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भारत को जाने-1 , भारत का विज्ञान प्राचीन काल से अच्छा रहा है

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भारत को जाने    आपको यह तो पता होगा की भारत 100 मिलियन वर्षो पहले एक द्वीप हुआ करता था?  तक़रीबन 50-60 मिलियन साल पहले, भारत का एशियाई महाद्वीप से टकराव हुवा और इस तरह दुनिया की छत यानि हिमालय का जन्म हुआ। गज़ब तथ्य, है ना? भारत अपनी समृद्ध विरासत और संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है। भारत की प्रतिभा यहाँ नहीं रुकती है। वास्तव में, भारत की समृद्धि इसके इतिहास, कला, प्राचीन तकनीकों, विज्ञान और बहुत कुछ के संदर्भ में अथाह है। भारत अनगिनत चीजों का आविष्कारक रहा है। आज हम आपको ऐसे ही 30 रोचक तथ्य बताएँगे भारत के विषय में। 1. दिमाग का खेल शतरंज भारत ने दुनिया को एक उपहार के रूप में दिया है। गुप्त साम्राज्य के दौरान लगभग 1500 साल पहले इसका आविष्कार किया गया था। इसे प्राम्भ में चतुरंग के नाम से जाना जाता है। 2. पुरे विश्व को स्वस्थ और तंदुरुस्त बनाने वाले योग का जन्म ईसा पूर्व 5 वीं शताब्दी के लगभग प्राचीन भारत में हुवा था। आज समस्त संसार के लोग योग के द्वारा अपने शरीर को स्वस्थ बना रहे है, क्यों है ना Interesting Facts About India . 3. समस्त विश्व में सबसे ज्यादा वर्षा वाली जगह भारत क...

प.पू. आद्य सरसंघचालक डा. केशव बलिराम हेडगेवार एक परिचय

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  प.पू. आद्य सरसंघचालक डा. केशव बलिराम हेडगेवा र सन् 1889 की 1 अप्रैल प्रतिपदा का दिन था। परम्परागत ढंग से हिन्दू घरों में भगवा फहराया जा रहा था। ऐसा ही खुशी का अवसर इस दिन नागपुर के एक गरीब ब्राह्मण बलिराम पंत हेडगेवार के परिवार में पांचवी संतान का जन्म हुआ था। इस महज संयोग को इस बालक ने अपने कर्तृत्व एवं व्यक्तित्व, संकल्प, साधना एवं संस्कार, शुद्ध चरित्र एवं मौलिक चिंतन से यथार्थ में बदल दिया। बचपन का केशव आधुनिक भारत के निर्माण की संकेत-रेखा था, जो आगे चलकर डा. केशव बलिराम हेडगेवार के रूप में यशस्वी हुआ। बलिराम पंत का परिवार बड़ा था। माता-पिता के प्यार ने बच्चों को गरीबी का अनुभव नहीं होने दिया। अपने दोनों ज्येष्ठ पुत्रों को वेद अध्ययन के लिए प्रेरित किया। केशव का भी नाम संस्कृत पाठशाला में लिखाया। परन्तु इस परम्परावाद पर उनके छोटे पुत्र ने प्रश्न खड़े करने का सफल कार्य किया। केशव की मानसिक संरचना असाधारण थी। उनकी कुशाग्र बुद्धि चंचलता और प्रतिभा ने उन्हें आधुनिक शिक्षा के लिए प्रवृत्त किया एवं माता-पिता ने लीक से हटकर बाद में पारिवारिक परम्परा के प्रतिकूल उनका नाम पूरे मध्यप्र...

वीर बलिदानी दिवस

 गुरु गोविंद सिंह व उनके चार पुत्र  गुरु गोविंद सिंह जी सिखों के दसवें और अंतिम गुरु थे। उनका जन्म 22 दिसंबर, 1666 को पटना में हुआ था।उन्होंने खालसा पंथ की स्थापना की थी।उन्होंने गुरु ग्रंथ साहिब को सिख धर्म का प्राथमिक पवित्र धार्मिक ग्रंथ और शाश्वत गुरु के रूप में प्रतिष्ठित किया। उन्होंने चंडी द वार, जाप साहिब, खालसा महिमा, बचित्र नाटक, जफ़रनामा जैसे कई महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे।उनकी काव्य रचना दशम ग्रंथ के नाम से जानी जाती है। गुरु गोबिंद सिंह ने अपने सिखों को मूल्य और वीरता से भरने के लिए हमेशा अपने हाथ में एक सफ़ेद बाज़ रखा. गुरु गोबिंद सिंह ने मुगलों की सेना को चिड़िया और सिखों को बाज़ कहा था. “सवा लाख से एक लड़ाऊं,चिड़ियन ते मैं बाज़ तुड़ाऊं,तबै गुरु गोबिंद सिंह नाम कहाऊं” यह सिखों के दसवें गुरु गुरु गोबिंद सिंह का एक अनमोल वचन है |धर्म की रक्षा के लिए उन्होंने मुगलों के साथ 14 युद्ध लड़े | गुरु गोविंद सिंह जी ने अपने पिता गुरु तेग बहादुर सिंह, चारों बेटों, और खुद भी बलिदान देकर धर्म की रक्षा की | गुरु गोविंद सिंह जी की मृत्यु 7 अक्टूबर, 1708 को महाराष्ट्र के नांदेड़ साहिब...

कुम्भ मेला ओर ग्रह स्थिति

 कुम्भ मेला ओर ग्रह स्थिति सभी महाकुंभ मेले का आयोजन ग्रहों की स्थिति के आधार पर किया जाता है,जब बृहस्पति ग्रह वृषभ राशि में होते हैं और सूर्य राशि मकर राशि में गोचर करते हैं, तो महाकुंभ का आयोजन प्रयागराज में किया जाता है । इसी लिए 2025 में महाकुंभ प्रयागराज यमुना गंगा संगम के किनारे में लगेगा। जब सूर्य और गुरु सिंह राशि में एक साथ होते हैं, तो महाकुंभ का आयोजन नासिक गोदावरी के तट पर किया जाता है। जब गुरु ग्रह कुंभ राशि में और सूर्य मेष राशि में होते हैं, तो हरिद्वार गंगा किनारे में महाकुंभ का आयोजन होता है । जब सूर्य अपनी उच्च राशि मेष और गुरु सिंह राशि में विराजमान होते हैं, तो महाकुंभ का आयोजन उज्जैन शिप्रा नदी के किनारे में किया जाता है । ज्योतिष के मुताबिक, महाकुंभ के समय ग्रहों की स्थिति शुभ होती है । इस समय स्नान करने, साधना करने व पूजा-अर्चना करने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। मनुस्मृति: मनु के नियम (लगभग 1500 ई.पू. -या बाद में-) (जी. बुहलर द्वारा अनुवादित अध्याय 9: 1. अब मैं कर्तव्य पथ पर चलने वाले पति-पत्नी के लिए शाश्वत नियमों का प्रतिपादन करू...

मान चित्र परिचय

  मानचित्र परिचय  सतीश शर्मा  पृथ्वी के सतह के किसी भाग के स्थानों, नगरों, देशों, पर्वत, नदी आदि की स्थिति को पैमाने की सहायता से कागज पर लघु रूप में बनाना मानचित्रण कहलाता हैं। मानचित्र दो शब्दों मान और चित्र से मिल कर बना है जिसका अर्थ किसी माप या मूल्य को चित्र द्वारा प्रदर्शित करना है। भारत की पारम्परिक सीमा "त्रिविष्टप" (तिब्बत) भारत के उत्तर में रही है। कैलाश मानसरोवर, गान्धार, कश्यप-सागर (कैस्पियन सागर), बर्मा (ब्रह्मदेश), श्रीलंका, ईरान (आर्यान), अफगानिस्तान (उप गणस्थान) आदि भारत के अंग रहे हैं। वृहत्तर भारत की सीमाएं- दक्षिण में हिन्दु महासागर और पूर्व में ब्रह्मदेश, श्याम, काम्बोज, द्वारावती (सुमात्रा), स्वर्ण दीप (बोर्नियो), सिंह द्वीप आदि । हिन्दु एशिया (इण्डोनेशिया) पश्चिम में यूनान तक महाभारत का विस्तार । समस्त पृथ्वी पर चक्रवर्तियों का शासन (धर्मानुशासन)। महाभारत के युद्ध (जनमेजय) के बाद चक्रवर्ती प्रथा समाप्त। भारत की सीमायें क्रमश: संकुचित । बुद्ध के पश्चात् सैनिक तैयारियाँ और जागरुकता भी बन्द । चन्द्रगुप्त मौर्य को फिर से दहेज में गान्धार मिला परन्तु अरब...

संघ स्थापना की पृष्ठभूमि

  संघ स्थापना की पृष्ठभूमि • संघ संस्थापक प.पू. डॉ. हेडगेवार जो अपने जीवन काल में राष्ट्र की स्वतन्त्रता के लिये चल रहे सामाजिक, धार्मिक, क्रान्तिकारी व राजनैतिक क्षेत्रों के सभी समकालीन संगठनों व आन्दोलनों से सम्बद्ध रहे। उन्होंने अनेक महत्त्वपूर्ण आन्दोलनों का नेतृत्व भी किया। इन सभी के अध्ययन व मुल्यांकन के चाद उन्होंने राष्ट्र की परतन्त्रता के कारणों को सार रूप में प्रकट किया। उन्होंने राष्ट्र की अवनति के तीन प्रमुख कारण बताये। १. आत्मविस्मृत समाज (समाज की आत्मविस्मृति) हिन्दुत्व की श्रेष्ठता, गौरवशाली अतीत, राष्ट्रीय एकात्मता व सामाजिक समरसता के भाव का विस्मरण। २. आत्मकेन्द्रित व्यक्ति- समाज हित दुर्लक्षित, स्वार्थपरता, एकाकीभाव प्रभावी ३. सामूहिक अनुशासन का अभाव परिणाम विघटित समाज तथा परतन्त्र व खण्डित राष्ट्र। मुस्लिम तथा ब्रिटिश आक्रमण व शासन के दुष्परिणाम - प्रतिक्रियात्मक देशभक्ति का निर्माण (भावात्मक, स्वाभाविक, सकारात्मक (Positive) देश भक्ति की सम्यक् कल्पना का अभाव)। आत्महीनता के भाव का होना- भाषा, शिक्षा, जीवन मूल्यों, महापुरुषों, इतिहास आदि के प्रति स्वाभिमान शून्यता...

पंच परिवर्तन

 पंच परिवर्तन  स्व आधारित जीवनशैली अपने पूर्वजों, परंपरा, ज्ञान-संपदा पर गर्व करना। बुनियादी जानकारी के लिए घर पर आवश्यक सामग्री उपलब्ध होना। हमारी जीवनशैली आधुनिक हो लेकिन पश्चिमी नहीं। फर्क समझना चाहिए। घर में स्वदेशी, स्थानीय उत्पादों पर जोर दें। हमारे त्यौहार, माध्यमों के प्रभाव के आगे झुके बिना सभ्य एवं सरल तरीके से मनाएं। सदियों से चली अपनी परंपराओं का पालन करना। जन्मदिन, विवाह वर्षगाँठ आदि को भारतीय पद्धती से मनाना। देव दर्शन, बड़ों का आशीर्वाद, सामाजिक संवेदना का ध्यान रखना। बच्चों का नामकरण अपनी संस्कृति के अनुसार करें। मातृभाषा, राष्ट्रभाषा के प्रति स्वाभिमान रखना। हस्ताक्षर, शुभकामनाएँ, गृह पट्टिकाएँ, शुभकामनाएँ, स्टिकर सभी मातृभाषा में हो। 'जंक फूड' से बचें और घर पर बने भोजन को प्राथमिकता दें। व्यावहारिक लाभ और हानि को प्राथमिकता न दे भावनात्मक संबंधों के महत्व को बनाए रखना। अधिकार की भाषा बोले बिना कर्तव्याधारित जीवनशैली विकसित करना। हमारी जीवनशैली में समाज के वंचित बंधुओं के प्रति कर्तव्य, दान के महत्व को रेखांकित करना। 'इस्तेमाल करो और फेंक दो' दृष्टिकोण ...

महारानी अहिल्याबाई होलकर

  महारानी अहिल्याबाई होलकर भारत का अपना एक समृद्धशाली इतिहास रहा है | संस्कृति और परंपराओं का देश भारत हमेशा से ही दुनिया भर में आकर्षण का केंद्र रहा है। यहां की विविधताओं की वजह से दुनिया भर से लोग यहां खींचे चले आते हैं। यहां कई शासकों ने शासन किया, तो वहीं यहां कई लड़ाइयां भी लड़ी गईं। इसके अलावा भारत के इतिहास के पन्नों में कई ऐसी रानियों के नाम भी शामिल हैं, जिन्होंने अपने पराक्रम और दृढ़ निश्चय से विरोधियों को कड़ी टक्कर दे हराया है । रानी अहिल्याबाई उन्ही वीरांगनाओ में से एक थीं, उनका नाम लोग सम्मान सहित याद करते है ।अहिल्याबाई होलकर भारत माता की वह बेटी थी जिसने 275 साल पहले ही कुरीतियों की बेड़ियों को तोड़ व उन्हे समाप्त करने का प्रयास किया । राज्य मे संकट के समय जब जरूरत पड़ी तो अपनी प्रजा के लिए घोड़े पर सवार होकर खड़ग हाथ मे लिए जंग भी लड़ी। धर्म का संदेश फैलाया,मंदिरों का निर्माण किया , संस्कृति संरक्षण, बालिका शिक्षा, महिला अधिकारों और औद्योगीकरण को बढ़ावा दिया। होलकर साम्राज्य की महारानी होलकर भारतीय इतिहास की कुशल महिला शासकों में से एक रही हैं। इनका जन्म 31 मई, 17...

स्वामी विवेकानन्द

 स्वामी विवेकानंद स्वामी विवेकानंद के जीवन की प्रेरक कहानियां जो हमें बहुत कुछ सिखा जाती है।  संस्कृति वस्त्रों में नहीं, चरित्र के विकास में है एक बार जब स्वामी विवेकानन्द जी विदेश गए.... तो उनका भगवा वस्त्र और पगड़ी देख कर लोगों ने पूछा स्वामी जी बोले...' बस यही सामान है'.... आपका बाकी सामान कहाँ है? तो कुछ लोगों ने व्यंग्य किया कि... 'अरे! यह कैसी संस्कृक्ति है आपकी? तन पर केवल एक भगवा चादर लपेट रखी है....... कोट पतलून जैसा कुछ भी पहनावा नहीं है? इस पर स्वामी विवेकानंद जी मुसकुराए और बोले- 'हमारी संस्कृति आपकी संस्कृति से भिन्न है.... आपकी संस्कृति का निर्माण आपके दर्जी करते हैं .... जबकि हमारी संस्कृति का निर्माण हमारा चरित्र करता है, संस्कृति वस्त्रों में नहीं, चरित्र के विकास में है। सच्चा पुरुषार्थ एक विदेशी महिला स्वामी विवेकानंद के समीप आकर बोली: "मैं आपसे शादी करना चाहती हूँ" विवेकानंद बोले: "क्यों? मुझसे क्यों ? क्या आप जानती नहीं की मैं एक सन्यासी हूँ?" औरत बोली: "मैं आपके जैसा ही गौरवशाली, सुशील और तेजोमयी पुत्र चाहती हूँ और वो वह त...

भगवा ध्वज एवं समर्पण भाव जागरण

 भगवा ध्वज एवं समर्पण भाव जागरण  ध्वज का प्रादुर्भाव अनायास ही नहीं होता। ध्वज की पृष्ठभूमि में उस राष्ट्र के दीर्घकालीन गौरवशाली इतिहास, वहाँ की श्रेष्ठ परम्पराओं, जीवन दृष्टि व समाज के दीर्घ कालीन लक्ष्य दृष्टिगोचर होते हैं। इसलिए ध्वज मार्गदर्शक एवं प्रेरणा का केन्द्र होता है। ध्वज किसी भी राष्ट्र अथवा समाज के चिन्तन, ध्येय का प्रतीक तथा स्फूर्ति का केन्द्र होता है। वह राष्ट्र के यश, गौरव, वैभव, पराक्रम, त्याग, बलिदान आदि का स्मरण कराता है तथा राष्ट्र व समाज के सुदीर्घ इतिहास की कहानी कहता है। ध्वज को देखते ही वहाँ के समाज की संगठित शक्ति का अनुभव होता है तथा विजीगीषु भावना जागृत होने लगती है।  भगवाध्वज अपने राष्ट्र का पुरातनध्वज । ऋग्वेद में "अरुणाः सन्तु केतवः" का वर्णन। अति प्राचीन काल अर्थात् वैदिक काल से लेकर अँग्रेजों के साथ संघर्ष तक सभी चक्रवर्ती सम्राटों, महाराजाओं तथा सेनापतियों का यही ध्वज था। उदाहरणार्थ - राजा दिलीप, राजा रघु, भगवान श्री राम, अर्जुन के रथ का ध्वज, हर्षवर्धन, पृथ्वीराज चौहान, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, छत्रसाल बुन्देला, राजा कृष्णदेव रा...

डॉ. हेडगेवार जी के जीवन के संस्मरण

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प. पू. डॉ. हेडगेवार आदर्श स्वयंसवेक कल्पना की साक्षात् प्रतिमूर्ति व 'त्यजेदेकं कुलस्यार्थे' अर्थात् 'बड़े हित के लिए छोटे हित का त्याग करना चाहिए' के प्रतीक । डॉक्टर जी का जीवन कष्टपूर्ण। परिश्रमी एवं कर्मठ जीवन का आदर्श उदाहरण, अति निर्धनता में प्लेग के कारण एक ही दिन में माता-पिता की मृत्यु। • पढ़ाई में सदैव अग्रणी। जन्मजात देशभक्त- ८ वर्ष की आयु में इंग्लैण्ड की महारानी विक्टोरिया के राज्यारोहण के ६० वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर मिली मिठाई कूड़ेदान में फेंकना। १२ वर्ष की आयु में इंग्लैण्ड के राजा एडवर्ड सप्तम् के राज्यारोहण के अवसर पर आयोजित आतिशबाजी का बहिष्कार करना व करवाना। १३ वर्ष की आयु में नागपुर के सीतावर्डी किले से यूनियन जैक उतारने के लिए सुरंग खोदना। लोक संग्रही, कुशल संगठक तथा कुशल नेतृत्वकर्ता - १६ वर्ष की आयु में "बान्धव समाज" नामक संस्था जो नागपुर में थी से जुड़ कर अपनी आयु वर्ग के युवाओं के साथ क्रान्तिकारी तथा राष्ट्रीय विषयों पर चर्चा करना। • १८ वर्ष की आयु में विद्यालय निरीक्षक का स्वागत "वन्दे मातरम्" के उद्घोष से करने के लिए विद...