा, लेकिन गुरु ने उसे कसकर दबाए रखा। जब शिष्य का दम घुटने लगा और उसे लगा कि अब वह मर जाएगा, तभी गुरु ने उसका सिर पानी से बाहर खींच लिया। बाहर आते ही शिष्य ज़ोर-ज़ोर से हांफने लगा और लंबी-लंबी सांसें लेने लगा।

गुरु ने उससे पूछा, "बेटा, जब तुम पानी के अंदर थे, तो उस समय तुम्हें सबसे ज्यादा किस चीज़ की चाहत थी?" शिष्य ने हांफते हुए जवाब दिया, "गुरुदेव! मुझे बस हवा (ऑक्सीजन) की चाहत थी। मैं किसी भी तरह बस सांस लेना चाहता था।"

यह सुनकर गुरु मुस्कुराए और बोले, "बस यही तुम्हारी सफलता की गारंटी है। जिस शिद्दत और तड़प के साथ तुम पानी के भीतर हवा खोज रहे थे, ठीक उसी तड़प और तीव्रता से जब तुम अपने लक्ष्य (सफलता) को चाहोगे, तो उसे हासिल करने से तुम्हें दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती।" 

यह कहानी हमें सिखाती है कि सफलता केवल चाहने से नहीं मिलती, बल्कि उसे पाने के लिए पानी में छटपटा रहे व्यक्ति की तरह एक तीव्र प्यास और लगन की आवश्यकता होती है। जब तक लक्ष्य हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता नहीं बन जाता, तब तक सच्ची सफलता पाना असंभव है।


सुख का अचूक सूत्र

*एक व्यक्ति अपने गुरु के पास गया और बोला, गुरुदेव, दुख से छूटने का कोई उपाय बताइए। शिष्य ने थोड़े शब्दों में बहुत बड़ा प्रश्न किया था ।दुखों की दुनिया में जीना लेकिन उसी से मुक्ति का उपाय भी ढूंढना! बहुत मुश्किल प्रश्न था।*

गुरु ने कहा, एक काम करो, जो आदमी सबसे सुखी है, उसके पहने हुए जूते लेकर आओ। फिर मैं तुझे दुख से छूटने का उपाय बता दूंगा।

शिष्य चला गया। एक घर में जाकर पूछा, भाई, तुम तो बहुत सुखी लगते हो। अपने जूते सिर्फ आज के लिए मुझे दे दो।

*उसने कहा, कमाल करते हो भाई! मेरा पड़ोसी इतना बदमाश है कि क्या कहूं? ऐसी स्थिति में मैं सुखी कैसे रह सकता हूं? मैं तो बहुत दुखी इंसान हूं।*

वह दूसरे घर गया। दूसरा बोला, अब क्या कहूं भाई? सुख की तो बात ही मत करो। मैं तो पत्नी की वजह से बहुत परेशान हूं। ऐसी जिंदगी बिताने से तो अच्छा है कि कहीं जाकर साधु बन जाऊं। सुखी आदमी देखना चाहते हो तो किसी और घर जाओ।

*वह तीसरे घर गया, चैथे घर गया। किसी की पत्नी के पास गया तो वह पति को क्रूर बताती, पति के पास गया तो वह पत्नी को दोषी कहता। पिता के पास गया तो वह पुत्र को बदमाश बताता।*

पुत्र के पास गया तो पिता की वजह से खुद को दुखी बताता। सैकड़ों-हजारों घरों के चक्कर लगा आया। सुखी आदमी के जूते मिलना तो दूर खुद के ही जूते घिस गए।

*शाम को वह गुरु के पास आया और बोला, मैं तो घूमते-घूमते परेशान हो गया। न तो कोई सुखी मिला और न सुखी आदमी के जूते।*

गुरु ने पूछा, लोग क्यों दुखी हैं? उन्हें किस बात का दुख है? उसने कहा, किसी का पड़ोसी खराब है। कोई पत्नी से परेशान, कोई पति से दुखी तो कोई पुत्र से परेशान है। आज हर आदमी दूसरे आदमी के कारण दुख भोग रहा है।

*गुरु ने बताया, सुख का सूत्र है - दूसरे की ओर नहीं, बल्कि अपनी ओर देखो। खुद में झांको। खुद की काबिलियत पर गौर करो। प्रतिस्पर्द्धा करनी है तो खुद से करो, दूसरों से नहीं।*

जीवन तुम्हारी यात्रा है। दूसरों को देखकर अपने रास्ते मत बदलो। खुद को सुनो, खुद को देखो। यही सुख का सूत्र है।

*शिष्य बोला, महाराज, बात तो आपकी सत्य है लेकिन यही आप मुझे सुबह भी बता सकते थे। फिर इतनी परिक्रमा क्यों करवाई?*

गुरु ने कहा, वत्स, सत्य दुष्पाच्य होता है। वह सीधा नहीं पचता। अगर यह बात मैं सुबह बता देता तो तू हर्गिज नहीं मानता।

*जब स्वयं अनुभव कर लिया, सबकी परिक्रमा कर ली, सबके चक्कर लगा लिए, तो बात समझ में आ गई। अब ये बात तुम पूरे जीवन में नहीं भूलोगे।*


शिवाजी महाराज की गुरु भेंट

समर्थ रामदास स्वामी जी की ख्याति सुनने पर छ.शिवा जी महाराज को उनके दर्शन की लालसा निर्माण हुई । उनसे मिलने के लिए वे कोंढवळ को गए । वहां भेट होगी इस आशा से सायंकाल तक रुके, तब भी महाराज की स्वामी जी से भेंट नहीं हुई ।

*तत्पश्चात प्रतापगढ आने पर रात में नींद में भी महाराज के मन में वही विचार था । समर्थ रामदास स्वामी जी जान बूझकर महाराज से मिलना टाल रहे थे ।*

ऐसे ही कुछ दिन निकल जाने पर एक दिन समर्थ जी के दर्शन की लालसा अत्यधिक बढने से वे भवानी माता के मंदिर में गए ।उस रात शिवा जी महाराज वहां पर ही देवी के सामने निद्राधीन हो गए ।

*रात में स्वप्न में उन्हें पैर में खडांऊ, देह पर भगवा वस्त्र, हाथ में माला, बगल में कुबडी ऐसे तेजस्वी रूप में समर्थ रामदास स्वामी जी के दर्शन हुए । छ. शिवाजी महाराज ने उन्हें साष्टांग नमस्कार किया ।*

समर्थजी ने उनके सिर पर हाथ रखकर उन्हें आशिर्वाद दिया । नींद में से जागने पर महाराज ने देखा तो उनके हाथ में प्रसाद के रूप में नारियल था । उस समय से वे समर्थ रामदास स्वामी जी को अपने गुरु मानने लगे ।

*आगे छ. शिवाजी महाराज ने अत्यधिक पराक्रम करने पर समर्थ रामदास स्वामी जी ने स्वयं शिंगणवाडी प्रत्यक्ष आकर महाराज को दर्शन दिए । शिवाजी महाराज ने उनकी पाद्य पूजा की ।*

समर्थ जी ने उन्हें प्रसाद के रूप में एक नारियल, मुठ्ठीभर माटी, लीद एवं पत्थर दिए । उस समय महाराज के मन में आया कि़, ‘हमें राज्य कारभारका त्याग कर समर्थजी की सेवा करने में शेष आयु लगानी चाहिए ।

*समर्थजी महाराज के मन का यह विचार समझ गए और उन्होंने कहा ‘राजा, क्षत्रिय धर्म का पालन कीजिए । प्राण जाने पर भी धर्म का त्याग न करें । प्रजा के रक्षण के लिए तुम्हारा जन्म हुआ है, वह छोडकर यहां सेवा करने के लिए न रहें ।*

मेरा केवल स्मरण करने पर भी मैं आपसे मिलने आऊंगा । सुख से, आनंद से राज्य कीजिए’ । तत्पश्चात् समर्थजी ने उन्हें राज्य करने की आदर्श पद्धति समझाई । समर्थजी ने शिवाजी महाराज को उनके कल्याण के लिए नारियल दिया था ।

*सर्वथा संतुष्ट एवं तृप्त मन से छ. शिवाजी महाराज राज्य करने लगे । महाराज ने माटी अर्थात पृथ्वी, पत्थर अर्थात गढ जीता एवं लीद अर्थात अश्व दल से भी समृद्ध हो गए । गुरु के कृपा प्रसाद से शिवाजी महाराज को किसी वस्तु का अभाव नहीं रहा ।*

छ. शिवाजी महाराज ने विदेशी शत्रुओं का नाश करके स्वराज्य की स्थापना करने का जो कार्य आरंभ किया था उस पर समर्थजी को अत्यधिक अभिमान था ।

*वे लोगों को छत्रपतीजी के कार्य में सहायता करने तथा शक्ति संपादन करके स्वराज्य एवं धर्मरक्षण के लिए लडने का उपदेश करते थे ।*

छ. शिवाजी महाराज की समर्थजी के प्रति अत्यधिक श्रद्धा थी । अनेक प्रसंगों में महाराज समर्थ रामदास स्वामीजी का विचार एवं आशिर्वाद लेते थे । आपत्काल में हमें सतर्कता कैसे बरतना चाहिए, इस संदर्भ में समर्थ जी द्वारा छ. शिवाजी महाराज को दिया गया उपदेश ‘दासबोध’ नामक ग्रंथ में है ।

*उसमें समर्थजी कहते हैं, ‘सदैव सतर्कता से रहकर आचरण करें, शत्रु-मित्र को ठीक से परखें, एकांत में अत्यधिक विचार कर योजना बनाएं, निरंतर प्रयास करते रहें ।*

इसके पूर्व अनेक महान लोग हो गए, उन्होंने अत्यधिक बुरी स्थिति तथा कष्ट सहन किए हैं । आलस का त्याग कर, बिना कष्टके अनेक लोगों से मित्रता करके कार्य करते रहें’।


गुरु दक्षिणा में दे दिया अहंकार

एक ऋषि के पास एक युवक ज्ञान के लिए गया। ज्ञान प्राप्ति के बाद शिष्य ने गुरु दक्षिणा देने का आग्रह किया। इसपर गुरु जी ने युवक से कहा कि वह दक्षिणा में उन्हें वह चीज दे जो बिलकुल व्यर्थ है। शिष्य आज्ञा लेकर व्यर्थ चीज की खोज में निकल पड़ा।

रास्ते में उसे मिट्टी दिखी तो उसे उससे ज्यादा व्यर्थ कुछ नहीं लगा। उसने मिट्टी की ओर हाथ बढ़ाया तो मिट्टी बोल पड़ी,

“तुम मुझे व्यर्थ समझ रहे हो? क्या तुम्हें पता नहीं है कि इस दुनिया का सारा वैभव मेरे ही गर्भ से प्रकट होता है ? ये विविध वनस्पतियां ये रूप, रस और गंध सब कहां से आते हैं?”

शिष्य आगे बढ़ गया, थोड़ी दूर पर उसे एक पत्थर मिला। शिष्य ने सोचा, इसे ही ले चलूं। उसने लेकिन जैसे ही उसे उठाने के लिए हाथ बढ़ाया, तो पत्थर बोला, तुम इतने ज्ञानी होकर भी मुझे बेकार मान रहे हो।

तुम अपने भवन और अट्टलिकाएं किससे बनाते हो? तुम्हारे मंदिरों में किसे गढ़कर देव प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं? मेरे इतने उपयोग के बाद भी तुम मुझे व्यर्थ मान रहे हो।

यह सुनकर शिष्य निरुत्तर हो गया और वहां से भी चल दिया। इसके बाद कई और ऐसी चीजें उसने गुरु जी के लिए लेनी चाहीं लेकिन उसे हर जगह काम की चीजें ही नजर आईं। उसने सोचा कि जब मिट्टी और पत्थर इतने उपयोगी है तो आखिर व्यर्थ क्या हो सकता है?

उसके मन से आवाज आई कि सृष्टि का हर पदार्थ अपने आप में उपयोगी है। वस्तुतः व्यर्थ और तुच्छ वह है, जो दूसरों को व्यर्थ और तुच्छ समझता है। व्यक्ति के भीतर का अहंकार ही एक ऐसा तत्व है, जिसका कहीं कोई उपयोग नहीं। वह गुरु के पास लौट गया और उनके पैरों में गिर पड़ा।

वह गुरु दक्षिणा में अपना अहंकार देने आया था


श्रेष्ठता का घमंड नहीं करना चाहिए।

एक युवा धनुर्धर ने अपने गुरु से धनुर्विद्या सीखी और जल्दी ही वह बहुत अच्छा निशाना लगाने लगा। तीर चलाने में वह इतना निपुण हो गया था कि अपने साथी से पूछता था कि बोलो कहां निशाना लगाना है। साथी बताते कि फलां पेड़ या फलां फल को गिराकर बताओ और वह धनुर्धर तुरंत ही वैसा करके दिखा देता। अपनी इस विधा पर धनुर्धर फूला नहीं समा रहा था। सफलता सर चढ़कर बोलने लगी। अब वह कहने लगा कि वह गुरुजी से बढ़िया धनुर्धर हो गया है। गुरुजी को जब यह बात पता चली तो उन्होंने कुछ भी नहीं कहा। एक बार गुरुजी को किसी काम से दूसरे गांव जाना था। उन्होंने अपने इसी शिष्य को बुलाया और साथ चलने को कहा। गुरु-शिष्य दोनों जब रास्ते से चले तो बीच में एक जगह खाई दिखी। गुरु ने देखा, खाई में एक तरफ से दूसरी तरफ जाने के लिए एक पेड़ के तने का पुल बना हुआ है। गुरु उस पेड़ के तने पर पैर रखते हुए आगे बढ़े और पुल के बीच में पहुंच गए। वहां पहुंचकर उन्होंने शिष्य की तरफ देखा और पूछा कि बताओ कहां निशाना लगाना है। शिष्य ने कहा कि वो जो सामने पतला-सा पेड़ दिख रहा है उसके तने पर निशाना साधिए। गुरु ने तत्काल निशाना लगाकर बता दिया। गुरु सरपट पुल से इस तरफ आ गए।

इसके बाद उन्होंने शिष्य से ऐसा करके दिखाने को कहा। शिष्य ने जैसे ही पुल पर पैर रखा, वह घबरा गया। पुल पर अपना वजन संभालकर आगे बढ़ना मुश्किल काम था। शिष्य जैसे-तैसे पुल के बीच में पहुंचा। गुरु ने कहा- तुम भी उसी पेड़ के तने पर निशान साधकर बताओ। शिष्य ने जैसे ही धनुष उठाया, संतुलन बिगड़ने लगा और वह तीर ही नहीं चला पाया। वह चिल्लाने लगा- गुरुजी बचाइए। वरना मैं खाई में गिर जाऊंगा। गुरुजी पुल पर गए और शिष्य को इस तरफ उतार लाए। दोनों ने यहां से चुपचाप गांव तक का सफर तय किया। शिष्य के समझ में बात आ गई थी कि उसे अभी भी बहुत कुछ सीखना बाकी है। इसलिए कभी अपनी श्रेष्ठता का घमंड नहीं करना चाहिए।


शिष्य की परीक्षा

*रामानुजाचार्य शठकोप स्वामी जी के शिष्य थे । स्वामी जी ने रामानुज जी को ईश्वर प्राप्ति का रहस्य बताया था । परंतु उसे किसी को न बताने का निर्देश दिया था; किंतु रामानुज जी ने अपने गुरु की इस आज्ञा को नहीं माना, उन्होंने ईश्वर प्राप्ति का जो मार्ग बताया था, उस पूर्ण ज्ञान को उन्होंने लोगों को देना प्रारंभ किया । यह ज्ञात होने पर शठकोप स्वामी जी बहुत क्रोधित हुए । रामानुज जी को बुलाकर वे कहने लगे, ‘‘ मेरी आज्ञा का उल्लंघन कर तू साधना का रहस्य प्रकट कर रहा है । यह अधर्म है, पाप है । इसका परिणाम क्या होगा तुझे ज्ञात है ?’’

*रामानुज जी ने विनम्रता से कहा, ‘‘ हे गुरुदेव, गुरु की आज्ञा का उल्लंघन करने से शिष्य को नरक में जाना पडता है ।’’ शठकोप स्वामी जी ने पूछा, ‘‘ यह ज्ञात होते हुए भी तुमने जान बूझकर ऐसा क्यों किया ?’’*

इस पर रामानुज जी कहने लगे, ‘‘ वृक्ष अपना सब कुछ लोगों को देता है । क्या उसे कभी इसका पश्चात्ताप प्रतीत होता है ? मैंने जो कुछ किया, उसके पीछे लोगों का कल्याण हो, लोगों को भी ईश्वर प्राप्ति का आनंद प्राप्त हो, यही हेतु है ।

*"इसके लिए यदि मुझे नरक में भी जाना पडे, तो मुझे उसका तनिक भी दुख नहीं होगा ।’’*

रामानुज जी की, समाज को ईश्वर प्राप्ति की साधना बताने की, लालसा को देखकर स्वामी जी प्रसन्न हुए । उन्होंने रामानुज जी को अपने निकट लिया, उनको उत्तमोत्तम आशीर्वाद दिए तथा उनको समाज में सत्य के ज्ञान का प्रचार करने हेतु बडे प्रेम से भेजा ।

*रामानुज जी ने समाज को ईश्वर प्राप्ति की साधना बताई । उनकी इस लालसा से स्वामी जी उन पर प्रसन्न हुए, इसी प्रकार हमें भी ज्ञान बांटना चाहिए ।


शोध की लगन

आयुर्वेद के ज्ञाता महर्षि चरक उन दिनों गुरुकुल में पढ़ते थे, उनके पास वन में जाकर औषधियों की खोजबीन करने का कार्य था। उनके एक फोड़ा निकल गया। उनके गुरु ने फोड़े को ठीक करने के लिए उन्हें एक विशेष औषधि बताई और साथ में यह भी कहा कि यदि औषधि नहीं मिली तो रोग और भी भयंकर हो सकता है। चरक उस औषधि को खोजने के लिए निकल पड़े। वे वन में दूर-दूर तक गए, उन्होंने सैकड़ों औषधियों को देखा और उनके प्रभाव का निरीक्षण किया। इस प्रकार उन्हें इस कार्य में लंबा समय लग गया। पर उन्हें जिस औषधि की आवश्यकता थी, वह नहीं मिली। वे फोड़े की पीड़ा से दुखी थे । जब वे निराश होकर वापस लौटे तो गुरु जी ने कहा कि औषधि तो आश्रम के पीछे ही है। उसे उखाड़ लाओ, सेवन करो। चरक ने ऐसा ही किया, औषधि के सेवन से वह कुछ ही दिनों में रोग-मुक्त हो गए।

एक दिन चरक ने गुरु से पूछा, जब वह औषधि आश्रम के पीछे मौजूद थी, तो आपने मुझे उस लंबी खोजबीन में क्यों लगाया ?

गुरु ने कहा, शोध की लगन जगाना अधिक महत्वपूर्ण है।कार्य के प्रति समर्पण से ज्ञान चक्षु खुलते हैं । उसके कारण असंख्य लोगों का भला होता है। उस प्रयास में तुम्हारी तन्मयता लग सके और वैसे स्वमत बन सके, इसी कारण तुम्हें उस कठोर प्रयत्न में लगाया था ।


श्रीगुरु की आज्ञा पालन हेतु स्वयं को झोंक देने वाला शिष्य आरुणी !

*प्राचीन समय में धौम्य नामक मुनि का एक आश्रम था । उस आश्रम में उनके अनेक शिष्य विद्याभ्यास के लिए रहते थे । उनमें आरुणी नामक एक शिष्य था । एक समय धुंआधार वर्षा होने लगी ।*

समीप के नाले का पानी खेत में न जाए, इसहेतु प्रतिबंध लगानेके लिए वहां एक बांध बनाया गया । उस बांध में दरारें पडने लगी तब गुरुदेव ने कुछ शिष्यों से कहा, ‘पानी को खेत में आने से रोको !’

*आरुणी एवं कुछ शिष्य बांध के समीप आए । बांध में आई दरारों को भरने के लिए सबने प्रयास किए ; परंतु पानी का वेग अत्यधिक होने के कारण संपूर्ण प्रयास निष्फल हो गए । बांध के बीच का भाग टूटने लगा एवं पानी धीरे-धीरे खेत में आने लगा ।*

अब कोई लाभ नहीं, ऐसा सोचकर सभी शिष्य लौट आए । दिनभर परिश्रम करने से थके सभी शिष्य गाढी नींद से सो गए । सवेरे तक वर्षा थम गई । तब सबके ध्यान में आया कि आरुणी का कोई पता नहीं है ।

*संपूर्ण आश्रम में ढूंढने पर भी जब वह नहीं मिला, तब वे सभी गुरुदेव जी के समीप जाकर बोले, ‘‘ हे गुरुदेव, आरुणी खो गया है ।” श्रीगुरु बोले, ‘हम खेत में जाकर देखेंगे’ सब शिष्य एवं ऋषि धौम्य खेत में गए और उन्होंने देखा कि, टूटे हुए बांध के बीच में पानी को रोकने हेतु स्वयं आरुणी ही वहां आडा होकर सोया हुआ है ।*

यह देखकर सबको आश्चर्य हुआ । रातभर पानी में भोजन-नींद के बिना ऐसा करते देख आरुणी के प्रति सभी के मन में प्रेमभाव निर्माण हुआ ।

*वर्षा रूक जाने के कारण पानी का बहाव तो पूर्व की अपेक्षा घट गया था परंतु आरुणी को वहां नींद लग गई थी । सभी वहां गए और उसे जगाया । श्रीगुरु ने उसे समीप लेकर प्रेम से उसके सिर पर हाथ फेरा । यह देखकर सब शिष्यों के आंखों में पानी आया ।*

आरुणी से हमें क्या सिखना है ? तो श्रीगुरु की आज्ञापालन करने की तीव्र उत्कंठा । आज्ञापालन करने के लिए आरुणी ने स्वयं का विचार नहीं किया; इसलिए वह गुरु का एक सच्चा शिष्य बना ।

*अतः हम भी हमारे गुरु के चरणों में प्रार्थना करेंगे कि, ‘हे गुरुदेव, हममें भी ‘आज्ञापालन’ गुण निर्माण हो !’*


वाह रे शिष्य!

गांव से बहुत दूर एक जंगल में एक गुरुजी रहते थे। वहां उनका एक बड़ा आश्रम था, जहां रहकर अनेक शिष्य विद्याध्ययन करते थे। गुरुजी की वाणी से सभी वेद, शास्त्रों का श्रवण कर ग्रहण भी करते थे। आश्रम में कई दुधारू गायें थीं।

जब अध्ययन की अवधि समाप्त हो गई तो गुरुजी ने एक दिन सबको अपने सामने एकसाथ बैठाकर दीक्षा व आशीर्वाद देते हुए कहा- तुम सब मेरे प्रिय और आत्मीय हो। मैं चाहता हूं कि मेरी ओर से भेंटस्वरूप एक-एक गाय अपने-अपने घर ले जाओ। शिष्य के रूप में तुमने जो सेवाभाव दिखाया है, उससे मैं बहुत प्रसन्न हूं।

यह ‍सुनकर शिष्य गदगद हो गए। वे शीघ्र ही अपनी पसंद की गाय चुन-चुनकर रस्सी हाथ में थामे हुए जब वहां से प्रस्थान करने को उत्सुक हुए तो गुरुजी की दृष्टि एक भोले-भाले शिष्य पर पड़ी, जो यह सब चुपचाप देख रहा था।

उसको पास बुलाकर गुरुजी ने पूछा- बेटा! तुम क्यों शांत खड़े हो? क्या तुम्हें गाय नहीं चाहिए?

नहीं गुरुजी, वह हाथ जोड़कर विनयपूर्वक बोला- मुझे यहां की कोई गाय नहीं चाहिए। मुझे केवल आशीर्वाद चाहिए, जो आपने देकर मेरा उपकार किया है।

शिष्य की कृतज्ञताभरी वाणी सुनते ही गुरुजी भाव-विभोर हो गए। उन्होंने इस शिष्य के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा- अब आश्रम की शेष सारी गायें मैं तुम्हें प्रदान करता हूं।

मैं आप जैसे गुरु और आश्रम को छोड़कर कहीं भी नहीं जाऊंगा, यहीं आपकी सेवा करूंगा।

ऐसा कहकर शिष्य ने ज्यों ही अपना मस्तक गुरुजी के चरणों में रखना चाहा, ज्यों‍ ही उन्होंने लपककर शिष्य को अपनी छाती से लगा लिया। उस समय सभी शिष्य एक-दूसरे का मुंह देख रहे थे।


गुरु दक्षिणा

*किसी गुरुकुल में तीन शिष्यों नें अपना अध्ययन सम्पूर्ण करने पर अपने गुरु जी से यह बताने के लिए विनती की कि उन्हें गुरुदाक्षिणा में, उनसे क्या चाहिए |*

गुरु जी पहले तो मंद-मंद मुस्कराये और फिर बड़े स्नेहपूर्वक कहने लगे-‘मुझे तुमसे गुरुदक्षिणा में एक थैला भर के सूखी पत्तियां चाहिए, ला सकोगे?’ वे तीनों मन ही मन बहुत प्रसन्न हुए क्योंकि उन्हें लगा कि वे बड़ी आसानी से अपने गुरु जी की इच्छा पूरी कर सकेंगे |

*सूखी पत्तियाँ तो जंगल में सर्वत्र बिखरी ही रहती हैं| वे उत्साहपूर्वक एक ही स्वर में बोले-‘जी गुरु जी, जैसी आपकी आज्ञा |’*

अब वे तीनों शिष्य चलते-चलते एक समीपस्थ जंगल में पहुँच चुके थे |लेकिन यह देखकर कि वहाँ पर तो सूखी पत्तियाँ केवल एक मुट्ठी भर ही थीं , उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा |

*वे सोच में पड़ गये कि आखिर जंगल से कौन सूखी पत्तियां उठा कर ले गया होगा? इतने में ही उन्हें दूर से आता हुआ कोई किसान दिखाई दिया |वे उसके पास पहुँच कर, उससे विनम्रतापूर्वक याचना करने लगे कि वह उन्हें केवल एक थैला भर सूखी पत्तियां दे दे |*

अब उस किसान ने उनसे क्षमायाचना करते हुए, उन्हें यह बताया कि वह उनकी मदद नहीं कर सकता क्योंकि उसने सूखी पत्तियों का ईंधन के रूप में पहले ही उपयोग कर लिया था |

*अब, वे तीनों, पास में ही बसे एक गाँव की ओर इस आशा से बढ़ने लगे थे कि हो सकता है वहाँ उस गाँव में उनकी कोई सहायता कर सके |*

वहाँ पहुँच कर उन्होंने जब एक व्यापारी को देखा तो बड़ी उम्मीद से उससे एक थैला भर सूखी पत्तियां देने के लिए प्रार्थना करने लगे लेकिन उन्हें फिर से एकबार निराशा ही हाथ आई क्योंकि उस व्यापारी ने तो, पहले ही, कुछ पैसे कमाने के लिए सूखी पत्तियों के दोने बनाकर बेच दिए थे।

*लेकिन उस व्यापारी ने उदारता दिखाते हुए उन्हें एक बूढी माँ का पता बताया जो सूखी पत्तियां एकत्रित किया करती थी| पर भाग्य ने यहाँ पर भी उनका साथ नहीं दिया क्योंकि वह बूढी माँ तो उन पत्तियों को अलग-अलग करके कई प्रकार की ओषधियाँ बनाया करती थी |*

अब निराश होकर वे तीनों खाली हाथ ही गुरुकुल लौट गये |गुरु जी ने उन्हें देखते ही स्नेहपूर्वक पूछा- ‘पुत्रो, ले आये गुरुदक्षिणा ?’तीनों ने सर झुका लिया

*गुरू जी द्वारा दोबारा पूछे जाने पर उनमें से एक शिष्य कहने लगा- ‘गुरुदेव, हम आपकी इच्छा पूरी नहीं कर पाये | हमने सोचा था कि सूखी पत्तियां तो जंगल में सर्वत्र बिखरी ही रहती होंगी लेकिन बड़े ही आश्चर्य की बात है कि लोग उनका भी कितनी तरह से उपयोग करते हैं |’*

गुरु जी फिर पहले ही की तरह मुस्कराते हुए प्रेमपूर्वक बोले-‘निराश क्यों होते हो ? प्रसन्न हो जाओ और यही ज्ञान कि सूखी पत्तियां भी व्यर्थ नहीं हुआ करतीं बल्कि उनके भी अनेक उपयोग हुआ करते हैं |’

 वह शिष्य जो गुरु जी की कहानी एकाग्रचित्त हो कर सुन रहा था, अचानक बड़े उत्साह से बोला* -

‘गुरु जी,अब मुझे अच्छी तरह से ज्ञात हो गया है कि आप क्या कहना चाहते हैं |आप का संकेत, वस्तुतः इसी ओर है न कि जब सर्वत्र सुलभ सूखी पत्तियां भी निरर्थक या बेकार नहीं होती हैं तो फिर हम कैसे, किसी भी वस्तु या व्यक्ति को छोटा और महत्त्वहीन मान कर उसका तिरस्कार कर सकते हैं?

*चींटी से लेकर हाथी तक और सुई से लेकर तलवार तक-सभी का अपना-अपना महत्त्व होता है |’ गुरु जी भी तुरंत ही बोले-‘हाँ, पुत्र, मेरे कहने का भी यही तात्पर्य है कि हम जब भी किसी से मिलें तो उसे यथायोग्य मान देने का भरसक प्रयास करें ताकि आपस में स्नेह, सद्भावना, सहानुभूति एवं सहिष्णुता का विस्तार होता रहे और हमारा जीवन संघर्ष के बजाय उत्सव बन सके |*

दूसरे,यदि जीवन को एक खेल ही माना जाए तो बेहतर यही होगा कि हम निर्विक्षेप, स्वस्थ एवं शांत प्रतियोगिता में ही भाग लें और अपने निष्पादन तथा निर्माण को ऊंचाई के शिखर पर ले जाने का अथक प्रयास करें |’अब शिष्य पूरी तरह से संतुष्ट था |


दो मुट्ठी गेहू 

*प्राचीनकाल के एक गुरु अपने आश्रम को लेकर बहुत चिंतित थे। गुरु वृद्ध हो चले थे और अब शेष जीवन हिमालय में ही बिताना चाहते थे, लेकिन उन्हें यह चिंता सताए जा रही थी कि मेरी जगह कौन योग्य उत्तराधिकारी हो, जो आश्रम को ठीक तरह से संचालित कर सके।*

उस आश्रम में दो योग्य शिष्य थे और दोनों ही गुरु को प्रिय थे। दोनों को गुरु ने बुलाया और कहा- शिष्यों मैं तीर्थ पर जा रहा हूँ और गुरुदक्षिणा के रूप में तुमसे बस इतना ही माँगता हूँ कि यह दो मुट्ठी गेहूँ है।

*एक-एक मुट्ठी तुम दोनों अपने पास संभालकर रखो और जब मैं आऊँ तो मुझे यह दो मुठ्ठी गेहूँ वापस करना है। जो शिष्य मुझे अपने गेहूँ सुरक्षित वापस कर देगा, मैं उसे ही इस गुरुकुल का गुरु नियुक्त करूँगा। दोनों शिष्यों ने गुरु की आज्ञा को शिरोधार्य रखा और गुरु को विदा किया।*

जैसे सूर्य बिना कहे सबको प्राण ऊर्जा देता है, मेघ जल बरसाता है, हवा भी बिना किसी भेदभाव व लालच के ठंडक पहुँचाकर सभी को जीवित रखती है और फूल भी अपनी महक में कोई कसर नहीं रखता, वैसे ही गुरुजन भी स्वयं ही शिष्यों की भलाई में लगे रहते हैं।

*एक शिष्य गुरु को भगवान मानता था। उसने तो गुरु के दिए हुए एक मुट्ठी गेहूँ को पुट्टल बाँधकर एक आलिए में सुरक्षित रख दिए और रोज उसकी पूजा करने लगा।*

दूसरा शिष्य जो गुरु को ज्ञान का देवता मानता था उसने उन एक मुट्ठी गेहूँ को ले जाकर गुरुकुल के पीछे खेत में बो दिए।

*कुछ महीनों बाद जब गुरु आए तो उन्होंने जो शिष्य गुरु को भगवान मानता था उससे अपने एक मुट्ठी गेहूँ माँगे। उस शिष्य ने गुरु को ले जाकर आलिए में रखी गेहूँ की पुट्टल बताई जिसकी वह रोज पूजा करता था।*

गुरु ने देखा कि उस पुट्टल के गेहूँ सड़ चुके हैं और अब वे किसी काम के नहीं रहे। तब गुरु ने उस शिष्य को जो गुरु को ज्ञान का देवता मानता था उससे अपने गेहूँ दिखाने के लिए कहा।

*उसने गुरु को आश्रम के पीछे ले जाकर कहा- गुरुदेव यह लहलहाती जो फसल देख रहे हैं यही आपके एक मुट्ठी गेहूँ हैं और मुझे क्षमा करें कि जो गेहूँ आप दे गए थे वही गेहूँ मैं दे नहीं सकता।*

लहलहाती फसल को देखकर गुरु का चित्त प्रसन्न हो गया और उन्होंने कहा जो शिष्य गुरु के ज्ञान को फैलाता है, बाँटता है वही श्रेष्ठ उत्तराधिकारी होने का पात्र है। मूलतः गुरु के प्रति सच्ची दक्षिणा यही है।

*सामान्य अर्थ में गुरुदक्षिणा का अर्थ पारितोषिक के रूप में लिया जाता है, किंतु गुरुदक्षिणा का वास्तविक अर्थ कहीं ज्यादा व्यापक है। महज पारितोषिक नहीं।*

गुरुदक्षिणा का अर्थ है कि गुरु से प्राप्त की गई शिक्षा एवं ज्ञान का प्रचार-प्रसार व उसका सही उपयोग कर जनकल्याण में लगाएँ। मूलतः गुरुदक्षिणा का अर्थ शिष्य की परीक्षा के संदर्भ में भी लिया जाता है।

*गुरुदक्षिणा गुरु के प्रति सम्मान व समर्पण भाव है। गुरु के प्रति सही दक्षिणा यही है कि गुरु अब चाहता है कि तुम खुद गुरु बनो।*



त्याग

कुछ ७०-८० वर्ष पूर्वकी कथा है । ६-७ वी कक्षा में पढने वाला एक विनू नामक बालक था, जो एक भव्य भुवन में रहा करता था । उनके भुवन के आंगन में एक कटहल पेड था । एक दिन उस पेड को बडे-बडे कटहल लदे । दिनू की माता ने कटहल निकालकर मगज निकाले । तत्पश्चात उसने दिनू को पांच दोनें लाने के लिए कही । माता ने उन पांचों दोनों में थोडे-थोडे मगज डाले । यह देखकर दिनू को लगा कि अब पहला दोना मुझे ही मिलेगा ।

*माता ने कहा, ‘‘जाओ, यह दोना भगवान जी को चढाओ और प्रणाम कर आओ ।’’ विनू ने माता की आज्ञा का पालन किया । जब वह लौटा तो उसे लगा कि अब मां यह दूसरा दोना मुझे ही देगी ! उसी क्षण मां ने कहा, ‘‘बेटा, यह दोना पडोस वाली भाभी को दे आओ ।’’*

तत्पश्चात रिक्त दो दोनों में से एक देते हुए मां ने कहा, ‘‘यह उस गलीमें रहनेवाली भाभीको दे आओ ।’’ माता का यह वर्तन देखकर अंत में विनू चिढा । सोचने लगा कि अब यह बचा हुआ दोना किस के लिए होगा ?

*तभी मां ने उस दोना का मगज विनू को खिलाया । विनू ने पूछा, ‘‘मां, हमारे घर का कटहल पहले सारे गांव को और बाद में मुझे ? आपने ऐसा क्यूं किया ?’’ मांने कहा, ‘‘विनू बेटा, हमें कटहल किसने दिया ? उस पेड ने ।*

यह पेड हमारे आंगन में कैसे बढा ? ईश्वर ने ही दिया न ? तो क्या केवल हम ही उसके फल खाएंगे ?’’ मां की यह बात सुनकर उसके उपरांत कभी भी विनू ने

*‘मैं, मुझे, मेरा..’ ऐसा नहीं किया; इसलिए वह विनू, आचार्य विनोबा भावे, जो ईश्वर के परमभक्त है, बन सके ! संस्कृत में रची भगवद्गीता का उन्होंने मराठी में अनुवाद किया । उसका गीताई नामकरण किया ।*

हमें भी भगवान जी के समान बनना है न ? तब हम भी दूसरों की सहायता करेंगे, झगडा नहीं करेंगे । यदि हमें कुछ अच्छा मिलता है तो, दूसरों के साथ बाटेंगे ।

पानी की स्पष्टता (क्रोध पर नियंत्रण और धैर्य)

एक बार महात्मा बुद्ध अपने शिष्यों के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा रहे थे। रास्ते में एक तालाब पड़ा। बुद्ध को प्यास लगी, तो उन्होंने अपने एक शिष्य को तालाब से पानी लाने को कहा। जब शिष्य तालाब के पास पहुँचा, तो उसने देखा कि कुछ लोग तालाब में कपड़े धो रहे थे और बैलगाड़ी पानी के बीच से जा रही थी। इस कारण तालाब का पानी बहुत गंदा और कीचड़युक्त हो गया था। शिष्य ने बुद्ध के पास लौटकर कहा कि पानी बहुत गंदा है और पीने योग्य नहीं है।

बुद्ध ने कुछ देर शांत रहने को कहा। थोड़ी देर बाद वे फिर उसी शिष्य को तालाब के पास पानी लाने के लिए भेजते हैं। शिष्य जब वहाँ पहुँचता है, तो देखता है कि सारा कीचड़ नीचे बैठ गया है और पानी एकदम साफ व स्वच्छ हो गया है। शिष्य बुद्ध के पास लौटकर पानी ले आया और हैरानी से पूछा कि यह कैसे हुआ?

 बुद्ध ने समझाया, "हमारा मन भी इसी तालाब के पानी की तरह है। जब इसमें अशांति, डर या क्रोध रूपी हलचल होती है, तो यह गंदा लगता है। लेकिन अगर हम धैर्य रखें और कुछ समय दें, तो ये विचार अपने आप शांत हो जाते हैं और मन साफ हो जाता है।" यह प्रसंग छात्रों को परीक्षा या पढ़ाई के तनाव के समय धैर्य रखने की प्रेरणा देता है।  

हाथी और रस्सी (मानसिक सीमाओं को तोड़ना)

एक बार एक व्यक्ति हाथियों के समूह के पास से गुजर रहा था। उसने देखा कि इतने विशाल हाथियों के अगले पैरों को एक बहुत ही पतली और कमजोर रस्सी से बाँधा गया था। व्यक्ति को बड़ा आश्चर्य हुआ कि इतने ताकतवर जानवर, जो चाहें तो एक झटके में उस रस्सी को तोड़ सकते हैं, लेकिन फिर भी वे चुपचाप वहीं खड़े थे।

उसने पास खड़े महावत से इसका कारण पूछा। महावत ने मुस्कुराकर जवाब दिया, "जब ये हाथी बहुत छोटे थे, तब भी हमने इन्ही रस्सियों से उनके पैर बाँधे थे। उस समय उन्होंने इसे तोड़ने की बहुत कोशिश की, लेकिन वे छोटे थे इसलिए ऐसा नहीं कर पाए। उनके मन में यह बात बैठ गई कि वे इस रस्सी को कभी नहीं तोड़ सकते। आज भी वे उसी विश्वास के कारण इसे नहीं तोड़ते।"

सीख: महावत ने आगे बताया कि हाथी की ताकत नहीं, बल्कि उनका पुराना विश्वास उन्हें रोक रहा था। यह कहानी छात्रों को यह सिखाती है कि पिछली असफलताओं (जैसे किसी विषय में कम अंक आना) को अपनी स्थायी सीमा न मानें। खुद पर विश्वास रखें, आप बहुत कुछ कर सकते हैं। 


पेंसिल की सीख (गलतियों से सीखना)

एक छात्र अपने शिक्षक के पास गया और निराशा से बोला, "गुरुजी, मैं अपने जीवन में बहुत बार असफल हुआ हूँ और मुझसे बहुत गलतियाँ होती हैं। मैं कैसे एक सफल और बेहतर इंसान बनूँ?"

शिक्षक ने मुस्कुराकर उस छात्र को अपने पास बुलाया और एक पेंसिल थमा दी। छात्र ने पूछा, "इससे क्या होगा?" शिक्षक ने कहा, "यह पेंसिल तुम्हें पाँच महत्वपूर्ण बातें सिखाती है। यदि तुम इन्हें समझ गए, तो तुम कभी निराश नहीं होगे। पहली बात: तुम इससे बहुत महान कार्य कर सकते हो, लेकिन तुम्हें इसे किसी के हाथ में सौंपना होगा (अर्थात सही मार्गदर्शन में रहना होगा)। दूसरी बात: लिखते समय यदि कोई गलती हो, तो इसे मिटाने (इरेज़र) की सुविधा होती है, जिसका अर्थ है कि गलतियों को सुधारा जा सकता है। तीसरी बात: पेंसिल के बाहरी रूप पर ध्यान मत दो, बल्कि उसके अंदर मौजूद 'ग्रेफाइट' (Lead) पर ध्यान दो जो असल काम करता है (अर्थात बाहरी सुंदरता से ज्यादा आंतरिक ज्ञान महत्वपूर्ण है)। चौथी बात: पेंसिल को छीलना (Sharp) पड़ता है, जो यह दर्शाता है कि जीवन में आने वाली मुश्किलें और चुनौतियाँ ही तुम्हें और अधिक योग्य बनाती हैं। और पाँचवी बात: पेंसिल हमेशा पीछे एक निशान छोड़ जाती है, ठीक वैसे ही तुम्हारे जीवन का हर कार्य एक छाप छोड़ेगा।"



चाणक्य की प्रतिज्ञा और चंद्रगुप्त की खोज

आचार्य चाणक्य (जिन्हें कौटिल्य या विष्णुगुप्त भी कहा जाता है) ने मगध के क्रूर नंद शासक धनानंद द्वारा किए गए अपमान का बदला लेने की प्रतिज्ञा की थी।  उन्होंने एक योग्य शासक की तलाश में युवा चंद्रगुप्त को चुना, जो एक चरवाहा बालक था।  चाणक्य चंद्रगुप्त को तक्षशिला ले गए, जहाँ उन्हें राजनीति, युद्ध और अर्थशास्त्र की शिक्षा दी गई। मौर्य साम्राज्य की स्थापना चाणक्य की रणनीतिक बुद्धिमत्ता और चंद्रगुप्त के सैन्य कौशल ने मिलकर नंद साम्राज्य की विशाल सेना को हरा दिया।  लगभग 321 ईसा पूर्व में चंद्रगुप्त मौर्य ने पाटलिपुत्र पर अधिकार कर लिया और मौर्य साम्राज्य की नींव रखी।  बाद में उन्होंने उत्तर-पश्चिम भारत में सिकंदर के उत्तराधिकारी सेल्यूकस निकेटर को भी हराया। अर्थशास्त्र और राज्य संचालन  चाणक्य द्वारा रचित 'अर्थशास्त्र' राज्य संचालन, कूटनीति, अर्थनीति और युद्ध कला पर आधारित एक अद्वितीय ग्रंथ है। चाणक्य ने चंद्रगुप्त का मार्गदर्शन किया कि कैसे एक आदर्श राजा को अपनी प्रजा की भलाई करनी चाहिए और अपने साम्राज्य की सीमाओं की रक्षा करनी चाहिए।विरासतचंद्रगुप्त और चाणक्य की जोड़ी ने पहली बार अखंड भारत (वर्तमान भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के क्षेत्रों) को एक शासन के अधीन किया। उनकी यह ऐतिहासिक साझेदारी आज भी नेतृत्व, कूटनीति और गुरु-शिष्य परंपरा का सबसे बड़ा उदाहरण मानी जाती है। 

( सतीश शर्मा जी द्वारा संकलित )


टिप्पणियाँ