"रक्षाबंधन"

 


 "रक्षाबंधन" 

बंधन का त्योहार मुख्य रूप से भाई-बहन के पवित्र प्रेम, स्नेह और सुरक्षा के संकल्प को मनाने के लिए मनाया जाता है। "रक्षाबंधन" का अर्थ है—"रक्षा का बंधन"। इस दिन बहनें अपने भाई की कलाई पर रक्षासूत्र (राखी) बांधती हैं और भाई अपनी बहन को हमेशा सुरक्षित रखने का वचन देता है।यह त्योहार परिवार में आपसी रिश्तों को मजबूत करता है। बहन अपने भाई की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और तरक्की के लिए प्रार्थना करती है। बदले में, भाई अपनी बहन को हर सुख-दुख में साथ निभाने और उसकी रक्षा करने का अटूट संकल्प लेता है। महाभारत काल में जब भगवान कृष्ण की उंगली कट गई थी, तब द्रौपदी ने अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया था। कृष्ण ने इस उपकार के बदले द्रौपदी को हमेशा रक्षा का वचन दिया और चीरहरण के समय उनकी लाज बचाई। चित्तौड़ की राजपूत रानी कर्णावती ने सुल्तान बहादुर शाह के आक्रमण से बचने के लिए मुगल सम्राट हुमायूं को राखी भेजी थी। हुमायूं ने राखी का मान रखा और रानी की रक्षा के लिए अपनी सेना भेज दी।माता लक्ष्मी ने पाताल लोक के राजा बलि को राखी बांधकर उन्हें अपना भाई बनाया था और उपहार स्वरूप अपने पति भगवान विष्णु को पाताल लोक से वापस मांग लिया था।

रक्षाबंधन केवल सगे भाई-बहन तक सीमित नहीं है। यह त्योहार समाज में आपसी भाईचारे को बढ़ावा देता है। लोग अपने दोस्तों, पड़ोसियों और उन सभी को राखी बांधते हैं जिन्हें वे अपना रक्षक या भाई मानते हैं।

रक्षा बंधन केवल भाई-बहन के व्यक्तिगत प्रेम का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज में सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय एकता और वसुधैव कुटुंबकम की भावना को सुदृढ़ करने का एक महापर्व है। यह त्योहार जाति, धर्म, वर्ग और प्रांतीयता की सीमाओं को तोड़कर संपूर्ण समाज को आत्मीयता के एक अटूट सूत्र में बांधता है।सामाजिक समरसता के रूप में रक्षा बंधन का महत्वजाति और वर्ग भेद का उन्मूलन दिवस के रूप में भी मनाते हैं।इस दिन समाज के विभिन्न वर्गों की बहनें एक-दूसरे को या समाज के रक्षकों को राखी बांधकर ऊंच-नीच के भेदभाव को समाप्त करती हैं।समाज के मुख्यधारा से दूर रह रहे लोगों, जैसे घुमंतू समुदायों और अनाथालयों में जाकर राखी बांधने से सामाजिक आत्मीयता बढ़ती है। रेशम का एक धागा पूरे समाज को एक-दूसरे के सुख-दुख और मान-सम्मान की रक्षा करने की जिम्मेदारी का अहसास कराता है।ऐतिहासिक और सांस्कृतिक उदाहरण रवींद्रनाथ टैगोर का अनूठा प्रयास: वर्ष 1905 में बंगाल विभाजन के समय रवींद्रनाथ टैगोर ने रक्षा बंधन को हिंदू-मुस्लिम एकता और सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया था।रानी कर्णावती और हुमायूं की कथा: इतिहास साक्षी है कि चित्तौड़ की रानी कर्णावती ने मुगल सम्राट हुमायूं को राखी भेजकर धार्मिक दूरियों को पाटते हुए मानवीय संबंधों और समरसता की मिसाल पेश की थी।राष्ट्र रक्षकों का सम्मान: वर्तमान में भी देश के सैनिक, पुलिसकर्मी और सामाजिक कार्यकर्ताओं को राखी बांधकर पूरा समाज उनके प्रति कृतज्ञता और एकजुटता व्यक्त करता है।समरस समाज के निर्माण में इसकी भूमिकायह पर्व हमें सिखाता है कि राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके नागरिकों के आपसी भाईचारे और समरसता में निहित है। रक्षा सूत्र के माध्यम से समाज का हर नागरिक एक-दूसरे के प्रति संवेदनशील बनता है, जिससे एक संगठित और सशक्त राष्ट्र की नींव मजबूत होती है

आप सभी को सादर प्रणाम।आज मुझे अत्यंत हर्ष हो रहा है कि मैं आप सभी के समक्ष एक ऐसे विषय पर अपने विचार साझा करने जा रहा हूँ, जो हमारे समाज की आत्मा है—"रक्षा बंधन पर सामाजिक समरसता"।आदरणीय श्रोतागण,अक्सर हम रक्षा बंधन को केवल भाई-बहन के व्यक्तिगत प्रेम, मीठी नोक-झोंक और उपहारों के लेन-देन तक सीमित मान लेते हैं। लेकिन यदि हम इसकी गहराई में जाएँ, तो यह त्योहार केवल एक परिवार की चारदीवारी का उत्सव नहीं है। यह संपूर्ण समाज को एकता के सूत्र में पिरोने वाला 'महापर्व' है। रक्षा बंधन का अर्थ है—"रक्षा का बंधन", और यह रक्षा केवल एक भाई अपनी बहन की नहीं करता, बल्कि समाज का हर वर्ग एक-दूसरे के मान-सम्मान और अस्तित्व की रक्षा का संकल्प लेता है।मित्रों,हमारा भारत विविधताओं का देश है। यहाँ विभिन्न जातियाँ, धर्म और भाषाएँ हैं। ऐसे में सामाजिक समरसता, यानी आपसी भाईचारा ही वह गोंद है जो हमें एक रखता है। रक्षा बंधन इस समरसता का सबसे बड़ा जीवंत उदाहरण है। रेशम का एक कमजोर सा दिखने वाला धागा जब किसी की कलाई पर सजता है, तो वह जाति, ऊंच-नीच और अमीर-गरीब के सारे भेदों को पल भर में मिटा देता है।इतिहास इस बात का गवाह है कि इस धागे ने बड़े-बड़े साम्राज्यों और दिलों की दूरियों को मिटाया है। जब चित्तौड़ की रानी कर्णावती ने हुमायूं को राखी भेजी, तो वह धर्म की सीमाओं को लांघकर रक्षा के लिए दौड़ पड़ा था। यही नहीं, वर्ष 1905 में जब अंग्रेजों ने बंगाल को बांटने की साजिश रची, तब गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने हिंदू-मुस्लिम समुदाय के लोगों से एक-दूसरे को राखी बांधने का आह्वान किया था। वह रक्षा बंधन सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता का एक ऐतिहासिक आंदोलन बन गया था।मेरे प्यारे भाइयों और बहनों,आज के आधुनिक दौर में इस पर्व की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है। आज हमें इस त्योहार को अपने घरों से निकालकर समाज के उस अंतिम व्यक्ति तक ले जाना है जो खुद को अकेला महसूस करता है।जब समाज की बहनें अनाथालयों, वृद्धाश्रमों और समाज के वंचित या घुमंतू समुदायों के बीच जाकर रक्षा सूत्र बांधती हैं, तब वास्तविक सामाजिक समरसता का जन्म होता है।जब हम सीमाओं पर हमारी रक्षा कर रहे वीर जवानों, दिन-रात मुस्तैद पुलिसकर्मियों और हमारे समाज को साफ-सुथरा रखने वाले सफाई कर्मियों की कलाई पर राखी बांधते हैं, तब हम एक समरस और संवेदनशील राष्ट्र का निर्माण करते हैं।निष्कर्ष के रूप में, मैं यही कहना चाहूँगा कि आइए इस रक्षा बंधन पर हम केवल धागे न बदलें, बल्कि अपनी सोच बदलें। हम यह संकल्प लें कि समाज में किसी भी बहन का अपमान नहीं होने देंगे, किसी भी वर्ग को खुद से अलग नहीं समझेंगे और हर नागरिक के सुख-दुख में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहेंगे। जब हर नागरिक के दिल में यह समरसता होगी, तभी हमारा देश "वसुधैव कुटुंबकम" के सपने को साकार कर पाएगा।

रक्षा बंधन और सामाजिक समरसताप्रस्तावनाभारतीय संस्कृति उत्सवों और त्योहारों की संस्कृति है। यहाँ मनाया जाने वाला हर पर्व अपने भीतर एक गहरा सामाजिक और मानवीय संदेश समेटे रहता है। इन्हीं त्योहारों में से एक प्रमुख त्योहार है—'रक्षा बंधन'। सामान्यतः रक्षा बंधन को भाई और बहन के पवित्र प्रेम और स्नेह के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। परंतु, व्यापक दृष्टिकोण से यह पर्व केवल एक पारिवारिक अनुष्ठान मात्र नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज में 'सामाजिक समरसता' (Social Harmony) और राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने का एक सशक्त माध्यम है।सामाजिक समरसता का अर्थसामाजिक समरसता का सीधा अर्थ है—समाज के सभी वर्गों, जातियों, धर्मों और विचारधाराओं के बीच आपसी सद्भाव, समानता और भाईचारे की भावना का होना। एक ऐसा समाज जहाँ ऊंच-नीच, छुआछूत या किसी भी प्रकार का भेदभाव न हो। रक्षा बंधन का त्योहार इसी समरसता की नींव को मजबूत करता है क्योंकि 'रक्षा सूत्र' (राखी) किसी जाति या धर्म को देखकर नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं को देखकर बांधा जाता है।भेदभाव मिटाने का माध्यमरक्षा बंधन का पर्व समाज के कृत्रिम बंधनों और दूरियों को पाटता है। इस दिन जब समाज के विभिन्न तबकों के लोग एक-दूसरे से जुड़ते हैं, तो वर्ग-भेद स्वतः ही समाप्त हो जाता है। उदाहरण के लिए, जब समाज की बहनें बस्तियों में रहने वाले वंचित वर्ग के बच्चों को, अनाथालयों में रहने वाले बच्चों को या समाज के बुजुर्गों को राखी बांधती हैं, तो यह संदेश जाता है कि हम सब एक ही समाज के अभिन्न अंग हैं। यह पर्व अमीर और गरीब के बीच की खाई को पाटकर एक संवेदनशील समाज का निर्माण करता है।ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समरसता की मिसालइतिहास गवाह है कि रक्षा बंधन ने राजनीतिक और धार्मिक दीवारों को तोड़कर समरसता की अनूठी मिसालें पेश की हैं:रानी कर्णावती और हुमायूं की कथा: चित्तौड़ की राजपूत रानी कर्णावती ने मुग़ल शासक हुमायूं को राखी भेजकर सहायता मांगी थी। हुमायूं ने धर्म की सीमा को लांघकर उस धागे का सम्मान किया और भाई का कर्तव्य निभाया।रवींद्रनाथ टैगोर का आंदोलन: वर्ष 1905 में जब ब्रिटिश सरकार ने बंगाल का विभाजन कर हिंदू और मुस्लिमों को बांटने का प्रयास किया, तब गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने रक्षा बंधन का सहारा लिया। उन्होंने दोनों समुदायों के लोगों से एक-दूसरे की कलाई पर राखी बांधने का आह्वान किया, जिसने सांप्रदायिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता की एक अभूतपूर्व मिसाल कायम की।वर्तमान समय में प्रासंगिकता और विस्तारआज के आधुनिक और संकुचित होते समाज में रक्षा बंधन की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ गई है। वर्तमान में समरसता के निम्नलिखित रूप देखने को मिलते हैं:राष्ट्र रक्षकों का सम्मान: इस दिन देश की महिलाएं सीमाओं पर तैनात सैनिकों, पुलिसकर्मियों और डॉक्टरों को राखी बांधती हैं, जो यह दर्शाता है कि पूरा देश उनके त्याग के प्रति कृतज्ञ है।पर्यावरण संरक्षण: आज के समय में लोग प्रकृति और वृक्षों को भी रक्षा सूत्र बांध रहे हैं, जो प्रकृति और मानव के बीच समरसता को दर्शाता है।घुमंतू और वंचित समुदायों की भागीदारी: विभिन्न सामाजिक संगठन अब मुख्यधारा से दूर रह रहे घुमंतू समुदायों के बीच जाकर इस पर्व को मनाते हैं, जिससे वे समाज का हिस्सा महसूस कर सकें.उपसंहाररक्षा बंधन केवल रेशम के धागों का त्योहार नहीं है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक प्रतिज्ञा है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि एक सुदृढ़ और समृद्ध राष्ट्र का निर्माण तभी संभव है जब समाज का हर नागरिक सुरक्षित और सम्मानित महसूस करे। जब तक समाज में ऊंच-नीच और जातिगत भेदभाव रहेगा, तब तक रक्षा बंधन का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। अतः आइए, इस पावन अवसर पर हम सब मिलकर एक ऐसे समरस समाज के निर्माण का संकल्प लें, जहाँ 'वसुधैव कुटुंबकम' की भावना केवल वेदों में न रहे, बल्कि हमारे व्यवहार में दिखाई दे।


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