वीर बलिदानी भगतसिंह
स्वतन्त्रता के मतवाले भगत सिंह पद्म सिंह गर्मियों की दोपहर थी। गांव के खेतों में हलचल मची हुई थी। हल जोतते बैलों की घंटियों की आवाज़, मिट्टी की सौंधी खुशबू और हवा में लहराते सरसों के पीले फूलों के बीच एक नन्हा बालक उछलता-कूदता घूम रहा था। यह कोई साधारण बालक नहीं था—यह था भगत, भगत सिंह । उसकी चंचल आंखों में अजीब-सा तेज था, उसके चेहरे पर कोई आम बालकों जैसी मासूमियत नहीं, बल्कि एक अजीब तरह की गंभीरता थी। वह अपने पिता और चाचा से कहानियाँ सुनकर बड़ा हो रहा था—कहानियाँ देश की गुलामी की, अंग्रेज़ों के जुल्म की, और उन बहादुर क्रांतिकारियों की, जो भारत माता के लिए हंसते-हंसते फांसी पर झूल गए। उसके घर का माहौल ही ऐसा था कि देशभक्ति उसके खून में घुल चुकी थी। जब बच्चे खिलौनों से खेलते थे, तब वह अपने दोस्तों से पूछता—"आजादी कैसे मिलेगी?" और जब कोई जवाब नहीं दे पाता, तो वह खुद ही कहता—"हमें कुछ करना होगा!" एक दिन, भगत सिंह अपने खेतों में दौड़ते हुए पहुँचा । उसकी जेब में कुछ था—कुछ लोहे की पुरानी कीलें और लकड़ी के टुकड़े, जिन्हें उसने कहीं से इकट्ठा कि...