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जुलाई, 2024 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

काँवड़ जलाभिषेक श्रावण मास विक्रमी संवत 2081,सन् 2024 ई.में मुहूर्त्त

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  काँवड़ जलाभिषेक  श्रावण मास विक्रमी संवत 2081,सन् 2024 ई . में मुहूर्त्त शिवभक्त कांवड़ियों द्वारा गोमुख, श्री केदारनाथ, श्री अमरनाथ, श्री हरिद्वार, नीलकण्ठ एवं गंगादि तीथों से श्री गंगाजल के कलश भरकर भगवान् श्रीशिव की प्रसन्नता हेतु आषाढ़ पूर्णिमा से लेकर सम्पूर्ण श्रावण मास पर्यन्त भगवान् शिव के प्रतिष्ठित मन्दिरों, ज्योतिर्लिङ्गों, विग्रहों,स्वरूपों तथा क्षेत्रीय मन्दिरों में श्रद्धारूपी श्रीगङ्गाजल अभिषेक किया जाता है। कुछ विद्वान लोगों को भ्रम है कि श्रावण-भाद्रपद मास में नदियां रजस्वलारूप हो जाने से उनका जल पवित्र नहीं होता। परन्तु - ये सभी नंदसंज्ञा वाली नदियां रजोदोष से युक्त नहीं होती है। ये सभी अवस्थाओं में निर्मल रहती हैं। स्कन्दपुराण में स्पष्ट लिखा है कि सिन्धु, सूती, चन्द्रभागा, गंगा, सरयू, नर्मदा, यमुना, प्लक्षजाला, सरस्वती - श्री गंगादि तीर्थों से जल लाने एवं भगवान् शिवपूजन एवं शिवलिङ्ग को जलाभिषेक करने की शुभ एवं पुण्य तारीखें- प्रातःकाल का समय ही श्रेष्ठ (सूर्योदय से लगभग 2-24 तक) रहेगा । दिनांक  2 अगस्त, 2024 ई., शुक्रवार को प्रदोषकाल तथा 1 अगस्त, गुर...

दानवीर टोडरमल

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  दानवीर टोडरमल चित्र मे दिखाई देने वाली यह हवेली दीवान टोडरमल जी की है। जिन्होंने 78,000 मोहरें बिछाकर गुरुगोविंद सिंह जी के साहबजादों और माता गुजरी देवी जी के संस्कार के लिए 4 गज जगह खरीदी थी | क्रूर मुग़ल बादशाह ने मां गुजरी और बच्चों के संस्कार के लिए जमीन देने से मना कर दिया था। तब टोडरमल जी सामने आए उन्होंने राजा से संस्कार के लिए जमीन देने की मन्नतें कीं। राजा ने जमीन की कीमत मांगी थी सोने की मोहरों से जितनी जमीन नापी जा सके उतनी ले लो। जब मोहरें बिछानी शुरू कीं तब धूर्तता ओर कपट में संलीप्त मुगल बादशाह ने ज्यादा रकम ऐंठने के लिए आड़ी नही खड़ी मुद्रायें बिछाने को कहा ! उस समय टोडरमल ने अंतिम संस्कार के लिए खड़ी सोने की मोहरें बिछाकर संस्कार हो सके इतनी जमीन खरीदकर संस्कार करवाया !, गुरु महाराज टोडरमल से कहा कि टोडरमल आप मुझसे जो चाहे वह मांगलो तब टोडरमल ने कहा गुरु महाराज मैं आपके चरणों में विनती करता हूं कि मेरे कोई संतान न हो, गुरु महाराज ने कहा ऐसा क्यों मांगते हो टोडरमल बोला अगर संतान होगी तब वह अंहकार करेगी की हमारे वंशजों ने यह दान किया था मैं नहीं चाहता कि ये बात किसी...

अष्टकूट मिलान में 36 अंकों का वितरण

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विवाह के लिए 36 गुण का महत्व... विवाह के बाद वर और वधु एक दूसरे के अनुकूल रहें, संतान सुख, धन दौलत में वृद्धि, दीर्घ आयु हो, इस वजह से ही दोनों पक्ष के 36 गुणों का मिलान किया जाता है, मुहूर्तचिंतामणि ग्रंथ में अष्टकूट में वर्ण, वश्य, तारा, योनि, ग्रह मैत्री, गण, भकूट और नाड़ी को शामिल किया गया है..ये अष्टकूट है, वर्ण, वश्य, तारा, योनी, ग्रहमैत्री,गण, राशि, नाड़ी। गुण मिलान के साथ यदि इन अष्टकूट का मिलान सही ढंग से नहीं होता है तो विवाह में जीवन भर बाधा आती है। विवाह के लिए वर-वधू की जन्म-कुंडली मिलान करते नक्षत्र मेलापक के अष्टकूटों में नाड़ी को सबसे महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है। विवाह के पूर्व वर-वधू की कुंडली का मिलान कैसे करें और क्या सावधानी रखें ताकि विवाह सुचारू रूप से संपन्न हो कर जीवन भर एक दूसरे का साथ सुख-समृद्धि के कायम रहे। • अष्टकूट मिलान में 36 अंकों का वितरण वर्ण : 1 वश्य : 2 तारा : 3 योनि : 4 मैत्री : 5 गण : 6 भकूट : 7 नाड़ी : 8 1. नाड़ी दोष - हर नक्षत्र के अनुसार बालक-बालिका की नाड़ी अलग होती है। इससे वर-कन्या की सेहत और संतान उत्पत्ति की स्थिति देखी जाती है। अगर वर ...

लोक नायक श्री राम 1

  रामायण के प्रेरक प्रसंग  *लोकनायक श्रीराम / 1* - प्रशांत पोळ कालचक्र की गति तेज है. वह घूम रहा है. घूमते - घूमते पीछे जा रहा है. बहुत पीछे. इतिहास के पृष्ठ फड़फड़ाते हुए हमें ले चलते हैं त्रेतायुग में. कई हजार वर्ष पीछे..! इस त्रेतायुग में पृथ्वी पर एक बहुत बड़ा भूभाग है, जिसे *आर्यावर्त* नाम से जाना जा रहा है. यह प्रगत मानवी संस्कृति का क्षेत्र है. समृद्ध देश है. उच्चतम एवं उदात्त मानवी भाव-भावनाओं से समाज प्रेरित है. समाज में ज्ञान की लालसा है. अध्ययनशील विद्यार्थी है. नए-नए ग्रंथ लिखे जा रहे हैं. उन्नत ऐसी ऋषि संस्कृति का समाज पर प्रभाव है. यज्ञ - याग हो रहे हैं. वायुमंडल और समाज जीवन, दोनों में शुद्धता की सतत प्रक्रिया चल रही है. देवाधिदेव, पृथ्वी पर स्थित इस आर्यावर्त को निहार रहे हैं. इस पर विचरण करने की आकांक्षा रख रहे हैं. इस आर्यावर्त में, सरयू नदी के किनारे बसा हुआ एक बहुत बड़ा जनपद है, जो 'कोशल' नाम से विख्यात है. यह समृद्ध है. धन-धान्य से सुखी है. आनंदी है. _कोसलो नाम मुदितः स्फीतो जनपदो महान् ।_ _निविष्टः सरयूतीरे प्रभूतधनधान्यवान् ॥५॥_ (वाल्मीकि रामायण / बालकां...

लोक नायक श्री राम 2

  *श्रीराम के रूप में..!* -   प्रशांत पोळ *लोकनायक श्रीराम / 2* -  प्रशांत पोळ सृष्टि के पालनकर्ता, सर्वव्यापी नारायण ने निर्णय लिया है, रावण जैसी आसुरी शक्ति के निर्दालन के लिए, ईश्वाकु कुल के वंशज, राजा दशरथ के पुत्र के रूप में माध्यम बनने का..! राजा दशरथ इसी समय पुत्रकामेष्टि यज्ञ कर रहे हैं. ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में एक तेजस्वी प्राजापत्य पुरुष, राजा को पायस (खीर) देता है, राजा की तीन रानियों के लिए. तीनों साध्वी रानियां, इस पायस का प्रसाद के रूप में प्राशन करती है. कालांतर में तीन रानियों को चार पुत्र होते हैं. *माता कौसल्या को श्रीराम के रूप में तेजस्वी पुत्र होता है. रानी सुमित्रा को लक्ष्मण और शत्रुघ्न यह यमल (जुड़वा) पुत्र होते हैं. कैकेई भरत को जन्म देती है.* राजा दशरथ अत्यंत आनंदित है. कोशल जनपद को चार युवराज मिले हैं. अयोध्या में भव्यतम उत्सव हो रहा है. अयोध्या समवेत पूरे कोशल जनपद के नागरिक, अपने राजकुमारों का जन्मोत्सव मना रहे हैं. कालचक्र सीधा, सरल घूम रहा है. चारों राजकुमार बड़े हो रहे हैं. उन्हें सभी प्रकार की शिक्षा, विद्वान शिक्षकों द्वारा दी जा रही...

लोक नायक श्री राम 3

  *लोकनायक श्रीराम / 3* -  प्रशांत पोळ मुनीश्रेष्ठ विश्वामित्र के साथ श्रीराम और लक्ष्मण चल रहे हैं. वें गंगा नदी पार कर, दक्षिण तट पर आते हैं. प्रवास पुनः प्रारंभ होता है. अब रास्ते में एक भयानक वन आता है, जिसमें सिंह, व्याघ्र, हाथी जैसे जानवर विचरण कर रहे हैं. किंतु इस वन में कहीं-कहीं मानवी बस्ती रहने के अवशेष दिख रहे हैं. कहीं टूटे-फूटे, वनलताओं से घिरे प्रासाद, कुछ टूटे - उखड़े पथ, तो कुछ वीरान से पड़े स्तंभ... यह सब देखकर श्रीराम, ऋषि विश्वामित्र से पूछते हैं, "मुनिवर, यह सब क्या है ? घने वन और मानवीय बस्ती के अवशेष..." विश्वामित्र बताते हैं, "नरश्रेष्ठ, कुछ वर्ष पहले तक यहां दो समृद्धशाली जनपद हुआ करते थे - मलद और करुष. यूं कहो कि यह जनपद, देवताओं के प्रयत्न से बने थे. धन-धान्य से संपन्न थे. समृद्ध थे." *"किंतु कुछ वर्ष पहले यहां आतंक का साया मंडराने लगा. 'ताटका' नाम की एक दानवी स्त्री, यक्षिणी के रूप में आई. यह सुंद नामक दैत्य की पत्नी है. दुरात्मा रावण का क्षत्रप मारीच, इस ताटका का ही पुत्र है."* _बलं नागसहस्रस्य धारयन्ती तदा ह्यभूत् ।_ _त...

लोक नायक श्री राम 4

  *लोकनायक श्रीराम / ४* -  प्रशांत पोळ मिथिला. आर्यावर्त के उत्तर - पूर्व दिशा में स्थित एक वैभव संपन्न जनपद, जिसके राजधानी का नाम भी मिथिला है. यह जनपद, लोक कल्याणकारी राज्य का अनुपम उदाहरण है. इस राज्य का नेतृत्व कर रहे हैं, शक्ति और बुद्धि का अपूर्व समन्वय जिन मे है, ऐसे राजा जनक. ये मूलतः क्षत्रिय है. राजा हश्वरोमा के सुपुत्र है. इनका मूल नाम शिरीध्वज है. उनके छोटे भाई, कुशध्वज नाम से जाने जाते हैं. शिरीध्वज का लोगों में प्रचलित नाम है, जनक. अत्यंत विद्वान. महर्षि अष्टावक्र के शिष्य. क्षत्रिय होने पर भी ब्राह्मण्य में पारंगत. अनेक ब्राह्मणों को दीक्षा भी दी है.  निमी वंश के इन दो राजाओं, शिरीध्वज (जनक) और कुशध्वज, के परिवार में कुछ ऐसा संयोग है, कि दोनों को दो-दो पुत्रियां हैं. राजा जनक को, खेत जोतते हुए, सोने के हल के अग्र का स्पर्श होकर एक संदूक मिली थी, जिसमें थी एक तेजस्वी बालिका. जनक ने इसका संगोपन करने का निश्चय किया. यही है, राजा जनक की जेष्ठ पुत्री - सीता. अत्यंत बुद्धिमान, तेजस्वी, सुंदर और ममतामयी. सभी अस्त्र - शस्त्रों में पारंगत. राजा जनक के परिवार में एक ...