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श्रवण नक्षत्र का महत्व व उपाय

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 श्रवण नक्षत्र, वैदिक ज्योतिष के 27 नक्षत्रों में से 22वां नक्षत्र है. इसे भगवान विष्णु का नक्षत्र माना जाता है। इस नक्षत्र में जन्मे लोग रचनात्मक, बुद्धिमान, और परिश्रमी होते हैं। श्रवण नक्षत्र से जुड़े कुछ अन्य तथ्य व जानकारी - इस नक्षत्र का स्वामी चंद्रमा है,इस नक्षत्र का प्रतीक कान और बाण है,इस नक्षत्र के चारों चरण मकर राशि में आते हैं,इस नक्षत्र में जन्मे लोग दूसरों की परेशानी नहीं देख सकते और उनकी मदद के लिए हमेशा तैयार रहते हैं,इस नक्षत्र में जन्मे लोग स्वच्छता पसंद करते हैं,इस नक्षत्र में जन्मे लोग यात्राओं के शौकीन होते हैं,इस नक्षत्र में जन्मे लोग सीखने और पढ़ने की चाहत रखते हैं,इस नक्षत्र में जन्मे लोग धर्म-कर्म में रुचि रखते हैं,इस नक्षत्र में जन्मे लोग ज्ञान की गहराई रखते हैं,इस नक्षत्र में जन्मे लोग उदार और दायलु होते हैं,इस नक्षत्र में जन्मे लोग सरल स्वभाव के कारण मित्रों और सगे-संबंधियों में लोकप्रिय होते हैं।इस नक्षत्र का नाम माता-पिता के भक्त श्रवण कुमार के नाम पर रखा गया है। श्रवण नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातकों के लिए कुछ उपाय हैं, जैसे कि कपास की जड़ को भुजा ...

वीर बलिदानी भगतसिंह

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स्वतन्त्रता के मतवाले भगत सिंह पद्म सिंह   गर्मियों की दोपहर थी। गांव के खेतों में हलचल मची हुई थी। हल जोतते बैलों की घंटियों की आवाज़, मिट्टी की सौंधी खुशबू और हवा में लहराते सरसों के पीले फूलों के बीच एक नन्हा बालक उछलता-कूदता घूम रहा था। यह कोई साधारण बालक नहीं था—यह था भगत, भगत सिंह । उसकी चंचल आंखों में अजीब-सा तेज था, उसके चेहरे पर कोई आम बालकों जैसी मासूमियत नहीं, बल्कि एक अजीब तरह की गंभीरता थी। वह अपने पिता और चाचा से कहानियाँ सुनकर बड़ा हो रहा था—कहानियाँ देश की गुलामी की, अंग्रेज़ों के जुल्म की, और उन बहादुर क्रांतिकारियों की, जो भारत माता के लिए हंसते-हंसते फांसी पर झूल गए। उसके घर का माहौल ही ऐसा था कि देशभक्ति उसके खून में घुल चुकी थी। जब बच्चे खिलौनों से खेलते थे, तब वह अपने दोस्तों से पूछता—"आजादी कैसे मिलेगी?" और जब कोई जवाब नहीं दे पाता, तो वह खुद ही कहता—"हमें कुछ करना होगा!"             एक दिन, भगत सिंह अपने खेतों में दौड़ते हुए पहुँचा । उसकी जेब में कुछ था—कुछ लोहे की पुरानी कीलें और लकड़ी के टुकड़े, जिन्हें उसने कहीं से इकट्ठा कि...

नवरात्र पूजन मुहर्त व विथि

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   चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक शक्ति आराधना पर्व का मान है। इसे चैत्र नवरात्र या वासंतिक नवरात्र कहा जाता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि 29 मार्च को शाम 4.56 बजे लग रही है जो 30 को दोपहर 2.40 बजे तक रहेगी। उद्द्यातिथि मान अनुसार, नवरात्र का आरंभ 30 मार्च को होगा। इस बार पंचमी तिथि का क्षय होने से शक्ति आसधन पर्व आठ दिन यानी छह अप्रैल तक है। वासंतिक नवरात्र में पंचमी का क्षय, शक्ति आराधना पर्व आठ दिनी रहेगा | पंचांग के अनुसार, नवरात्र के चौथे दिन दो अप्रैल को चतुथी के साथ ही पंचमी तिथि के भी दर्शन, व्रत, पूजन किए जाएंगे। नवरात्र व्रत, पूजन, पाठ, नैत्यिक दर्शन यात्रा की पूर्णाहुति छह अप्रैल को हवन से होगी।  उदया तिथि में प्रतिपदा मिलने से 30 मार्च को होगा व्रत का आरंभ | चौथे दिन ही चतुर्थी के साथ पंचमी का  भी व्रत  किया जाएगा | इस वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि में वैधृति योग न होने के कारण प्रातः काल से आरंभ कर दोपहर 12:25 तक रहेगी | कलश स्थापना शुभ होगा। किसी कारणवश जो लोग उक्त काल में कलश स्थापन न कर सकें, वे इसके बाद भी रात्रि आठ बजे तक कलश स...

चैत्र नवरात्र पर क्या करें

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एक स्त्री के पूरे जीवनचक्र का बिम्ब है *नवदुर्गा* के नौ स्वरूप- 1. जन्म ग्रहण करती हुई कन्या "शैलपुत्री" स्वरूप है ! 2. कौमार्य अवस्था तक "ब्रह्मचारिणी" का रूप है ! 3. विवाह से पूर्व तक चंद्रमा के समान निर्मल होने से वह "चंद्रघंटा" समान है ! 4. नए जीव को जन्म देने के लिए गर्भ धारण करने पर वह "कूष्मांडा" स्वरूप है ! 5. संतान को जन्म देने के बाद वही स्त्री "स्कन्दमाता" हो जाती है ! 6. संयम व साधना को धारण करने वाली स्त्री "कात्यायनी" रूप है ! 7. अपने संकल्प से पति की अकाल मृत्यु को भी जीत लेने से वह "कालरात्रि" जैसी है ! 8. संसार ( कुटुंब ही उसके लिए संसार है ) का उपकार करने से "महागौरी" हो जाती है ! 9. धरती को छोड़कर स्वर्ग प्रयाण करने से पहले संसार मे अपनी संतान को सिद्धि ( समस्त सुख-संपदा ) का आशीर्वाद देने वाली "सिद्धिदात्री" हो जाती है ! आप सभी को सपरिवार  चैत्र नवरात्रि की अनंत शुभकामनाएँ.!! जय माता दी  मां दुर्गा की तीसरी शक्ति का नाम  चंद्रघंटा  है।  मां चंद्रघंटा का स्वरूप परम शान्तिदायक और...

होलाष्टक व हालिका-दहन का समय

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होलाष्टक  व हालिका-दहन का समय सतीश शर्मा   होलाष्टक का मतलब है, होली से आठ दिन पहले का समय,यह शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है – ‘होली’ और ‘अष्टक’. होलाष्टक, फाल्गुन महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से शुरू होकर पूर्णिमा तक रहता है. क्योंकि होली से 8 दिन पहले होलाष्टक लग जाता है होलाष्टक 7 मार्च से शुरू होगा और 14 मार्च को होलिका दहन के साथ समाप्त होगा इसलिए उसमें कोई शुभ और मांगलिक कार्य नहीं करने चाहिए. तो आइए जानते हैं होलाष्टक के समय कौन से कार्य नहीं करने चाहिए. होलाष्टक के समय कोई भी शुभ कार्य जैसे विवाह, जमीन खरीदना, निर्माण कार्य करना, मुंडन, नामकरण और गृह प्रवेश नहीं करने चाहिए.इन 8 दिनों में प्रह्लाद को आग में जलाने, पर्वत से गिराने, विष देने, हाथियों से कुचलवाने जैसी यातनाएँ दी गईं लेकिन वह भगवान विष्णु की भक्ति से अडिग रहे। धार्मिक दृष्टि से यह प्रह्लाद की कठिन परीक्षा का समय था, इसलिए इसे अशुभ समय माना जाता है। होलिका दहन कब करें प्रदोष-व्यापिनी फाल्गुन पूर्णिमा के दिन भद्रा-रहितकाल में होलिका दहन किया जाता है।    ‘सा प्रदोषव्यापिनी भद्रारहित ग्राह्या ।।...

जानकारी काल हिन्दी मासिक मार्च -2025

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  जानकारी काल      वर्ष-25   अंक - 11    मार्च - 2025 ,  पृष्ठ 47                    www.sumansangam.com      प्रधान संपादक व  प्रकाशक  सतीश शर्मा   कार्यालय  ए 214 बुध नगर इंद्रपुरी  नई दिल्ली 110012  मोबाइल    9312002527  संपादक मंडल  सौरभ  शर्मा, कपिल शर्मा, गौरव शर्मा, डॉ अजय प्रताप सिंह,  करुणा ऋषि,  डॉ मधु वैध, राजेश शुक्ल   प्रकाशक व मुद्रक  सतीश शर्मा के लिय ग्लैक्सी प्रिंटर- 106 F, कृणा नगर नई दिल्ली 110029 , A- 214 बुध नगर इन्दर पूरी नई दिल्ली  110012 से प्रकाशित | सभी लेखों पर संपादक की सहमति आवश्यक नहीं है पत्रिका में किसी भी लेख में आपत्ति होने पर उसके विरुद्ध कार्रवाई केवल दिल्ली कोर्ट में ही होगी  R N I N0-68540/98 मूल्य 02-50  sumansangam.com jaankaarikaal.blogspot.com अनुक्रमणिका अपनों से अपनी बात - 3  छत्रपति संभाजी महाराज की मृत्यु का बदला - 4 लेख ...