कुछ कहे कुछ अनकहे प्रसंग
सतीश शर्मा जी द्वारा लिखित व संकलित
कुछ कहे कुछ अनकहे प्रसंग
"घड़ी और समय"
एक दिन शाखा समाप्त होने के बाद डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार अपने कमरे में रखी पुरानी घड़ी को देख रहे थे। तभी माधव सदाशिव गोलवलकर वहाँ पहुँचे।
डॉक्टरजी ने पूछा— "गुरुजी, बताइए, इस घड़ी का सबसे बड़ा गुण क्या है?"
गुरुजी ने उत्तर दिया— "यह कभी रुकती नहीं, समय के साथ निरंतर चलती रहती है।"
डॉक्टरजी मुस्कुराए और बोले— "यदि एक दिन भी रुक जाए, तो लोग इसका भरोसा छोड़ देते हैं।"
फिर उन्होंने कहा—
"स्वयंसेवक का जीवन भी ऐसी ही घड़ी होना चाहिए। नियमित, समयनिष्ठ और निरंतर। समाज का विश्वास भाषणों से नहीं, निरंतर आचरण से बनता है।"
गुरुजी ने गंभीर होकर पूछा— "तो संगठन की सबसे बड़ी शक्ति क्या है?"
डॉक्टरजी ने उत्तर दिया—
"प्रतिदिन का छोटा-सा नियमित प्रयास। वही वर्षों बाद राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति बन जाता है।"
कुछ देर दोनों मौन रहे। घड़ी की टिक-टिक पूरे कमरे में सुनाई दे रही थी।
गुरुजी ने कहा—
"अब समझ गया, समय का सम्मान करने वाला स्वयंसेवक ही समाज का विश्वास जीतता है।"
डॉक्टरजी ने कहा—
"याद रखिए, बड़े परिवर्तन अचानक नहीं होते; वे समय पर किए गए छोटे-छोटे सतत प्रयासों से जन्म लेते हैं।"
रिटायरमेंट
एक पुलिसवाला रोज़ एक ही पेड़ को प्रणाम करता था... उसकी रिटायरमेंट वाले दिन सबको वजह पता चली। ठीक आठ बजते ही शहर के पुराने चौक पर खड़े विशाल बरगद के पेड़ के सामने एक पुलिसवाला रुकता, अपनी टोपी ठीक करता और पूरे सम्मान से प्रणाम करता। फिर बिना कुछ बोले अपनी ड्यूटी पर निकल जाता। यह सिलसिला एक-दो दिन का नहीं, पूरे तीस साल से चल रहा था। लोगों ने कई बार देखा, लेकिन किसी को समझ नहीं आया कि आखिर एक पेड़ को प्रणाम करने की क्या वजह हो सकती है।
कुछ लोग हँसते। "लगता है साहब का दिमाग़ थोड़ा ज़्यादा ईमानदार हो गया है।" कुछ कहते,
"ज़रूर कोई मनोकामना होगी।" नए सिपाही भी कई बार पूछते, मगर इंस्पेक्टर रघुवीर सिंह हमेशा मुस्कुरा कर बस इतना कहते, "जिस दिन वर्दी उतारूँगा, उस दिन बता दूँगा।" धीरे-धीरे यह बात पूरे शहर में मशहूर हो गई।
फिर वह दिन भी आ गया… रघुवीर सिंह की रिटायरमेंट थी। पूरा थाना, अधिकारी, पत्रकार और शहर के लोग उन्हें विदाई देने आए थे। कार्यक्रम खत्म हुआ तो सबने एक ही सवाल पूछा—"सर... अब तो बता दीजिए, आप रोज़ उस बरगद को प्रणाम क्यों करते थे?" रघुवीर सिंह कुछ पल चुप रहे। उनकी आँखें बरगद की ओर उठीं। आज भी उन्होंने वैसा ही प्रणाम किया… लेकिन इस बार प्रणाम करते-करते उनका हाथ काँप गया। आँखों से आँसू बह निकले। उन्होंने धीमी आवाज़ में कहना शुरू किया—"आज से ठीक तीस साल पहले... मैं पुलिस में नया-नया भर्ती हुआ था। वर्दी का घमंड सिर पर था। लगता था मैं जो चाहूँ, वही कानून है।"
"एक रात तेज़ बारिश हो रही थी। इसी चौक पर मेरी ड्यूटी लगी थी। तभी एक बूढ़ा आदमी दौड़ता हुआ आया। उसके कपड़े भीगे हुए थे। उसने हाथ जोड़कर कहा..." "साहब... मेरी बेटी की तबीयत बहुत खराब है। अस्पताल ले जाना है। रास्ता बंद है, मदद कर दीजिए।" रघुवीर ने सिर झुका लिया। "उस दिन मैं चिढ़ा हुआ था। मैंने उसे डाँट दिया। कहा—'भाग यहाँ से... मुझे परेशान मत कर।'" "बेचारा बूढ़ा कुछ देर तक हाथ जोड़ता रहा... फिर चला गया।" भीड़ बिल्कुल शांत थी। रघुवीर की आवाज़ भर्रा गई।
"करीब आधे घंटे बाद सूचना मिली कि चौक के पास एक बच्ची और उसके पिता सड़क किनारे बेहोश पड़े हैं।" "जब मैं पहुँचा... तब तक बहुत देर हो चुकी थी।" "बच्ची की साँसें रुक चुकी थीं..." "और उसका पिता... उसी बरगद के नीचे बैठा था।" "वह मुझे देखकर बोला..." "'साहब... अगर आप पाँच मिनट पहले मदद कर देते... तो मेरी गुड़िया बच जाती।'" "इतना कहकर उसने बच्ची को सीने से लगाया... और वहीं हार्ट अटैक से उसकी भी मौत हो गई।" पूरा मैदान सन्नाटे में डूब गया। रघुवीर की आवाज़ टूटने लगी।
"उस दिन पहली बार समझ आया कि वर्दी इंसान से बड़ी नहीं होती।" "मैंने उसी बरगद के नीचे दोनों की लाशें देखीं..." "और वहीं खड़े होकर कसम खाई कि आज के बाद इस वर्दी का इस्तेमाल कभी किसी को डराने के लिए नहीं करूँगा... सिर्फ़ लोगों की मदद करने के लिए करूँगा।"
उन्होंने गहरी साँस ली। "उस दिन से हर सुबह मैं इस पेड़ को नहीं... अपने अपराधबोध को प्रणाम करता था।" "ताकि मुझे याद रहे कि मेरी एक गलती ने दो ज़िंदगियाँ छीन ली थीं।" लोगों की आँखें भर आई थीं।
रघुवीर आगे बोले— "उस घटना के बाद मैंने कभी किसी गरीब, बूढ़े या मजबूर इंसान को खाली हाथ नहीं लौटाया।" "रात हो या दिन... छुट्टी हो या त्योहार... जहाँ मदद की पुकार सुनी, वहाँ पहुँचा।" "लोग कहते थे मैं बहुत अच्छा पुलिसवाला हूँ..." "लेकिन सच यह है कि मैं हर दिन अपनी एक गलती का कर्ज़ चुका रहा था।" इतना कहकर उन्होंने अपनी जेब से एक पुरानी, धुंधली तस्वीर निकाली। उसमें वही छोटी बच्ची मुस्कुरा रही थी। "यह तस्वीर मुझे उसके पिता की जेब से मिली थी।" "तीस साल से यह मेरे दिल के सबसे करीब रही।" "जब भी कभी गुस्सा आता... मैं यही तस्वीर देख लेता।" अब वहाँ मौजूद बड़े-बड़े अधिकारियों की आँखें भी नम थीं। रघुवीर धीरे-धीरे बरगद के पास गए। उसके तने को दोनों हाथों से छुआ। फुसफुसाकर बोले— "मुझे माफ़ कर देना... मैं तुम्हारी गुड़िया वापस नहीं ला सका।" हवा का एक तेज़ झोंका आया। बरगद की सूखी पत्तियाँ टूटकर उनके कंधों पर गिरने लगीं। ऐसा लगा जैसे प्रकृति खुद उन्हें अंतिम विदाई दे रही हो।
रघुवीर ने अपनी पुलिस कैप उतारी, बरगद की जड़ के पास रखी और बिना पीछे देखे चल पड़े। उस दिन पूरे शहर ने पहली बार समझा… कि सबसे बहादुर पुलिसवाला वह नहीं होता जो अपराधियों को पकड़ ले।
सबसे बहादुर वह होता है जो अपनी गलती को जीवन भर याद रखे, उसे स्वीकार करे और हर दिन किसी अनजान इंसान की मदद करके उसका प्रायश्चित करता रहे। क्योंकि कुछ प्रणाम सम्मान के लिए नहीं होते… कुछ प्रणाम उन आँसुओं के लिए होते हैं, जिन्हें इंसान पूरी ज़िंदगी भूल नहीं पाता।
अपर सत्र न्यायाधीश (श्री) अक्षय कुमार द्विवेदी
मध्य प्रदेश के खंडवा में तैनात ये अपर सत्र न्यायाधीश (श्री) अक्षय कुमार द्विवेदी हैं। ये उन लोगों में से हैं जिन्हें हम सबको ही ससम्मान प्यार करना चाहिए।
‘जज साहब’ ने आलीशान सरकारी बंगला, वीआईपी कार और अन्य सरकारी सुविधाएं लेने से इंकार कर दिया है। वे एक छोटे से कमरे में रहते हैं, अपना खाना खुद बनाते हैं और रोजाना पैदल ही कोर्ट जाते हैं।
जज साहब (अक्षय जी) ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट को आवेदन देकर अपनी सेलरी आधी करने की मांग भी की है। निजी संपत्ति के नाम पर उनके पास सिर्फ अपनी मां द्वारा दिया गया मोबाइल फोन है। उन्होंने आजीवन अविवाहित रहने का फैसला किया है। तबादले पर उन्होंने विभाग से कहा है कि उन्हें देश में कहीं भी भेजा जाए, वे न्यूनतम सरकारी सुविधाएं ही लेंगे।
बचपन में अपनी मां को संपत्ति विवाद के दौरान अदालतों के चक्कर लगाते देखकर उन्होंने जज बनने का निर्णय लिया था। इसी कारण वे अपनी अदालत में आने वाले सभी मुकदमों, खासकर जमीन-जायदाद से जुड़े मामलों का निपटारा बेहद तेजी से करते हैं, ताकि आम लोगों को जल्द से जल्द न्याय मिल सके।
एक बार राजा भोज के दरबार में यह प्रश्न उठा कि ऐसा कौन-सा कुआँ है जिसमें गिरने के बाद मनुष्य कभी बाहर नहीं निकल पाता। इस प्रश्न का उत्तर कोई नहीं दे सका। अंत में राजा भोज ने राजपंडित से कहा कि वे सात दिनों के भीतर इस प्रश्न का उत्तर प्रस्तुत करें, अन्यथा अब तक प्राप्त सभी धन और सम्मान उनसे वापस ले लिए जाएंगे तथा उन्हें नगर छोड़ना होगा। छह दिन बीत गए, पर राजपंडित को कोई उत्तर नहीं मिला। निराश होकर वे जंगल की ओर चले गए। वहाँ उनकी भेंट एक गड़रिए से हुई।
गड़रिए ने पूछा, आप तो राजपंडित हैं, राजा के प्रिय हैं, फिर आपके चेहरे पर इतनी उदासी क्यों है।
पहले तो पंडित ने सोचा कि यह साधारण गड़रिया क्या सहायता करेगा, इसलिए उन्होंने कुछ नहीं कहा। लेकिन गड़रिए ने पुनः आग्रह करते हुए कहा, पंडित जी, हम भी सत्संगी हैं, संभव है आपके प्रश्न का उत्तर मेरे पास हो, आप निःसंकोच बताइए। राजपंडित ने पूरी बात बता दी और कहा कि यदि कल तक उत्तर नहीं मिला, तो उन्हें नगर से निकाल दिया जाएगा। गड़रिया बोला, मेरे पास पारस है, उससे तुम सोना बना सकते हो। एक राजा भोज क्या, अनेक राजा तुम्हारे पीछे चलेंगे। पर एक शर्त है, तुम्हें मेरा चेला बनना होगा। राजपंडित के मन में पहले अहंकार आया कि वे एक साधारण गड़रिए के शिष्य कैसे बन सकते हैं, परंतु स्वार्थवश वे तैयार हो गए। गड़रिया बोला, पहले भेड़ का दूध पीना होगा, तभी तुम मेरे चेला बन सकते हो। राजपंडित ने कहा, यदि ब्राह्मण भेड़ का दूध पिएगा तो उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाएगी, मैं यह नहीं कर सकता। गड़रिया बोला, तो फिर मैं पारस नहीं दूँगा। कुछ सोचकर राजपंडित बोले, ठीक है, मैं दूध पीने को तैयार हूँ। तब गड़रिया बोला, अब मैं पहले दूध को स्वयं पीकर झूठा करूँगा, फिर तुम्हें पीना होगा। राजपंडित ने आपत्ति जताई, पर अंततः वे इसके लिए भी तैयार हो गए। गड़रिया फिर बोला, अब मैं इस दूध को उस सामने पड़ी मृत मनुष्य की खोपड़ी में दुहूँगा, उसे झूठा करूँगा, कुत्ते को चटवाऊँगा, और फिर तुम्हें पिलाऊँगा। तभी तुम्हें पारस मिलेगा। राजपंडित कुछ देर सोचते रहे, फिर बोले, यह कठिन अवश्य है, पर मैं इसके लिए भी तैयार हूँ।
तभी गड़रिया मुस्कुराया और बोला, तुम्हें उत्तर मिल गया। यही वह कुआँ है—लोभ और तृष्णा का कुआँ, जिसमें मनुष्य गिरता ही चला जाता है और कभी बाहर नहीं निकल पाता। जैसे तुम पारस पाने के लोभ में एक के बाद एक शर्त स्वीकार करते चले गए। हम सभी इस संसार के मोह और माया में इस प्रकार उलझ जाते हैं कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य भूल जाते हैं और अधिक पाने की लालसा में निरंतर डूबते जाते हैं।
रेल मंत्री की माँ!
शाम ढल चुकी थी और बनारस के एक छोटे से स्टेशन पर दीयों की मध्यम रोशनी और भाप के इंजनों का शोर गूँज रहा था। एक वृद्ध महिला, जिनकी आँखों में ममता और चेहरे पर गहरी झुर्रियां थीं, हाथ में एक छोटी सी पोटली थामे बदहवास होकर प्लेटफॉर्म की ओर दौड़ी जा रही थीं। उनके मन में बस एक ही डर था—"कहीं दिल्ली वाली आखिरी ट्रेन न छूट जाए।"
लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। जैसे ही वह प्लेटफॉर्म पर पहुँचीं, ट्रेन की आखिरी सीटी गूँजी और उसके गार्ड का लाल सिग्नल अंधेरे में ओझल हो गया।
वृद्ध महिला वहीं एक पुरानी लकड़ी की बेंच पर ढह सी गईं।
दिनभर की थकान और ट्रेन छूटने की चिंता ने उन्हें निढाल कर दिया था। उनके चेहरे पर छाई बेबसी को देखकर पास खड़े एक कुली का दिल पसीज गया।
कुली पास आया और सरलता से पूछा, "माईजी, बड़ी परेशान लग रही हो, कहाँ जाना था आपको?" महिला ने लंबी सांस खींचते हुए कहा, "बेटा, मुझे अपने लाल के पास दिल्ली जाना था। सुना है आज की आखिरी गाड़ी यही थी।"
कुली ने सहानुभूति जताते हुए कहा, "हाँ माई, अब तो कल सुबह ही गाड़ी मिलेगी। पर घबराओ मत, अगर आपका घर दूर है तो यहीं प्रतीक्षालय (Waiting Room) में आपके रुकने का प्रबंध कर देता हूँ और भोजन भी मिल जाएगा। ,,,,,
आखिर दिल्ली में आपका बेटा करता क्या है? क्या वह वहां मजदूरी करता है,,,,,!!!!
माँ की आँखों में एक चमक सी आई और बड़े गर्व से बोलीं, "नहीं बेटा, मेरा लाल रेल महकमे (रेलवे विभाग) में काम करता है।"
कुली उत्साहित हुआ, "अरे वाह! तब तो आप फिक्र ही न करें। आप बस अपने बेटे का नाम बता दें, अगर संभव हुआ तो मैं 'तार' (Telegram) भिजवाकर उनसे आपकी बात करवाने की कोशिश करूँगा।"
माँ ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया, "मैं तो उसे घर में 'लाल' ही बुलाती हूँ, पर दुनिया उसे 'लाल बहादुर शास्त्री' कहती है!,,,,,!!!!
यह नाम सुनते ही कुली के हाथ-पाँव फूल गए। उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। जिसे वह एक साधारण बुढ़िया समझ रहा था, वह कोई और नहीं बल्कि भारत के रेल मंत्री की पूज्य माता जी थीं!
कुली बिना कुछ बोले भागता हुआ स्टेशन मास्टर के केबिन में पहुँचा और हाँफते हुए बोला, "साहब! गजब हो गया! बाहर बेंच पर जो माई बैठी हैं, वो हमारे मंत्री जी, शास्त्री जी की माँ हैं!,,,,,!!!!
स्टेशन मास्टर कुर्सी से उछल पड़े। आनन-फानन में तारों के जरिए संदेश भेजे गए। कुछ ही मिनटों में पूरा स्टेशन प्रशासन हरकत में आ गया। स्टेशन मास्टर अपने मातहतों के साथ भागते हुए उस बेंच तक पहुँचे और माँ के चरणों में सिर झुका दिया।,,,,,!!!!!
स्टेशन मास्टर ने विस्मय से पूछा, "माँ जी, क्या शास्त्री जी ने आपको कभी बताया नहीं कि वह रेलवे में किस पद पर हैं?"
माँ ने सरलता से कहा, "बताया था ना बेटा, बोला था कि अम्मा मैं रेलवे के दिल्ली दफ्तर में एक छोटा सा मुलाजिम (कर्मचारी) हूँ।,,,,!!!!
स्टेशन मास्टर की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने कहा, "माँ जी, आप धन्य हैं और आपके संस्कार धन्य हैं। आपके बेटे 'छोटे मुलाजिम' नहीं, बल्कि इस देश की करोड़ों पटरियों पर दौड़ने वाली हर ट्रेन और हम जैसे लाखों रेल कर्मचारियों के 'मुखिया' हैं। वह भारत के माननीय रेल मंत्री हैं!"
देखते ही देखते स्टेशन का नजारा बदल गया। जो स्टेशन कुछ देर पहले शांत था, वह सायरन की आवाजों से गूँज उठा। जिले के कलेक्टर, पुलिस कप्तान और सुरक्षा बलों का काफिला पहुँच चुका था। एक चमचमाती एंबेसडर कार प्लेटफॉर्म के बाहर खड़ी थी।,,,,,!!!!
वृद्ध माँ, जो कुछ देर पहले एक सामान्य यात्री की तरह बेंच पर बैठी थीं, उन्हें पूरे राजकीय सम्मान के साथ सुरक्षा गार्डों के घेरे में दिल्ली के लिए रवाना किया गया।,,,,,!!!!
वाराणसी के उस छोटे से स्टेशन पर इतिहास रचा जा रहा था, लेकिन दिल्ली में अपने दफ्तर में बैठा वह 'छोटे कद का बड़ा इंसान' इस बात से पूरी तरह अनजान था कि उसकी सादगी ने आज एक बार फिर मानवता का सिर ऊँचा कर दिया है।,,,,,!!!!!
जहाँ आज छोटे पदों पर बैठे लोग भी रसूख दिखाते हैं, वहाँ एक रेल मंत्री की माँ सामान्य यात्री की तरह ट्रेन छूटने पर बेंच पर बैठी रहीं।
शास्त्री जी का अपनी माँ से यह कहना कि वह "रेलवे में एक छोटे मुलाजिम हैं", उनके अहंकार-शून्य व्यक्तित्व को दर्शाता है।
स्व-शिक्षित चॉकलेटियर
सामान्य ज्ञान हमारे जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है कि हम क्या पढ़ते है। जो पढ़ा जा रहा है उसे समझने के लिए मस्तिष्क को लगातार मौजूदा संग्रहीत ज्ञान से आकर्षित होने और उससे जुड़ने की आवश्यकता होती है, समान्य ज्ञान उसकी पूर्ति करता है।
19 साल की उम्र में बच्चे रील बनाते हैं और अश्लील स्टैंड अप कॉमेडी पर समय बर्बाद करते हैं या सरकारी नौकरी के लिए लाइन में लग जाते हैं
उदयपुर के रहने वाले दिग्विजय सिंह की कहानी प्रेरणादायक है। पर्याप्त खाली समय के साथ, उन्होंने अपनी ऊर्जा को किसी दिलचस्प और मजेदार चीज़ में लगाने की कोशिश की। विभिन्न गतिविधियों के साथ प्रयोग करने के बाद, उन्होंने घर पर चॉकलेट बनाने का फैसला किया। दिग्विजय जब सिर्फ़ 16 साल के थे, तब उठाया गया यह छोटा सा कदम आखिरकार उन्हें अपना खुद का ब्रांड शुरू करने के लिए प्रेरित किया।
अब, 19 साल की उम्र में, दिग्विजय एक स्व-शिक्षित चॉकलेटियर हैं, जो साराम नामक एक कंपनी चलाते हैं, जो बीन से लेकर बार तक बढ़िया चॉकलेट बनाती है। इस ब्रांड के तहत, दिग्विजय ने देश भर में सैकड़ों संतुष्ट ग्राहकों को दो टन से ज़्यादा चॉकलेट बेची हैं। उन्होंने दिल्ली, बेंगलुरु, उदयपुर और जयपुर जैसे प्रमुख शहरों में एक वफ़ादार ग्राहक आधार बनाया है।
YouTube की मदद से, दिग्विजय ने चॉकलेट बनाने की कला सीखी और परिवार और दोस्तों को ये मिठाइयाँ बाँटना शुरू किया। दिवाली के दौरान, उनके पिता ने एक कार खरीदी और शोरूम से उपहार के रूप में उन्हें चॉकलेट का एक डिब्बा मिला। जब सिंह को पता चला कि शोरूम अपने सभी ग्राहकों को ये चॉकलेट देता है, तो उन्हें होटल मालिकों और कार शोरूम से संपर्क करके अपनी घर की बनी चॉकलेट बेचने का विचार आया।
2021 में, दिग्विजय को एक कार शोरूम से 1,000 चॉकलेट का पहला ऑर्डर मिला। उन्होंने उसी साल अपना ब्रांड साराम लॉन्च किया। समय बिताने के शौक के तौर पर शुरू हुआ यह काम अब एक सफल चॉकलेट ब्रांड बन गया है, जो देश भर में दो टन से ज़्यादा चॉकलेट बेचकर 5 करोड़ रुपये का राजस्व कमा रहा है। वह सिर्फ़ 19 साल के हैं।
महेश भाई सवाणी, समाज रत्न
महेश भाई सवाणी, सूरत के एक प्रसिद्ध हीरा व्यापारी हैं, जिन्होंने अपनी उदारता से समाज में एक नई मिसाल कायम की है। हर साल, वे 300 गरीब बेटियों की शादी कराते हैं, जिससे न केवल इन लड़कियों के जीवन में खुशियाँ आती हैं, बल्कि उनके परिवारों के लिए भी एक नई उम्मीद जागृत होती है।
महेश भाई का मानना है कि हर बेटी को शादी का हक है, और उनके इस सपने को साकार करने के लिए वे दिल से प्रयास करते हैं। वे अपनी संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा इस noble cause के लिए समर्पित करते हैं। हर शादी समारोह में महेश भाई अपनी पूरी ऊर्जा और प्रेम के साथ शामिल होते हैं, जिससे सभी को एक पारिवारिक माहौल महसूस होता है।
उनकी यह पहल न केवल एक उत्सव होती है, बल्कि यह समाज में एक महत्वपूर्ण संदेश भी देती है कि यदि हम मिलकर काम करें, तो किसी भी चुनौती का सामना किया जा सकता है। महेश भाई ने इन बेटियों को अपनी बेटियों का दर्जा दिया है, जिससे वे आत्मसम्मान और प्यार महसूस करती हैं।
उनकी उदारता और समर्पण ने लाखों लोगों को प्रेरित किया है। महेश भाई के कार्यों से यह स्पष्ट होता है कि सच्ची खुशी दूसरों की मदद करने में है। वे अपने उदाहरण से यह सिखाते हैं कि जब हम एकजुट होकर काम करते हैं, तो हम समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।
महेश भाई सवाणी को समाज का रत्न कहना गलत नहीं होगा। उनकी मानवता और दया के लिए हम उन्हें दिल से सलाम करते हैं। उनका कार्य सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत है, और हमें यह याद दिलाता है कि एक छोटी सी मदद भी किसी के जीवन में बड़ा बदलाव ला सकती है।
हिन्दुत्व का यह महासागर
प्रयागराज कुंभ के सामने जगत के सभी सातों आश्चर्य फीके पड़ गए हैं :-
यही हाल रहा तो भीड़ मैनेजमेंट आईआईएम और आईआईटी जैसे संस्थानों में शोध संबंधी महत्वपूर्ण विषय बन जाएगा । भीड़ मैनेजमेंट में डॉक्टरेट करने वाले अभ्यर्थी ही कुंभ जैसे विराट महापर्वों में मेला यू आयुक्त और मेलाधिकारी के पद संभाला करेंगे ।
प्रयागराज हो , अयोध्या या काशी , श्रद्धालुओं की उमड़ती भीड़ को देखकर आश्चर्य हो रहा है । यही क्यों , मथुरा , वृन्दावन , हरिद्वार , ऋषिकेश , पुरी , उज्जैन , द्वारिका आदि तमाम तीर्थों पर लोग बेतहाशा उमड़ रहे हैं । राम मंदिर का उदघाटन होने के बाद और अब महाकुम्भ में तो तीर्थाटन की बाढ़ ही आ गई है । पर्यटन किस तरह तीर्थाटन में बदल सकता है , दुनिया भारत से सीखे ।
प्रयागराज का मुख्य कुंभ स्नान बीत जाने के बाद भी शेष बचे दो स्नानों ने देश का परिदृश्य ही बदल डाला है । मौनी अमावस्या पर हुई दुर्घटना का कोई असर श्रद्धालुओं पर नहीं है । श्रद्धा के सामने हादसों का भय जब पूरी तरह मिट जाए तो समझिए कि माजरा क्या है ? हिन्दुत्व का यह निर्भय सैलाब अब किसी बंदिश का मोहताज नहीं है ।
श्रद्धा भी ऐसी कि करीब 97 देशों के लोग संसार के इस सबसे बड़े महासमागम की ओर दौड़े जा रहे हैं । यह गंगा यमुना सरस्वती मैया का आकर्षण और आस्था की एक डुबकी लगाने का मोह दुनिया के तमाम आकर्षणों पर भारी है । सच कहें तो प्रयागराज कुंभ के सामने जगत के सभी सातों आश्चर्य फीके पड़ गए हैं । यह कल्पना पश्चिमी देशों में कोई नहीं कर सकता उत्तर प्रदेश के अनेक पड़ौसी राज्यों की सड़कों पर भी मीलों लम्बे बेकाबू जाम इसलिए लगे हैं कि लोग अपनी कारों में बैठकर कुंभ नहाने जा रहे है ? यह तब हो रहा है जबकि अब तक 45 करोड़ श्रद्धालु आस्था की डुबकी त्रिवेणी में लगा चुके हैं । कभी कभी तो ऐसा लगता है कि महाशिवरात्रि के अंतिम स्नान तक कहीं 100 करोड़ की संख्या तो नहीं पहुंच जाएगा स्नानार्थियों का आंकड़ा ? विराट हिन्दुत्व का इस तरह सड़कों पर आ जाना अद्भुत है , अविस्मरणीय है । सच कहें तो न भूतों न भविष्यति ।
कभी सोचा कि पिछले कुछ वर्षों से हिन्दुत्व का यह महासागर सड़कों पर क्यूँ उमड़ रहा है ? क्या राष्ट्रीय परिदृश्य पर एक व्यक्ति के आने के बाद ऐसा हुआ है ? कुंभ मेले पहले से होते आए हैं । प्रयागराज में तो कुंभ मेला कल 45 दिनों का होता है । हरिद्वार में कुंभ मेला 120 दिनों चलता है । उज्जैन और नासिक में भी 60 दिनों कुंभ स्नान चलते हैं । वर्ष 2021 में हरिद्वार कुंभ कोविड का शिकार हुआ अतः लोगों को आने ही नहीं दिया गया । तब अखाड़ों में भी कोरोना फैल गया । लेकिन 2010 के हरिद्वार कुंभ में 8 करोड़ लोग आए थे । श्रद्धा का समुद्र जिस तरह उमड़ रहा है उसे देखते हुए माना जा सकता है कि फिर तो अर्धकुंभ में भी भीड़ संभालना हरिद्वार में असंभव हो जाएगा । 15 दिनों की कांवड़ में ही 5 करोड़ श्रद्धालु गंगाजल भरने आते रहे हैं । क्या अब तीर्थाटन का स्वर्ण युग आ गया है ? भारत जैसे विशाल देश का अपनी जड़ों की ओर लौटना उन ताकतों की गाल पर करारा तमाचा है जिन्होंने आजादी के बाद दशकों तक सनातनी आस्था को दबाने का काम किया । प्रयागराज , अयोध्या और काशी का महायात्रा संदेश अकल्पित है अद्भुत है । यह ऐसा प्रारंभ है जिसका अंत अब कभी नहीं आएगा , शायद कभी नहीं आएगा !
शान से सीनियर
कौन कहता है कि रिटायरमेंट के बाद जीवन में कोई सपना, कोई जुनून नहीं रह जाता? 65 साल के इंजीनियर रमेश गेरा ने रिटायरमेंट के बाद एक नए करियर की शुरुआत की; वो भी नोएडा में अपने घर से ही! रमेश बताते हैं, "2002 में मैं काम के सिलसिले में साउथ कोरिया गया था। वहाँ छह महीने में मैंने हाइड्रोपोनिक्स, माइक्रोग्रीन्स और इंडोर केसर खेती जैसी आधुनिक तकनीकों के बारे में सीखा। इन अनुभवों ने मुझे बहुत प्रभावित किया।" 2017 में रमेश ने अपने 100 वर्ग फुट के कमरे में केसर की खेती शुरू की। 6 लाख के निवेश से उन्होंने एक ऐसा सिस्टम तैयार किया, जिससे हर महीने उन्हें 3.5 लाख का मुनाफ़ा होता है!! केसर फार्मिंग में सफलता हासिल करने के बाद रमेश ने Akarshak Saffron Institute की स्थापना की, जहां वह 370 से ज्यादा लोगों को इंडोर केसर उगाने की ट्रेनिंग दे चुके हैं। उन्होंने इस सफलता को केवल अपने तक नहीं रखा, बल्कि औरों को भी दुनिया के इस सबसे महंगे मसाले की खेती करना सिखाते हैं। अगर आप रमेश से संपर्क करना चाहते हैं या इस बिज़नेस के बारे में और जानना चाहते हैं, तो उनके Youtube Channel 'Akarshak Saffron Instutute, Panchkula' से जुड़ सकते हैं।
चमत्कारी ताबीज
किसी गांव में राम नाम का एक नवयुवक रहता था। वह बहुत मेहनती थे, पर हमेशा अपने मन में एक शंका लिए रहता कि वो अपने कार्यक्षेत्र में सफल होगा या नहीं! कभी-कभी वो इसी चिंता के कारण आवेश में आ जाता और दूसरों पर क्रोधित भी हो उठता।
एक दिन उसके गांव में एक प्रसिद्ध महात्मा जी का आगमन हुआ।
खबर मिलते ही राम, महात्मा जी से मिलने पहुंचा और बोला, “ महात्मा जी मैं कड़ी मेहनत करता हूँ, सफलता पाने के लिए हर-एक प्रयत्न करता हूँ; पर फिर भी मुझे सफलता नहीं मिलती। कृपया आप ही कुछ उपाय बताएँ।”
महात्मा जी ने मुस्कुराते हुए कहा- बेटा, तुम्हारी समस्या का समाधान इस चमत्कारी ताबीज में है, मैंने इसके अन्दर कुछ मन्त्र लिखकर डालें हैं जो तुम्हारी हर बाधा दूर कर देंगे। लेकिन इसे सिद्ध करने के लिए तुम्हे एक रात शमशान में अकेले गुजारनी होगी।”
शमशान का नाम सुनते ही राम का चेहरा पीला पड़ गया, “ लल्ल..ल…लेकिन मैं रात भर अकेले कैसे रहूँगा…”, राम कांपते हुए बोला।
“घबराओ मत यह कोई मामूली ताबीज नहीं है, यह हर संकट से तुम्हे बचाएगा।”, महात्मा जी ने समझाया।
राम ने पूरी रात शमशान में बिताई और सुबह होती ही महात्मा जी के पास जा पहुंचा, “ हे महात्मन! आप महान हैं, सचमुच ये ताबीज दिव्य है, वर्ना मेरे जैसा डरपोक व्यक्ति रात बिताना तो दूर, शमशान के करीब भी नहीं जा सकता था। निश्चय ही अब मैं सफलता प्राप्त कर सकता हूँ।”
इस घटना के बाद राम बिलकुल बदल गया, अब वह जो भी करता उसे विश्वास होता कि ताबीज की शक्ति के कारण वह उसमें सफल होगा, और धीरे-धीरे यही हुआ भी…वह गाँव के सबसे सफल लोगों में गिना जाने लगा।
इस वाकये के करीब १ साल बाद फिर वही महात्मा गाँव में पधारे।
राम तुरंत उनके दर्शन को गया और उनके दिए चमत्कारी ताबीज का गुणगान करने लगा।
तब महात्मा जी बोले,- बेटे! जरा अपनी ताबीज निकालकर देना। उन्होंने ताबीज हाथ में लिया, और उसे खोला।
उसे खोलते ही राम के होश उड़ गए जब उसने देखा कि ताबीज के अंदर कोई मन्त्र-वंत्र नहीं लिखा हुआ था…वह तो धातु का एक टुकड़ा मात्र था!
राम बोला, “ ये क्या महात्मा जी, ये तो एक मामूली ताबीज है, फिर इसने मुझे सफलता कैसे दिलाई?”
महात्मा जी ने समझाते हुए कहा- ” सही कहा तुमने, तुम्हें सफलता इस ताबीज ने नहीं बल्कि तुम्हारे विश्वास की शक्ति ने दिलाई है। पुत्र, हम इंसानों को भगवान ने एक विशेष शक्ति देकर यहाँ भेजा है। वो है, विश्वास की शक्ति। तुम अपने कार्यक्षेत्र में इसलिए सफल नहीं हो पा रहे थे क्योंकि तुम्हें खुद पर यकीन नहीं था…खुद पर विश्वास नहीं था। लेकिन जब इस ताबीज की वजह से तुम्हारे अन्दर वो विश्वास पैदा हो गया तो तुम सफल होते चले गए ! इसलिए जाओ किसी ताबीज पर यकीन करने की बजाय अपने कर्म पर, अपनी सोच पर और अपने लिए निर्णय पर विश्वास करना सीखो, इस बात को समझो कि जो हो रहा है वो अच्छे के लिए हो रहा है और निश्चय ही तुम सफलता के शीर्ष पर पहुँच जाओगे। “
राम महात्मा जी के बात को गंभीरता से सुन रहा था और उसे आज एक बहुत बड़ी सीख मिली थी कि यदि उसे किसी भी क्षेत्र में सफल होना है तो उसे अपने प्रयत्नों पर विश्वास करना होगा। यदि वह खुद पर विश्वास कर लेता है तो उसकी सफलता का प्रतिशत हमेशा बढ़ता चला जायेगा।
भीड़ में भी माँ को अपना बच्चा दिख जाता है
हम लोग समाचार पत्र पढ़ रहे थे। आदि से अंत तक पूरा अखबार पढ़ डाला। इतने में श्री गुरुजी आये और समाचार पत्र उठाकर इधर-उधर निगाह डाली। बातचीत के दौरान संघ संबंधी समाचार का जिक्र आ गया, जो इसी समाचार पत्र में छपा था। मैंने पूछा समाचार है कहाँ? उन्होंने कहा इसी अखबार में तो है। मैंने पूरा अखबार पढ़ा, पन्ने उलटे पर वह समाचार नहीं दिखा। मेरी हैरानी देखकर श्री गुरुजी ने वह समाचार दिखाया, जो बाजारभाव के पन्ने पर छपा था। मैं मन ही मन सोचने लगा, कहाँ छाप दिया है। हम लोग क्या व्यापारी हैं, जो इस पन्ने पर निगाह जाती? फिर दूसरे ही क्षण विचार आया- 'श्री गुरुजी भी तो व्यापारी नहीं है। फिर उनकी निगाह कैसे गयी? मैंने अपनी शंका रखी भी नहीं, पर शायद वे समझ गये।
श्री गुरुजी ने इस पर इतना ही कहा भीड़ में भी माँ को अपना बच्चा दिख जाता है और कोलाहल में भी अपने आत्मीय जनों के शब्द साफ समझ मेंआते हैं।
मेरी समझ में आ गया। ध्येय के साथ उनका यह तादात्म्य है जिसके कारण वे उस समाचार को देख सके। श्री गुरुजी अक्सर कहा करते थे कि मैं तो समाचार पत्र नहीं पढ़ता, परन्तु मैं कहूँगा कि श्री गुरुजी ही समाचार पत्र पढ़ते हैं, और हम लोग तो उन्हें मात्र देखते हैं और बहुत देर तक देखते रहते हैं।
-पं. दीनदयालजी उपाध्याय (श्रीगुरुजी के प्रेरक संस्मरण : पृष्ठ-18)
एकता में दम है
जब पूरा गाँव हार मान चुका था... तब एक 27 साल का युवा खड़ा हुआ और बोला— 'अगर हम मिलकर काम करें, तो हमारा गाँव भी बदल सकता है।'
लोग हँसे... लेकिन कुछ साल बाद वही लोग उस पर गर्व करने लगे।
महाराष्ट्र के एक छोटे से गाँव हिवरे बाज़ार की कहानी किसी फिल्म की पटकथा से कम नहीं है।
आज जिस गाँव को लोग देश के सबसे आदर्श गाँवों में गिनते हैं, कभी उसकी पहचान कुछ और थी। चारों तरफ़ सूखा था। कुएँ सूख चुके थे। खेत बंजर पड़े थे। खेती घाटे का सौदा बन चुकी थी। गाँव के नौजवान रोज़गार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे थे। शराबखोरी बढ़ रही थी, गरीबी हर घर में थी और लोगों को लगने लगा था कि अब इस गाँव का भविष्य खत्म हो चुका है।
ऐसे समय में गाँव के एक युवा, पोपटराव पवार ने सरपंच बनने का फैसला किया।
उनके पास न करोड़ों रुपये थे...
न कोई राजनीतिक ताकत...
न कोई बड़ी डिग्री...
लेकिन उनके पास एक चीज़ थी—
अपने गाँव को बचाने का जुनून।
सरपंच बनने के बाद उन्होंने सबसे पहले लोगों को इकट्ठा किया और एक सवाल पूछा—
"अगर बारिश हर साल होती है, तो फिर हमारे गाँव में पानी क्यों नहीं बचता?"
यही सवाल पूरे बदलाव की शुरुआत बना।
उन्होंने कहा कि सरकार का इंतज़ार करने से कुछ नहीं होगा। अगर गाँव बदलना है, तो गाँव वालों को ही आगे आना होगा।
फिर शुरू हुआ एक ऐसा अभियान जिसने इतिहास बदल दिया। पहाड़ियों पर कंटूर ट्रेंच बनाए गए। छोटे-छोटे चेक डैम बने। नालों को गहरा किया गया। वर्षा जल को रोकने की व्यवस्था की गई। हजारों पेड़ लगाए गए। भूजल रिचार्ज पर लगातार काम हुआ। हर व्यक्ति ने श्रमदान किया। किसी ने पैसा दिया… किसी ने अपना समय… किसी ने अपने हाथों की मेहनत… धीरे-धीरे वह होने लगा जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। पहली बारिश के बाद सूखे कुओं में पानी दिखाई देने लगा।अगले कुछ वर्षों में खेत फिर से हरे होने लगे। जो किसान कभी खेती छोड़ने की सोच रहे थे, वही अब कई फसलें उगाने लगे।
दूध उत्पादन बढ़ा...आमदनी बढ़ी...गरीबी कम होने लगी… जो लोग शहरों में मजदूरी करने गए थे, वे वापस अपने गाँव लौटने लगे। लेकिन बदलाव सिर्फ़ पानी तक सीमित नहीं था। गाँव में शराबबंदी लागू हुई।
पेड़ों की अंधाधुंध कटाई पर रोक लगी। पानी की ज़रूरत के अनुसार फसलें उगाने पर ज़ोर दिया गया। सामूहिक निर्णय लेने की परंपरा विकसित हुई। पारदर्शिता और ईमानदारी को पंचायत की पहचान बनाया गया। आज परिणाम पूरी दुनिया के सामने है। जिस गाँव में कभी पीने के पानी का संकट था...आज वहीं भूजल स्तर कई गुना बेहतर हो चुका है। जहाँ कभी गरीबी थी...वहाँ आज कई किसान लाखों रुपये की खेती कर रहे हैं।जहाँ कभी लोग गाँव छोड़कर जाते थे...आज देश-विदेश से लोग सीखने आते हैं कि एक गाँव अपनी किस्मत कैसे बदल सकता है। सबसे बड़ी बात… यह चमत्कार किसी उद्योगपति ने नहीं किया। किसी विदेशी संस्था ने नहीं किया। किसी अरबों रुपये की योजना ने नहीं किया। यह बदलाव एक ईमानदार नेतृत्व, सामूहिक सोच और गाँव के लोगों की मेहनत ने किया।
इस कहानी की सबसे बड़ी सीख यही है— किस्मत बदलने के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की ज़रूरत नहीं होती… कई बार सिर्फ़ एक ईमानदार इंसान, सही सोच और समाज का साथ ही पूरी तस्वीर बदल देता है।
एक संकल्प...एक गाँव...और पूरे देश के लिए एक प्रेरणा।
"मेरे लिए नहीं, राष्ट्र के लिए"
एक बार श्रीगुरुजी का स्वास्थ्य बहुत खराब था। तेज़ बुखार और लगातार यात्रा के कारण शरीर थक चुका था। साथ के कार्यकर्ताओं ने आग्रह किया कि कुछ दिनों का विश्राम कर लें और कार्यक्रम स्थगित कर दें।
श्रीगुरुजी मुस्कुराए और बोले—
"यदि शरीर की चिंता करके कार्य रोक दूँ, तो स्वयंसेवकों को त्याग का संदेश कैसे दूँ? यह शरीर मेरा नहीं, राष्ट्रकार्य का है। जब तक इसमें प्राण हैं, तब तक इसका प्रत्येक क्षण मातृभूमि के लिए समर्पित है।"
उन्होंने स्वास्थ्य की कठिनाइयों के बावजूद निर्धारित कार्यक्रम पूरे किए। उनके इस आचरण को देखकर अनेक स्वयंसेवकों ने संकल्प लिया कि वे भी सुविधा नहीं, कर्तव्य को प्राथमिकता देंगे।
इस प्रसंग का संदेश केवल इतना नहीं कि बीमारी में भी काम करना चाहिए, बल्कि यह कि कर्तव्य के प्रति निष्ठा, आत्मानुशासन और राष्ट्रसेवा की भावना व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में भी दृढ़ बनाए रखती है।
स्वयंसेवकों के लिए संदेश:
"थकान शरीर में होती है, संकल्प में नहीं। जब लक्ष्य राष्ट्र हो, तो हर कदम साधना बन जाता है।"
दुर्दम्य आत्मविश्वास
सबेरे का समय, चाय-पान का वक्त, पूजनीय श्री गुरुजी के कमरे में (उसे कोठरी कहना ही अधिक उपयुक्त होगा) जब हम लोग प्रविष्ट हुए तब वे कुर्सी पर बैठे थे। चरण स्पर्श के लिए हाथ बढाए। सदैव की भाँति पॉव पीछे खींच लिए। मेरे साथ आए स्वयंसेवकों का परिचय हुआ। उनमें आदिलाबाद के एक डॉक्टर थे। श्री गुरुजी विनोदवार्ता सुनाने लगे कि एक मरीज एक डॉक्टर के पास गया। डॉक्टर ने पृछा- “क्या कष्ट है? सारी कहानी सुनाओ 7 मरीज बिगड गया। बोला“अगर मुझे ही अपना रोग वताना है तो फिर आप निदान क्या करेंगे? बिना बताए जो बीमारी समझे, मुझे ऐसा डॉक्टर चाहिए।'
डॉक्टर एक क्षण चुप रहे। फिर बोले “ठहरो, तुम्हारे लिए दूसरा डॉक्टर बुलाता हूँ" जो डॉक्टर आया वह जानवरों का डॉक्टर था। बिना कुछ कहे सब कुछ समझ लेता था।
कथा सुनकर हँसी का फव्वारा फूट पडा। रात्रि भर के जागरण की थकान, पल भर में दूर हो गई। श्री गुरुजी स्वयं हँसी में शामिल हो गए।
फिर एक किस्सा सुनाया, हँसतै-हँसते पेट में बल पड गए। इतने में चाय आ गई। चाय सबको मिली या नहीं इसकी चिंता श्रीगुरुजी स्वयं कर रहे थे। कीन चाय नहीं पीता, किसको दूध की आवश्यकता है, इसका उन्हें बडा ध्यान रहता। सबके वाद स्वय चाय ली। कप में नाम मात्र की चाय थी। उन्होंने उसे और कम कराया। शायद हमारा साथ देने के लिए ही वे चायपान कर रहे थे। निगलने मे बडा कष्ट था। साँस लेने में अत्यधिक पीडा थी। किन्तु चेहरे पर थी वही मुक्त मोहिनी मुस्कान। हृदय-हृदय को हरने वाला हास्य। मुरझाए मन की कली-कली को खिलाने वाली खिलखिलाहट। निराशा, हताशा ओर दुराशा को दूर भगाने वाला दुर्दम्य आत्मविश्वास । कमरे के किसी कोने में मीत खडी थी। शरीर छूट रहा धा। एक-एक कर सभी बंधन टूट रहे थे। महामुक्ति का मंगल मुहूर्त निकट था। एक क्षण के लिए मुझे लगा, शूलों की शय्या पर भीष्म पितामह मृत्यु की बांट जोह रहे हैं। इच्छामरण सुना भर था, आज आँखों से देख लिया। मैंने देखा इच्छामरण (श्री अटलबिहारी वाजपेयी, राजनेता) श्रीगुरुजी समग्र खण्ड 12
*ईमान की आख़िरी चिंगारी*
जब टी. एन. शेषण मुख्य चुनाव आयुक्त थे, उत्तर प्रदेश की यात्रा पर अपनी पत्नी के साथ जा रहे थे। रास्ते में एक पेड़ पर लटका बया पक्षी का घोंसला दिखा—घास से बुना हुआ, सुराही के आकार का, अद्भुत शिल्प। प्रकृति की इंजीनियरिंग का चमत्कार।
पत्नी ने कहा – “इसे मंगवा दीजिए, मैं इसे अपने अहाते में सजाऊँगी।”
सुरक्षा गार्ड ने पास के चरवाहे लड़के से कहा – “ला दोगे तो 10 रुपये मिलेंगे।”
लड़के ने मना कर दिया।
शेषण स्वयं आगे बढ़े – “50 रुपये दूँगा।”
लड़का बोला –
“साहब, इसमें चिड़िया के बच्चे हैं। शाम को माँ आएगी। उसे अपने बच्चे नहीं मिलेंगे तो बहुत दुख होगा। आप चाहे कितने पैसे दे दें… मैं यह घोंसला नहीं उतारूँगा।”
उस क्षण पद, प्रतिष्ठा, रुतबा—सब बौने हो गए।
शेषण ने बाद में स्वीकार किया—
“शिक्षित मैं था… पर समझदार वह लड़का निकला।”
एक और दृश्य।
सड़क किनारे भिखारियों की पंक्ति। एक परिवार बेटी के जन्मदिन पर भोजन बाँट रहा था। आख़िर में एक पैकेट बच गया।
“भाई, इसे भी रख लो।”
भिखारी ने मना किया—
“आपसे ले चुका हूँ। दिन भर के लिए काफी है।”
“कल काम आ जाएगा…”
“साहब, आगे कोई और भूखा होगा। उसे दे दीजिए। उसे मुझसे ज्यादा ज़रूरत होगी।”
जिसे समाज “अशिक्षित” कहता है,
वही इंसानियत का सबसे ऊँचा पाठ पढ़ा गया।
इंसानियत का पाठ
एक मोटर पार्ट्स व्यापारी का जवान बेटा सड़क दुर्घटना में मारा गया।
ड्राइवर ने कहा—ब्रेक नहीं लगे।
जाँच में पाया गया —नकली ब्रेक शू लगे थे।
घर में तूफ़ान— मच गया।
छोटे बेटे ने पिता से कहा—
“पिताजी… आप ही मेरे भाई के हत्यारे हैं। आप ही नकली सामान बेचते हैं।”
उस दिन शायद उस पिता को समझ आया—
मुनाफा कभी-कभी सीधे अपने घर की चिता बनकर लौटता है।
"व्यक्ति नहीं, विचार बड़ा है"
संघ के प्रारंभिक दिनों में नागपुर में एक बैठक चल रही थी। कई वरिष्ठ कार्यकर्ता उपस्थित थे। चर्चा के दौरान किसी स्वयंसेवक ने डॉक्टर हेडगेवार जी की अत्यधिक प्रशंसा करते हुए कहा—
"डॉक्टर जी, आज संघ जिस गति से बढ़ रहा है, वह केवल आपके व्यक्तित्व के कारण संभव हुआ है।"
सभा में बैठे अधिकांश लोगों ने सहमति में सिर हिलाया। तब डॉक्टर जी ने मुस्कुराते हुए सामने बैठे गुरुजी की ओर देखा और कहा—
"यदि संघ केवल किसी एक व्यक्ति के बल पर खड़ा है, तो समझो हमने अभी तक कुछ बनाया ही नहीं।"
कुछ क्षण के लिए वातावरण शांत हो गया।
डॉक्टर जी आगे बोले—
"हमारा उद्देश्य व्यक्तियों का संगठन नहीं, बल्कि राष्ट्रभाव से प्रेरित चरित्रवान स्वयंसेवकों का निर्माण है। व्यक्ति आएंगे, अपना कार्य करेंगे और चले जाएंगे; लेकिन विचार और संस्कार चलते रहने चाहिए।"
गुरुजी यह बात बड़े ध्यान से सुन रहे थे।
डॉक्टर जी ने आगे कहा—
"जिस दिन संघ किसी एक व्यक्ति पर निर्भर हो जाएगा, उसी दिन उसकी शक्ति कमजोर पड़ जाएगी। संघ की वास्तविक शक्ति शाखा में खड़े साधारण स्वयंसेवक में है।"
बाद में जब गुरुजी सरसंघचालक बने, तब उन्होंने भी अनेक बार कहा—
"संघ व्यक्ति-पूजा का संगठन नहीं है। यहाँ विचार, कार्य और राष्ट्र सर्वोपरि हैं।"
यह प्रसंग हमें सिखाता है कि संघ की शक्ति किसी एक नेता में नहीं, बल्कि लाखों स्वयंसेवकों के संस्कार, अनुशासन और राष्ट्रनिष्ठा में निहित है।
संघ का अंतिम लक्ष्य क्या है
यह प्रसंग संघ के प्रारंभिक दिनों में डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार जी और परम पूजनीय गुरुजी (माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर) के बीच हुए आत्मीय संवादों में से एक के रूप में सुनाया जाता है।
एक दिन प्रातःकाल शाखा समाप्त होने के बाद डॉक्टर हेडगेवार जी और गुरुजी नदी के किनारे टहल रहे थे। वातावरण अत्यंत शांत था। शाखा के स्वयंसेवक अपने-अपने घर जा चुके थे। चलते-चलते दोनों संगठन, राष्ट्र और भविष्य की योजनाओं पर चर्चा कर रहे थे।
कुछ देर बाद गुरुजी ने डॉक्टर जी से पूछा— "डॉक्टर जी, संघ का अंतिम लक्ष्य क्या है? हम शाखाएँ लगा रहे हैं, स्वयंसेवकों का निर्माण कर रहे हैं, लेकिन वह दिन कब आएगा जब हम कह सकेंगे कि हमारा कार्य पूर्ण हो गया?"
डॉक्टर जी कुछ क्षण मौन रहे। फिर नदी के प्रवाह की ओर संकेत करते हुए बोले—
"माधव, क्या तुम बता सकते हो कि इस नदी का कार्य कब पूरा होगा?"
गुरुजी ने कहा— "नदी का कार्य तो निरंतर चलता रहता है। वह बहती रहती है, जीवन देती रहती है।"
डॉक्टर जी मुस्कुराए और बोले—
"ठीक वैसे ही संघ का कार्य भी है। राष्ट्र जीवन को सशक्त, संगठित और जागृत बनाए रखना कोई एक दिन का काम नहीं है। यह सतत चलने वाली साधना है। शाखा कोई कार्यक्रम मात्र नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की अखंड प्रक्रिया है।"
फिर उन्होंने कहा—
"जिस दिन समाज स्वयं संगठित, अनुशासित और राष्ट्रभक्ति से परिपूर्ण हो जाएगा, उस दिन भी इस भाव को जीवित रखने के लिए ऐसे संस्कार केन्द्रों की आवश्यकता रहेगी। इसलिए संघ का कार्य किसी लक्ष्य की प्राप्ति पर समाप्त होने वाला नहीं, बल्कि राष्ट्र की चेतना को निरंतर जागृत रखने का कार्य है।"
कहा जाता है कि डॉक्टर जी की यह बात गुरुजी के हृदय में गहराई से उतर गई। बाद में स्वयं गुरुजी ने भी अनेक अवसरों पर संघ कार्य को "नित्य साधना" और "अखंड राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया" के रूप में समझाया।
यह प्रसंग हमें बताता है कि संघ की शाखा केवल दैनिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण की दीर्घकालिक साधना है।
"पत्थर और प्रतिमा"
एक बार संघ शिक्षा वर्ग में रात्रि के समय कुछ स्वयंसेवक शिल्पकला पर चर्चा कर रहे थे। उसी समय डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार जी वहाँ आए। उनके साथ गुरुजी भी थे।
डॉक्टरजी ने पास रखे एक साधारण पत्थर की ओर संकेत करते हुए पूछा—
"गुरुजी, बताइए, इस पत्थर और मंदिर की प्रतिमा में क्या अंतर है?"
गुरुजी ने उत्तर दिया—
"प्रतिमा को शिल्पी ने आकार दिया है, जबकि यह पत्थर अभी साधारण है।"
डॉक्टरजी ने पूछा—
"और शिल्पी प्रतिमा कैसे बनाता है?"
गुरुजी बोले—
"वह पत्थर पर बार-बार चोट करता है, अनावश्यक भाग हटाता है, तब जाकर सुंदर प्रतिमा बनती है।"
डॉक्टरजी कुछ क्षण मौन रहे, फिर बोले—
"मनुष्य का जीवन भी ऐसा ही है। जन्म से कोई महान नहीं होता। अनुशासन, तपस्या और निरंतर अभ्यास ही उसके व्यक्तित्व को गढ़ते हैं।"
गुरुजी ने कहा—
"अर्थात कठिनाइयाँ और संघर्ष भी आवश्यक हैं?"
डॉक्टरजी मुस्कुराए—
"हाँ। जिस पत्थर ने चोटें सह लीं, वही मंदिर में प्रतिष्ठित हुआ। जो चोटों से बचता रहा, वह मार्ग का साधारण पत्थर बनकर रह गया।"
गुरुजी गंभीर होकर बोले—
"तब स्वयंसेवक को कठिनाइयों से घबराना नहीं चाहिए।"
डॉक्टरजी ने उत्तर दिया—
"बिल्कुल। संगठन का कार्य करने वाला स्वयंसेवक जितना तपता है, उतना ही निखरता है।"
दूर ध्वज स्तंभ की ओर देखते हुए डॉक्टरजी ने कहा—
"हमारा उद्देश्य केवल व्यक्तियों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि ऐसे चरित्रवान व्यक्तित्व तैयार करना है जो समाज के लिए आदर्श बन सकें।"
बाद में एक स्वयंसेवक ने अपने संस्मरण में लिखा—
"उस दिन मैंने समझा कि महानता जन्म से नहीं मिलती। जैसे शिल्पी की चोटों से पत्थर प्रतिमा बनता है, वैसे ही अनुशासन और सेवा से साधारण व्यक्ति समाज का पथप्रदर्शक बनता है।" 🚩
“भीगे स्वयंसेवक के लिए अपनी चादर”
एक बार वर्षा ऋतु में रात्रि का कार्यक्रम समाप्त हुआ। दूर-दराज़ से आए स्वयंसेवक वापस लौटने की तैयारी कर रहे थे। तभी डॉक्टरजी की नज़र एक युवा स्वयंसेवक पर पड़ी। उसके कपड़े वर्षा से पूरी तरह भीग चुके थे और ठंडी हवा चल रही थी।
डॉक्टरजी ने पूछा—
“तुम कहाँ से आए हो?”
स्वयंसेवक ने गाँव का नाम बताया और कहा—
“अभी रात में ही वापस जाना है।”
डॉक्टरजी ने देखा कि उसके पास ओढ़ने के लिए कुछ भी नहीं है। उन्होंने बिना कुछ कहे अपनी चादर उतारी और उसके कंधों पर रख दी।
स्वयंसेवक संकोच में पड़ गया—
“डॉक्टरजी, यह कैसे ले सकता हूँ? आपको आवश्यकता होगी।”
डॉक्टरजी मुस्कराए और बोले—
“मेरी चिंता मत करो। संगठन की शक्ति भवनों से नहीं, स्वयंसेवकों से बनती है। स्वयंसेवक सुरक्षित रहेगा, तभी राष्ट्रकार्य आगे बढ़ेगा।”
वह स्वयंसेवक भावुक हो गया। वर्षों बाद उसने कहा—
“उस रात मुझे केवल चादर नहीं मिली थी, मुझे अपनेपन का स्पर्श मिला था।”
उस दिन उपस्थित लोगों ने समझा कि संगठन का विस्तार आदेशों से नहीं, आत्मीयता से होता है।
संदेश:
"जहाँ व्यक्ति को सम्मान और अपनापन मिलता है, वहाँ समर्पण अपने आप जन्म लेता है।" “नाम नहीं, व्यक्ति महत्वपूर्ण”
"व्यक्ति का सम्मान ही संगठन की आत्मा है।"
एक कार्यक्रम में हजारों स्वयंसेवक उपस्थित थे। कार्यक्रम के बाद डॉक्टरजी एक युवा स्वयंसेवक से मिले और उसका नाम लेकर हालचाल पूछा।
पास खड़े कार्यकर्ता आश्चर्यचकित रह गए।
उन्होंने पूछा— “डॉक्टरजी, इतने लोगों में आपको इसका नाम कैसे याद है?”
डॉक्टरजी ने उत्तर दिया— “यदि हम स्वयंसेवकों को केवल भीड़ समझेंगे तो संगठन नहीं बनेगा। प्रत्येक स्वयंसेवक एक व्यक्तित्व है, उसे पहचानना और सम्मान देना आवश्यक है।”
उस स्वयंसेवक की आँखें भर आईं। "व्यक्ति का सम्मान ही संगठन की आत्मा है।"
“जूते बाहर रह गए”
एक नगर में संघ का विशेष बौद्धिक कार्यक्रम आयोजित था। दूर-दूर से स्वयंसेवक आए थे। कार्यक्रम एक छोटे विद्यालय के कक्ष में रखा गया था।
बरसात का मौसम था। बाहर कीचड़ फैला हुआ था। सभी स्वयंसेवक अपने जूते बाहर उतारकर अंदर बैठ गए।
कार्यक्रम शुरू होने ही वाला था कि एक वृद्ध स्वयंसेवक धीरे-धीरे चलते हुए पहुँचे। उनके कपड़े साधारण थे और पैरों में पुराने घिसे हुए जूते थे।
उन्होंने चुपचाप अपने जूते बाहर उतारे और अंदर जाकर सबसे पीछे बैठ गए।
बौद्धिक समाप्त होने के बाद अचानक तेज बारिश शुरू हो गई। लोग जल्दी-जल्दी बाहर निकलने लगे।
तभी एक छोटे बाल स्वयंसेवक की नजर उन वृद्ध स्वयंसेवक के जूतों पर पड़ी। बारिश का पानी उनमें भर चुका था और एक जूता फट भी गया था।
बाल स्वयंसेवक बिना कुछ बोले दौड़कर गया। उसने अपने रुमाल से जूते साफ किए और उन्हें छत के नीचे रख दिया।
वृद्ध स्वयंसेवक यह सब देख रहे थे।
उन्होंने उस बालक के सिर पर हाथ रखते हुए पूछा— “बेटा, तुम मुझे जानते भी नहीं, फिर यह सब क्यों किया?”
बाल स्वयंसेवक मुस्कुराकर बोला—
“शाखा में सिखाया है कि स्वयंसेवक व्यक्ति नहीं, भावना देखता है।”
वृद्ध स्वयंसेवक की आँखें भर आईं। बाद में पता चला कि वे संघ के पुराने प्रचारक रह चुके थे, जिन्होंने अपना पूरा जीवन राष्ट्रकार्य में लगा दिया था।
उस दिन वहाँ उपस्थित सभी लोगों ने समझा कि शाखा केवल बड़े कार्य नहीं, छोटे-छोटे संस्कार भी सिखाती है।
शिक्षा-सच्चे संस्कार वही हैं, जो बिना बताए सेवा और सम्मान करना सिखाएँ।
“गुरुजी और पान की दुकान”
एक बार श्री गुरुजी किसी स्थान पर रुके हुए थे। एक स्वयंसेवक बहुत उत्साह में आया और बोला—
“गुरुजी! हम संगठन का प्रचार बहुत तेज़ कर रहे हैं!”
गुरुजी ने शांत होकर पूछा—
“कैसे?”
वो बोला—
“हर जगह पर्चे बाँट रहे हैं, पोस्टर लगा रहे हैं, लोग हमें जान रहे हैं!”
गुरुजी मुस्कुराए और बोले—
“बहुत अच्छा… लेकिन पान की दुकान पर भी अपना पर्चा लगा आए हो क्या?”
लड़का थोड़ा चौंका—
“जी?”
गुरुजी बोले—
“अगर लोगों की ज़िंदगी में घुलना है, तो सिर्फ दीवारों पर नहीं… रोज़मर्रा की जगहों पर भी जाना पड़ता है।”
सब लोग हँस पड़े, और बात भी दिल में उतर गई।
"बारिश की रात"
संघ शिक्षा वर्ग चल रहा था। एक रात अचानक तेज़ आँधी और बारिश शुरू हो गई। कई तंबुओं में पानी भरने लगा। सभी स्वयंसेवक अपने सामान को बचाने में लग गए।
उसी समय एक स्वयंसेवक ने देखा कि एक वृद्ध शिक्षक के तंबू में भी पानी घुस रहा है। वह तुरंत वहाँ पहुँचा और बिना कुछ कहे उनका सामान सुरक्षित स्थान पर रखने लगा। थोड़ी ही देर में कई अन्य स्वयंसेवक भी आ गए।
पूरी रात वे भीगते रहे, लेकिन किसी ने शिकायत नहीं की। सुबह जब वर्षा रुकी, तो पूरा वर्ग सामान्य रूप से अपनी दिनचर्या में लग गया।
समापन के समय उस वृद्ध शिक्षक ने कहा—
"कल रात किसी ने आदेश की प्रतीक्षा नहीं की। सब स्वयं आगे आए। यही संघ का संस्कार है।"
उस दिन सभी स्वयंसेवकों ने अनुभव किया कि अभ्यास वर्ग केवल कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक ऐसा परिवार है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति दूसरे के लिए खड़ा रहता है।
शिक्षा - सच्चा स्वयंसेवक परिस्थिति की कठिनाई नहीं देखता, बल्कि अपना कर्तव्य देखता है।
“ गुरुजी और टूटी हुई कुर्सी”
एक बार गुरुजी किसी संघ कार्यक्रम में प्रवास पर थे। कार्यक्रम के बाद कार्यकर्ताओं की बैठक आयोजित थी। सभी वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के लिए कुर्सियाँ लगाई गई थीं।
जब गुरुजी बैठक स्थल पर पहुँचे तो उन्होंने देखा कि एक कोने में एक स्वयंसेवक टूटी हुई कुर्सी पर बैठा है, जबकि उनके लिए सबसे अच्छी कुर्सी रखी गई थी।
गुरुजी सीधे उस स्वयंसेवक के पास गए और मुस्कुराकर बोले, "भैया, आप इस कुर्सी पर बैठिए।"
इतना कहकर उन्होंने अपनी कुर्सी उस स्वयंसेवक को दे दी और स्वयं साधारण कुर्सी पर बैठ गए।
बैठक के बाद एक कार्यकर्ता ने पूछा, "गुरुजी, आप तो संघ के सर्वोच्च दायित्व पर हैं, फिर आपने ऐसा क्यों किया?"
गुरुजी ने शांत स्वर में उत्तर दिया—
"संघ में पद बड़ा नहीं होता, स्वयंसेवक बड़ा होता है। यदि स्वयंसेवक का सम्मान नहीं हुआ, तो किसी पद का कोई अर्थ नहीं।"
उस दिन उपस्थित सभी कार्यकर्ताओं ने अनुभव किया कि सच्चा नेतृत्व अधिकार से नहीं, विनम्रता और आत्मीयता से प्रकट होता है।
शिक्षा - जो जितना बड़ा होता है, वह उतना ही अधिक विनम्र होता है।
"अधूरा भोजन"
संघ शिक्षा वर्ग में भोजन का समय चल रहा था। सभी स्वयंसेवक पंक्तिबद्ध बैठकर भोजन कर रहे थे। भोजन परोसने वाले स्वयंसेवक बड़ी तत्परता से सभी की सेवा कर रहे थे।
एक युवा स्वयंसेवक ने देखा कि भोजन परोसने वाला एक कार्यकर्ता स्वयं भोजन नहीं कर रहा था। वह लगातार सभी की थालियाँ भरने में लगा था।
जब सबका भोजन समाप्त हो गया, तब वह कार्यकर्ता भोजन करने बैठा। तब तक केवल थोड़ा सा भोजन बचा था। उसने प्रसन्नता से उतना ही भोजन ग्रहण किया और किसी प्रकार की शिकायत नहीं की।
युवा स्वयंसेवक ने आश्चर्य से पूछा, "आपने पहले भोजन क्यों नहीं किया?"
कार्यकर्ता मुस्कुराकर बोला, "स्वयंसेवक का सुख पहले नहीं, समाज का सुख पहले होता है।"
उस दिन उस युवा स्वयंसेवक ने समझा कि सेवा का अर्थ केवल कार्य करना नहीं, बल्कि अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरों का ध्यान रखना है।
वर्षों बाद वह स्वयंसेवक एक प्रमुख दायित्व पर पहुँचा, लेकिन उसने उस दिन की सीख कभी नहीं भूली।
अभ्यास वर्ग हमें सिखाता है कि नेतृत्व का अर्थ अधिकार नहीं, बल्कि सबसे पहले सेवा और त्याग है।
समाज को समर्पित
गुरुजी संघ-कार्य के लिए निरंतर प्रवास पर रहते थे। एक बार वे संगठन के महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में व्यस्त थे। उसी दौरान उनकी माताजी की तबीयत अत्यंत गंभीर हो गई। परिवार की ओर से संदेश भेजा गया कि वे शीघ्र आ जाएँ।
गुरुजी ने परिस्थिति को समझा, किंतु उस समय उनके सामने हजारों कार्यकर्ताओं और समाज-कार्य की जिम्मेदारी थी। वे तुरंत नहीं पहुँच सके। जब तक वे घर पहुँचे, उनकी माताजी का देहांत हो चुका था।
माता के पार्थिव शरीर के सामने खड़े होकर गुरुजी कुछ क्षण मौन रहे। उनकी आँखें नम थीं। पास खड़े लोगों ने पहली बार उस तपस्वी व्यक्तित्व को भीतर से टूटता हुआ देखा।
कहा जाता है कि उन्होंने धीमे स्वर में कहा—
"मां ने मुझे जन्म दिया था, पर उन्होंने मुझे समाज को समर्पित भी कर दिया था। आज मैं पुत्रधर्म पूरी तरह नहीं निभा सका, पर यह भी उसी संस्कार का परिणाम है जो उन्होंने ही मुझे दिया था।"
उस क्षण वहाँ उपस्थित अनेक लोगों की आँखें भर आईं। एक ओर पुत्र का हृदय था, जो अपनी मां के अंतिम दर्शन तक न कर सका; दूसरी ओर राष्ट्रकार्य के प्रति ऐसा समर्पण था कि व्यक्तिगत दुःख भी कर्तव्य के आगे छोटा पड़ गया।
यह प्रसंग सुनकर अक्सर लोगों के मन में यह विचार आता है कि जिन महापुरुषों को हम मंचों पर देखते हैं, उनके जीवन में भी उतने ही गहरे व्यक्तिगत त्याग और वेदनाएँ होती हैं, जिन्हें इतिहास के पन्ने बहुत कम दर्ज कर पाते हैं।
“एक दीपक, दो संकल्प”
नागपुर में वर्षा का मौसम था। शाखा समाप्त हो चुकी थी। अधिकांश स्वयंसेवक अपने घरों को लौट गए थे। एक कक्ष में डॉ. हेडगेवार जी कुछ पत्र देख रहे थे। तभी गुरुजी वहाँ पहुँचे। कमरे में एक छोटा-सा दीपक जल रहा था। डॉक्टरजी ने दीपक की ओर संकेत करते हुए पूछा— "गुरुजी, इस दीपक में ऐसा क्या है कि अंधकार से घिरा होने पर भी यह बुझता नहीं?"
गुरुजी ने उत्तर दिया— "क्योंकि यह स्वयं जलकर प्रकाश देता है।"
डॉक्टरजी मुस्कुराए और बोले— "यही स्वयंसेवक का जीवन है। उसे अपने लिए नहीं, समाज के लिए जलना होता है।"
कुछ क्षण मौन छाया रहा।
फिर डॉक्टरजी ने मेज पर रखा एक पुराना पत्र गुरुजी को दिया। वह किसी स्वयंसेवक का पत्र था, जिसमें उसने आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद शाखा कार्य जारी रखने का संकल्प लिखा था।
पत्र पढ़ते-पढ़ते गुरुजी की आँखें नम हो गईं।
उन्होंने धीमे स्वर में कहा— "डॉक्टरजी, संघ की वास्तविक पूँजी तो ऐसे ही कार्यकर्ता हैं।"
डॉक्टरजी ने गंभीर होकर उत्तर दिया— "हाँ, भवन, साधन और व्यवस्थाएँ बाद में आती हैं। पहले ऐसे हृदय चाहिए जो राष्ट्र के लिए धड़कते हों।"
इतना कहकर उन्होंने दीपक की लौ थोड़ी ऊँची कर दी।
गुरुजी उस दीपक को देखते रहे। उन्हें लगा मानो वह केवल एक दीपक नहीं, आने वाले भारत का प्रकाश हो। वर्षों बाद एक स्वयंसेवक उस घटना को याद करते हुए कहा करता था— "उस दिन मैंने दो महापुरुषों को कोई योजना बनाते नहीं देखा, बल्कि राष्ट्र के लिए स्वयं को समर्पित करते देखा था।"
एक गिलास पानी
एक बार गर्मी के दिनों में शाखा का विशेष कार्यक्रम चल रहा था। स्वयंसेवक मैदान की व्यवस्था में व्यस्त थे। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद डॉक्टरजी सभी व्यवस्थाओं का निरीक्षण कर रहे थे। तभी उन्होंने देखा कि एक स्वयंसेवक पसीने से तर-बतर बैठा है।
डॉक्टरजी स्वयं उसके पास गए और पानी का गिलास देते हुए बोले— “पहले पानी पी लो।”
स्वयंसेवक आश्चर्यचकित हो गया— “डॉक्टरजी, आप स्वयं?”
डॉक्टरजी ने हँसते हुए कहा— “जो पूरे दिन सबकी चिंता करता रहा, उसकी चिंता कौन करेगा?”
उस दिन उपस्थित लोगों ने देखा कि नेतृत्व केवल निर्देश देने से नहीं, बल्कि आत्मीयता से बनता है। "सच्चा नेतृत्व वही है जो कार्यकर्ता की आवश्यकता को सबसे पहले समझे।"
कार्यकर्ता पहले
एक बार नागपुर में संघ का एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम चल रहा था। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद सभी वरिष्ठ कार्यकर्ता आपस में चर्चा कर रहे थे।
तभी एक स्वयंसेवक थका हुआ-सा एक कोने में बैठ गया। वह पूरे दिन व्यवस्था में लगा रहा था और भोजन भी नहीं कर पाया था। डॉक्टरजी की नज़र उस पर पड़ी। उन्होंने तुरंत एक कार्यकर्ता को बुलाकर पूछा— “उस स्वयंसेवक ने भोजन कर लिया क्या?” जब पता चला कि उसने अभी तक भोजन नहीं किया है, तो डॉक्टरजी स्वयं उसके पास गए और बोले— “पहले भोजन कर लो, फिर बाकी काम होंगे।”
स्वयंसेवक संकोच में पड़ गया— “डॉक्टरजी, अभी बहुत काम बाकी है।”
डॉक्टरजी ने स्नेहपूर्वक कहा— “संघ का काम कार्यकर्ता से चलता है। कार्यकर्ता स्वस्थ और प्रसन्न रहेगा तभी कार्य आगे बढ़ेगा।”
वर्षों बाद गुरुजी ने इस घटना का स्मरण करते हुए कहा— “डॉक्टरजी संगठन नहीं खड़ा कर रहे थे, वे मनुष्य निर्माण कर रहे थे। इसलिए स्वयंसेवक उनसे केवल प्रभावित नहीं, आत्मीयता से जुड़े रहते थे।”
उस दिन उपस्थित लोगों ने अनुभव किया कि संघ में कार्य से अधिक कार्यकर्ता का महत्व है। "कार्य की सफलता का आधार कार्यकर्ता का सम्मान और उसकी चिंता है।"
व्यक्तिगत सुविधा नहीं, कार्यकर्ता का सम्मान
एक बार गुरुजी किसी प्रवास पर थे। लंबी यात्रा और लगातार कार्यक्रमों के कारण वे बहुत थके हुए थे। कार्यकर्ताओं ने उनके विश्राम के लिए विशेष व्यवस्था की थी। उसी समय एक दूरस्थ क्षेत्र से आया एक युवा स्वयंसेवक उनसे मिलने पहुँचा। वह कई घंटों की यात्रा करके केवल गुरुजी के दर्शन और मार्गदर्शन के लिए आया था।
कार्यकर्ताओं ने सोचा कि गुरुजी विश्राम कर रहे हैं, इसलिए उस स्वयंसेवक को बाद में मिलने के लिए कहा जाए। जब गुरुजी को इसका पता चला तो उन्होंने तुरंत उस स्वयंसेवक को बुलवाया।
गुरुजी ने उससे आत्मीयता से बातचीत की, उसकी शाखा, परिवार और कार्य की जानकारी ली। बातचीत के बाद उन्होंने उपस्थित कार्यकर्ताओं से कहा:
"संघ का कार्य भवनों या व्यवस्थाओं से नहीं चलता, स्वयंसेवकों के मन से चलता है। यदि एक स्वयंसेवक इतनी दूर से आया है, तो उसका सम्मान और उत्साहवर्धन करना मेरा प्रथम कर्तव्य है।"
यह सुनकर सभी कार्यकर्ता भावुक हो गए। उस युवा स्वयंसेवक ने बाद में कहा कि गुरुजी के उन कुछ मिनटों ने उसके जीवन की दिशा बदल दी। संगठन का वास्तविक बल कार्यकर्ता होता है। नेतृत्व का अर्थ केवल निर्देश देना नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के प्रति आत्मीयता रखना है। बड़े से बड़ा दायित्व निभाने वाला व्यक्ति भी यदि विनम्र और कार्यकर्ता-केंद्रित रहे, तो संगठन मजबूत बनता है। इसी कारण गुरुजी को केवल एक संगठनकर्ता ही नहीं, बल्कि हजारों स्वयंसेवकों के लिए प्रेरणास्रोत और मार्गदर्शक के रूप में स्मरण किया जाता है।
“स्वयंसेवक का सम्मान”
नागपुर में एक कार्यक्रम समाप्त हुआ था।
डॉक्टरजी मंच से उतर रहे थे। तभी एक युवा स्वयंसेवक दौड़ता हुआ आया और बोला—
“डॉक्टरजी, आज का आपका भाषण बहुत अद्भुत था।”
डॉक्टरजी मुस्कुराए और पूछा—
“भाषण अच्छा था या उसमें व्यक्त संघ का विचार?”
स्वयंसेवक कुछ क्षण चुप रहा।
फिर बोला— “विचार अच्छा था।”
डॉक्टरजी ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा— “बस, यही याद रखना। व्यक्ति नहीं, विचार बड़ा होता है। यदि स्वयंसेवक व्यक्ति के पीछे चलेगा तो संगठन सीमित हो जाएगा, और यदि विचार के पीछे चलेगा तो राष्ट्र का निर्माण होगा।”
पास खड़े गुरुजी यह सब सुन रहे थे। वापस लौटते समय उन्होंने कहा— “डॉक्टरजी, आप हर छोटी बात में भी शिक्षा दे देते हैं।”
डॉक्टरजी मुस्कुराए— “गुरुजी, संघ की शाखा केवल एक घंटे नहीं चलती; स्वयंसेवक का जीवन ही शाखा बन जाना चाहिए।”
कुछ देर दोनों मौन रहे।
बाद में उस स्वयंसेवक ने कहा— “उस दिन मुझे समझ आया कि संघ में व्यक्ति की नहीं, विचार और संस्कार की पूजा होती है।”
"अपना परिचय केवल स्वयंसेवक के रूप में"
एक कार्यक्रम में गुरुजी का परिचय बड़े सम्मान के साथ कराया जा रहा था। वक्ता ने उनके ज्ञान, नेतृत्व और सरसंघचालक पद का विस्तार से वर्णन किया।
जब गुरुजी बोलने के लिए खड़े हुए तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा:
"आपने मेरा जो परिचय दिया, उसमें एक बात सबसे महत्वपूर्ण छूट गई। मैं सबसे पहले और सबसे अंत तक एक स्वयंसेवक हूँ।"
उन्होंने आगे कहा कि संघ में पद का महत्व नहीं, दायित्व का महत्व होता है। यदि स्वयंसेवक भाव समाप्त हो जाए, तो कोई भी पद व्यक्ति को महान नहीं बना सकता।
सभा में उपस्थित कार्यकर्ता इस विनम्रता से अत्यंत प्रभावित हुए। सच्चा नेतृत्व विनम्रता से जन्म लेता है।
पद से नहीं, सेवा और समर्पण से सम्मान मिलता है। स्वयंसेवक भाव ही संघ जीवन की आत्मा है। इसी प्रकार गुरुजी का जीवन यह सिखाता है कि जितनी ऊँचाई मिले, उतनी ही विनम्रता भी बढ़नी चाहिए।
शाखा की टूटी सीटी
एक नगर में एक वृद्ध मुख्य शिक्षक जी थे। उनकी जेब में हमेशा एक पुरानी पीतल की सीटी रहती थी। वर्षों से वही सीटी शाखा में खेल शुरू करवाती, गण सजवाती और प्रार्थना का संकेत देती थी।
एक दिन शाखा के बाद एक बाल स्वयंसेवक ने पूछा —
“शिक्षक जी, यह सीटी तो अब पुरानी और टूटी हुई है। नई क्यों नहीं ले लेते?”
वृद्ध शिक्षक जी मुस्कुराए। उन्होंने सीटी हाथ में लेकर कहा —
“बेटा, इसकी आवाज़ शायद धीमी हो गई है… लेकिन इसने हजारों स्वयंसेवकों को समय, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति की याद दिलाई है।”
कुछ दिनों बाद शिक्षक जी अस्वस्थ हो गए। शाखा की जिम्मेदारी युवाओं ने संभाल ली। पहले दिन सब तैयार थे, पर खेल शुरू होने का संकेत देने वाला कोई नहीं था।
तभी वही बाल स्वयंसेवक आगे बढ़ा। उसने धीरे से वह पुरानी सीटी बजाई। आवाज़ कमजोर थी, लेकिन मैदान में खड़े हर स्वयंसेवक की आँखों में चमक आ गई।
उस दिन सबने अनुभव किया —
संघ केवल वस्तुओं से नहीं चलता, बल्कि पीढ़ियों से चले आ रहे संस्कारों से चलता है।
वर्षों बाद वह बाल स्वयंसेवक स्वयं मुख्य शिक्षक बना। उसकी जेब में भी वही पुरानी सीटी रहती थी।
विशिष्ट कार्यकर्ता बीमार स्वयंसेवक"
एक बार एक युवा स्वयंसेवक गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। उसका परिवार आर्थिक रूप से भी कठिनाई में था।
जब यह बात डॉक्टरजी तक पहुँची, तो वे स्वयं उसे देखने उसके घर गए। हालचाल पूछा, डॉक्टर की व्यवस्था कराई और परिवार को धैर्य बंधाया।
स्वयंसेवक ने संकोच से कहा— "डॉक्टरजी, मेरे लिए इतना कष्ट क्यों कर रहे हैं? संघ के पास तो बहुत कार्य हैं।"
डॉक्टरजी ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा— "संघ का कार्य क्या है? स्वयंसेवकों का जीवन ही तो संघ का कार्य है।"
कुछ दिन बाद वह स्वयंसेवक स्वस्थ होकर शाखा आया। उसने कहा— "मुझे लगा था कि मैं संघ का एक साधारण कार्यकर्ता हूँ।"
डॉक्टरजी मुस्कुराए और बोले— "संघ में कोई साधारण कार्यकर्ता नहीं होता। प्रत्येक स्वयंसेवक राष्ट्रकार्य का अमूल्य साथी है।"
उस दिन उपस्थित स्वयंसेवकों ने अनुभव किया कि संगठन केवल विचारों से नहीं, आत्मीय संबंधों से भी खड़ा होता है। यह प्रसंग संघ की उस परंपरा को दर्शाता है जिसमें कार्यकर्ता को केवल सहयोगी नहीं, परिवार का सदस्य माना जाता है।
बारिश में खड़ा स्वयंसेवक
संघ की एक शाखा में वर्षा ऋतु का समय था। आकाश में घने बादल छाए हुए थे और तेज वर्षा होने लगी। अधिकांश लोगों को लगा कि आज शाखा नहीं लगेगी।
लेकिन एक स्वयंसेवक नियत समय पर शाखा स्थल पहुँच गया। कुछ देर बाद दूसरा आया, फिर तीसरा। अंततः केवल चार-पाँच स्वयंसेवक ही उपस्थित थे।
संयोग से उस दिन उसी शाखा पे डॉक्टरजी भी वहाँ पहुँचे।
उन्होंने देखा कि भीगते हुए स्वयंसेवक पूरे उत्साह से शाखा लगा रहे हैं। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद डॉक्टरजी ने पूछा,
"तुम लोगों को नहीं लगा कि इतनी बारिश में घर पर ही रुक जाना चाहिए था?"
एक स्वयंसेवक ने उत्तर दिया,
"डॉक्टरजी, वर्षा तो आज है, लेकिन राष्ट्रकार्य तो प्रतिदिन है। यदि हम मौसम देखकर आएँगे, तो हमारा संकल्प मौसम से छोटा हो जाएगा।"
यह सुनकर डॉक्टरजी कुछ क्षण मौन रहे। फिर बोले,
"आज शाखा में स्वयंसेवक कम थे, लेकिन मैं कह सकता हूँ कि यहाँ उपस्थित प्रत्येक स्वयंसेवक सौ स्वयंसेवकों के बराबर है। क्योंकि जो व्यक्ति सुविधा नहीं, कर्तव्य देखकर चलता है, वही राष्ट्र का सच्चा सेवक बनता है।"
वर्षों बाद उस घटना को याद करते हुए एक कार्यकर्ता ने कहा,"उस दिन हमें समझ आया कि शाखा में उपस्थित रहने से अधिक महत्वपूर्ण है — अपने संकल्प में उपस्थित रहना।" "परिस्थितियाँ अनुकूल हों तब कार्य करना सामान्य बात है; प्रतिकूल परिस्थितियों में भी कर्तव्य निभाना ही चरित्र की पहचान है।"
व्यक्तिगत पीड़ा से ऊपर संगठन का दायित्व
एक बार गुरुजी लगातार प्रवास पर थे। देश के विभिन्न भागों में स्वयंसेवकों के बीच जाकर संगठन कार्य को गति दे रहे थे। इसी दौरान उन्हें सूचना मिली कि परिवार में एक निकट संबंधी का निधन हो गया है।
सामान्यतः कोई भी व्यक्ति ऐसे समय तुरंत अपने घर लौटना चाहेगा, लेकिन गुरुजी के सामने पहले से निर्धारित कार्यक्रम थे, जिनमें हजारों स्वयंसेवक उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने गहरे दुःख के बावजूद अपने कार्यक्रमों को बीच में नहीं छोड़ा।
जब किसी कार्यकर्ता ने उनसे कहा कि "गुरुजी, आप चाहें तो कार्यक्रम स्थगित कर सकते हैं", तब उन्होंने शांत स्वर में कहा:
"व्यक्ति का जीवन सीमित है, पर राष्ट्रकार्य निरंतर चलने वाला है। व्यक्तिगत शोक अपने स्थान पर है, किंतु समाज के प्रति दायित्व भी उतना ही महत्वपूर्ण है।"
उन्होंने अपने दुःख को सार्वजनिक रूप से प्रकट नहीं होने दिया और निर्धारित कार्यक्रम पूरे किए। बाद में परिवार के प्रति अपने दायित्व भी निभाए। कर्तव्य और भावनाओं के बीच संतुलन ही महानता की पहचान है। राष्ट्र और समाज के लिए समर्पित व्यक्ति व्यक्तिगत कठिनाइयों में भी अपने दायित्वों से विमुख नहीं होता। त्याग केवल बड़े भाषणों से नहीं, बल्कि जीवन के कठिन निर्णयों से सिद्ध होता है। इसी कारण स्वयंसेवकों के बीच गुरुजी का जीवन केवल विचारों के लिए नहीं, बल्कि उनके आचरण और कर्तव्यनिष्ठा के लिए भी प्रेरणा का स्रोत माना जाता है।
अपना स्विच ऑन करना सीखें
अक्सर लोग एक उम्र के बाद यह मान लेते हैं कि अब जीवन में कुछ नया नहीं हो सकता। शरीर बूढ़ा हो गया है, ऊर्जा खत्म हो गई है और बदलाव की संभावना भी समाप्त हो गई है। लेकिन सच यह है कि इंसान की असली शक्ति उसके शरीर में नहीं, उसके मन में होती है। जब मन जागता है, तो उम्र की दीवारें भी छोटी पड़ जाती हैं।
साल 1979 में एक अनोखा प्रयोग हुआ। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक *डॉ. एलेन लैंगर* ने यह जानने का निश्चय किया कि क्या केवल सोच बदलने से इंसान की उम्र और क्षमता पर असर पड़ सकता है।
उन्होंने लगभग 80 वर्ष के आठ बुज़ुर्गों को एक सप्ताह के लिए एक विशेष स्थान पर रहने के लिए बुलाया।
इन लोगों की स्थिति सामान्य बुज़ुर्गों जैसी थी—किसी को चलने के लिए छड़ी की जरूरत थी, किसी के हाथ काँपते थे, तो किसी की दृष्टि कमजोर थी।
डॉ. लैंगर ने उस जगह को पूरी तरह बीस साल पीछे याने 1959 के माहौल में बदल दिया।
पुराने जमाने के अखबार, रेडियो पर वही संगीत, ब्लैक-एंड-व्हाइट टीवी और उस समय की खबरें—सब कुछ वैसा ही था जैसे बीस साल पहले हुआ करता था।
लेकिन उन सभी के लिये एक खास नियम था—
उन्हें यह मानकर जीना था कि अभी 1959 ही चल रहा है, और वे भी उसी समय के सक्रिय, ऊर्जावान लोग हैं।
पहले दिन जब वे पहुँचे तो उन्हें उम्मीद थी कि कोई उनका सामान उठाकर कमरे तक पहुँचा देगा।
पर उन्हें साफ कह दिया गया—
“यहाँ हर काम आपको खुद करना होगा।”
थोड़ी नाराज़गी हुई, पर मजबूरी में उन्होंने अपना सामान खुद उठाया और सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर पहुँचे।
यहीं से उनके मन में एक छोटा-सा स्विच ऑन हुआ—
“मैं असहाय नहीं हूँ, मैं यह कर सकता हूँ।”
एक दिन बीता, दो दिन बीता, तीसरा दिन बीता।
वे पुराने दिनों की राजनीति, खेल और फिल्मों पर चर्चा करने लगे।
वे उसी उत्साह से बातें करने लगे जैसे अपनी पचपन-साठ साल की उम्र में किया करते थे।
कुछ ही दिनों में अद्भुत परिवर्तन दिखाई देने लगा।
जो व्यक्ति गठिया के कारण झुककर चलता था, वह अब सीधे बैठकर चर्चा कर रहा था।
जो कम सुनता था, वह अब रेडियो धीमी आवाज़ में सुन पा रहा था।
एक सप्ताह बाद सबसे चौंकाने वाला दृश्य सामने आया—
वे सभी बुज़ुर्ग मैदान में टच फुटबॉल खेल रहे थे, दौड़ रहे थे, हँस रहे थे।
अंत में जब उनके मेडिकल टेस्ट हुए, तो डॉक्टर भी हैरान रह गए।
उनकी पकड़ मजबूत हो गई थी, शरीर की लचक बढ़ गई थी, यहाँ तक कि दृष्टि और सुनने की क्षमता भी बेहतर हो गई थी।
सिर्फ उनका व्यवहार ही नहीं बदला था—लोगों को उनकी नई तस्वीरें देखने पर वे पहले से अधिक युवा लगे।
इस प्रयोग ने एक गहरी सच्चाई उजागर की—
*मन जैसा मान लेता है, शरीर वैसा ही बनने लगता है।*
जब हम बार-बार खुद से कहते हैं—
“अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ, मुझसे नहीं होगा”,
तो हमारा शरीर भी वही संदेश स्वीकार कर लेता है।
लेकिन जैसे ही सोच बदलती है,ऊर्जा भी बदलने लगती है। और यह भी सच है—
*“जिस दिन इंसान सीखना और कोशिश करना छोड़ देता है, उसी दिन वह सच में बूढ़ा हो जाता है।”*
इसलिए यदि कभी मन कहे कि अब बहुत देर हो चुकी है, तो अपने भीतर का स्विच ऑन कीजिए और याद रखिए— *“उम्र शरीर की गिनती है, लेकिन उत्साह मन की पहचान है।”* इंसान की असली उम्र उसके सालों से नहीं, उसके विचारों और उत्साह से तय होती है। जब मन जवान रहता है, तो जीवन में बदलाव और नई शुरुआत हमेशा संभव होती है।
पंडित राम प्रसाद बिस्मिल की अंतिम इच्छा
19 दिसंबर 1927 को काकोरी कांड के महानायक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित राम प्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर जेल की कोठरी में फांसी के फंदे पर लटकाया गया था। फांसी से पहले अंतिम इच्छा पूछने पर उन्होंने कहा था "I Wish The Downfall Of British Empire." वो फांसीघर आज भी मौजूद है। लकड़ी का फ्रेम और लीवर भी सुरक्षित है।
पं. राम प्रसाद बिस्मिल को जिला कारागार लखनऊ से 10 अगस्त 1927 को गोरखपुर जेल लाया गया था। उन्हें कोठरी संख्या सात में रखा गया था। उस समय इसे 'तन्हाई बैरक' कहा जाता था। बिस्मिल ने चार महीने 10 दिन तक इस कोठरी को साधना केंद्र के रूप में इस्तेमाल किया। इस कोठरी को अब बिस्मिल कक्ष और शहीद पंडित राम प्रसाद बिस्मिल बैरक के नाम से संरक्षित किया गया है।
फांसी के फंदे पर झूलने से पहले बिस्मिल के मुंह से निकले बिस्मिल के शब्द अंतिम क्षण तक युवाओं में देशभक्ति का जज़्बा जगाते रहे!
बाबासाहब नरगुन्दकर
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महायोद्धा बाबासाहब नरगुन्दकर (मूल नाम: भास्कर राव भावे) नरगुंड (कर्नाटक) के जागीरदार थे। उन्होंने ब्रिटिश सत्ता को सीधी चुनौती देते हुए 12 जून 1858 को सर्वोच्च बलिदान दिया था। उनका जीवन और संघर्ष भारतीय इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय है। 1857 के महासंग्राम के नायक श्रीमन्त नाना साहब पेशवा ने जब अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका, तो बाबासाहब ने उनका साथ दिया।जेम्स मेंशन का वध (1857)दक्षिणी मराठा क्षेत्र के ब्रिटिश राजनीतिक एजेंट, सी. जे. मेंशन ने इस क्षेत्र के राजाओं के खिलाफ दमनकारी नीतियां अपना रखी थीं।बाबासाहब नरगुन्दकर और उनके सैनिकों ने मेंशन को मार गिराया और उसके सिर को नरगुंड के किले में लाकर लोगों के प्रदर्शन के लिए रख दिया। पतन और सर्वोच्च बलिदानमेंशन के वध के बाद, अंग्रेजों ने नरगुंड पर भारी सैन्य हमला कर दिया। बाबा साहब की सेना ने बहादुरी से मुकाबला किया, लेकिन अपने ही कुछ लोगों के विश्वासघात के कारण उन्हें हार का सामना करना पड़ा। हार के बाद वे तोरागल के जंगलों में चले गए, जहाँ उन्हें अंग्रेजों द्वारा बंदी बना लिया गया। 12 जून 1858 को बेलगाम (बेलगावी) में उन्हें फांसी दे दी गई। उनके कई अनुयायियों (जैसे हनुमंत घाडगे) को भी ब्रिटिश सरकार ने कड़ी सजाएं दीं। ऐतिहासिक महत्वलंबी अवधि तक गुमनामी में रहने के बाद, इस स्वतंत्रता सेनानी के सम्मान में बेलगावी में एक स्मारक भी बनाया गया है। उनका साहस और ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ लिया गया कड़ा रुख हमेशा याद रखा जाएगा
पहला परमाणु परिक्षण
1998 में जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने और ठीक छः दिन बाद दो वैज्ञानिक अब्दुल कलाम और चिदंबरम को अपने ऑफिस बुलाया। वाजपेयी ने धीमी आवाज मे पूछा क्या आप दोनों परमाणु परिक्षण के लिये तैयार है? दोनों ने हामी भरी तो वाजपेयी ने कहा कि बुद्ध पूर्णिमा की पूजन इस बार आप दोनों ही करेंगे। परमाणु परिक्षण के लिये राजस्थान का पोखरण चुना गया, मटेरियल पूरा मुंबई मे रखा था। रात के दो बजे मुंबई मे सामान लोड करके एयरपोर्ट लाया गया, रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नाडीज पूरी रात नहीं सोये।
यदि एक भी कन्टेनर फट जाता तो पूरा मुंबई शहर शमशान बन जाता, ये सामग्री मुंबई से जैसलमेर के रास्ते पोखरण साइट पहुंची। अमेरिकी सेटेलाइट से बचने के लिये टीम मुश्किल से चंद मिनट ही काम कर पाती थी। हमारे वैज्ञानिको ने अपार कष्ट सहकर काम किया, अपार इसलिए कि उन्हें तपते रेगिस्तान मे सेना की भारी वर्दी पहननी पड़ी जिसके वे आदि नहीं थे।
दिल्ली मुंबई मे रहे वैज्ञानिको को राजस्थान की गर्मी असहनीय थी, लेकिन बावजूद इसके काम शीघ्रता से किया गया। दूसरा डर यह भी था कि वाजपेयी की गठबंधन की सरकार बड़ी मुश्किल से चल रही थी।
ऐसे मे यदि सरकार गिर जाती तो ये परिक्षण फिर सालो पीछे हो जाता। आखिर 11 मई का दिन आया, उस दिन वाजपेयी, आडवाणी, जसवंत सिंह और जॉर्ज फर्नाडीज प्रधानमंत्री आवास पर एकदम शांत बैठे थे।
दिल्ली के गरम माहौल से दूर पोखरण मे आखिर परमाणु परिक्षण हुआ,धरती डोल गयी,दो फुटबाल मैदान के बराबर का गड्ढा हो गया। कलाम और चिदंबरम को चक्कर आने लगे दोनों ने एक दूसरे को संभाला और बाहर आये। वैज्ञानिको ने जैसे ही चिदंबरम और कलाम को देखा तो भारत माता की जय 🇮🇳 का नारा लगाना शुरू कर दिया, कलाम और चिदंबरम हर नारे पर जय बोल रहे थे। दिल्ली खबर आयी तो चारो नेता रो पड़े मगर किसी ने किसी को बधाई नहीं दी।
इसके बाद वाजपेयी का वो 15 आवर्स 45 मिनट वाला भाषण इतिहास लिख गया, 13 मई को फिर दो धमाके किये गए और वाजपेयी ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा "अब भारत परमाणु शक्ति बन चुका है"
लेकिन इसके तुरंत बाद अमेरिका के प्रतिबंधों की बारिश शुरू हो गयी, जापान ने भारत के सारे बॉन्ड फ्रीज कर दिये, कनाडा ने तो अपने डिप्लोमेट तक बुलाने का फैसला कर लिया। संयुक्त राष्ट्र तक मुद्दा गया। ब्रिटेन फ़्रांस और रूस ने इस पर किसी भी प्रकार की बात करने से मना कर दिया, हालांकि ब्रिटेन राष्ट्रीय स्तर पर भारत के खिलाफ था मगर संयुक्त राष्ट्र मे उसने चुप्पी साधकर भारत का साथ दिया।
बड़ों का सम्मान
गुरुजनोंके चरण-वन्दनका श्रीभाईजीके जीवनमें बहुत ऊँचा स्थान था। वे अपनेसे बड़ोंको पैर छूकर प्रणाम किया करते थे, साधु-संतों एवं पण्डितोंको भी वे चरण स्पर्श करके प्रणाम करते थे। अपने घरमें रसोई बनाने वाले ब्राह्मणोंको भी पैर छूकर प्रणाम करते हुए उन्हें देखा गया है। पिता-पितामहके श्राद्धमें ब्राह्मण-भोजन हो जानेपर वे दक्षिणा देते समय पण्डितोंको चरण छूकर प्रणाम करते थे। अपने साथ कार्य करने वाले तथा अपनेसे बहुत छोटी आयु वाले पण्डितोंको जब श्रीभाईजी प्रणाम करते थे, तब युवा पण्डित संकोचके मारे गड़ जाते थे, पर श्रीभाईजी अपने आदर्शका निर्वाह अवश्य करते थे। प्रायः अपना प्रवचन आरम्भ करनेके पूर्व उपस्थित श्रोताओंको प्रणाम करते हुए वे कहा करते थे- विश्व ब्रह्माण्डके रूपमें अभिव्यक्त भगवानके नाते आप सबके श्रीचरणोंमें सभक्ति नमस्कार।
श्रीभाईजी अपनी लाचारीकी अवस्थामें भी यथासम्भव अपने इस स्वभावका निर्वाह करते रहे। अन्तिम बीमारीके दिनोंमें गोरखपुर स्थित पूर्वोत्तर रेलवेके केन्द्रीय अस्पतालके सर्जरी विभागके डी. एम. ओ. श्रीशर्माजी विशुद्ध प्यारके नाते श्रीभाईजीको देखने आये थे। एक दिन श्रीभाईजीका दर्शन करने और उन्हें प्रणाम करनेके लिये उनकी वयोवृद्ध माताजी उनके साथ आयीं। डाक्टर साहबने कमरेमें प्रवेश करते ही हाथ जोड़कर श्रीभाईजीको प्रणाम किया। श्रीभाईजीने उनके प्रणामका उत्तर प्रणाम कह कर दिया। जब डाक्टर साहबकी वृद्धा माताजी श्रीभाईजीको प्रणाम करने लगी, तब श्रीभाईजी बड़ी ही विनम्रतासे बोले- माताजी ! आप तो मेरी माँ हैं। मैं आपको प्रणाम करूँगा और आपका आशीर्वाद लूँगा।
माताजी श्रीभाईजीकी इस विनय भरी भावनासे मुग्ध हो गयीं और वे प्रणाम न करके आगे बढ़ गयीं श्रीभाईजीको आशीर्वाद देनेके लिये। श्रीभाईजीने चारपाईसे झुककर माताजीका चरण-स्पर्श करके उन्हें प्रणाम किया। माताजी वृद्ध हैं, पर वे आयुमें श्रीभाईजीसे छोटी हैं तथा वेश्रीभाईजीके प्रति श्रद्धा रखती हैं और उसी भावसे वे श्रीभाईजीको प्रणाम करने पधारी थीं, पर स्वजनकी माँ अपनी माँ है और माँ सदा प्रणम्य है, इस आदर्शका निर्वाह श्रीभाईजी कैसे न करते ! डाक्टर साहब तथा उपस्थित सभी व्यक्ति श्रीभाईजीके इस व्यवहारसे मुग्ध हो गये कि इतने बड़े होकर भी ये माताजीका चरणस्पर्श कर उन्हें प्रणाम करते हैं और वह भी अपनी लाचारीकी अवस्थामें। लेटे-लेटे हाथ जोड़कर प्रणाम कर लेना ही पर्याप्त था, पर श्रीभाईजीने चारपाईसे झुककर प्रणाम करनेमें ही संतोषका अनुभव किया। उनके इस प्रकार विवशताकी स्थितिमें चारपाईसे झुककर प्रणाम करनेसे डाक्टर साहबका तथा अन्य व्यक्तियोंका हृदय भर आया।
आस्था की डोर
“हमारा परिवार 1978 से शांतिकुंज हरिद्वार से जुड़ा रहा। उस समय शांतिकुंज का स्वरूप भी बहुत बड़ा नहीं था और हमें पूज्य पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य एवं पूजनीय माता भगवती देवी शर्मा का निकट सानिध्य प्राप्त करने का सौभाग्य मिलता रहता था। उनके हाथों मेरा और परिवार का यज्ञोपवीत संस्कार हुआ तथा अनेक बार उनके श्रीचरणों में बैठकर मार्गदर्शन प्राप्त करने का अवसर मिला।
1983 के आसपास मेरा झुकाव संघ की शाखा की ओर बढ़ने लगा। एक ओर गायत्री परिवार का अध्यात्म था, तो दूसरी ओर संघ की कर्मशीलता, अनुशासन और व्यक्ति निर्माण की अद्वितीय कार्यपद्धति मुझे आकर्षित करने लगी।
1985 में गुरुपूर्णिमा के अवसर पर हमारा परिवार शांतिकुंज गया हुआ था, लेकिन उसी दिन मेरी शाखा का भी गुरुपूर्णिमा उत्सव था, जिसमें मेरी जिम्मेदारी भी थी। मैंने वापस मुरादनगर जाने की इच्छा व्यक्त की, लेकिन मेरी माता जी ने कम आयु और छोटे होने के कारण मना कर दिया। तब वे मुझे पूज्य आचार्यश्री के पास ले गईं और उन्हें मुझे समझाने का आग्रह किया।
मेरी पूरी बात सुनने के बाद आचार्यश्री ने मुझे नहीं, बल्कि मेरी माता जी को समझाते हुए कहा — ‘यदि यह संघ में जाता है, तो इसे मत रोकना।’ उन्होंने आगे कहा कि संघ व्यक्ति निर्माण का अत्यंत उत्कृष्ट कार्य कर रहा है। इसी संदर्भ में उन्होंने अपनी और श्री गुरुजी की एक अनौपचारिक भेंट का उल्लेख करते हुए बताया कि श्री गुरुजी ने शांतिकुंज के कार्यों की प्रशंसा की थी और तब मैने स्वयं भी निसंकोच स्वीकार किया था कि संघ की व्यक्ति निर्माण की पद्धति, अनुशासन और स्वयंसेवक निर्माण की प्रक्रिया वास्तव में अनूठी और अनुकरणीय है।
तब मां ने मुझे आने दिया और मैं अपनी शाखा के उत्सव में सम्मलित हो पाया।
इस घटना का उल्लेख उस समय शाखा के होने वाले वार्षिक उत्सव में भी एक वर्ष की शाखा उपलब्धि में भी आया था। जो पवन त्यागी जी(तत्कालीन शाखा कार्यवाह) जो वर्तमान में वैशाली महानगर में निवास करते है दिल्ली विद्युत विभाग में कार्यरत है और पत्रकारिता में भी बहुत अच्छी पकड़ है और अपना खुद का एक न्यूज चैनल भी है। शेखर जी की फेसबुक पोस्ट से -
मानवता अस्पताल
उसका नाम सुभाषिनी मिस्त्री है। उसने बारह साल की उम्र में शादी की थी। जब तक वह लगभग तेईस वर्ष की थी, तब तक उसके पति साधना चंद्रा, कोलकाता के पास एक सब्जी विक्रेता थे, की एक इलाज योग्य बीमारी से मृत्यु हो गई थी। परिवार चिकित्सा देखभाल का खर्च नहीं उठा सकता था। उसके पास चार बच्चे थे, कोई औपचारिक शिक्षा नहीं थी और लगभग कोई पैसा नहीं था। बाद के महीनों में, परिवार अत्यधिक ग़रीबी में डूब गया। एक बिंदु पर, उसे अपने सबसे बड़े बेटे को अनाथालय में रखना पड़ा क्योंकि वह उसे खाना नहीं खिला सकती थी। अपने पति की मृत्यु के बाद, उसने खुद से एक वादा किया।
उसके गांव में कोई और नहीं मरेगा क्योंकि वे इलाज के लिए बहुत गरीब थे। एक महिला के लिए जो पढ़ या लिख नहीं सकती थी, यह असंभव लग रहा था। लेकिन उसने वैसे भी शुरू कर दिया।
वह एक घरेलू नौकर के रूप में काम करती थी। वह एक खेत मजदूर के रूप में काम करती थी। वह सड़क के किनारे सब्जियां बेचती थी, वही काम जो उसके पति ने किया था। लगभग बीस वर्षों तक, उसने जो कुछ भी बचा सकता था, उसे बचाया। उस पैसे का एक हिस्सा उसके बेटे अजॉय को शिक्षित करने की ओर चला गया। वह अंततः एक डॉक्टर बन गया। अपनी बचत से, उसने हंसपुकुर में ज़मीन का एक छोटा सा भूखंड ख़रीदा। 1990 के दशक में, अपने बेटे के साथ रोगियों और ग्रामीणों का इलाज करते हुए जो कुछ भी वे कर सकते थे, उसने वहां एक छोटा चिकित्सा केंद्र खोला। उन्होंने इसे मानवता अस्पताल कहा।
यह एक ही कमरे में शुरू हुआ। आज, इसमें दर्जनों बिस्तर हैं और हर हफ्ते सैकड़ों रोगियों का इलाज करता है, उनमें से कई मुफ्त हैं। 2018 में, जिस महिला ने कभी औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की थी, उसे भारत के राष्ट्रपति द्वारा पद्म श्री से सम्मानित किया गया था। वह अपने पति को नहीं बचा सकी। इसलिए उसने अगले चार दशक हजारों अन्य परिवारों को बचाने में मदद करने में बिताए
( सतीश शर्मा जी द्वारा संकलित व लेखन )

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