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ऋषियों ने इसलिए दिया था 'हिन्दुस्थान' नाम

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  ऋषियों ने इसलिए दिया था 'हिन्दुस्थान' नाम भारत जिसे हम हिंदुस्तान, इंडिया, सोने की चिड़िया, भारतवर्ष ऐसे ही अनेकानेक नामों से जानते हैं। आदिकाल में विदेशी लोग भारत को उसके उत्तर-पश्चिम में बहने वाले महानदी सिंधु के नाम से जानते थे, जिसे ईरानियो ने हिंदू और यूनानियो ने शब्दों का लोप करके 'इण्डस' कहा। भारतवर्ष को प्राचीन ऋषियों ने 'हिन्दुस्थान' नाम दिया था जिसका अपभ्रंश 'हिन्दुस्तान' है। 'बृहस्पति आगम' के अनुसार हिमालयात् समारभ्य यावत् इन्दु सरोवरम्। तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते॥ यानि हिमालय से प्रारम्भ होकर इन्दु सरोवर (हिन्द महासागर) तक यह देव निर्मित देश हिन्दुस्थान कहलाता है। भारत में रहने वाले जिसे आज लोग हिंदू नाम से ही जानते आए हैं। भारतीय समाज, संस्कृति, जाति और राष्ट्र की पहचान के लिये हिंदू शब्द लाखों वर्षों से संसार में प्रयोग किया जा रहा है विदेशियों नेअपनी उच्चारण सुविधा के लिये 'सिंधु' का हिंदू या 'इण्डस' से इण्डोस बनाया था, किन्तु इतने मात्र से हमारे पूर्वजों ने इसको नहीं माना। 'अद्भुत कोष', ...

उत्पन्ना एकादशी

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      उत्पन्ना एकादशी उत्पन्ना एकादशी का व्रत मार्गशीर्ष मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को रखा जाता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण की पूजा का विधान है। एकादशी का व्रत रखने वाले दशमी के दिन शाम को भोजन नहीं करते हैं। एकादशी के दिन ब्रह्मावेला में भगवान कृष्ण की पुष्प, जल, धूप, अक्षत से पूजा की जाती है। इस व्रत में केवल फलों का ही भोग लगाया जाता है। यह ब्रह्मा, विष्णु, महेश त्रिदेवों का संयुक्त अंश माना जाता है। यह अंश दत्तात्रेय के रूप में प्रकट था। यह मोक्ष देने वाला व्रत माना जाता है। उत्पन्ना एकादशी की कहानी सत्ययुग में एक बार मुर नामक दैत्य ने देवताओं पर विजय प्राप्त कर इन्द्र को अपदस्थ कर दिया। देवता भगवान शंकर की शरण में पहुंचे। भगवान शंकर ने देवताओं को विष्णुजी के पास भेज दिया। विष्णुजी ने दानवों को तो परास्त कर दिया परन्तु मुर भाग गया। विष्णु ने मुर को भागता देखकर लड़ना छोड़ दिया और बद्रिकाश्रम की गुफा में आराम करने लगे। मुर ने वहां पहुंचकर विष्णुजी को मारना चाहा। तत्काल विष्णुजी के शरीर से एक कन्या को आशीर्वाद दिया कि तुम संसार में माया जाल में उलझे तथा मोह के कारण मुझसे...

मतदान हमारा अधिकर ओर कर्तव्य

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  मतदान हमारा अधिकर ओर कर्तव्य    मतदान हमारा अधिकार भी है ओर कर्तव्य भी, मतदान एक संवैधानिक अधिकार है | भारतीय  संविधान के अनुसार देश के नागरिकों को देश के संविधान द्वारा प्रदत्त सरकार चलाने के हेतु,अपने प्रतिनिधि निर्वाचित करने के का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 326 के अनुसार मिला है। लोकतंत्र का अर्थ ही है जनता की, जनता के द्वारा, जनता के लिए सरकार इसी लिए मतदान का लोकतंत्र में इसका बहुत महत्व होता है । भारतीय संविधान के अनुसार, 18 वर्ष से अधिक आयु के सभी भारतीय नागरिक जिन्होंने खुद को मतदाता के रूप में पंजीकृत किया है, वे मतदान करने के योग्य  हैं। मतदाता सूची मे पंजीकृत नागरिक राष्ट्रीय,राज्य,जिला और स्थानीय सरकारी निकाय चुनावों में मतदान कर सकते हैं। मतदाता केवल उसी निर्वाचन क्षेत्र में मतदान कर सकता है जहां उसने खुद को पंजीकृत किया है। मतदाताओं को उस निर्वाचन क्षेत्र में खुद को पंजीकृत करना होता है  जहां वे रहते हैं, जिसके बाद उन्हें फोटो चुनाव पहचान पत्र (जिसे ई पी आई सी कार्ड भी कहा जाता है) जारी किया जाता है । यदि किसी व्यक्ति ने मतदाता सूची मे नाम न...

सफला एकादशी कथा

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  सफला  एकादशी व्रत यह व्रत पौष कृष्ण पक्ष एकादशी को किया जाता है। इस दिन भगवान अच्युत की पूजा का विशेष विधान है। इस व्रत को धारण करने वाले को चाहिए कि प्रात स्नान करके भगवान की आरती करे तथा भोग लगाये। ब्रह्मणों तथा गरीबों को भोजन अथवा दान देना चाहिए। रात्रि में जागरण करते हुए कीर्तन पाठ करना अत्यन्त फलदायी होता है। इस व्रत को करने से समस्त कार्यों में सफलता मिलती है। इसलिए इसका नाम 'सफला' एकादशी है। सफला  एकादशी व्रत की कथा प्राचीन समय में महिष्मत नामक एक राजा चम्पावती नाम की प्रसिद्ध नगरी में राज करता था। उसका बड़ा बेटा लुम्पक बड़ा दुराचारी था। मांस, मदिरा, परस्त्री मगन, वेश्याओं का संग इत्यादि कुर्कमों से परिपूर्ण था। पिता ने उसे अपने राज्य से निकाल दिया। वन में एक पीपल का वृक्ष था जो भगवान को भी प्रिय था। सब देवताओं की क्रीड़ा स्थली भी वहीं थी। ऐसे पतित पावन वृक्ष के सहारे लुम्पक भी रहने लगा। परन्तु फिर भी उसकी चाल टेढ़ी ही रही। पिता के राज्य में चोरी करने चला जाता तो पुलिस पकड़कर छोड़ देती थी। एक दिन पौष मास के कृष्ण पक्ष की दशमी की रात्रि को उसने लूट मार एवं अत्याच...

पंचक क्या है कब लगते है इनके गुण दोष क्या है

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पंचक क्या है कब लगते है इनके गुण दोष क्या है अपने परिपथ भ्रमण के काल में गोचरवश जब-जब चद्रँमा कुंभ और मीन राशियों में अथवा कहें कि धनिष्ठा नक्षत्र के उत्तरार्ध में, शतभिषा, पूर्वामाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती नक्षत्रों में होता है, तो इस काल को पंचक कहते हैं। अधिकांश लोगों में यह भ्रम और भय व्याप्त है कि इन नक्षत्रों में शुभ कर्म वर्जित होते हैं अथवा इन नक्षत्रों में प्रारम्भ किए गए कार्य पूर्ण नहीं होते और होते भी हैं तो पूरे पांच बार प्रयास करने बाद। यह मान्यता भी चली आ रही है कि पंचकों में कहीं से कोई सगे-सम्बन्धी की मृत्यु की सूचना मिलती है तो ऐसे में पांच दुःखद समाचार और भी सुनने को मिलते हैं। लोगों में भ्रम तो यहाँ तक व्याप्त है कि इन दिनों में सनातन धर्म के कोई भी  शुभ कार्र्य अशुभता अवश्य देते हैं। सबसे पहले यह मय, भ्रम और अंधविश्वास तो मन से एक दम ही निकाल दें कि तथाकथित यह पांच नक्षत्र सदैव अहितकारी ही सिद्ध होते हैं। अनेक जातक ग्रथों और विशेषरुप से मुहूर्त चिन्तामणि और राज भार्तण्ड में पंचको के शुभाशुभ विचार का विवरण मिलता है। यदि गहनता से पंचकों के विषय में अध्ययन ...

आंवला नवमी कथा

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  आँमला नौमी आंमला नौमी वाले दिन आंवले के वृक्ष की पूजा करते हैं । जल, मोली, रोली, चावल,गुड़, सुहाली, पतारा, आंवला, एक ब्लाऊज ओर दक्षिणा चढ़ाएं । दीया और धूप जलाकर एक सौ आठ फेरे दें। कहानी कहें। ब्राह्मण ब्राह्माणी का ब्लाऊज देकर जिमायें, धोती दक्षिणा दें। भोजन में आंवले का होना जरूरी है और स्वयं भी भोजन करें। आपकी इच्छा हो तो दक्षिणा, गहना डालकर लाल कपड़े में बांधकर ब्राह्मण को दें। आँमला नौमी की कहानी एक आँवलिया राजा था जो रोज एक मन सोने के आंवले दान करता था और बाद में भोजन करते थे । एक दिन उसके बेटों बहुओं ने देखा कि रोज इतने आवंले का दान करेंगे तो सारा धन खत्म हो जाएगा इसलिए इनका दान बन्द कर देना चाहिए। एक पुत्र आया और राजा से बोला कि आप तो सारा धन लुटा देंगे। इसलिए आप आवंले का दान करना बंद कर दीजिए। तब राजा और रानी उजाड़ में जाकर बैठ गए और वह आंवलों का दान नहीं कर सके, इसलिए उन्होंने कुछ भी नहीं खाया। तब भगवान ने सोचा कि अगर हमने इनका सत्त नहीं रखा तो दुनिया में हमें कोई नहीं मानेगा। तब भगवान ने सपने में कहा कि तुम उठो और तुम्हारे पहले जैसी रसोई हो गई है और आवंले का वृक्ष लगा...