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मार्च, 2022 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

धारणा

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धारणा  हेलो भाईसाहब टिकट ले लिजिए टिकट.. बस कंडक्टर ने उस आदमी से कहा। उस आदमी ने पीछे मुड़कर देखा और रौबदार आवाज में बोला, मैं टिकट नहीं लेता दुबले-पतले कंडक्टर ने उस 6 फुट लम्बे और बाॅडी बिल्डर आदमी को देखा तो उसकी दुबारा बोलने की हिम्मत ही नहीं हुई । वह चुपचाप आगे बढ़ गया। अगले दिन वह आदमी फिर मिल गया। कंडक्टर ने फिर उससे टिकट के लिए पुछा, मैं कभी टिकट नहीं लेता। फिर वहीं उत्तर मिला ।  अगले दिन वह बस में फिर चढ़ा और फिर उसने टिकट नहीं लिया। अगले कई दिनों तक यहीं सिलसिला चलता रहा। उसके टिकट ना लेने से कंडक्टर के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचती लेकिन उसके हट्टे कट्टे शरीर को देखकर उसका आत्मविश्वास कमजोर पड़ जाता. एक दिन कंडक्टर के भीतर का मर्द जाग उठा, उसने सोचा कि आखिर कब तक इसके डर से नुकसान उठाते रहेंगे। अब तो इज्जत का सवाल है।आखिरकार कंडक्टर ने एक महीने की छुट्टी ले कर अखाड़े में भर्ती हो गया । अखाड़े में उसने खुब मेहनत की खुब पसीने बहाएं। एक महीने बाद फिर वह अपने काम पर वापस आया तो उसकी खुब बाॅडी बन चुकी थी और उसका आत्मविश्वास भी बढ गया था। हां भाई टिकट के पैसे निकालो, कंडक्टर न...

गोपकुमार की गोलोक यात्रा

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गोपकुमार की गोलोक यात्रा.. बृहदभागवतामृत सुंदरता पूर्वक गोपकुमार की गोलोक वृंदावन यात्रा का वर्णन करती है। गोपकुमार हमारी तरह इस भौतिक संसार में रहता था परंतु उसने इस संसार का त्याग करके आध्यात्मिक जगत में लौटने का निश्चय किया।वहां लौट कर उसे प्राप्त हुए आनंद का वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता। इस संसार में हमारी यात्रा अंतहीन है,हम अनादि काल से श्री कृष्ण से बिछड़ कर इस संसार में भटक रहे हैं। कई बार हम अपने पुण्यों को भोगने के लिए उच्च लोको में जाते हैं और कई बार अपने पाप फलों को भोगने के लिए निम्न लोको में। कई बार हमें मनुष्य शरीर मिलता है और कई बार निम्न योनियों में, कई बार हमारा जन्म भूमि पर होता है और कई बार जल अथवा आकाश में। इस संसार के रचयिता श्री कृष्ण ने हमें पहले ही चेतावनी दी है कि इस संसार में कहीं भी स्थाई सुख नहीं है और मृत्यु के कारण सर्वत्र दुख व्याप्त है (गीता 8.16)। इसके विपरीत आध्यात्मिक जगत स्थाई है और मृत्यु मुक्त होने के कारण सभी प्रकार के दुखों से मुक्त है। फलस्वरूप श्री कृष्ण हमें आध्यात्मिक जगत में लौटने के लिए प्रेरित करते हैं। जिस प्रकार समुद्र से बाहर निक...

हीरे से अनमोल कथा है।

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 हीरे से भी अनमोल क्या है   एक महात्मा एक वृक्ष के नीचे ध्यान करते थे । वो रोज एक लकड़हारे को लकड़ी काट कर ले जाते देखते थे।  एक दिन उन्होंने लकड़हारे से कहा कि सुन भाई, दिन-भर लकड़ी काटता है, दो समय की रोटी भी नहीं जुट पाती । तू जरा आगे क्यों नहीं जाता, वहां आगे चंदन का जंगल है ।  एक दिन काट लेगा, सात दिन के खाने के लिए काफी हो जाएगा । गरीब लकड़हारे को विश्वास नहीं हुआ, क्योंकि वह तो सोचता था कि जंगल को जितना वह जानता है और कौन जानता है ! जंगल में लकड़ियां काटते-काटते ही तो जिंदगी बीती । यह महात्मा यहां बैठा रहता है वृक्ष के नीचे, इसको क्या खाक पता होगा ?  मानने का मन तो न हुआ, लेकिन फिर सोचा कि हर्ज क्या है, कौन जाने ठीक ही कहता हो ! फिर झूठ कहेगा भी क्यों ? शांत आदमी मालूम पड़ता है, मस्त आदमी मालूम पड़ता है । कभी बोला भी नहीं इसके पहले । एक बार प्रयोग करके देख लेना जरूरी है । महात्मा की बातों पर विश्वास कर वह आगे गया । लौटा तो महात्मा के चरणों में सिर रखा और कहा कि मुझे क्षमा करना, मेरे मन में बड़ा संदेह आया था, क्योंकि मैं तो सोचता था कि मुझसे ज्यादा लकड़ियां के ...

भागवत कधा के अंश

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   आनन्द साधन से नहीं साधना से प्राप्त होता है। आंनद भीतर का विषय है, तृप्ति आत्मा का विषय है। मन को तो कितना भी मिल जाए , यह अपूर्णता का बार - बार अनुभव कराता रहेगा। जो अपने भीतर तृप्त हो गया उसे बाहर के अभाव कभी परेशान नहीं करते।    केवल मानव जन्म मिल जाना ही पर्याप्त नहीं है अपितु हमें जीवन जीने की कला भी आना जरुरी है। पशु- पक्षी तो बिलकुल भी संग्रह नहीं करते फिर भी भी उन्हें जीवनोपयोगी सब कुछ प्राप्त होता है। जीवन तो बड़ा आनंदमय है लेकिन हम अपनी इच्छाओं के कारण, वासनाओं के कारण इसे कष्टप्रद और क्लेशमय बनाते हैं। प्रारब्ध में जितना लिखा है और जब मिलना लिखा है, उतना ही मिलेगा और उसी समय पर मिलेगा। कर्म जरूर करते रहें पर चिन्तित कदापि ना हों। जीवन के लिए जो जरुरी है उतना प्रकृति कारण से नहीं, करुणा से अपने आप दे देती है। जब कोई पुरुष समस्त भौतिक इच्छाओं का त्याग करके ना तो इंद्रिय तृप्ति के लिए कार्य करता है और ना सकाम कर्मों में प्रवृत्त होता है तो वह योगा रूढ़ कहलाता है। मनुष्य को चाहिए कि अपने मन की सहायता से अपना उद्धार करें और अपने मन को नीचे न गिरने दे, यह ...

अनमोल विचार

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 विचार सागर  विचार सागर   पिता को बुढ़ापा इतना कमजोर नही करता जितना औलाद का रवैया कमजोर कर देता है ।  अकड़ और अभियान एक मानसिक बीमारी है जिसका इलाज कुदरत और समय जरूर करता है ।  ज्यादातर चिंतायें वास्तव में आधारहीन और मन की उपज होती है जो कभी जन्म ही नहीं लेती ।  इंसानियत एक बहुत बडा खजाना है, उसे लिबास में नहीं इंसान में तलाश करो ।  किसी भी इंसान के सामने जितनी बडी समस्या होगी, उसकी उतनी बडी सफलता होगी। प्रभात-पुष्पम्  _भिन्नभाण्डं च खट्वां च कुक्कुटं शुनकं तथा।_ _अप्रशस्तानि सर्वाणि यश्च वृक्षो गृहेरुह:॥_ _भिन्नभाण्डे कलिं प्राहु: खट्वायां च धनक्षय:।_ _कुक्कुटे शुनके चैव हवि: नाश्नन्ति देवताः॥_ _वृक्षमूले ध्रुवं सत्यं तस्माद् वृक्षं न रोपयेत्॥_ (महाभारत) भावार्थ: घर में टूटे-फूटे बर्तन, टूटी हुई खाट, मुर्गा, कुत्ता और पीपल आदि वृक्ष का होना अच्छा नहीं माना जाता है। टूटे-फूटे बर्तन में कलियुग का वास माना जाता है और टूटी हुई खाट से धनहानि कही जाती है। मुर्गा और कुत्ता घर में रहने पर देवता उस घर में हविष्य ग्रहण नहीं करते तथा मकान के अन्दर कोई ब...

सन्त तुकाराम

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सन्त तुकाराम भारत के महान् सन्तों में सन्त तुकाराम का विशिष्ट स्थान है। उनका जन्म 8 मार्च, 1608 को पुणे में हुआ था। उनके पिता श्री वोल्होबा तथा माता कनकाई बहुत सात्विक प्रवृत्ति के दम्पति थे। अतः तुकाराम को बालपन से ही विट्ठल भक्ति संस्कारों में प्राप्त हुई।  उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। फिर भी सन्तोषी स्वभाव के तुकाराम कभी विचलित नहीं हुए। आगे चलकर उनके माता-पिता और फिर पत्नी तथा पुत्र की भी मृत्यु हो गयी; पर तुकाराम ने प्रभु भक्ति से मुँह नहीं मोड़ा।  तुकाराम स्वभाव से ही विरक्त प्रवृत्ति के थे। वे प्रायः भामगिरी तथा भण्डार की पहाडि़यों पर जाकर एकान्त में बैठ जाते थे। वे वहाँ ज्ञानेश्वरी तथा एकनाथी भागवत का अध्ययन भी करते थे। कीर्तन तथा सत्संग में उनका बहुत मन लगता था। जब वे नौ वर्ष के ही थे, तब उन्हें स्वप्न में एक तेजस्वी सन्त ने दर्शन देकर ‘रामकृष्ण हरि’ मन्त्र का उपदेश दिया। इससे उनका जीवन बदल गया और वे दिन-रात प्रभु के ध्यान में डूबे रहने लगे। एक बार प्रसिद्ध सन्त नामदेव ने तुकाराम जी को स्वप्न में दर्शन देकर भजन लिखने को कहा। इससे पूर्व तुकाराम ने कभी कविता नही...

जानकारी काल मार्च - 2022

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  हिंदी मासिक   जानकारी काल   वर्ष-22,             अंक-10,             मार्च  - 2022,          पृष्ठ 36,        मूल्य-2-50 इन्हें भी पड़े   भ्रान्तियों के निवारण का महापर्व : आजादी का अमृत महोत्सव– अवनीश भटनागर - 2 परिवार हो समाज पोषक – दिलीप वसंत बेतकेकर - 5 राधा रानी की शक्ति - 12 ,क्रोध से बचे - 14 ,सनातम संस्क्रति - 15 ,लालची - 17 ,मन पंछी - 19 ,बलिदान -22 ,दही भल्ला - 24 ,मंडूक आसन -25 ,आत्म बल -26 ,मंगल देव -27 ,मूंगा 28 ,ना करो सियासत -29 , राष्ट्रीय शिक्षा नीति : प्रौढ़ शिक्षा   – डॉ० रवीन्द्र नाथ तिवारी - 30  बाप की वसीयत -33 , संरक्षक  श्रीमान कुलवीर शर्मा महामंत्री समर्थ शिक्षा समिति डॉ वी  एस नेगी प्रोफेसर भगत सिंह कॉलेज सांध्य  प्रधान संपादक व्  प्रकाशक  सतीश शर्मा     कार्यालय  ए 214 बुध नगर इंद्रपुरी  नई दिल्ली 110012  मोबाइल   9312002527  संपादक मंडल  सौरभ...