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दिसंबर, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अहल्या बाई होल्कर और श्री काशी विश्वनाथ

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   अहल्या बाई होल्कर और श्री काशी विश्वनाथ   1735 में बाजीराव पेशवा की माँ राधाबाई तीर्थयात्रा पर काशी आईं।उनके लौटने के पश्चात ‘काशी के कलंक’ को मिटा देने के संकल्प के साथ पेशवा बाज़ीराव के सेनापति मल्हार राव होल्कर 1742 में गंगा के मैदानों में आगे बढ़ रहे थे। उस समय पेशवाओं की विजय पताका चहुँओर लहरा रही थी।काशी विश्वनाथ के मन्दिर की मुक्ति सुनिश्चित थी। 27 जून 1742 को मल्हार राव होल्कर जौनपुर तक आ चुके थे। उस समय काशी के कुछ तथाकथित प्रतिष्ठित लोग उनके पास पहुँच गए और कहा कि “आप तो मस्जिद को तोड़ देंगे लेकिन आप के चले जाने के बाद मुसलमानों से हमारी रक्षा कौन करेगा।” इस तरह बाबा की मुक्ति के बजाय स्वयं की सुरक्षा को ऊपर रखने वाले काशी के कुछ धूर्तों ने उन्हें वापस लौटा दिया। बाबा विश्वनाथ के मन्दिर की पुनर्स्थापना होती होती रह गई। मल्हार राव होल्कर लौट तो गए लेकिन उनके मन में कसक बनी रही। वही कसक और पीड़ा श्रीमन्त मल्हार राव होल्कर से उनकी पुत्रवधू अहिल्याबाई होल्कर को स्थानान्तरित हुई। अहल्याबाई के लिए उनके ससुर मल्हार राव होल्कर ही प्रेरणा थे क्योंकि अहल्याबाई का ...

धनुषा मंदिर धनुषा धाम नेपाल

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  धनुषा मंदिर धनुषा धाम नेपाल धनुषा का इतिहास धनुषा धाम, पिनाक धनुष, सीता उठा लेती थीं पिनाक धनुष, सीता का विवाह पिनाक धनुष तोड़ने वाले से क्यों? धनुषा नेपाल का प्रमुख जिला है । धनुषा नाम ऐतिहासिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है। दरअसल ये भारतीय संस्कृति के उस संधिकाल का प्रतीक है जब विष्णु के एक अवतार परशुराम और उनके बाद के अवतार श्री राम का परस्पर मिलन हुआ था । धनुषा धाम में आज भी पिनाक धनुष के अवशेष पत्थर के रूप में मौजूद हैं  धनुषा का इतिहास वाल्मीकि रामायण में पिनाक धनुष भंग का विवरण काफी विस्तार से दिया गया है । त्रेतायुगीन जनक सीरध्वज मुनि विश्वामित्र और श्री राम को पिनाक धनुष का इतिहास बताते हुए कहते हैं कि मेरे पूर्वज देवरात को भोलेनाथ ने यह संभाल कर रखने के लिये दिया था । इसकी विशेषताओं का उल्लेख करते हुए मिथिला नरेश कहते हैं कि इस धनुष का प्रयोग मेरे वंश में कोई नहीं कर सका क्योंकि इसे उठाना और प्रत्यंचा चढ़ा पाना किसी के वश की बात नहीं । इसका आकार काफी विशाल है । इसे आठ पहियों वाले संदूक में रखकर मेरे पूजा घर में रखा गया है । हमारे परिवार की पुत्रियां धनुष वाले संदूक ...

भारत की गोरव शाली परम्परा

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  भारत की गौरवशाली परंपरा   सांस्कृतिक, वैचारिक, व्यवहारिक व साहित्य वैभव -  सांस्कृतिक वैभव - चार पुरुषार्थ, धर्म, अर्थ, काम मोक्ष, संस्कार व्यवस्था जन्म से मृत्यु तक 16 संस्कारों की व्यवस्था, पूर्व में 40 संस्कारों का वर्णन |  परिवार व्यवस्था संयुक्त परिवार, उसमें प्रत्येक घटक के संपूर्ण विकास की व्यवस्था इसके लिए समर्पण भाव,  आश्रम व्यवस्था - ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ व संयास आश्रम, गुरु शिष्य संबंध परिकल्पना - गुरुकुल व्यवस्था भारतीय जीवन शैली - आत्मा की अमरता, पुनर्जन्म व कर्मफल का सिद्धांत,  आत्मा परमात्मा तथा जीवात्मा -   परस्पर संबंधित हैं, व्यष्टि, समष्टि, सृष्टि, परमेष्ठी |  ऐहिक जीवन  में प्रगति - ऋग्वेद में कृषि संबंधी वर्णन, कृषि क्षेत्र के सभी यंत्रों व तकनीकी प्रक्रियाओं की विस्तृत जानकारी व वर्णन | जैसे हल, सिंचाई, पशुपालन, जैविक खाद आदि |  संसार में हजारों वर्ष पूर्व सर्वप्रथम कृषि अध्ययन भारत में ही प्रारंभ हुआ हजारों वर्ष पूर्व पुराने कृषि पराशर, वृक्ष, आयुर्वेद आदि कृषि ग्रंथ आज भी विश्व स्तरीय शिक्षा में मा...

जानकारी काल - दिसम्बर - 2021

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  हिंदी मासिक   जानकारी काल   वर्ष-22, अंक-08, दिसम्बर - 2021, पृष्ठ 35, मूल्य-2-50 हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा संरक्षक  श्रीमान कुलवीर शर्मा महामंत्री समर्थ शिक्षा समिति डॉ वी  एस नेगी प्रोफेसर भगत सिंह कॉलेज सांध्य  प्रधान संपादक व्  प्रकाशक  सतीश शर्मा  संरक्षक प्रचार विभाग  विद्या भारती दिल्ली        कार्यालय  ए 214 बुध नगर इंद्रपुरी  नई दिल्ली 110012  मोबाइल   9312002527  संपादक मंडल  सौरभ  शर्मा,कपिल शर्मा, गौरव शर्मा,डॉ अजय प्रताप सिंह, करुणा ऋषि, डॉ मधु वैध,  भूप  सिंह यादव, ऋतु सिंह, राजेश शुक्ल   प्रकाशक व मुद्रक सतीश शर्मा के लिय ग्लैक्सी प्रिंटर -106 F ,कृणा नगर नई दिल्ली 110029, A- 214 बुध नगर इं पूरी नई दिल्ली  110012 से प्रकाशित | सभी लेखों पर संपादक की सहमति आवश्यक नहीं है पत्रिका में किसी भी लेख में आपत्ति होने पर उसके विरुद्ध कार्रवाई केवल दिल्ली कोर्ट में ही होगी   R N I N0-68540/98 जननी जन्म भूमि स्वर्ग से मह...