संदेश

जुलाई, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

पद्मिनी एकादशी

चित्र
  पद्मिनी एकादशी अधिक मास/लोध मास/मलमास की शुक्लपक्ष की  एकादशी को  पद्मिनी एकादशी कहते है | एकादशी के दिन प्रात उठकर नित्य क्रिया से निवृत्त होकर भगवान की पूजा करनी चाहिए | पद्मिनी एकादशी व्रत कथा - एक समय कार्तवीर्य ने रावण को कारागार में बंद कर रखा था उसको पुलस्त्य जी ने कार्तवीर्य से विनय करके मुक्त कराया | इस घटना को सुनकर नारदजी ने पुलस्त्य जी से पूछा हे महाराज उस महावीर रावण ने  समस्त देवताओं सहित देवराज इंद्र को जीत लिया तथा उसको कार्तवीर्य ने किस प्रकार जीता था आप मुझे बताइए इस पर पुलस्त्य जी बोले हैं नारद आप पहले कार्तवीर्य  की उत्पत्ति सुनो त्रेता युग में महिष्मति नाम की नगरी में उपकीर्तवीर्य्   राजा राज करता था उस राजा के सौ स्त्रीयाँ थी उनमें से किसी के भी राज्य भार लेने वाला योग्य पुत्र नहीं था उस राजा ने पुत्र की प्राप्ति के लिए यज्ञ किए परंतु सब असफल रहे।  अंत में वह तप के द्वारा ही सिद्धियों को प्राप्त जानकर तप करने के लिए वन को चला गया। उसकी स्त्री हरीशचंद की पुत्री प्रमादा वस्त्र आभूषण को त्याग कर अपने पति के साथ गंधमादन पर्वत पर चल...

श्री गुरू- जी प्रेरक प्रसंग

चित्र
  शत नमन माधव चरण में--- कागजी गाय घास नहीं खाती वैसे, 'मित्रता' विषय पर एक पुस्तक आप लोगों ने देखी हो कुछ ने तो पड़ी भी होगी। उस पुस्तक की बहुत ख्याति है। उसे पढ़कर कोई मित्र बनाना सीख सकता हो तो सीख ले, परंतु यह संभव लगता नहीं। मुझे स्मरण है कि जब मैं १०वीं कक्षा में पढ़ता था, तब शासकीय विद्यालयों के विद्यार्थियों के लिए एक कार्यक्रम चलता था। उसकी कुछ शर्तें थीं। उनमें से एक थी 'किंग इम्प्रूव' वह शर्त मुझे मान्य न होने के कारण मैं उसमें नहीं गया। उस योजना में तरह-तरह की शिक्षा दी जाती थी। तैरने की शिक्षा भी देते थे। उस योजना में जो विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करने गए थे, उन्हें एक प्रमाण-पत्र दिया गया था कि उन्होंने तैरना सीख लिया है। गर्मी के दिनों में हम मित्र लोग नदी पर तैरने जाते थे। प्रमाण-पत्र प्राप्त उन विद्यार्थियों में से भी कुछ साथ गए। हम लोग ऊँचाई पर जाकर नदी में कूदते व डुबकी लगाते थे। वे प्रमाण-पत्र प्राप्त तैराक किनारे पर ही बैठे रहे। हमने उनसे पूछा कि तुम लोग नहीं तैरोगे? उन्होंने कहा कि पानी में उतर कर तैर नहीं सकते। पानी में उतरेंगे तो डूब जाएँगे। हमने प...

राजा जनक

चित्र
  कथा कहानी सुनने के लिए क्लिक करे sumansangam.com   राजा जनक को नर्क द्वार का दर्शन प्राचीन काल की बात है। राजा जनक ने ज्यों ही योग बल से शरीर का त्याग किया, त्यों ही एक सुन्दर सजा हुआ विमान आ गया और राजा दिव्य-देहधारी सेवको के साथ उस पर चढकर चले। विमान महाराज को संमनी पुरी के निकटवर्ती भाग से ले जा रहा था। ज्यों ही विमान वहाँ से आगे बढ़ने लगा, त्यों ही बड़े ऊँचे स्वंर से राजा को हजारों मुखों से निकली हुई करुणध्वनि सुनायी पड़ी... पुण्यात्मा राजन्! आप यहां से जाइये नहीं, आपके शरीर को छूकर आने वाली वायु का स्पर्श पाकर हम यातनाओ से पीड़ित नरक के प्राणियों को बड़ा ही सुख मिल रहा है। धार्मिक और दयालु राजा ने दुखी जीवों की करुण पुकार सुनकर दया के वश निश्चय किया कि, जब मेरे यहाँ रहने से इन्हें सुख मिलता है तो यम, मैं यहीं रहूंगा। मेरे लिये यही सुन्दर स्वर्ग है।  राजा वहीं ठहर गये। तब यमराज ने उनसे कहा, यह स्थान तो इष्ट, हत्यारे पापियों के लिये है।  हिंसक, दूसरो पर कलंक लगाने वाले, लुटेरे, पतिपरायणा पती का त्याग करनेवाले, मित्रों को धोखा देने वाले, दम्भी, द्वेष और उपहास करके...

अध्यात्मिक विकास

चित्र
  कथा,कहानी व लेख पढ़ने के लिए क्लिक करे sumansangam.com   अध्यात्मिक विकास  नेहामिक्रमनाशोऽस्ति - स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् (2.40) भगवान कहते हैं योग बुद्धि के इस महान मार्ग में अधूरे प्रयास का कोई भय नहीं है। सामान्यतः हम कोई कार्य शुरू करते हैं और कुछ कारणों से उसे बीच में ही छोड़ देते हैं। जब दोबारा उस कार्य को करना है तो कई बार पुनः शुरू से आरम्भ करना पड़ता है परन्तु इस मार्ग में पुनः शुरू करने के लिए आपको आरम्भ में नहीं जाना पड़ता, जहाँ छोड़ा था वहीं से आगे शुरू कर सकते हैं। इसे ही कहा जाता है ‘संचित विकास’ - वास्तव में चरित्र निर्माण की यही मूल प्रकृत्ति है। आगे दूसरी पंक्ति में भगवान कहते हैं - इस धर्म का थोड़ा सा भी पालन, हमें महान भय से बचाएगा। इस चरित्र निर्माण के कार्य में समय लगता है। इसमें अधूरे प्रयास का बेकार जाना नहीं होता। गीता का यही उपदेश है कि, ‘थोड़ा भी कुछ नहीं से अच्छा है’ - यह ऐसा नहीं है कि, या तो सब कुछ हो, अन्यथा कुछ भी नहीं। इस विचार से निराश मत हो कि उस व्यक्ति ने इतना किया है, मुझमे उस जैसी शक्ति नहीं, अतः मैं कुछ नहीं करूँगा। यह उच...

क्षमा एक कहानी

चित्र
  क्षमा एक कहानी एक साधक ने अपने दामाद को तीन लाख रूपये व्यापार के लिये दिये। उसका व्यापार बहुत अच्छा जम गया लेकिन उसने रूपये ससुर जी को नहीं लौटाये।आखिर दोनों में झगड़ा हो गया। झगड़ा इस सीमा तक बढ़ गया कि दोनों का एक दूसरे के यहाँ आना जाना बिल्कुल बंद हो गया। घृणा व द्वेष का आंतरिक संबंध अत्यंत गहरा हो गया। साधक हर समय हर संबंधी के सामने अपने दामाद की निंदा, निरादर व आलोचना करने लगे। उनकी साधना लड़खड़ाने लगी। भजन पूजन के समय भी उन्हें दामाद का चिंतन होने लगा। मानसिक व्यथा का प्रभाव तन पर भी पड़ने लगा। बेचैनी बढ़ गयी। समाधान नहीं मिल रहा था। आखिर वे एक संत के पास गये और अपनी व्यथा कह सुनायी। संतश्री ने कहाः- 'बेटा ! तू चिंता मत कर। ईश्वरकृपा से सब ठीक हो जायेगा। तुम कुछ फल व मिठाइयाँ लेकर दामाद के यहाँ जाना और मिलते ही उससे केवल इतना कहना, बेटा ! सारी भूल मुझसे हुई है, मुझे क्षमा कर दो।' साधक ने कहाः "महाराज ! मैंने ही उनकी मदद की है और क्षमा भी मैं ही माँगू !" संतश्री ने उत्तर दियाः- "परिवार में ऐसा कोई भी संघर्ष नहीं हो सकता, जिसमें दोनों पक्षों की गलती न हो। च...

पुत्रदा एकादशी

चित्र
  पुत्रदा  एकादशी पुत्रदा एकादशी सावन मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है इस दिन भगवान विष्णु के नाम पर व्रत रखकर पूजा की जाती है इसके बाद  ब्राह्मण को भोजन करके दान देकर आशीर्वाद लेना  चाहिए | पुत्रदा एकादशी की कथा - एक समय की बात है महिष्मति नगर में  महिजीत नाम का राजा राज करता था | वह बड़ा ही धर्मात्मा शांतिप्रिय और दानी था परंतु उसके कोई संतान नहीं थी यही सोच सोच कर राजा बहुत ही दुखी रहता था | एक बार राजा ने अपने राज्य के समस्त ऋषिओ  और महात्माओं को बुलाया और संतान प्राप्त करने के उपाय पूछे इस पर परम ज्ञानी लोमस ऋषि ने बताया कि आपने पिछले जन्म में स्वर्ण मास की एकादशी को अपने तालाब से प्यासी गाय को पानी नहीं पीने दिया था और उसे हटा दिया था | इसी श्राप के कारण आपके कोई संतान उत्पन्न नहीं हुई है इसलिए आप सावन मास की पुत्रदा एकादशी का नियम पूर्वक व्रत रखकर रात्रि जागरण करिए | आपको पुत्र अवश्य प्राप्त होगा ऋषि की आज्ञा अनुसार राजा ने एकादशी का व्रत किया और इसके प्रभाव से उसे पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई तथा इस लोक मे सुख भोग कर अंत मे वैकुंठ   म...

ज्ञान व चरित्र

चित्र
ज्ञान व चरित्र एक राजपुरोहित थे। वे अनेक विधाओं के ज्ञाता होने के कारण राज्य में अत्यधिक प्रतिष्ठित थे। बड़े-बड़े विद्वान उनके प्रति आदरभाव रखते थे पर उन्हें अपने ज्ञान का लेशमात्र भी अहंकार नहीं था। उनका विश्वास था कि ज्ञान और चरित्र का योग ही लौकिक एवं परमार्थिक उन्नति का सच्चा पथ है। प्रजा की तो बात ही क्या स्वयं राजा भी उनका सम्मान करते थे और उनके आने पर उठकर आसन प्रदान करते थे। एक बार राजपुरोहित के मन में जिज्ञासा हुई कि राजदरबार में उन्हें आदर और सम्मान उनके ज्ञान के कारण मिलता है अथवा चरित्र के कारण? इसी जिज्ञासा के समाधान हेतु उन्होंने एक योजना बनाई। योजना को क्रियान्वित करने के लिए राजपुरोहित राजा का खजाना देखने गए। खजाना देखकर लौटते समय उन्होंने खजाने में से पाँच बहुमूल्य मोती उठाए और उन्हें अपने पास रख लिया। खजांची देखता ही रह गया। राजपुरोहित के मन में धन का लोभ हो सकता है। खजांची ने स्वप्न में भी नहीं सोचा था। उसका वह दिन उसी उधेड़बुन में बीत गया। दूसरे दिन राजदरबार से लौटते समय राजपुरोहित पुन: खजाने की ओर मुड़े तथा उन्होंने फिर पाँच मोती उठाकर अपने पास रख लिए। अब तो खजांची...

संघ तपस्वी

चित्र
  संघ तपस्वी  संघ विस्तार में ध्येय जीवन समर्पित भावना। दिव्य लक्ष्य तक पहुंचने की अनुपम कामना ।। 1950 में अजमेर संघ शिक्षा वर्ग के बाद प्रांत प्रचारक ने सभी प्रचारकों से कहा कि अब प्रचारक व्यवस्था समाप्त की जा रही है, अतः सब घर वापस लौट जाएँ ! इस सूचना के बाद कुछ प्रचारक गुरूजी से मिले और पूछा कि गुरूजी आप शादी कब कर रहे हैं ? इस प्रश्न से गुरूजी असमंजस में पड गए और बोले कि मैं शादी क्यूं करूँगा भला ? इस पर प्रचारकों ने कहा कि जब आप गृहस्थ नहीं बन सकते तो फिर हमसे यह अपेक्षा क्यों ? सारी स्थिति समझकर गुरूजी ने उन्हें समझाया कि संघ की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वह प्रचारकों के प्रवास व्यय को भी वहन कर सके ! इसके बाद निर्णय हुआ कि जो लोग स्वयं व्यवस्था कर संघ कार्य कर सकते हैं, वे रहें , शेष वापस घर जाएँ ! तभी बाबा साहब नातू और राजाभाऊ महाकाल ने सोनकच्छ में चाय की दूकान चलाई और दिगंबर राव तिजारेजी ने उज्जैन के विनोद मिल में स्वीपर की नौकरी की ! वहीं उनका पहला परिचय हुआ - दत्तात्रय गंगाधर कस्तूरे उपाख्य भैयाजी कस्तूरे से ! माता पिता बचपन में ही चल बसे ! इन्हें व बड़े भाई दिगंबर...

महापराक्रमी बाजीराव पेशवा

चित्र
    महापराक्रमी बाजीराव पेशवा  पेशवा बाजीराव को पढ़ रहा हूँ। आश्चर्य हो रहा है कि इतने बड़े योद्धा के बारे में हम कितना कम जानते हैं। अतिशयोक्ति लगेगी, पर पिछले दो हजार वर्षों में भगवा भारत का सबसे बड़ा नक्शा उसी योद्धा ने बनाया था। ईसा के बाद हिन्दुओं का सबसे बड़ा साम्राज्य उसी के समय खड़ा हुआ। भारत के सफलतम योद्धाओं में से एक, जिनके लिए इतिहास के पन्नो में कम स्थान होने के बावजूद यह पीड़ा अवश्य झलक जाती है कि "वे बीस वर्ष और जी गए होते तो भारत का इतिहास कुछ और होता.."      एक योद्धा, जो अपनी तलवार से स्वाभिमान का इतिहास लिखता था। एक लड़ाका, जो अपनी पीठ पर धर्म का ध्वज बांध कर चलता था। एक कूटनीतिज्ञ, जिसने अपनी समस्त आयु शिवाजी महाराज के स्वप्नों को साकार करने में झोंक दी।       उसका अश्व अपनी टापों से शत्रुओं के अहंकार को रौंदते हुए दौड़ता था। उसकी तलवार सर्पिणी की जिह्वा सी लपलपाती हुई मृत्यु का उत्सव मनाती थी। हर हर महादेव के पवित्र उद्घोष के साथ वह जब भी युद्धभूमि की ओर निकला तो विजयी हो कर लौटा। जैसे युद्ध की देवी को प्रसन्न कर लिया था उसने... ...

नव निर्माण

चित्र
  आईये आपको एक दिलचस्प वाकया सुनाया जाये. हाँ तो कुछ यूं हुआ...... एक बार कॉलेज में Biology (जीव विज्ञान) क्लास चल रही थी. उसमें प्रोफेसर साहब सभी को तितली अर्थात Butterfly के जीवन चक्र के बारे में बता रहे थे. तदुपरांत... प्रोफेसर साहब अपने सभी विद्यार्थी को लैब ले गए जहाँ एक तितली का अंडा (प्यूपा) अपने अंतिम चरण में था और उसमें से एक नई तितली का जन्म होने ही वाला था. सभी विद्यार्थी सांस रोके खड़े थे और उस अनमोल क्षण को देखने को बेताब थे... जब तितली का बच्चा उस अंडे से बाहर आएगा. तभी... उस अंडे में थोड़ी सी हलचल हुई और अंडे में एक हल्की दरार आ गई. उसे देखकर... सभी विद्यार्थियों ने खुशी से किलकारी भरी और सबने उस अंडे पर नजरें गड़ा दी. तभी... अंडा थोड़ा सा टूटा और तितली का बच्चा छटपटाते हुए उससे बाहर आने का प्रयास करने लगा. लेकिन, चूंकि वो जन्म का समय था और तितली का वो बच्चा बेहद कमजोर था... शायद, इसीलिए वो अंडे के उस खोल एक झटके में नहीं तोड़ पा रहा था. इसीलिए, वो लगातार छटपटाए जा रहा था.. जिससे कि अंडे के खोल में काफी हल्की दरार ही आ पा रही थी. इसे देखकर... कुछ विद्यार्थी इमोशनल हो गए औ...

जीवन मूल्य

चित्र
   रोचक कथा कहानी सुनने के लिए क्लिक करे sumansangam.com   टूटते रिश्ते  सुबह के साढ़े सात बजे जब निधि स्कूल के लिए ‌तैयार हुई तो‌ चुपके से ऊपर मम्मी के बेडरूम में ‌ग‌ई धीरे से डोर सरकाया देखा तो सारा सामान बिखरा पड़ा था। नीचे ड्राइंग रूम में आई तो पापा सोफे पर बेसुध सो रहे थे। अपने रुम में आकर उसने अपनी गुल्लक में से पचास रुपए निकाल कर पॉकेट में रख लिए। बैग उठा कर बस के लिए निकलने लगी तो सरोज आई निधि बेटा आलू का परांठा बनाया है खा लो। निधि ने मायूस नजरों से सरोज आंटी को देखा नहीं आंटी भूख नहीं है। सरोज ने जबरदस्ती टिफिन उसके बैग में डाला। निधि स्कूल के ‌लिए निकल गई सरोज ‌सोचने लगी बेचारी छोटी बच्ची साहब और मेमसाब के रोज के लडा़ई झगडे से इस तेरह साल की उम्र में ‌कितनी बड़ी हो गई है। सरोज पिछले दस सालों से नेहा व नरेश के यहां काम कर रही है। दोनों ‌मल्टीनेशनल कंपनी में ऊंचे ‌पदों पर कार्यरत हैं निधि उनकी इकलौती बेटी है किसी चीज की कोई कमी नहीं है। पर हर समय दोनों एक दूसरे से लड़ते रहते हैं। नरेश पिछले कुछ समय से नेहा से तलाक चाह रहा है और चाहता है निधि की जिम्मेदारी ने...

आस्था,चमत्कार या अन्धविश्वास

चित्र
   रोचक कथा,कहानी व लेख पढ़ने के लिए क्लिक करे sumansangam.com   आस्था या अंधविश्वास  आस्था का संबंध केवल आत्मा-परमात्मा से नहीं, संपूर्ण अस्तित्व से है। आस्था जीवन की संचालन शक्ति है। संशय उत्पन्न होते ही वह शक्ति गड़बड़ा जाती है। अगर जीवन-व्यवस्था को ढंग से चलाना है तो हमें विश्वास और आस्था का सहारा लेना ही है--"आस्था किसी विचार, मूल्य, व्यक्ति अथवा कथन में वह दृढ़ विश्वास है जिसे वह पर्याप्त एवं विश्वसनीय प्रमाणों के न होते हुए भी पूर्णतः स्वीकार करता है जिसमें कुछ अनिश्चयात्मकता अनिवार्यतः विद्यमान रहती है।"श्रद्धा पवित्र आचरण से निर्माण होती है यदि किसी व्यक्ति में सत्य निष्ठा पवित्रता एवं निस्वार्थ बुद्धि हो तो अनेक लोग उसके निकट आते हैं उसके शब्दों का मान होता है वह हृदय हृदय का स्वामी बनता है श्रद्धा की एक लहर निर्माण होती है और यही आस्था में बदल जाती है | आस्था और बुद्धि परस्पर विरोधी है इनका आपस में कोई संबंध नहीं है ऐसा सोचना गलत है अगर ऐसा होता तो भगवान वेदव्यास जगतगुरु शंकराचार्य संत ज्ञानेश्वर स्वामी विवेकानंद जैसे बुद्धिमान लोग आस्थावान नहीं कहलाते | ल...

अपने पंख खोले

चित्र
  रोचक कथा कहानी पढ़ने के लिए क्लिक करे sumansangam.com   अपने पंख खोले बहुत समय पहले की बात है , एक राजा को उपहार में किसी ने बाज के दो बच्चे भेंट किये । वे बड़ी ही अच्छी नस्ल के थे , और राजा ने कभी इससे पहले इतने शानदार बाज नहीं देखे थे।राजा ने उनकी देखभाल के लिए एक अनुभवी आदमी को नियुक्त कर दिया।जब कुछ महीने बीत गए तो राजा ने बाजों को देखने का मन बनाया , और उस जगह पहुँच गए जहाँ उन्हें पाला जा रहा था। राजा ने देखा कि दोनों बाज काफी बड़े हो चुके थे और अब पहले से भी शानदार लग रहे थे ।राजा ने बाजों की देखभाल कर रहे आदमी से कहा, ” मैं इनकी उड़ान देखना चाहता हूँ , तुम इन्हे उड़ने का इशारा करो ।“ आदमी ने ऐसा ही किया। इशारा मिलते ही दोनों बाज उड़ान भरने लगे , पर जहाँ एक बाज आसमान की ऊंचाइयों को छू रहा था , वहीँ दूसरा , कुछ ऊपर जाकर वापस उसी डाल पर आकर बैठ गया जिससे वो उड़ा था।ये देख राजा को कुछ अजीब लगा. “क्या बात है जहाँ एक बाज इतनी अच्छी उड़ान भर रहा है वहीँ ये दूसरा बाज उड़ना ही नहीं चाह रहा ?”, राजा ने सवाल किया। ” जी हुजूर.... इस बाज के साथ शुरू से यही समस्या है , वो इस डाल को...

लाभ हानी यश अपयश

चित्र
  रोचक कथा कहानी व लेख पढ़ने के लिए क्लिक करे sumansangam.com   सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ सुख और दुख, लाभ और हानि, विजय और पराजय - इन सब परिस्थितियों को एक मानकर - समान मानना यानि मन को समभाव में रखना - न एक में खुश होना, न दूसरे में दुखी - अर्थात प्रत्येक परिस्थिति में मन को शांत व स्थिर रखना। यह एक अद्भुत विचार है परन्तु कठिन भी है। इसके लिए सतत् सावधानीपूर्वक जागरूक रहते हुए अभ्यास करना पड़ता है। जब भी हम महान उपलब्धियाँ प्राप्त करना चाहते हैं, तो उत्तेजित अवस्था में उन्हें प्राप्त नहीं किया जा सकता है। आज सामान्यतः हर आदमी उत्तेजित अवस्था में जी रहा है, इस स्थिति को बदलने हेतु इस विचार को एक मौन आन्दोलन में बदलने की आवश्यकता है। डॉ0 राधाकृष्णन जी ने एक जगह अपने भाषण में कहा था आधुनिक स्त्री-पुरूष आज Going about doing good- अच्छे काम को दिखाने में विश्वास करते हैं, लेकिन जब आप निकट जाकर गहराई व सूक्ष्मता से देखते हैं, तो It is more going about than doing good, यह करने की अपेक्षा करते दिखाना फिरना ज्यादा दिखाई देता है। इतनी उत्तेजना, हो-हल्ला और काम कम। जन्म कुण्डली...

संस्कार

चित्र
  रोचक कथा कहानी व लेख पढ़ने के लिए क्लिक करे sumansangam.com   संस्कार   प्रीति और कुणाल का 6 साल के प्रेम संबंध ने आज एक मोड़ पर आकर दम तोड़ दिया। मेडिकल कॉलेज में एडमिशन लेते ही प्रथम वर्ष में ही दोनों की दोस्ती हुई। दोनों को धीरे-धीरे समझ में आने लगा कि एक दूसरे को चाहने लगे हैं। दोनों एक दूसरे को डेटिंग करने लगे। कभी किसी कॉफी हाउस में बैठकर घंटों करते तो कभी किसी थिएटर में बैठकर कोई मनपसंद मूवी देखते। कॉलेज में भी दोनों के रिश्ते की चर्चा होने लगी। सभी बातों से बेफिक्र दोनों अपने में मस्त थे।  देखते ही देखते 4 साल कैसे गुजर गए पता नहीं चला। दोनों एमबीबीएस डॉक्टर हो गये। पीजी करने के लिए दोनों को अलग-अलग शहर जाना पड़ा। दोनों एक दूसरे को बहुत मिस करने लगे। फिर भी छुट्टियों में कभी-कभी दोनों एक दूसरे से मिल लेते और घंटों बैठ कर बात करते। आखिर में दोनों ने यह फैसला लिया कि एक ही शहर में कोई हॉस्पिटल ज्वाइन करेंगे। आखिर में दोनों ने दिल्ली का एक हॉस्पिटल ज्वाइन किया। जब किराए के फ्लैट में रहने की बात आई तो दोनों ही परेशान थे क्योंकि दिल्ली जैसे शहर में किराया बहुत अ...

माँ बेटी

चित्र
sumansangam.com   माँ बेटी   सास ने  जोर से आवाज लगाई मर गई क्या, अंदर से आवाज- जिंदा हूं माँ जी।तो फिर मेरी चाय क्यूं अभी तक नहीं आई, कब से पूजा करके बैठी हूं ला रही हूं माँ जी, बहू चाय के साथ, भजिया भी ले आयी, सास ने कहा तेल का खिलाकर क्या मरोगी? बहू ने कहा- ठीक हैं माँ जी ले जाती हूं।सास ने कहा- रहने दे अब बना दिया हैं तो खा लेती हूं। सास ने भजिया उठाई और कहा- कितनी गंदी भजिया बनाई हैं तुमने। बहू- माँ जी मुझे कपड़े धोने हैं मैं जाती हूं। बहू दरवाजे के पास छिपकर खड़ी हो गयी। सास भजिया पर टूट पड़ी और पूरी भजिया खत्म कर दी।बहू मुस्कुराई और काम पर लग गई दोपहर के खाने का वक्त हुआ। सास ने फिर आवाज लगाई- कुछ खाने को मिलेगा। बहू ने आवाज नहीं दी। सास फिर चिल्लाई- भूखे मारोगी क्या, बहू आयी सामने खिचड़ी रख दी। सास गुस्से से- ये क्या है, मुझे इसे नहीं खाना इसे। ले जाओ। बहू ने कहा- आपको डॉक्टर ने दिन में खिचड़ी खाने को कहा है, खाना तो पड़ेगा ही। सास मुंह बनाते हुए, हाँ तू मेरी माँ बन जा, बहू फिर मुस्कुराई और चली गई। आज इनके घर पूजा थी । बहू सुबह 4 बजे से उठ गयी। पहले स्नान किय...

हकीकत

चित्र
sumansangam.com   हकीकत    गाँव में एक किसान रहता था,जो दूध से दही और मक्खन बनाकर बेचने का काम करता था | एक दिन बीवी ने उसे मक्खन तैयार करके दिया वो उसे बेचने के लिए अपने गाँव से शहर की तरफ रवाना हुवा..वो मक्खन गोल पेढ़ो की शकल मे बने हुये थे और हर पेढ़े का वज़न एक किलो था | शहर मे किसान ने उस मक्खन को हमेशा की तरह एक दुकानदार में बेच दिया,और दुकानदार से चायपत्ती,चीनी,तेल और साबुन वगैरह खरीदकर वापस अपने गाँव को रवाना हो गया | किसान के जाने के बाद - दुकानदार ने मक्खन को फ्रिज़र मे रखना शुरू किया...उसे खयाल आया के क्यूँ ना एक पेढ़े का वज़न किया जाए, वज़न करने पर पेढ़ा सिर्फ 900 ग्राम का निकला, हैरत और निराशा से उसने सारे पेढ़े तोल डाले मगर किसान के लाए हुए सभी पेढ़े 900-900 ग्राम के ही निकले। अगले हफ्ते फिर किसान हमेशा की तरह मक्खन लेकर जैसे ही दुकानदार की दहलीज़ पर चढ़ा..दुकानदार ने किसान से चिल्लाते हुए कहा: दफा हो जा, किसी बेईमान और धोखेबाज़ शखस से कारोबार करना पर मुझसे नही।मै 900 ग्राम.मक्खन को पूरा एक किलो कहकर बेचने वाले शख्स की वो शक्ल भी देखना गवारा नही करता..किसान...

9 दिव्य औषधियां हैं नवदुर्गा के 9 रूप

चित्र
  sumansangam.com   नवदुर्गा  यह 9 दिव्य औषधियां हैं नवदुर्गा के 9 रूप प्रत्येक देवी आयुर्वेद की भाषा में मार्कण्डेय पुराण के अनुसार नौ औषधि के रूप में मनुष्य की प्रत्येक बीमारी को ठीक कर रक्त का संचालन उचित व साफ कर मनुष्य को स्वस्थ करतीं है। अत: मनुष्य को इनकी आराधना एवं सेवन करना चाहिए। नवदुर्गा यानि मां दुर्गा के नौ रूप। जानकारों के अनुसार 9 औषधियों में भी विराजते हैं, मां अम्बे के यह नौ रूप, जो समस्त रोगों से बचाकर जगत का कल्याण करते हैं। नवदुर्गा के नौ औषधि स्वरूपों को सर्वप्रथम मार्कण्डेय चिकित्सा पद्धति के रूप में दर्शाया गया और चिकित्सा प्रणाली के इस रहस्य को ब्रह्माजी द्वारा उपदेश में दुर्गाकवच कहा गया है। ऐसा माना जाता है कि यह औषधियां समस्त प्राणियों के रोगों को हरने वाली और और उनसे बचा रखने के लिए एक कवच का कार्य करती हैं, इसलिए इसे दुर्गाकवच कहा गया। इनके प्रयोग से मनुष्य अकाल मृत्यु से बचकर सौ वर्ष जीवन जी सकता है। यहां हम जानकारों से बातचीत के बाद आपको बता रहे हैं, दिव्य गुणों वाली उन 9 औषधियों के बारे में जिन्हें नवदुर्गा कहा गया है -  1. प्रथम शैलपु...

कामिका एकादशी

चित्र
  कामिका एकादशी   कामिका एकादशी श्रावण  मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को बनाई जाती है इसे पवित्रता के नाम से भी जाना जाता है | प्रातः स्नानादि करके भगवान विष्णु की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान कराकर भोग लगाया जाता है | आचमन के पश्चात धूप दीप चंदन आदि सुगंधित पदार्थों से आरती उतारनी चाहिए | कामिका एकादशी व्रत की कथा - एक समय की बात है कि किसी गांव में एक ठाकुर रहा करते थे | वह बहुत ही क्रोधी स्वभाव के थे क्रोधवश  उनकी एक ब्राह्मण से भिड़ंत हो गई जिसका परिणाम यह हुआ कि वह ब्राह्मण मारा गया | उस ब्राह्मण के मरणोपरांत उन्होंने उसकी तेहरवीं करनी चाही लेकिन सब ब्राह्मणों ने भोजन करने से इंकार कर दिया तब उन्होंने सभी ब्राह्मणों से निवेदन किया कि हे  भगवान मेरा पाप  कैसे दूर हो सकता है कृपया कोई उपाय बताए | भगवान से की इस प्रार्थना पर उन सब ने उसे एकादशी व्रत करने की सलाह दी ठाकुर ने वैसे ही किया | रात में भगवान की मूर्ति के पास जब वह शयन  कर रहा था तभी उसने एक सपना देखा सपने में भगवान ने उसे दर्शन देकर कहा कि ठाकुर तेरा सारा पाप दूर हो गया अब तो तू ब्राह्मण की ...