जानकारी काल हिन्दी मासिक सितंबर - 2026
जानकारी काल
वर्ष-27 अंक - 04 सितंबर - 2026 पृष्ठ 35 www.sumansangamaashray.com
"प्रेरणा और विचारों की धार से ही क्रांति की तलवार तेज़ होती है।”
“मैं इश्क भी लिखना चाहूँ तो इंकलाब लिखा जाता है” भगत सिंह
अपनों से अपनी बात
भारतीय लोकतंत्र में 'संसद ठप करने की राजनीति' एक गंभीर और पुरानी चुनौती बन चुकी है, जो हाल के सत्रों में और अधिक तीव्र हो गई है। पक्ष और विपक्ष दोनों ही इसके लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराते हैं, जिससे जनता के पैसे की बर्बादी के साथ-साथ देश के विधायी कार्यों को भारी नुकसान पहुंचता है । हालिया मानसून सत्र में विपक्ष ने नीट पेपर लीक विवाद, दिल्ली छात्र विरोध प्रदर्शन पर पुलिस कार्रवाई, और राम मंदिर दान में कथित अनियमितताओं जैसे गंभीर मुद्दों पर गृह मंत्री और सरकार से सीधे जवाब की मांग की। राजनीतिक दलों को यह लगने लगा है कि गंभीर और शांत बहस की तुलना में संसद में हंगामा करने और वाकआउट करने से उन्हें मीडिया और जनता के बीच अधिक राजनीतिक लाभ मिलता है। बजट और विधायी प्रस्तावों का एक बड़ा हिस्सा बिना किसी विस्तृत चर्चा के सीधे मतदान के जरिए पारित हो गया । संसद नीति निर्माण और कानून संशोधनों का सर्वोच्च मंच है । व्यवधानों के कारण इस लोकतांत्रिक संस्था की प्रासंगिकता और गरिमा पर आम जनता के बीच प्रश्नचिह्न खड़े हो रहे हैं। विपक्षी दलों के भारी विरोध के कारण लोकसभा की उत्पादकता लगातार घट रही है । महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा के लिए विपक्ष को 'विशेष दिन' या निश्चित समय आवंटित किया जाना चाहिए ताकि उन्हें विरोध के लिए संसद ठप न करनी पड़े। सदन के नियमों का उल्लंघन करने वाले, तख्तियां लहराने वाले या अध्यक्ष के आसन के करीब आकर हंगामा करने वाले सांसदों के खिलाफ बिना किसी पक्षपात के कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। सत्तापक्ष को विपक्ष के जायज सवालों के प्रति अधिक संवेदनशील और जवाबदेह होना होगा, तथा विपक्ष को भी यह समझना होगा कि विरोध का सही मंच बहस है, न कि बहिष्कृत करना।संसद केवल सरकार और विपक्ष के बीच शक्ति संघर्ष का अखाड़ा नहीं, बल्कि करोड़ों नागरिकों की आकांक्षाओं,समस्याओं और अधिकारों पर विचार करने वाली सर्वोच्च प्रतिनिधि संस्था है। इसलिए उसका समय नष्ट होना अंततः जनता के अधिकारों और सार्वजनिक संसाधनों की क्षति है। विपक्ष का दायित्व सरकार से प्रश्न पूछना, नीतियों की आलोचना करना और वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत करना है। इसके लिए बहस,प्रश्नकाल,स्थगन प्रस्ताव और संसदीय समितियां अधिक प्रभावी माध्यम हैं। दूसरी ओर, सत्ता पक्ष को भी बहुमत के आधार पर असहमति को दबाने के बजाय गंभीर विषयों पर पर्याप्त चर्चा सुनिश्चित करनी चाहिए। यदि सरकार संवाद से बचेगी और विपक्ष लगातार व्यवधान को रणनीति बनाएगा, तो दोनों मिलकर संसदीय संस्थाओं की विश्वसनीयता कमजोर करेंगे। संसद में हंगामे का सबसे गंभीर परिणाम यह निकलता है कि महत्वपूर्ण विधेयकों, जनसमस्याओं और नीतिगत प्रश्न पर्याप्त विमर्श से वंचित रह जाते हैं। समाधान के लिए सर्वदलीय संवाद, चर्चा का पूर्वनिर्धारित समय, संसदीय समितियों की मजबूती और व्यवधान के प्रति समान आचार संहिता आवश्यक हैं। लोकतंत्र की शक्ति सदन बंद कराने में नहीं, असहमति को तर्कपूर्ण बहस में रूपांतरित करने में निहित है।
नीरा आर्य - स्वतंत्रता संग्राम की अनसुनी नायिका
सतीश शर्मा
नीरा आर्य भारत की पहली महिला जासूस और स्वतंत्रता संग्राम की अनसुनी नायिका थीं।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास वीरों और वीरांगनाओं की गौरवगाथाओं से भरा हुआ है, लेकिन कुछ नाम ऐसे हैं जो समय के अंधकार में कहीं गुम हो गए। उन्हीं में से एक नाम है – नीरा आर्य। भारत की पहली महिला जासूस, जिन्होंने आज़ादी की खातिर असाधारण साहस का परिचय दिया, अत्याचारों को झेला और अपनी जान की बाज़ी लगाकर भी अपने मिशन और कर्तव्य से डिगीं नहीं।इन्हें नीरा नागिनी के नाम से भी जाना जाता है।
नीरा आर्य का जन्म उत्तर प्रदेश के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। इनके जन्मदाता पिता महावीर सिंह जबकि इन्हें गोद लेने वाले धर्मपिता छज्जूराम लांबा थे। बचपन में माता-पिता के निधन के बाद उन्हें सेठ छज्जू राम लांबा और उनकी पत्नी ने गोद लिया था। इनके धर्मपिता सेठ छज्जूमल अपने समय के एक प्रतिष्ठित व्यापारी थे, जिनका व्यापार देशभर में फैला हुआ था। वे पढ़ी-लिखी, साहसी और राष्ट्रप्रेम से ओतप्रोत महिला थीं। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उनका संपर्क नेताजी सुभाष चंद्र बोस और इंडियन नेशनल आर्मी (INA) से हुआ। उन्होंने आज़ाद हिंद फौज की महिला विंग "रानी झांसी रेजिमेंट" में शामिल होकर जासूसी का कार्यभार संभाला।
नीरा की शादी एक ब्रिटिश समर्थक पुलिस अधिकारी से हुई थी, जिसे नेताजी सुभाष चंद्र बोस की
गतिविधियों पर नजर रखने और उन्हें पकड़वाने की जिम्मेदारी दी गई थी। जब नीरा को यह पता चला कि उसका पति श्रीकांत जयरंजन दास नेताजी की जान लेने की साज़िश कर रहा है, तो उनके सामने कर्तव्य और निजी जीवन के बीच एक असंभव सी स्थिति आ गई।आजाद हिन्द फौज के समर्पण के बाद जब लाल किले में मुकदमा चला तो सभी बंदी सैनिकों को छोड़ दिया गया, लेकिन इन्हें पति की हत्या के आरोप में काले पानी की सजा हुई थी, जहां इन्हें घोर यातनाएं दी गई।
देशप्रेम ने उनके निर्णय को स्पष्ट किया — नीरा ने अपने पति की हत्या कर दी ताकि नेताजी की जान बचाई जा सके। यह कदम आज़ादी के प्रति उनके समर्पण और दृढ़ निश्चय का प्रतीक है।
पति की हत्या के बाद नीरा को गिरफ्तार कर लिया गया। जेल में उनके साथ अमानवीय अत्याचार किए गए। इतिहास के पन्नों में दर्ज एक हृदय विदारक विवरण के अनुसार, अंग्रेज़ जेलरों ने उनसे नेताजी और आज़ाद हिंद फौज के बारे में जानकारी पाने के लिए उनके दोनों स्तनों को काट डाला।
नीरा ने अपनी एक आत्मकथा भी लिखी है,
‘‘मैं जब कोलकाता जेल से अंडमान पहुंची, तो हमारे रहने का स्थान वे ही कोठरियाँ थीं, जिनमें अन्य महिला राजनैतिक अपराधी रही थी अथवा रहती थी।
हमें रात के 10 बजे कोठरियों में बंद कर दिया गया और चटाई, कंबल आदि का नाम भी नहीं सुनाई पड़ा। मन में चिंता होती थी कि इस गहरे समुद्र में अज्ञात द्वीप में रहते स्वतंत्रता कैसे मिलेगी, जहाँ अभी तो ओढ़ने बिछाने का ध्यान छोड़ने की आवश्यकता आ पड़ी है?जैसे-तैसे जमीन पर ही लोट लगाई और नींद भी आ गई। लगभग 12 बजे एक पहरेदार दो कम्बल लेकर आया और बिना बोले-चाले ही ऊपर फेंककर चला गया। कंबलों का गिरना और नींद का टूटना भी एक साथ ही हुआ। बुरा तो लगा, परंतु कंबलों को पाकर संतोष भी आ ही गया।।अब केवल वही एक लोहे के बंधन का कष्ट और रह-रहकर भारत माता से जुदा होने का ध्यान साथ में था।
‘‘सूर्य निकलते ही मुझको खिचड़ी मिली और लुहार भी आ गया। हाथ की सांकल काटते समय थोड़ा-सा चमड़ा भी काटा, परंतु पैरों में से आड़ी बेड़ी काटते समय, केवल दो-तीन बार हथौड़ी से पैरों की हड्डी को जाँचा कि कितनी पुष्ट है।।मैंने एक बार दुःखी होकर कहा, ‘‘क्या अंधा है, जो पैर में मारता है?’’‘‘पैर क्या हम तो दिल में भी मार देंगे, क्या कर लोगी?’’
उसने मुझे कहा था।‘‘बंधन में हूँ तुम्हारे कर भी क्या सकती हूँ…’’ फिर मैंने उनके ऊपर थूक दिया था, ‘‘औरतों की इज्जत करना सीखो?’’
जेलर भी साथ थे, तो उसने कड़क आवाज में कहा, ‘‘तुम्हें छोड़ दिया जाएगा,यदि तुम बता दोगी कि तुम्हारे नेताजी सुभाष कहाँ हैं?’’
‘‘वे तो हवाई दुर्घटना में चल बसे,’’ मैंने जवाब दिया, ‘‘सारी दुनिया जानती है।’’
‘‘नेताजी जिंदा हैं….झूठ बोलती हो तुम कि वे हवाई दुर्घटना में मर गए?’’ जेलर ने कहा।
‘‘हाँ नेताजी जिंदा हैं।’’
‘तो कहाँ हैं…।’’
‘‘मेरे दिल में जिंदा हैं वे।’’
जैसे ही मैंने कहा तो जेलर को गुस्सा आ गया था और बोले, ‘‘तो तुम्हारे दिल से हम नेताजी को निकाल देंगे।’’ और फिर उन्होंने मेरे आँचल पर ही हाथ डाल दिया और मेरी आँगी को फाड़ते हुए फिर लुहार की ओर संकेत किया…लुहार ने एक बड़ा सा जंबूड़ औजार जैसा फुलवारी में इधर-उधर बढ़ी हुई पत्तियाँ काटने के काम आता है, उस ब्रेस्ट रिपर को उठा लिया और मेरे दाएँ स्तन को उसमें दबाकर काटने चला था…लेकिन उसमें धार नहीं थी, ठूँठा था और उरोजों (स्तनों) को दबाकर असहनीय पीड़ा देते हुए दूसरी तरफ से जेलर ने मेरी गर्दन पकड़ते हुए कहा, ‘‘अगर फिर जबान लड़ाई तो तुम्हारे ये छाती से अलग कर दिए जाएँगे…’’उसने फिर चिमटानुमा हथियार मेरी नाक पर मारते हुए कहा, ‘‘शुक्र मानो महारानी विक्टोरिया का कि इसे आग से नहीं तपाया, आग से तपाया होता तो तुम्हारे दोनों स्तन पूरी तरह उखड़ जाते।’’ सलाम हैं ऐसे देश भक्त को। आजादी के बाद इन्होंने फूल बेचकर जीवन यापन किया, लेकिन कोई भी सरकारी सहायता या पेंशन स्वीकार नहीं की।।
उनके इस बलिदान ने यह साबित कर दिया कि भारतीय महिलाएं भी स्वतंत्रता की लड़ाई में किसी से कम नहीं थीं, और जब बात देश की हो, तो वे अपने प्राण तक न्यौछावर करने को तैयार होती हैं।
नीरा आर्य स्वतंत्रता के बाद गुमनामी में जीती रहीं। उन्होंने अपना शेष जीवन साध्वी के रूप में बिताया। ना कोई सम्मान, ना सरकारी मदद, ना समाज की कृतज्ञता — उनके बलिदान को इतिहास की धूल में दबा दिया गया।
कहा जाता है कि नीरा आर्य ने अपने अंतिम दिन गुमनामी में बिताए। वह फूल बेचकर अपना गुजारा करती थीं, एक झोपड़ी में रहती थीं और गरीबी में ही उनकी मृत्यु हुई । वह हैदराबाद के फलकनुमा में बस गईं और फूल बेचकर अपना जीवन यापन करती थीं। वह वहां एक छोटी सी झोपड़ी में रहती थीं।वृद्धावस्था में बीमारी की हालत में चार मीनार के पास उस्मानिया अस्पताल में इन्होंने रविवार 26 जुलाई, 1998 में एक गरीब, असहाय, निराश्रित, बीमार वृद्धा के रूप में मौत का आलिंगन कर लिया।
"जिसके अंदर 'सनक' नहीं होती, वह कभी महान नहीं बन सकता। अगर संघर्ष न रहे, किसी भी भय का सामना न करना पड़े, तब जीवन का आधा स्वाद ही समाप्त हो जाता है। सफलता हमेशा असफलता के स्तंभ पर खड़ी होती है।"
“एक असाधारण व्यक्तित्व - नरेंद्र दास दामोदर मोदी”
मनमीत सोनी
इस 17 सितंबर को यह व्यक्ति छिहत्तर वर्ष का हो जाएगा। यह व्यक्ति पिछले चार दशकों से खुली राजनीति में है। जिनमें से लगभग 26 वर्ष बिलकुल सत्ता की राजनीति की है और कभी मुँह की नहीं खाई। कुछ तो बात होगी। कोई तो करिश्मा होगा। उन आलोचकों की तरह मूर्खता की भाषा मत बोलिये कि दो धर्मों को लड़वा के वोट लिए / झूठ बोलता है / फेंकता है / मीडिया मैनेज करता है। सारी बातों को पीछे धकेल दीजिये। आप विपक्षी या विरोधी हैं, तब भी "सब्जेक्टिव अप्रोच" से इस व्यक्ति को देखिये।
सब कुछ खिलाफ़ था। यह व्यक्ति गुजरात की राजनीति में भी उपेक्षित था। एक "चांस" की बात है कि भारतीय जनता पार्टी ने वहाँ भेजा। उसके बाद 26 वर्ष से यह व्यक्ति या तो गुजरात की सत्ता में रहा या केंद्र की सत्ता में।
कितने ही नेता लाइन में थे। आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, राजनाथ, वेंकय्या, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, नितिन गडकरी। लेकिन यह व्यक्ति सब को पीछे छोड़ देता है। इसके भीतर कितनी तेज़ ललक रही होगी। कितनी ऊर्जा। कितना जोश। कितनी चतुराई। कितना धैर्य। यह व्यक्ति कितनी जल्दी परिस्थिति में ढल जाता है। इसे कड़क / रिजिड कहने वाले सचमुच भोले हैं। यह व्यक्ति राम मंदिर के निर्माण में केंद्रीय भूमिका निभाता है। 370 हटाता है। तीन तलाक़ हटाता है। मिलिट्री
ओपरेशन करवाता है। लेकिन जब हालात हाथों से बाहर निकलते हैं तो रिवर्स गियर ले लेता है।
कितनी चतुराई से किसान आंदोलन निपटाया। कितनी योजना से जंतर मंतर को उसी ज़हर से काटा, जो ज़हर बोया जा रहा था।
पिचहत्तर वर्ष की आयु में अचानक इंस्टाग्राम पर आ जाना। यह जानते हुए भी कि जेन ज़ी को कंविन्स करना आसान नहीं, कोशिश करना। अपने मंत्री का इस्तीफ़ा ले लेना। बिलकुल चुप हो जाना। फिर एक दिन कुछ बोल कर यह बता देना कि मुझे सब जानकारी है।
यह व्यक्ति कितना संवाद कुशल है। बारह बरस से केंद्रीय सत्ता का केंद्र। और चाहे तो आगे भी रह सकता है। यानी ऐसी कोई गोपन तकनीक है ज़रूर कि सत्ता के सारे समीकरण साध लेता है। यह तकनीक नेहरू के पास भी थी लेकिन इतनी "वाईब्रैंट" नहीं। अटल के पास भी। लेकिन उनका समय दूसरा था। यह व्यक्ति "प्रिसिजन" से वार करता है। इस व्यक्ति को कैमरे के एंगल से लेकर पूजा में बैठने के ढंग तक, सब कुछ पर "कमांड" है।
यह कला ऐसे ही नहीं आती। मैं तो सबसे कुछ न कुछ सीखता हूँ। मुझे कम बैक करना नरेन्द्र मोदी ने ही सिखाया। अपने विरोधी को चुभना मगर उसे पूरी तरह लाचार कर देना। झटके नहीं हलाल का इस्तेमाल करना।
मीडिया - संस्थान - संसद - मन्त्रिमंडल - विधायक - जनता - अंतर्राष्ट्रीय राजनीति तक, सब कुछ पर एक साथ नज़र। यदि कभी मुँह की खानी पड़ भी जाए तो हाथों हाथ सम्भल जाना। यह मैंनेजमेंट आसान नहीं है। इसके लिए आपके पास ईश्वर - प्रदत्त - प्रतिभा होनी चाहिए।
सोने पर सुहागा राहुल जैसा ढीला और बेहद गैर-ज़िम्मेदार और मरा हुआ विपक्ष।
फिर कहता हूँ। इस व्यक्ति को एक "इंस्टिट्यूट" की तरह देखिये। 2002 से 2026 तक यह व्यक्ति भारत में सबसे अधिक चर्चा में रहा है। मुझे लगता है 2032 तक रहेगा। कहने में क्या जाता है कि जब तक जीवित रहेगा, आकर्षण और समाचारों का केंद्र रहेगा।
ऐसा चक्रवर्ती भाग्य मैंने तो किसी का नहीं देखा।
हाँ, बहुत कमियाँ हैं। कहीं - कहीं अलोकतांत्रिक हो जाना। अटेंशन सीकर होना। बहुत महत्वाकांक्षी होना। बहुत बड़े दावे करना। लेकिन फिर वही बात कि परफेक्ट कोई नहीं होता। मोदी भी नहीं है। लेकिन परफेक्ट होने का पीछा ज़रूर किया जा सकता है।
यदि मैं राहुल गाँधी होता तो मन ही मन मोदी को गुरु मान लेता। हार मान लेता कि भाई हमसे आप नहीं सध सकते। लेकिन हार मानने के बाद मैं मोदी की तकनीक अपना कर ही मोदी की जगह पहुँचता। तू - तड़ाक नहीं करता। मेलोनी - फेलोनी वाली सस्ती नौटंकी नहीं करता। टी-शर्ट पहनकर तफ़री नहीं करता। संसद को गंभीरता से लेता और अठारह घंटे नहीं तो बारह घंटे ज़रूर काम करता।
मोदी से ही सीखता कि इतने बड़े जन-समुदाय को कैसे अपने पीछे किया जाता है। मोदी से ही सीखता
कि कब, क्या, कैसे कौन-सी बात बोलनी है। क्या बोलनी है और क्या छुपा जानी है।
मोदी भारतीय राजनीति के लिए ही बने हैं। मोदी के भीतर "प्रेडिक्शन" और "जजमेंट" और "टाइमिंग" जैसी तीनों चीज़ें हैं।
मैं बहुत सामान्य व्यक्ति हूँ। एक प्राइवेट कॉलेज में लेक्चरर। थोड़ी - बहुत कविता भी कर लेता हूँ। लेकिन मैं जब भी किसी मुसीबत में फंस जाता हूँ तो यही सोचता हूँ कि मोदी यहाँ होते तो क्या करते? क्या वह "रियेक्ट" करते ? या, चुप रह जाते? या, ध्यान ही नहीं देते!
बहुत सारी बातें हैं। आप मुझे भक्त / अंधभक्त या "अंडभक्त" भी कह सकते हैं। लेकिन हर पीढ़ी का एक हीरो होता है। मेरा भी है। मैं इसे आपसे क्यों छुपाऊँ। छुपाकर बेईमानी ही करूँगा।
आप भले ही मोदी से नफ़रत करें, लेकिन लक्ष्मण भी तो रावण के पास कुछ सीखने ही गए थे। यदि आप मोदी को विश्वामित्र समझकर राम की तरह नहीं जा सकते तो रावण समझकर लक्ष्मण की तरह ही चले जाइये।
आपका क़द छोटा नहीं हो जाएगा। उलटे यह विनम्रता आपको लाभ ही देगी।
दोस्तो!
अपने "रिसीविंग हैंड" को हमेशा खुला रखिये। यह जीवन को बहुत सरल और सुविधाजनक बनाता है और मुश्किलों से उबार भी लेता है। बाक़ी आप पर। हाँ, मुझे मोदीजी को केवल मोदी कहना पड़ा, इसके लिए क्षमा! यह केवल समझाने के लिए था। और आख़िरी बात। अमित शाह जैसा एक दोस्त ज़रूर बनाइये। दोस्ती कीजिये। दोस्ती निभाइये। आख़िरी हद तक निभाइये। मैंने अपने जीवन में मोदी और शाह से बढ़कर दोस्त नहीं देखे। यह दोनों तो ख़ून के रिश्ते को भी पीछे छोड़ चुके।
हम उसी मुस्कान पर हैं
कंचन तिवारी कशिश
जाने किस दुकान पर हैं।
सालों से नुकसान पर हैं।
छोड़ देते हम भी उनको,
रिश्ता दी जुबान पर है।
दिल पर जितने ज़ख्म हैं
उनका नाम हर निशान पर है।
अब ख़ामोशी ओढ़ ली है,
ताला इस जुबान पर है।
पूछते हैं हाल मेरा
तीर जिनका कमान पर है।
जिंदा हम रहेंगे या मरेंगे,
यह बात मेरी जान पर है।
दर्द से डरते नहीं हम,
दर्द के उनवान पर हैं।
वो बदलते होंगे चेहरे,
हम उसी मुस्कान पर हैं।
प्रश्न पूछना अध्ययन प्रक्रिया का प्रथम सोपान है
दिलीप बेतकेकर
“समझे या नहीं?”, हैव् यू अण्डरस्टेण्ड? कक्षा में पढ़ाते समय ऐसे प्रश्न शिक्षक अपने विद्यार्थियों से अनेक बार पूछते रहते हैं। भिन्न-भिन्न प्रान्तों में भाषा अलग होने पर भी प्रश्न पूछते रहते हैं। ‘जी हां’, ‘यस सर’, ‘हो सर’……… ऐसे ही निश्चित उत्तर विद्यार्थियों से मिलते हैं, और विद्यार्थियों से संयुक्त सुर में ‘हां’ उत्तर मिलने पर तो शिक्षक प्रसन्न होकर दूसरा प्रश्न उछालता हैं।
‘कुछ आशंका?’ ‘कुछ कठिनाई?’, ‘एनी डिफिक्लटी?’…… जैसे प्रश्नों का उत्तर भी ‘नो सर’, ‘नहीं सर’ संयुक्त रूप से मिलते ही प्रसन्न शिक्षक आगे पढ़ाना जारी रखते है………….
गहराई से परखने पर ध्यान में आता है कि कुछ विद्यार्थियों को कुछ भी समझ में नहीं आया होता है, और कुछ समझ में आने पर भी उत्तर नहीं दे पाते! इसका क्या कारण हो सकता है? गहन अध्ययन पश्चात् जो कारण समझ में आते हैं – ये हैं – विद्यार्थियों के मन में उभरते अनेक प्रकार के डर!
उत्तर गलत होने का डर: अनेक विद्यार्थियों के मन में एक अदृश्य डर बैठा बैठा रहता है कि गलत उत्तर बताने पर कक्षा में हंसी उड़ेगी, शिक्षक गुस्सा होंगे, डाटेंगे, ये डर भी उन्हें उत्तर देने से रोकता हैं।
परीक्षा केन्द्रित शिक्षा: हमारी शिक्षा पद्धति उत्तर-केन्द्रित अधिक हैं, प्रश्न-केन्द्रित विचारों पर नहीं, परिणामस्वरूप परीक्षा में जो पूछा जाना अपेक्षित नहीं उस सम्बन्ध में प्रश्न क्यों पूछें ऐसी मानसिकता बन जाती हैं।
शिक्षक केन्द्रित कक्षा: शिक्षक ही केवल निरन्तर बोलता जाए और विद्यार्थी केवल सुनते रहे, ऐसी कक्षा में विद्यार्थियों को बोलने-पूछने का अवसर और उनका अधिकार नहीं मिलता हैं।
प्रश्न पूछना भी एक कौशल्य है, जो प्रयास से ही प्राप्त होता है, जहां बाल्यकाल से ही प्रश्नों को दबा दिया जाता है वहां प्रश्न उभरते ही नहीं।
‘मुझे उत्तर ज्ञात नहीं, ऐसा कहने में विद्यार्थी शरमाता है, और ज्ञात न होना अर्थात् अपयश यह भावना मन में बैठी होती हैं। कभी-कभी शिक्षकों के प्रश्न पूछने का सुर विद्यार्थी को अरूचिकर लगता है। कभी शिक्षक उलझन भरे अथवा उपहास करने हेतु प्रश्न पूछते हैं। सदैव कुछ विशेष होशियार विद्यार्थियों को ही प्रश्न पूछे जाए तो अन्य विद्यार्थी मौन बैठने को विवश होते हैं। पाठ्य पुस्तक और परीक्षा-केन्द्रित अध्यापन के कारण उत्तर महत्वपूर्ण और प्रश्न गौण ऐसी मानसिकता बनती हैं। परिणाम स्वरूप विद्यार्थी की जिज्ञासा अनदेखी रह जाती है। “और कोई प्रश्न तो पूछना नहीं है”? ऐसा शिक्षक के बोलने पर उत्तर मौन होता हैं।
वास्तविकता तो है कि इन्हीं बच्चों ने अपने बाल्यकाल में अपने माता-पिता को हजारों प्रश्न पूछे होते हैं, तो फिर कक्षा में मौन क्यों हो जाते हैं यह प्रश्न पालक गण और शिक्षकों को स्वयं से पूछना होगा। बच्चों द्वारा पूछे प्रश्नों के उत्तर अनेक बार पालकों के पास नहीं होते हैं, उनके प्रश्नों का महत्व और उसकी गंभीरता पालक समझ नहीं पाते हैं, उनके प्रश्न पालकों को उबाऊ, झंझट वाले लगते हैं। इसलिए पालक उन्हें ‘चुप बैठ’, ‘मूर्खो’ जैसे सवाल मत कर, कहते हुए बच्चों को निराश कर देते हैं। परिणाम स्वरूप नये पालकों से प्रश्न पूछना कम कर देते हैं, जैसे-जैसे बच्चे ऊँची कक्षाओं में जाते हैं, जैसे वे अधिक मौन हो जाते हैं – शिक्षक द्वारा प्रश्न पूछने पर कक्षा में बच्चे मौन रहते हैं, शिक्षक की नजर से हटने का प्रयास होता है, आँखे नीचे की ओर झुका लेते हैं बच्चे! कक्षा में प्रश्नों का अभाव अच्छे अनुशासन की श्रेणी में नहीं रखा जाता है, वह निःशब्दता है, शान्त, मौन कक्षा जीवित कक्षा नहीं कहलाती है।
कक्षा में जब प्रश्न पूछे जाते हैं, तब कक्षा केवल सीखने की जगह न होकर विचारों की कार्यशाला हो जाती है – शैक्षणिक मानस शास्त्र के अनुसार प्रश्न पूछना उच्च स्तरीय वैचारिक कौशल्य है, विश्लेषण, मूल्यांकन और सृजनशीलता के स्तर पर प्रश्नों की भूमिका निर्णायक होती है, प्रश्नों द्वारा ही संकल्पनाएं स्पष्ट होती है, चिकित्सकीय विचारशक्ति विकसित होकर ज्ञान प्राप्ति की प्रेरणा जागृत होती है।
कुशल प्रश्नोत्तर – अर्थात् – अच्छे अध्यापन शास्त्र का धड़कता दिल हैं। भारतीय ज्ञान परम्परा प्रश्नोतरों से ही प्रारम्भ होती है, उपनिषद् के संवाद प्रश्नोत्तरों के रूप में ही हैं।
“कस्मिन्न भगवो विज्ञाते सर्व मिदं विज्ञानतं भवति?” यह मुंडकोपनिषद् का प्रश्न ही सम्पूर्ण मुंडकोपनिषद् का आधार है।
“अथातो ब्रह्म जिज्ञासा, येन ज्ञानं सर्वमिदं ज्ञातं भवति, कोऽहं, तत्वमसि, नायमात्या प्रवचनेन लभ्यो, किम कर्म किमकर्मेति?” यह सब वचन चिंतन को प्रवृत करती हैं। इतनी विशाल ज्ञान परम्परा होते हुए भी आज हमारे विद्यार्थियों में प्रश्न क्यों उभरते नहीं, यह गहन विचारणीय समस्या हैं।
बच्चे कक्षा में क्यों मौन रहते हैं, क्यों उत्तर नहीं देते, प्रश्न पूछते नहीं, यह है शिक्षकों की शिकायत,
परन्तु शिकायत करना ही समस्या का हल नहीं। इस हेतु कोई ठोस प्रामाणिक विचार विमर्श आवश्यक
हैं।
प्रश्न न पूछने वाला विद्यार्थी समूह एक अनुशासित समूह हैं ऐसा मानना उचित नहीं, वास्तव में देखा जाए तो ऐसे विद्यार्थी विचार शून्य हो सकते हैं। प्रश्न पूछना केवल जिज्ञासा की अभिव्यक्ति नहीं, अपितु ज्ञान प्राप्ति का प्रारम्भ हैं। प्रश्न पूछना अध्ययन प्रक्रिया का प्रथम सोपान है – प्रश्न से ही ज्ञान निर्मिति और विचार प्रक्रिया प्रारम्भ होती है, जहां प्रश्नों का अभाव वहां विचारों का भी अभाव और विचारों के अभाव में वास्तविक शिक्षा अवरूद्ध होती है।
चीनी भाषा में एक कहावत के अनुसार – यदि आप प्रश्न पूछते हैं, तो लोग आपको मूर्ख समझेंगे, आपकी हंसी उड़ायेंगे, परन्तु केवल पांच-दस मिनिट! परन्तु यदि आपने प्रश्न पूछा नहीं तो आप आजीवन मूर्ख रहने की सम्भावना हैं। एक अंगेज लेखक रूड़याई किपलिंग के अनुसार – “मैंने छह मित्रों को अपने पास जोड़ रखा है, वे मेरे हर कार्य में सहायक होते हैं ओर वे छह मित्र है – क्या, कौन, कहां, कैसे, कब, और, क्यों?” साक्रेटिस की प्रश्नोत्तर पद्धति एक प्रभावी प्रक्रिया मानी जाती हैं। जॉन हुई के मतानुसार शिक्षा एक समस्या निवारण की प्रक्रिया है, और समस्या प्रश्नों के अभाव में अस्तित्व में नहीं आती।
अपनी अधिकतर कक्षाओं में मौन संस्कृति ही विद्यमान है – प्रश्न पूछने की आदत विद्यार्थी में अपने आप ही निर्मित नहीं होती, वरन उसे प्रयास पूर्वक ही विद्यार्थी में निर्माण करनी पड़ती हैं। इसलिए शिक्षकों से अपेक्षा की जाती है कि वे अध्यापन पद्धति में परिवर्तन लाकर, प्रश्नों को महत्वपूर्ण स्थान दें तभी कक्षा जीवित-संवादमय और विचार-समृद्ध हो सकेगी। प्रश्न पूछने वाला विद्यार्थी ही वास्तव में ज्ञान प्राप्त करने वाला विद्यार्थी होता है, यह शिक्षा का मूल मंत्र स्वीकार करना होगा। प्रश्न पूछने की आदत शिक्षा-प्रक्रिया में से ही विकसित होती है। प्रश्न केन्द्रित अध्यापन पद्धति स्वीकारने से ही विद्यार्थी का सहयोग, आकलन और चिकित्सकीय विचार शक्ति का लाक्षणिक विकास हो पायेगा।
प्रश्न-संस्कृति निर्मिति - सुरक्षित और मित्रता का वातावरण निर्मित कीजिये, प्रश्नों का स्वागत आवश्यक है, प्रश्न पूछना पुलिस अधिकारी जैसा न हो। विद्यार्थी द्वारा पूछे प्रश्न की खिल्ली न उड़ाए ना ही उसे अनदेखा करें। स्वयं को उत्तर ज्ञात ना हो तो प्रामाणिकता से स्वीकार कर कहें कि प्रश्न अच्छा है, हम अन्तर के लिए अध्ययन कर बताते हैं। प्रश्न पूछने का मॉडल बनें, स्वयं मनन करें, स्वयं को प्रश्न पूछे, ऐसा क्यों? प्रश्न का अन्य पर्याय क्या हो सकता है? इस पर भी मंथन करें। छोटे-छोटे समूहों में चर्चा करें, सम्पूर्ण कक्षा में चर्चा करने से दो-तीन समूहों में चर्चा करने से प्रश्न सहजता से उभरेंगे।
प्रश्न पूछने के लिए पर्याप्त समय दें, जल्दबाजी न करें, अध्यापन में शीघ्रता के कारण प्रश्न पूछने के लिए पर्याप्त समय नहीं दे पाते, विचार करने हेतु शान्ति और समय आवश्यक हैं।
प्रश्न पूछने के लिए भी प्रशिक्षण देना पड़ता है, कौशल्य का पाठ भी पढाएं, समूह चर्चा, प्रकल्प पद्धति, समस्या आधारित शिक्षा द्वारा प्रश्नों की संख्या में वृद्धि होती है, मूल्यांकन केवल उत्तरों का ही नहीं, प्रश्नों
को भी महत्व देकर उनका मूल्यांकन करें।
अधिकतर विद्यार्थी कक्षा में बोलने में शरमाते है अथवा झिझकते है, या डरते हैं, इसलिए उन्हें उनके
प्रश्न कागज पर लिखकर पश्चात् उन्हें पढ़ने को कहें, प्रश्न पूछने की आदत और कौशल्य विकसित करने हेतु अनेक खेल अथवा उपक्रम उपयोग में लाए जा सकते हैं।
शिक्षक अपने एजेण्डा में ‘प्रश्न कोशल्य’ विषय रखें और इस पर क्या कर सकते हैं इसका विचार-विमर्श करें जिससे अनेक उपाय समक्ष आएंगे, परन्तु इस हेतु शिक्षकों के समक्ष ही यह प्रश्न उभरना चाहिये, तभी उत्तर कही अन्य स्थान से न आकर शिक्षक स्वयं से ही प्राप्त होगा। मार्ग प्रशस्त होगा। विद्यार्थी के मन में प्रश्न पूछने की क्षमता निर्मित होना इसी में शिक्षक का सुयश छुपा हुआ हैं।
ब्रह्मसूत्र का सूत्र ‘अथातो जिज्ञासा’ पर आधारित ‘अथातो प्रश्न जिज्ञासा’ अर्थात् अब प्रश्न पूछने की जिज्ञासा जागृत करने का समय आ गया हैं।
अथातो प्रश्न जिज्ञासा,दिलीप बेतकेकर-लेख (मूल मराठी) दिलीप बसंत बेतकेकर
-अनुवाद (हिन्दी) डॉ. रमेश चौगांवकर (लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।)
भीड़ में भी माँ को अपना बच्चा दिख जाता है
हम लोग समाचार पत्र पढ़ रहे थे। आदि से अंत तक पूरा अखबार पढ़ डाला। इतने में श्री गुरुजी आये और समाचार पत्र उठाकर इधर-उधर निगाह डाली। बातचीत के दौरान संघ संबंधी समाचार का जिक्र आ गया, जो इसी समाचार पत्र में छपा था। मैंने पूछा समाचार है कहाँ? उन्होंने कहा इसी अखबार में तो है। मैंने पूरा अखबार पढ़ा, पन्ने उलटे पर वह समाचार नहीं दिखा। मेरी हैरानी देखकर श्री गुरुजी ने वह समाचार दिखाया, जो बाजारभाव के पन्ने पर छपा था। मैं मन ही मन सोचने लगा, कहाँ छाप दिया है। हम लोग क्या व्यापारी हैं, जो इस पन्ने पर निगाह जाती? फिर दूसरे ही क्षण विचार आया- 'श्री गुरुजी भी तो व्यापारी नहीं है। फिर उनकी निगाह कैसे गयी? मैंने अपनी शंका रखी भी नहीं, पर शायद वे समझ गये।
श्री गुरुजी ने इस पर इतना ही कहा भीड़ में भी माँ को अपना बच्चा दिख जाता है और कोलाहल में भी अपने आत्मीय जनों के शब्द साफ समझ मेंआते हैं।
मेरी समझ में आ गया। ध्येय के साथ उनका यह तादात्म्य है जिसके कारण वे उस समाचार को देख सके। श्री गुरुजी अक्सर कहा करते थे कि मैं तो समाचार पत्र नहीं पढ़ता, परन्तु मैं कहूँगा कि श्री गुरुजी ही समाचार पत्र पढ़ते हैं, और हम लोग तो उन्हें मात्र देखते हैं और बहुत देर तक देखते रहते हैं।
-पं. दीनदयालजी उपाध्याय (श्रीगुरुजी के प्रेरक संस्मरण : पृष्ठ-18)
शिक्षा में अपव्यय व अवरोधन
सतीश शर्मा
शिक्षा में अपव्यय (बिना प्राथमिक शिक्षा पूरी किए बीच में स्कूल छोड़ना) और अवरोधन (एक ही कक्षा में फेल होकर दोबारा रुकना) मुख्य रूप से गरीबी, अशिक्षा और दोषपूर्ण शिक्षण व्यवस्था के कारण होते हैं। ये दोनों समस्याएँ प्राथमिक शिक्षा स्तर पर सबसे अधिक देखी जाती हैं। अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा के प्रचार में जहाँ अन्य बाधाएँ सामने आई उनमें अपव्यय तथा अवरोधन की समस्याएँ भी प्रमुख रही है। शिक्षा में जब अपव्यय पर बात होती है तो पाया जाता है कि प्राथमिक शिक्षा में अपव्यय और अवरोधन अधिक है। हमारी प्राथमिक शिक्षा के लिए यह एक गम्भीर समस्या है। हम जब तक इस समस्या से निजात नहीं पाते तब तक शिक्षा के सार्वजनीकरण का हमारा सपना पूरा नहीं हो सकता।
अपव्यय का आशय बालक का अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी किए बिना ही विद्यालय छोड़ देना, जिससे बालक पर खर्च किया गया धन, समय और श्रम बेकार चला जाता है। हार्टोग कमेटी के अनुसार-"प्राइमरी शिक्षा पूरी करने से पहले बच्चे का किसी स्तर पर स्कूल छोड़ देना अपव्यय है।" अवरोधन का आशय कक्षा में असफल रहने से लिया जाता है। अर्थात एक ही कक्षा में दोबारा पढ़ाई के लिए ठहरना।
आर्थिक कारण से गरीब माता-पिता बच्चों से घरेलू काम करवाते हैं या उन्हें मजदूरी पर भेजते हैं।खर्च का बोझ इतना होता है की मुफ्त शिक्षा के बावजूद कॉपियाँ, किताबें और कपड़ों का खर्च उठाना कठिन होता है। माता-पिता का पढ़ा-लिखा न होना, जिससे वे शिक्षा का महत्व नहीं समझ पाते ओर
उनकी उदासीनता बच्चों की पढ़ाई के प्रति परिवार का लापरवाह रवैया भी इसकी वजह है । लड़कियों की शिक्षा को कम महत्व देना।ये कुछ एसे कारण है रुकावट करते है ।
रटने पर जोर देना और पुराने पढ़ाने के तरीके अपनाना। बच्चों के जीवन और रुचि से पाठ्यक्रम का मेल न खाना। स्कूलों में कमरों, शौचालय, और शिक्षण सामग्री का अभाव। शिक्षकों का बच्चों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण न होना।
एन.सी.ई.आर.टी. द्वारा प्रकाशित "Encyclopedia of Indian Education Vol. 2 में कहा गया है कि "शोध अध्ययनों से निरिक्षण कर यह पाया गया है 20% बच्चे ग्रामीण इलाकों में विद्यालय से बाहर तथा 25% बच्चे शहरी क्षेत्र में विद्यालय से बाहर है, ये सभी बच्चे किसी रोजगार में सलंग्न है, जिनसे उन्हें कुछ आमदनी होती है।"
इस संदर्भ में हम प्रवेश लेने वाले ड्राप आउट, अनामांकित बालक-बालिकाओं की स्थिति वर्ष 2004 के तथ्यों में निम्न प्रकार से देख सकते हैं।
कक्षा 1 में प्रवेश लेने वाले बच्चें,बालक -610148,बालिका 544894,कुल 1155042
ड्राप आउट बालक-बालिकाओं की संख्या- बालक 103881,बालिका -151028,कुल 254909
अपव्यय व अवरोधन के कुछ निम्नलिखित कारण है - निर्धनता-निर्धन अभिभावक अपने भोजन-वस्त्र की व्यवस्था ही ठीक प्रकार से नहीं कर पाते, ऐसी दशा में वे अपने बालकों को शिक्षा कैसे दिलाएँ। वे अपने बच्चों के लिए पढ़ाई के साधन नहीं जुटा पाते जिससे बालक बीच में पढ़ना छोड़ देता है। निर्धन अभिभावक शिक्षा की अपेक्षा जीविका को अधिक महत्व देते है। अतः वे अपने बच्चों को पढ़ाना छुडाकर किसी काम में लगा देते है इससे अपव्यय और अवरोधन अधिक बढ़ रहा है।
शिक्षा में अपव्यय एवं अवरोधन की समस्याओं को दूर करने के प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं, गरीब बच्चों को मुफ्त वर्दी, कॉपियां, किताबें और छात्रवृत्ति देना। पढ़ाई का समय ऐसा रखना जिससे बच्चे परिवार की मदद भी कर सकें। माता-पिता को शिक्षा के महत्व के प्रति जागरूक करना। लड़कियों के लिए मुफ्त और सुरक्षित शिक्षा का प्रबंध करना।सिलेबस को बच्चों के दैनिक जीवन से जोड़ना और आसान बनाना। रटने के बजाय गतिविधि-आधारित शिक्षण पद्धतियों का उपयोग करना। प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति और उनका बच्चों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार। सतत एवं व्यापक मूल्यांकन (CCE) लागू करना ताकि बच्चे परीक्षा के डर से स्कूल न छोड़ें। प्रत्येक गांव में उचित दूरी पर स्कूल खोलना। स्कूलों में पीने का साफ पानी, बिजली और अलग शौचालय (विशेषकर लड़कियों के लिए) सुनिश्चित करना। दोपहर के भोजन की गुणवत्ता में सुधार करना ताकि बच्चे स्कूल आने के लिए प्रेरित हों।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) में शिक्षा में अपव्यय (ड्रॉपआउट) और अवरोधन को रोकने तथा स्कूली शिक्षा में 100% सकल नामांकन अनुपात (GER) हासिल करने के लिए कई क्रांतिकारी कदम उठाए गए हैं:1. 5+3+3+4 स्कूली ढांचाप्रारंभिक बचपन की देखभाल और शिक्षा (ECCE),
खेल-आधारित शिक्षा के जरिए 3 साल की उम्र से ही बच्चों को औपचारिक शिक्षा से जोड़ा गया है, जिससे बच्चे स्कूल से डरने के बजाय आकर्षित हों। कक्षा 1 और 2 में पारंपरिक परीक्षाओं का दबाव
हटा दिया गया है, ताकि अवरोधन (फेल होने) की समस्या खत्म हो। स्कूल छोड़ चुके लगभग 2 करोड़ बच्चों को मुख्यधारा की शिक्षा में वापस लाने का लक्ष्य तय किया गया है । डिजिटल माध्यमों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद से प्रत्येक बच्चे की उपस्थिति और सीखने के स्तर की लगातार ट्रैकिंग की जाएगी। प्राथमिक स्तर (कम से कम कक्षा 5 तक) की शिक्षा मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा में देने का प्रावधान है। भाषा की समझ न होने के कारण होने वाले अपव्यय को रोकने में यह बहुत मददगार है। पाठ्यक्रम को कम करके व्यावहारिक समझ (Conceptual Understanding) पर केंद्रित किया गया है। आर्ट्स, साइंस या कॉमर्स के बीच की दीवारें हटा दी गई हैं। छात्र अपनी पसंद के विषय चुन सकते हैं, जिससे पढ़ाई में उनकी रुचि बनी रहती है। कक्षा 6 से ही व्यावसायिक शिक्षा (Vocational Education) और इंटर्नशिप को शामिल किया गया है। समावेशी और समानता-आधारित फंडजेंडर इंक्लूजन फंड (Gender Inclusion Fund), लड़कियों और ट्रांसजेंडर छात्रों को स्कूल तक पहुँचाने और सुरक्षित माहौल देने के लिए अलग से फंड की व्यवस्था की गई है। विशेष शिक्षा क्षेत्र (SEZ), शैक्षिक रूप से पिछड़े और वंचित क्षेत्रों में विशेष स्कूल खोले जा रहे हैं । ओपन स्कूलिंग का विस्तार वैकल्पिक रास्ते खोले जा रहे है ,जो बच्चे नियमित स्कूल नहीं जा सकते, उनके लिए राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (NIOS) के माध्यम से दूरस्थ शिक्षा (Distance Learning) के दायरे को बढ़ाया गया है।
शिक्षा के सार्वजनीकरण हेतु राज्य व केंद्र सरकार अनेको उपाय कर रहे है ताकि छात्र अपनी पढ़ाई बीच मे ना छोड़े । लेकिन सब काम सरकारों पर नहीं छोड़ना चाहिए हम भी जागरूकता चला कर अपना योगदान दे सकते है । अनेको सामाजिक संगठन इस काम मे लगे हुए है ।
"संगठन ही राष्ट्र की प्रमुख शक्ति होती है। संसार में कोई भी समस्या हल करनी हो, तो वह शक्ति के आधार पर ही हो सकती है। शक्तिहीन राष्ट्र की कोई आकांक्षा सफल नहीं होती। परन्तु सामर्थ्यशाली राष्ट्र अपनी इच्छानुसार कोई भी काम कर सकता है।यहीं आत्मीयता हर व्यक्ति में होनी चाहिए।"
संस्कार भी एक वसीयत है
श्रीमती शिखा सक्सेना
“धन-दौलत की वसीयत कुछ पीढ़ियों तक चलती है, लेकिन संस्कारों की वसीयत पीढ़ियों को संवार देती है।”
वसीयत का नाम सुनते ही हमारे मन में धन, संपत्ति, ज़मीन-जायदाद या आभूषणों का विचार आता है। लेकिन जीवन की सबसे मूल्यवान वसीयत वह नहीं होती जिसे कागज़ पर लिखा जाए, बल्कि वह होती है जो व्यवहार, आदर्शों और संस्कारों के रूप में अगली पीढ़ी को सौंप दी जाए। यही संस्कार ऐसी अमूल्य विरासत हैं जो कभी नष्ट नहीं होती और पीढ़ी दर पीढ़ी समाज को श्रेष्ठ बनाती रहती है।
बच्चे अपने माता-पिता की बातों से कम और उनके आचरण से अधिक सीखते हैं। यदि परिवार में ईमानदारी, अनुशासन, करुणा, सेवा, बड़ों का सम्मान और सत्यनिष्ठा का वातावरण होगा, तो यही गुण बच्चों के व्यक्तित्व का आधार बनेंगे। इसलिए कहा जाता है कि संस्कार सिखाए नहीं जाते, बल्कि जीए जाते हैं।
महात्मा गांधी ने कहा था—
“यदि हम संसार में वास्तविक परिवर्तन देखना चाहते हैं, तो उसकी शुरुआत स्वयं से करनी होगी।”
आज के आधुनिक युग में भौतिक सुख-सुविधाओं की होड़ ने जीवन को सुविधाजनक तो बनाया है,
परंतु कई बार मानवीय मूल्यों को पीछे छोड़ दिया है। माता-पिता अपने बच्चों के लिए महँगे विद्यालय, आधुनिक साधन और आर्थिक सुरक्षा तो जुटा देते हैं, लेकिन यदि वे उन्हें अच्छे संस्कार नहीं दे पाए, तो
यह सारी संपत्ति भी उनके जीवन को सही दिशा नहीं दे सकती। दूसरी ओर, सीमित संसाधनों वाला परिवार भी यदि अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दे दे, तो वे जीवन में सम्मान, सफलता और संतोष—तीनों प्राप्त कर सकते हैं।
स्वामी विवेकानंद का कथन है—
“हम वही बनते हैं जो हमारे विचार और संस्कार हमें बनाते हैं।”
संस्कारों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्हें कोई चुरा नहीं सकता, कोई बाँट नहीं सकता और समय भी उन्हें नष्ट नहीं कर सकता। वे व्यक्ति के चरित्र में बस जाते हैं और हर निर्णय में उसका मार्गदर्शन करते हैं। ईमानदारी, विनम्रता, सहनशीलता, कर्तव्यनिष्ठा और दूसरों के प्रति सम्मान जैसे संस्कार जीवन भर कठिन परिस्थितियों में भी व्यक्ति को सही मार्ग पर बनाए रखते हैं।
वास्तव में, माता-पिता की सबसे बड़ी सफलता यह नहीं कि वे अपने बच्चों के लिए कितनी संपत्ति छोड़कर गए, बल्कि यह है कि उन्होंने उन्हें ऐसा चरित्र दिया या नहीं, जिसके बल पर वे स्वयं अपना भविष्य बना सकें। संस्कारों की यह वसीयत केवल परिवार ही नहीं, पूरे समाज और राष्ट्र को समृद्ध बनाती है।
अंततः हमें यह समझना होगा कि धन की विरासत समाप्त हो सकती है, लेकिन संस्कारों की विरासत अमर रहती है। इसलिए अपने बच्चों के लिए बैंक बैलेंस के साथ-साथ प्रेम, नैतिकता, मानवता और सदाचार की पूँजी भी अवश्य छोड़ें। यही वह वसीयत है जो आने वाली पीढ़ियों को सच्चे अर्थों में समृद्ध और महान बनाती है।
“संपत्ति से घर बनता है, लेकिन संस्कारों से परिवार बनता है।
अंत में कहना चाहूँगी ——
धन-दौलत की चमक तो समय के साथ ढल जाएगी,
संस्कारों की ज्योति हर पीढ़ी में जल जाएगी।।
जो विरासत चरित्र और मानवता की दे दी जाए,
वही सच्ची वसीयत बनकर दुनिया में अमर हो जाएगी।।
"विपरीत परिस्थितियों में हमें अपने अंदर के सर्वोत्तम को प्रकट करने, अपने पौरुष की परीक्षा करने और विश्व के समक्ष एक महान व्यक्तित्व के रूप में खड़े होने का अवसर मिलता है।"
माता के संस्कार ओर पुत्र
डॉ निर्मला शर्मा
महाभारत में मुख्य रूप से दो माँए समानांतर अपने पुत्रों की परवरिश करती हैं - एक कुंती और दूसरी गांधारी।
राजमहल एक ही है, वंश एक ही है, लेकिन फिर भी दोनों माँए अपने बच्चों को अलग-अलग तरह से संस्कारित करती है। जहाँ एक और थोड़ा सा भी गलत बोलने पर, अपनों से बड़ों की आज्ञा की थोड़ी सी अवमानना करने पर कुंती अपने पुत्रों को डाँट देती है और तुरंत क्षमा मांगने के लिए कहती है , वहीं दूसरी ओर गांधारी अपने पुत्र की हर गलती को छुपा कर, बड़ों के अपमान को अपना प्रतिशोध समझकर खुश होती है और चुप रहती है।
जैसे-जैसे ये बच्चे बड़े होते हैं देखिए उनमें किस तरह के संस्कार आते हैं। एक इस जिद पर अड़कर बैठ जाता है कि सब कुछ मेरा ही है। किसी को कुछ नहीं दूंगा और दूसरी तरफ संस्कारित पुत्र थोड़ा सा मिलने पर भी खुश होकर लेने को राजी हो जाते हैं, किंतु जिद्दी पुत्र अपने कुल का सर्वनाश के लिए तुला रहता है। युद्ध को निमंत्रण देता है और एक दिन अपना और अपने कुल का पूरी
तरह से सर्वनाश कर देता है।
इस बात के माध्यम से यही कहना चाहती हूँ कि पांडवों को भले ही हमेशा राजमहल में रहने का सौभाग्य नहीं मिला किंतु उनकी माता ने उनको बहुत अच्छी तरह से पाला- पोसा और संस्कार सिखाएं। दुर्योधन भले ही हमेशा राजमहल में रहा किंतु उसके संस्कार गड़बड़ ही रहे। जिसका नतीजा पूरे कुरूवंश को भुगतना पड़ा। ऐसा अनेक घरों में भी होता रहा है जो बच्चा है हमेशा बाहर रहे हैं वे संस्कारी होते हैं क्योंकि बाहर की दूरियों के थपड़े पड़ते हैं और जो हमेशा घर में ही रहे वह आराम की वजह से जिद्दी ही हो जाते हैं।
इन माताओं के संस्कारों को एक शिक्षक के संस्कारों से जोड़कर भी देखा जा सकता है कि एक ही विद्यालय या महाविद्यालय में पढ़ाते हुए, एक गुरु अपने बच्चों को सीखाता है कि बड़ों का सम्मान करो, उनको इज्जत दो, राष्ट्र की संपत्ति को अपनी संपत्ति समझो, उसे कभी नुकसान मत पहुंचाओ यही राष्ट्रवाद है। दूसरी ओर एक गुरु अपने बच्चों के गाली -गलौज करने पर खुश होता है। बड़ों का अपमान करने पर उनको शाबाशी देता है और राष्ट्र की संपत्ति को नुकसान पहुंचाने पर भी उसको नजरअंदाज करता है ,यही वामपंथ है।
"मेरे लिए नहीं, राष्ट्र के लिए"
एक बार श्रीगुरुजी का स्वास्थ्य बहुत खराब था। तेज़ बुखार और लगातार यात्रा के कारण शरीर थक चुका था। साथ के कार्यकर्ताओं ने आग्रह किया कि कुछ दिनों का विश्राम कर लें और कार्यक्रम स्थगित कर दें।
श्रीगुरुजी मुस्कुराए और बोले—
"यदि शरीर की चिंता करके कार्य रोक दूँ, तो स्वयंसेवकों को त्याग का संदेश कैसे दूँ? यह शरीर मेरा नहीं, राष्ट्रकार्य का है। जब तक इसमें प्राण हैं, तब तक इसका प्रत्येक क्षण मातृभूमि के लिए समर्पित है।" उन्होंने स्वास्थ्य की कठिनाइयों के बावजूद निर्धारित कार्यक्रम पूरे किए। उनके इस आचरण को देखकर अनेक स्वयंसेवकों ने संकल्प लिया कि वे भी सुविधा नहीं, कर्तव्य को प्राथमिकता देंगे।
इस प्रसंग का संदेश केवल इतना नहीं कि बीमारी में भी काम करना चाहिए, बल्कि यह कि कर्तव्य के प्रति निष्ठा, आत्मानुशासन और राष्ट्रसेवा की भावना व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में भी दृढ़ बनाए रखती है। स्वयंसेवकों के लिए संदेश - "थकान शरीर में होती है, संकल्प में नहीं। जब लक्ष्य राष्ट्र हो, तो हर कदम साधना बन जाता है।"
“अर्जुनविषाद योग”
सतीश शर्मा
श्रीमद्भगवद्गीता का प्रथम अध्याय, जिसे 'अर्जुनविषादयोग' कहा जाता है, अर्जुन विषाद योग पूरी गीता की पृष्ठभूमि और आधारशिला है। इस अध्याय में कुल 47 श्लोक हैं, जो कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में उपजे एक महान मानसिक और नैतिक संकट को दर्शाते हैं। यह अध्याय केवल एक ऐतिहासिक युद्ध का वर्णन नहीं है, बल्कि मानव मन के भीतर चलने वाले अंतर्द्वंद का जीवंत चित्रण है। अध्याय की शुरुआत हस्तिनापुर के नेत्रहीन राजा धृतराष्ट्र के प्रश्न से होती है, जो अपने सारथी संजय से पूछते हैं -
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥
धृतराष्ट्र पूछते हैं कि धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे और पांडु के पुत्रों ने क्या किया ? यहाँ 'धर्मक्षेत्र' शब्द दर्शाता है कि यह लड़ाई केवल भूमि के टुकड़े के लिए नहीं, बल्कि धर्म और अधर्म के बीच थी । संजय अपनी दिव्य दृष्टि से युद्ध के मैदान का हाल सुनाना शुरू करते हैं।
शुरुआती श्लोकों में दुर्योधन की कूटनीति और भय का वर्णन है, साधारणतः जो अधर्म के साथ होते हैं उनको भय रहता ही है। दुर्योधन सेनापति पितामह भीष्म व गुरु द्रोणाचार्य के पास जाकर उनको पांडवों की सेना की व्यवस्था दिखाता है। अपनी सेना और पांडवों की सेना की तुलनात्मक अध्ययन
करते हुए उनसे चर्चा करता है । इसके बाद, कौरव सेना के सेनापति पितामह भीष्म सिंह की दहाड़ के समान अपना शंख बजाकर युद्ध की घोषणा करते हैं। प्रत्युत्तर में, भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन अपने दिव्य शंख (पांचजन्य और देवदत्त) बजाते हैं, जिससे अधर्म के पक्ष में खड़े कौरवों के हृदय दहल जाते हैं।
अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना करते हैं कि उनके रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा किया जाए ताकि वे देख सकें कि उन्हें किन-किन से युद्ध करना है । जब श्रीकृष्ण अर्जुन के रथ को भीष्म और द्रोणाचार्य के सामने खड़ा करते हैं, तो अर्जुन के सामने एक अत्यंत कठिन परिस्थिति उत्पन्न हो जाती है । जैसे ही अर्जुन दोनों ओर अपने सगे-संबंधियों, पिताओं, पिताओं के भाइयों, गुरुओं, मामाओं, भाइयों, पुत्रों और मित्रों को देखते हैं, उनका हृदय गहरे शोक और करुणा से भर जाता है।
सगे-संबंधियों को मारने की कल्पना मात्र से अर्जुन का शरीर कांपने लगता है, उनका मुख सूख जाता है और उनके हाथ से प्रसिद्ध 'गांडीव' धनुष गिर जाता है। वे तर्क देते हैं कि अपनों को मारकर मिलने वाले राज्य-सुख या विजय का कोई मूल्य नहीं है। अर्जुन को कुल-नाश (परिवार के विनाश) और उसके कारण समाज में फैलने वाले अधर्म का डर सताने लगता है। वे युद्ध के मैदान में हताश होकर रथ के पिछले हिस्से में बैठ जाते हैं। पहले अध्याय का आध्यात्मिक और व्यावहारिक महत्व है मानव मन जो हमे विचलित कर्ता है तो यह अध्याय हमे शोक से ज्ञान की ओर ले जाता है । कुरुक्षेत्र का मैदान हमारा जीवन है, जहाँ पांडव हमारी अच्छी प्रवृत्तियों (गुणों) के और कौरव हमारी बुरी आदतों (विकारों) के प्रतीक हैं। अर्जुन का यह 'विषाद' (दुख) साधारण अवसाद नहीं है, बल्कि एक आध्यात्मिक खोज की शुरुआत है। जब तक मनुष्य अपनी सीमाओं को पहचानकर व्याकुल नहीं होता, तब तक वह गुरु (श्रीकृष्ण) की शरण में नहीं जाता।
पहला अध्याय हमे सिखाता है कि जब हमारी बुद्धि मोह, ममता और 'मैं और मेरा' की भावना से घिर जाती है, तो हम कर्तव्य पथ से भटक जाते हैं। तो निर्णय लेने में असमर्थ हो जाते है । अर्जुनविषादयोग' हमें सिखाता है कि जीवन की विकट परिस्थितियों में मोहग्रस्त होकर अपने कर्तव्यों से भागना कायरता है। यह अध्याय मनुष्य को उसकी कमजोरियों का आईना दिखाता है की हमारे मन मे जो कमजोरियाँ होती है वह हमारी कायरता है । अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण के सामने युद्ध न करने के लिए जो सबसे बड़ा सामाजिक और नैतिक तर्क दिया, उसे 'कुल-नाश का तर्क' कहा जाता है।
अर्जुन का मानना था कि इस युद्ध में दोनों तरफ उनके अपने ही परिवार के लोग खड़े हैं। यदि वे मारे गए, तो संपूर्ण समाज की व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाएगी।
पहले हम अर्जुन के इन तर्कों को विस्तार से समझते हैं -
अर्जुन का पहला तर्क था कि युद्ध में परिवार के मुख्य पुरुषों (बुजुर्गों और संरक्षकों) के मारे जाने पर कुल की प्राचीन और पवित्र परंपराएं (कुल-धर्म) समाप्त हो जाती हैं।
जब परिवार के मार्गदर्शक ही नहीं रहेंगे, तो आने वाली पीढ़ियों को अच्छे संस्कार और धर्म की शिक्षा कौन देगा? इसके परिणामस्वरूप, बचे हुए परिवार में अधर्म और अनैतिकता तेजी से पैर पसार लेती
है।
कुल में अधर्म फैलने का सबसे पहला और बुरा प्रभाव परिवार की महिलाओं पर पड़ता है। अर्जुन कहते हैं कि पुरुषों के अभाव और असुरक्षा के कारण कुल की स्त्रियां दूषित (पथभ्रष्ट) हो जाती हैं। समाज में नैतिक मूल्यों की कमी के कारण महिलाओं का शोषण और चरित्र हनन होने की संभावना बढ़ जाती है।
जब स्त्रियां दूषित या धर्म से विमुख हो जाती हैं, तो समाज में 'वर्णसंकर' संतानें पैदा होती हैं। वर्णसंकर का अर्थ है ऐसी संतानें जो बिना किसी नैतिक मूल्य, संस्कार और सामाजिक नियमों के पैदा होती हैं। ऐसी भावी पीढ़ी समाज में केवल अराजकता, अपराध और पतन को बढ़ावा देती है।
अर्जुन एक गहरा धार्मिक तर्क देते हुए कहते हैं कि कुल का नाश होने पर पूर्वजों (पितरों) को दिया जाने वाला पिंड और जल ये कहे की श्राद्ध कर्म बंद हो जाता है।
सनातन परंपरा में माना जाता है कि पुत्र द्वारा किया गया श्राद्ध पितरों को उच्च लोकों में स्थान दिलाता है। जब कुल की परंपरा ही नष्ट हो जाएगी, तो श्राद्ध करने वाला कोई नहीं बचेगा, जिससे पितरों का भी पतन हो जाता है और पूरा परिवार पाप का भागी बनता है। इन वर्णसंकर दोषों के कारण केवल उस विशिष्ट परिवार का ही नहीं, बल्कि पूरी जाति (समाज) और राष्ट्र का सनातन धर्म नष्ट हो जाता है। समाज की नींव हिला देने वाले इस विनाश के कारण पूरी सामाजिक व्यवस्था, मर्यादा और कानून का अंत हो जाता है।
अपने तर्कों का उपसंहार करते हुए अर्जुन कहते हैं कि उन्होंने आचार्यों से सुना है कि जो लोग कुल-धर्म का नाश करते हैं, उन्हें और उनके पूरे परिवार को अनिश्चित काल तक नरक में वास करना पड़ता है। इसलिए, ऐसे घोर पाप को करके राज्य-सुख भोगने से बेहतर है कि मैं युद्ध न करूँ और कौरव मुझे निहत्था ही मार दें। अर्जुन के यह तर्क सतही तौर पर बहुत ही धार्मिक, व्यावहारिक और दयालुता से भरे लगते हैं। लेकिन भगवान श्रीकृष्ण अगले ही अध्याय (द्वितीय अध्याय) में इन तर्कों को 'मूर्खतापूर्ण' और 'मोह जनित' बताते हैं।
श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि अर्जुन का यह ज्ञान असल में 'मोह' से पैदा हुआ है, विवेक से नहीं। यदि सामने कोई और शत्रु होता, तो अर्जुन को कुल-नाश की याद नहीं आती। दुर्योधन और कौरवों ने समाज में पहले ही अधर्म फैला रखा था। ऐसे आततायियों को दंड न देना समाज के लिए और भी बड़े विनाश का कारण बनता। अगले अध्यायों में भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य ज्ञान के माध्यम से उन कमजोरियों को दूर किया जा सके।
नेता जी ने कहा था - "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा! याद रखिए, सबसे बड़ा अपराध अन्याय सहना और गलत के साथ समझौता करना है। अधिकार मांगने से नहीं मिलते, उन्हें छीनना पड़ता है।
संतान योग
सतीश शर्मा
संतान कब होगी ?,संतानोत्पत्ति के बारे में जानने के लिए स्त्री-पुरुष दोनों की कुंडलियों पर विचार करके ही निर्णय करना चाहिए।संतान तभी होगी, जब कुंडली में संतान योग होगा इसलिए सर्व प्रथम यह देखिए कि संतान योग है या नहीं। फिर यह देखिए कि कोई संतान बाधा योग तो नहीं है। यदि संतान योग है और संतान बाधा योग नहीं है, तब दोनो कुंडलियों में ग्रह स्थिति एवं गोचर में ग्रहों के भ्रमण देखने के साथ-साथ यह भी देखिए कि विशोत्तरी महादशा तथा अंतर्दशा किस ग्रह की चल रही है, इन सब बातों पर विचार करके ही आप ठीक निर्णय पर पहुंच सकेंगे।
निम्नलिखित में से किसी की महादशा या अंतर्दशा चल रही हो तो पुत्र की उत्पत्ति संभव होती है:-ज्योतिष के अनुसार, पुत्र या पुत्री का निर्धारण जन्मकुंडली के पंचम भाव (संतान भाव), उसके स्वामी (पंचमेश), और ग्रहों की स्थिति (जैसे गुरु, सूर्य, मंगल, चंद्र, शुक्र) के विश्लेषण से किया जाता है, जहाँ पुरुष ग्रहों (सूर्य, मंगल, गुरु) और पुरुष राशियों (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुंभ) का प्रभाव पुत्र योग बनाता है, और स्त्री ग्रहों (चंद्र, शुक्र) व स्त्री राशियों (वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन) का प्रभाव कन्या योग बनाता है, लेकिन यह केवल ज्योतिषीय गणना है, जो वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं है और संतान का लिंग प्राकृतिक रूप से तय होता है।
पंचम भाव और पंचमेश व पुत्र योग - यदि पंचम भाव में बुध, गुरु, शुक्र जैसे बलवान ग्रह हों, पंचमेश बली हो और पुरुष ग्रहों (सूर्य, मंगल, गुरु) से देखा जाए, तो पुत्र की संभावना बढ़ जाती है।
कन्या योग: यदि पंचमेश चंद्र के साथ हो या पंचम भाव में कर्क राशि का द्रेष्काण हो, तो कन्या जन्म
की संभावना होती है।
ग्रहों का प्रभाव व संतान कारक ग्रह - बृहस्पति (गुरु) संतान का मुख्य कारक है, विशेषकर पुत्र के लिए। सूर्य और मंगल भी पुरुष संतान से जुड़े हैं।
स्त्री ग्रह प्रभाव - चंद्र और शुक्र स्त्री ग्रहों के रूप में कन्या संतान का संकेत देते हैं।
पुरुष ग्रह दृष्टि - यदि गुरु (संतान कारक) पर मंगल या सूर्य जैसे पुरुष ग्रहों की दृष्टि हो और वह पुरुष राशि में हो, तो पुत्र का योग बनता है।
भाव और राशियाँ व पुरुष दिन/राशियाँ, मंगलवार, गुरुवार, रविवार जैसे पुरुष दिनों में गर्भधारण (ज्योतिष के अनुसार) या पुरुष राशियों (मेष, सिंह, धनु) में ग्रहों की स्थिति पुत्र का संकेत देती है।
महिला दिन/राशियाँ: महिलाओं के लिए चंद्र, शुक्र और स्त्री राशियाँ (कर्क, वृषभ, मकर) कन्या योग बनाती हैं। पंचम भाव का स्वामी बलवान हो और लग्न से शुभ भावों (1, 2, 5, 9) में हो, तो पुत्र से भाग्य वृद्धि होती है। पंचम भाव में शुभ ग्रहों का होना या उन पर शुभ दृष्टि होना संतान के लिए अच्छा माना जाता है।
यह सभी ज्योतिषीय विधियाँ जन्मकुंडली और ग्रहों की स्थिति पर आधारित हैं। ये केवल संभावनाएं बताती हैं, निश्चित भविष्यवाणी नहीं करतीं। संतान का लिंग (लिंग निर्धारण) केवल प्रकृति और विज्ञान का विषय है, ज्योतिष इसका केवल एक सांकेतिक पहलू बताता है।
अजा ( प्रबोधिनी ) एकादशी
अजा ( प्रबोधिनी ) एकादशी - अजा (प्रबोधिनी) एकादशी भाद्रपद मास में कृष्ण पक्ष की एकादशी को कहते हैं। इस एकादशी को और भी कई नामों से पुकारा जाता है जैसे प्रबोधिनी, जया, दामिनी अजा, इस दिन विष्णु भगवान की उपासना कर रात में जागरण करना चाहिए व्रत के करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
अजा एकादशी की कथा - एक बार सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र के सपने में ऋषि विश्वामित्र को अपना राज्य दान कर दिया। अगले दिन ऋषि विश्वामित्र दरबार में गए तो राजा ने सचमुच में अपना सारा राजपाट सौंप दिया। ऋषि ने अपनी दक्षिणा की 500 स्वर्ण मुद्राएं और मांगी दक्षिणा चुकाने के लिए राजा को अपनी पत्नी पुत्र और खुद को बेचना पड़ा। राजा हरिश्चंद्र को डोम ने खरीदा था। उसने हरिश्चंद्र को श्मशान में नियुक्त किया और उन्हें यह कार्य सौंपा कि वह मृतकों के संबंधियों से कर ले कर अंतिम संस्कार करने दे। उन्हें यह कार्य करते हुए जब अधिक वर्ष बीत गए तब अचानक ही उनकी भेंट गौतम ऋषि से हुई राजा ने गौतम ऋषि को अपनी सारी आपबीती सुनाई तब उन्हें इसी अजा एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। राजा ने यह व्रत कथा करना आरंभ कर दिया इसी बीच उसके पुत्र रोहतास को सर्प के डसने के कारण स्वर्गवास हो गया। जब उनकी पत्नी अपने पुत्र का अंतिम संस्कार करने हेतु शमशान पर अपने पुत्र कि लाश का वहाँ लेकर आई तो राजा हरिश्चंद्र ने उसे श्मशान का कर मांगा। परंतु उसके पास शमशान का कर्ज चुकाने के लिए कुछ भी नहीं था। उसने अपनी चुनरी का आधा भाग देकर शमशान का कर्ज चुकाया। तत्काल आकाश में बिजली चमकी प्रभु ने प्रकट होकर बोले "महाराज! तुमने सत्य को जीवन में धारण करके उच्चतम आदर्श प्रस्तुत किया है। अतः तुम्हारी कर्तव्यनिष्ठा धन्य है। तुम इतिहास में सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र के नाम से अमर रहोगे। भागवत कृपा से रोहित जीवित हो गया। तीनों प्राणी चिरकाल तक सुख भोगकर अन्त मे स्वर्ग को चले गए।
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परिवर्तनी ( पद्मा ) एकादशी
कथा सुनने के लिए क्लिक करें -
https://youtu.be/dX-MvXuXbbI?si=lG_JQ5xVRxGHf-iQ
परिवर्तनी एकादशी को पद्मा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। यह श्रीलक्ष्मी जी का परम आह्लादकारी व्रत है। यह भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की एकादशी को किया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषशैय्या पर शयन करे हुए करवट बदलते हैं। इसीलिये इसे करवटनी एकादशी भी कहा जाता है। इस दिन लक्ष्मी जी की पूजा करना उत्तम माना जाता है, क्योंकि देवताओं ने अपने राज्य को फिर से पाने के लिये महालक्ष्मी का ही पूजन किया अर्चना की थी।
परिवर्तनी (पद्मा) एकादशी की कथा - त्रेता युग में प्रहलाद का पौत्र राजा राज्य करता था। वह ब्राह्मणों का सेवक तथा भगवान विष्णु का उपासक था और इन्द्र आदि सभी देवताओं का शत्रु था। अपने बल के कारण उसने देवताओं पर विजय प्राप्त कर ली और इन्द्र से इन्द्रासन छीन कर देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया। देवताओं को दुखी देखकर भगवान ने बामन का वेष धारण करके बलि के द्वार पर आकर भिक्षा मांगते हुए कहा- "हे राजन मुझे केवल तीन पग भूमि का दान चाहिए।" राजा बलि ने उत्तर दिया- "मैं आपको तीन लोक दे सकता हूँ, विराट रूप धारण करके नाप लो।" बामन (भगवान) ने विराट रूप धारण किया और दो पग में पूरी पृथ्वी को नाप लिया। जब उन्होंने तीसरा पग उठाया तो बलि ने सिर नीचे धर दिया। प्रभु ने चरण धरकर दबाया तो बलि पाताल लोक में जा पहुंचा। जब भगवान चरण उठाने लगे तो बलि ने हाथ पकड़कर कहा-"मैं इन्हें मन्दिर में रखूंगा।" भगवन बोले- "यदि तुम बामन एकादशी का पूर्ण विधि पूर्वक व्रत करो तो मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूँगा और मैं तुम्हारे द्वार पर कुटिया बनाकर रहूँगा।" आज्ञानुसार राजा बलि ने बामन एकादशी का व्रत विधि पूर्वक किया। और तभीसे भगवानकी एक प्रतिमा द्वारपाल बनकर पातालमें औरएक क्षीरसागर मेंनिवास करने लगी।
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सितंबर मास 2026 का पंचांग
भारतीय व्रतोत्सव सितंबर -2026
दि. 2-हल छठ, चंद्र छठ,दि. 4-श्री कृष्णजन्माष्टमी, कालाष्टमी,दि. 5-गोगा नवमी, नन्द महोत्सव,दि. 7-अजा एकादशी व्रत,दि. 8-वत्स द्वादशी, भौम प्रदोष व्रत,दि. 9-मास शिवरात्रि,दि. 11-कुशोत्पाटिनी-पिठोरी अमावस्या,दि. 13-वाराह जयंती,दि. 14-हरितालिका तीज, श्री गणेश जन्मोत्सव, सिद्धि विनायक व्रत, कलंक चतुर्थी, चंद्रदर्शन निषेध,दि. 17-सूर्य षष्ठी, बलदेव षष्ठी, मेला बृज मण्डल, संक्रांति पुण्य, श्री विश्वकर्मा पूजा,दि. 18-ज्येष्ठा गौरी आवाहन, मुक्ताभरण सप्तमी, अपराजिता पूजा, महालक्ष्मी व्रत प्रारम्भ,दि. 19- दुर्गाष्टमी, राधाष्टमी दि. 20- भागवत सप्ताह प्रा.,दि. 21- रामदेव जी का मेला (नवलदुर्ग),दि. 22- पद्मा एकादशी व्रत, जलझूलनी मेला, श्रीचारभुजा नाथ गणगौर,दि. 23- वामन जयंती,दि. 24- प्रदोष व्रत,दि. 26- सत्य व्रत, प्रौष्ठपदी पूर्णिमा श्राद्ध, भागवत सप्ताह समाप्त,दि. 26- महालय प्रारम्भ,दि. 29- गणेश चतुर्थी व्रत
मूल विचार सितंबर -2026
मासारंभ से दि. 2 को 2/42 तक, दि. 8 को 16/39 से, दि. 10 को 14/04 तक, दि. 17 को 19/53 से दि. 20 को 1/42 तक, दि. 27 को 11/07 से दि. 29 को 9/03 बजे तक गण्ड मूल नक्षत्र हैं।
ग्रह स्थिति सितम्बर - 2026
दि. 2 तुला में शुक्र,दि. 7 कन्या में बुध,दि. 12 बुध पश्चिमोदय,दि. 17 कन्या में सूर्य,दि. 18 कर्क में मंगल,दि. 26 तुला में बुध
पंचक विचार सितम्बर - 2026
पंचक विचार -(धनिष्ठा नक्षत्र के तृतीय चरण से रेवती नक्षत्र तक) पंचको में दक्षिण दिशा की ओर यात्रा करना मकान दुकान आदि की छत डालना चारपाई पलंग आदि बुनना,दाह संस्कार,बांस की चटाई दीवार प्रारंभ करना आदि स्तंभ रोपण तांबा पीतल तृण काष्ट आदि का संचय करना आदि कार्यों का निषेध माना जाता है समुचित उपाय एवं पंचक शांति करवा कर ही उक्त कार्यों का संपादन करना कल्याणकारी होगा ध्यान रहेगा पंचर नक्षत्रों का विचार मात्र उपरोक्त विशेष कृतियों के लिए ही किया जाता है विवाह मंडल आरंभ गृह प्रवेश प्रवेश उपनयन आदि मुद्दों से तो पंचक नक्षत्रका प्रयोग शुभ माना जाता है पंचक विचार- दि. 1 सित. को 3/23 बजे तक दि 23 को 21-26 से दि 28 को 10-16 पंचक है |
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भद्रा विचार सितम्बर -2026
भद्रा काल का शुभ अशुभ विचार - भद्रा काल में विवाह मुंडन, गृह प्रवेश, रक्षाबंधन आदि मांगलिक कृत्य का निषेध माना जाता है परंतु भद्रा काल में शत्रु का उच्चाटन करना,स्त्री प्रसंग में,यज्ञ करना,स्नान करना,अस्त्र शस्त्र का प्रयोग,ऑपरेशन कराना, मुकदमा करना,अग्नि लगाना,किसी वस्तु को काटना,भैस,घोड़ा व ऊंट संबंधी कार्य प्रशस्त माने जाते हैं सामान्य परिस्थिति में विवाह आदि शुभ मुहूर्त में भद्रा का त्याग करना चाहिए परंतु आवश्यक परिस्थितिवश अति आवश्यक कार्य भूलोक की भद्रा ,भद्रा मुख छोड़कर कर भद्रा पुच्छ में शुभ कार्य कर सकते है |
दि. 3 को 4/26 से 15/27 तक, दि. 6 को 8/41 से 19/29 तक, दि. 9 को 12/31 से 23/32 तक, दि. 14 को 19/25 से दि. 15 को 7/44 तक, दि. 18 को 13/01 से दि. 19 को 2/14 तक, दि. 22 को 8/51 से 21/43 तक, दि. 25 को 23/06 से दि. 26 को 10/43 तक, दि. 29 को 6/12 से 17/10 बजे तक भद्रा है।
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सर्वार्थ सिद्धि योग सितम्बर-2026
दैनिक जीवन में आने वाले महत्वपूर्ण कार्यों के लिए शीघ्र ही किसी शुभ मुहूर्त का अभाव हो,किंतु शुभ मुहर्त के लिए अधिक दिनों तक रुका ना जा सकता हो तो इन सुयोग्य वाले मुहर्तु को सफलता से ग्रहण किया जा सकता है | इन से प्राप्त होने वाले अभीष्ट फल के विषय में संशय नहीं करना चाहिए यह योग हैं सर्वार्थ सिद्धि,अमृत सिद्धि योग एवं रवियोग | योग्यता नाम तथा गुण अनुसार सर्वांगीण सिद्ध कारक है|
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चौघड़िया मुहूर्त
चौघड़िया मुहूर्त, ज्योतिष में शुभ और अशुभ समय जानने की एक प्रणाली है। यह 24 घंटों को 8 भागों में विभाजित करता है, जिन्हें चौघड़िया कहा जाता है। प्रत्येक चौघड़िया एक निश्चित अवधि का होता है, और इन्हें शुभ और अशुभ कार्यों के लिए उपयुक्त माना जाता है।
चौघड़िया मुहूर्त क्या है - 24 घंटों को 16 भागों में बांटा जाता है, जिन्हें चौघड़िया कहा जाता है। प्रत्येक चौघड़िया लगभग 1.30 घंटे का होता है।
शुभ-अशुभ - कुछ चौघड़िया शुभ माने जाते हैं, जैसे अमृत, शुभ, लाभ, और चर। कुछ अशुभ माने जाते हैं, जैसे रोग, उद्वेग, और काल। चौघड़िया का उपयोग शुभ कार्यों, जैसे विवाह, यात्रा, और व्यापार शुरू करने के लिए शुभ समय जानने के लिए किया जाता है।
चौघड़िया के प्रकार - दिन का चौघड़िया,सूर्योदय से सूर्यास्त तक के समय को दिन का चौघड़िया कहा जाता है।
रात का चौघड़िया,सूर्यास्त से अगले दिन के सूर्योदय तक के समय को रात का चौघड़िया कहा जाता है।
चौघड़िया का महत्व - चौघड़िया मुहूर्त का उपयोग किसी भी शुभ कार्य को शुरू करने के लिए एक अच्छे समय का चयन करने के लिए किया जाता है। यह माना जाता है कि यदि कोई कार्य शुभ चौघड़िया में शुरू किया जाता है, तो उसके सफल होने की संभावना अधिक होती है।
सुर्य उदय- सुर्य अस्त सितम्बर-2026
राहू काल
राहुकाल -राहुकाल दक्षिण भारत की देन है,दक्षिण भारत में राहु काल में कृत्य करना अच्छा नहीं माना जाता, राहु काल में शुभ कृतियों में वर्जित करने की परंपरा अब हमारे उत्तरी भारत में भी अपनाने लगे हैं राहुकाल प्रतिदिन सूर्यादि वारों में भिन्न-भिन्न समय पर केवल डेढ़ डेढ़ घंटे के लिए घटित होता है |
संक्रांति विचार सितम्बर - 2026
इस मास की संक्रान्ति कन्या भाद्रपद शुक्ल षष्ठी गुरुवार दि. 17 सितम्बर पूर्वाह्न 7/51 बजे 30 मु. बैठी आग्नेय दृष्टि पूर्व गमन कर माहेन्द्र मण्डल में प्रवेश करेगी। गतवार नक्षत्र 4, वार नक्षत्र नाम नन्दा-विप्र सुखी हों। गुरुवारी संक्रान्ति होने से सभी रस पदार्थ तेज होकर मन्दे। तिल, तेल, मूंगफली, अलसी, सरसों, बिनौला के भावों में घट-बढ़ से तेज होंगे।
आकाश लक्षण सितम्बर - 2026
ग्रहचाल नाड़ी परिवर्तन, बुधोदय से पहाड़ी स्थानों पर वर्षा होना सम्भव है। मौसम में शनैः शनैः परिवर्तन प्रारम्भ होगा। तापमान में कुछ गिरावट आयेगी, परन्तु गर्मी का प्रकोप बना रहेगा। रात में गर्मी में कुछ कमी आयेगी। कहीं-कहीं वायुवेग के साथ खण्ड वर्षा सम्भव है।
मांगलिक दोष विचार परिहार
वर अथवा कन्या दोनों में से किसी की भी कुंडली में 1,4,7,8 व 12 भाव में मंगल होने से ये मांगलिक माने जाते हैं,मंगली से मंगली के विवाह में दोष न होते हुए भी जन्म पत्रिका के अनुसार गुणों को मिलाना ही चाहिए यदि मंगल के साथ शनि अथवा राहु केतु भी हो तो प्रबल मंगली डबल मंगली योग होता है | इसी प्रकार गुरु अथवा चंद्रमा केंद्र हो तो दोष का परिहार भी हो जाता है |इसके अतिरिक्त मेष वृश्चिक मकर का मंगल होने से भी दोष नष्ट हो जाता है | इसी प्रकार यदि वर या कन्या किसी भी कुंडली में 1,4,7,9,12 स्थानों में शनि हो केंद्र त्रिकोण भावो में शुभ ग्रह, 3,6,11 भावो में पाप ग्रह हों तो भी मंगलीक दोष का आंशिक परिहार होता है, सप्तम ग्रह में यदि सप्तमेश हो तो भी दोष निवृत्त होता है |
स्वयं सिद्ध मुहूर्त
स्वयं सिद्ध मुहूर्त चैत्र शुक्ल प्रतिपदा वैशाख शुक्ल तृतीया अक्षय तृतीया आश्विन शुक्ल दशमी विजयदशमी दीपावली के प्रदोष काल का आधा भाग भारत में से इसके अतिरिक्त लोकाचार और देश आचार्य के अनुसार निम्नलिखित कृतियों को भी स्वयं सिद्ध मुहूर्त माना जाता है बडावली नामी देव प्रबोधिनी एकादशी बसंत पंचमी फुलेरा दूज इन में से किसी भी कार्य को करने के लिए पंचांग शुद्धि देखने की आवश्यकता नहीं है परंतु विवाह आदि में तो पंचांग में दिए गए मुहूर्त व कार्य करना श्रेष्ठ रहता है।
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विंशोत्तरी दशा का मानव जीवन मे महत्व
विंशोत्तरी दशा वैदिक ज्योतिष में जीवन के समय और घटनाओं का पता लगाने की एक 120 वर्ष की चक्रीय प्रणाली है, जिसमें मुख्य ग्रह सूर्य, चंद्रमा और मंगल आते हैं। यह जन्म के समय चंद्रमा के नक्षत्र पर निर्भर करती है।
ग्रहों की महादशा का समय (वर्ष)
सूर्य - 06 वर्ष,चन्द्रमा - 10 वर्ष,मंगल - 07 वर्ष,राहु - 18 वर्ष,गुरु (बृहस्पति) - 16 वर्ष,शनि - 19 वर्ष ,बुध - 17 वर्ष,केतु - 07 वर्ष,शुक्र - 20 वर्ष
दशा के स्तर महादशा - यह किसी एक ग्रह का बड़ा समय होता है जो कई वर्षों तक चलता है।
अंतर्दशा - यह महादशा के अंदर छोटे ग्रहों के आने वाले समय का हिस्सा है।
प्रत्यंतर्दशा - यह और भी छोटा समय होता है जो दिनों या महीनों में फल देता है।
दशा को समझने का तरीका महादशा और अंतर्दशा - हर बड़ी महादशा के अंदर सभी ग्रहों की छोटी अंतर्दशा आती हैं। जैसे गुरु की महादशा में शनि की अंतर्दशा। मुख्य फल महादशा नाथ का होता है, और विशेष समय का बदलाव अंतर्दशा तय करती है।
कुंडली में स्थिति - कोई ग्रह फल अपनी महादशा में तब देता है, वह कुंडली में किस भाव (घर) का स्वामी है और कहाँ बैठा है।
शुभ और अशुभ फल - 1, 5, 9 वें घर के स्वामी ग्रह आम तौर पर शुभ फल देते हैं, जबकि 3, 6, 11 वें घर के स्वामी संघर्ष या कष्ट दे सकते हैं। उच्च या मित्र राशि के ग्रह अच्छा परिणाम देते हैं। अपनी जन्म तिथि, समय और स्थान या अपना जन्म का नक्षत्र साझा करें, तो मैं आपकी वर्तमान दशा और उसके प्रभावों को समझाने में और मदद कर सकता हूँ संपर्क करें पंडित जी 9312002527
योगिनी दशा एक नक्षत्र-आधारित विशेष दशा प्रणाली है
वैदिक ज्योतिष में योगिनी दशा एक नक्षत्र-आधारित विशेष दशा प्रणाली है, जो कुल 36 वर्षों की होती है। यह जन्म के समय चंद्रमा के नक्षत्र पर निर्भर करती है और जीवन के शुभ-अशुभ परिणामों का अनुमान लगाने के लिए उपयोग की जाती है।
आठ योगिनियां और उनकी अवधि - यह चक्र 8 अलग-अलग योगिनियों और उनके स्वामी ग्रहों से जुड़ा होता है-
मंगला (स्वामी: चंद्रमा) - 1 वर्ष,पिंगला (स्वामी: सूर्य) - 2 वर्ष,धान्या (स्वामी: गुरु) - 3 वर्ष,भ्रामरी (स्वामी: मंगल) - 4 वर्ष,भद्रिका (स्वामी: बुध) - 5 वर्ष,उल्का (स्वामी: शनि) - 6 वर्ष,सिद्धा (स्वामी: शुक्र) - 7 वर्ष,संकटा (स्वामी: राहु) - 8 वर्ष,
शुभ दशाएं - पहली (मंगला), तीसरी (धान्या), पांचवीं (भद्रिका) और सातवीं (सिद्धा) दशा को आमतौर पर अच्छा और लाभदायक माना जाता है।
अशुभ दशाएं - दूसरी (पिंगला), चौथी (भ्रामरी), छठी (उल्का) और आठवीं (संकटा) दशा जीवन में कठिनाइयों, चुनौतियों या संघर्ष का संकेत देती हैं। आप अपनी कुंडली के अनुसार जन्म का नक्षत्र या वर्तमान दशा के बारे में जानना चाहते हैं, तो संपर्क करें पंडित जी 9312002527
ग्रह गोचर क्या होता है
ज्योतिष में 'ग्रह गोचर' का अर्थ है ग्रहों का एक राशि से दूसरी राशि में चलना या प्रवेश करना। 'गो' का मतलब तारा या ग्रह और 'चर' का मतलब चलना होता है। जब आकाश में सभी नौ ग्रह अपनी गति से घूमते हुए एक नक्षत्र या राशि से निकलकर दूसरी राशि में जाते हैं, तो उसे उस ग्रह का गोचर कहा जाता है।
ग्रहों की गोचर अवधिचंद्रमा - सबसे तेज गति से चलता है और हर ढाई दिन में राशि बदलता है।सूर्य: हर महीने (लगभग 30 दिन में) एक राशि से दूसरी राशि में जाता है।
बुध और शुक्र: लगभग 20 से 26 दिनों में राशि परिवर्तन करते हैं।
मंगल: करीब 45 दिनों तक एक राशि में रहता है।
गुरु (बृहस्पति): एक राशि में लगभग 1 साल रहता है।
राहु और केतु: लगभग 18 महीने तक एक राशि में रहते हैं।
शनि: सबसे धीमी गति से चलता है और एक राशि में करीब ढाई साल रहता है।
जीवन पर प्रभाव जन्म कुंडली व्यक्ति के जन्म के समय ग्रहों की स्थिति दिखाती है।गोचर उन ग्रहों की वर्तमान चाल को दिखाता है।ज्योतिष के अनुसार, ग्रहों के इस राशि बदलने से हर इंसान के जीवन, करियर, सेहत और मन पर असर पड़ता है। यदि आप जानना चाहते हैं कि वर्तमान में कौन सा ग्रह किस राशि में गोचर कर रहा है या इसका आपकी राशि पर क्या असर होगा, तो आप अपनी राशि निम्नलिखित नंबर पर बता सकते हैं।
सितम्बर-2026 मास का राशिफल
आत्म-जागरूकता, मानसिक शांति और भविष्य की चुनौतियों के लिए मानसिक रूप से तैयार होने के लिए राशिफल देखना चाहिये हैं। राशिफल आपको अपनी क्षमताओं, कमियों और स्वभाव को गहराई से समझने में मदद करता है। जीवन के असमंजस भरे फैसलों में यह एक सकारात्मक दृष्टिकोण और संबल प्रदान करता है। आने वाले समय में संभावित समस्याओं या चुनौतियों के बारे में जानकर आप पहले से सतर्क रह सकते हैं। यह कठिन समय में धैर्य रखने और अच्छे समय का लाभ उठाने की प्रेरणा देता है। आप इसे भविष्य का अटल सत्य मानने के बजाय जीवन की योजनाओं को बेहतर बनाने के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में देख सकते हैं ।
मेष - पुत्र जन्मदिन मांगलिक कार्य सम्पन्न होंगे, धन लाभ होगा। मित्रवर्ग से सहयोग मिलेगा, व्यापार से लाभ होगा। राजनैतिक एवं सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ेगी, लाभ होगा। 18 से मंगल नीच राशिगत परंतु गुरु युक्त रहने से व्यवसाय के क्षेत्र में संघर्ष अधिक रहेगा।
वृषभ - अधूरे कार्य पूर्ण होंगे, स्त्री-पुत्र एवं मित्रों का सुख मिलेगा। शरीर कष्ट दूर होगा। चिन्ता दूर, मन शान्त होगा। विरोधी नतमस्तक होंगे, यात्रा लाभकारी होगी। किसी दुष्ट व्यक्ति से धोखे की संभावना बनी हुई है।
मिथुन - पुत्रों की उन्नति होगी, घर में मांगलिक कार्य होगा,धन आगमन योग बना है। कहीं जाना भी होगा। नयी योजनाओं के साथ कोई चिन्ता भी बनेगी। क्रोध की अधिकता से परेशानी के योग हैं।
कर्क - स्वास्थ्य में सुधार आयेगा, जीवन साथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। व्यापार में कुछ कमी आये। मन चिन्ताग्रस्त रहेगा। बिगड़े कार्यों में सुधार, यात्रा में सफलता मिलेगी। लेनदेन करते वक्त सावधानी भरते।
सिंह - स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानी बढ़ेगी, वाहन दुर्घटना की आशंका है। स्त्री से मनमुटाव होने से मन चिन्तित होगा। भूमि-वाहन, पशु के व्यापार से लाभ, यात्रा शुभी होगी। दिनांक 16 से परिस्थितियों बदलेंगी। पितृ स्तोत्र का पाठ करें।
कन्या - ग्रहों स्थिति मध्यम फलदायक है, मन-मस्तिष्क उदास रहेगा। शुभ सन्देश मिलेगा। मन में प्रसन्नता बढ़ेगी। स्थान परिवर्तन के योग बने हैं। घर में तनाव बढ़ेगा। पितृ स्तोत्र का पाठ करें।
तुला - बौद्धिक क्षमता सुदृढ़ होगी, वाणी व्यवहार में निखार आयेगा। गृह क्लेश अधिक होगा। खर्च भी अधिक होगा। भाग्य आपका साथ देगा, लाभके अवसर मिलेंगे। वाहन या भूमि क्रय विक्रय के योग हैं।
वृश्चिक - आप मानसिक रूप से परेशान रहेंगे, अधिकारी वर्ग आप से नाराज रहेंगे। भाईयों से सहयोग मिलेगा। यात्रा से भी लाभ होगा। स्त्री को पीड़ा, मन अशान्त रहेगा। मन चिन्तातुर रहे। 18 से मंगल नीचस्थ रहने से व्यय अधिक रहे।
धनु - शनि अत्यन्त शुभ फल कारक है, कारोबार में सफलता मिलेगी। मनोवांछित कार्य बनेंगे, कहीं से विशेष लाभ होगा। भाइयों से सहयोग मिलेगा। बिगड़े कार्य बनेंगे। पेट में विकार से परेशानी।
मकर - शुभ कार्यों की ओर प्रवृत्ति बनेगी, जायदाद संबंधी कार्यों में प्रगति होगी। भूमि सम्बन्धी विवाद बनेगा। विवाद बढ़ायें नहीं। यात्रा के प्रबल योग हैं। लाभ भी अच्छा मिलेगा। मन अशांत रहेगा।
कुम्भ - आय में कमी, नौकरी वालों के लिए तनाव हो सकता है। नया वाहन खरीदा जायेगा। खर्च कम करें। व्यापार उत्तम, धार्मिक कार्यों में खर्च अधिक होगा। अधिकांश समय व्यर्थ के कामों में लगा रहेगा।
मीन - अपयश सम्भव है, कोई जटिल समस्या खड़ी हो सकती है। मित्रों से सहयोग मिलेगा। व्यापार उत्तम होगा। वाणी में कठोरता नहीं, झगड़ा हो सकता है। क्रोध व उत्तेजना से कोई बना काम बिगड़ सकता है।
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सितंबर मास 2026 के महत्वपूर्ण दिवस
1 सितंबर - 1947 को भारतीय मानक समय (IST) को आधिकारिक तौर पर पूरे देश के लिए अपनाया गया था।
2 सितंबर - विश्व नारियल दिवस
5 सितंबर: डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन (भारत के दूसरे राष्ट्रपति और शिक्षक दिवस)
5 सितंबर: वयोवृद्ध गायक फ्रेडी मर्करी
5 सितंबर (1997): नोबेल शांति पुरस्कार विजेता और भारत रत्न से सम्मानित समाजसेविका मदर टेरेसा का निधन हुआ था।
5 सितंबर (2012): प्रसिद्ध हिंदी व्यंग्यकार और लेखक शरद जोशी की पुण्यतिथि।
5 सितंबर: अंतर्राष्ट्रीय दान दिवस
7 सितंबर: नीले आसमान के लिए स्वच्छ वायु का अंतर्राष्ट्रीय दिवस
8 सितंबर: अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस
8 सितंबर: सुरेश गोयल प्रसिद्ध बैडमिंटन खिलाड़ी / आशा भोसले प्रसिद्ध गायिका - 8 सितंबर 1933
8 सितंबर: अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस
10 सितंबर: विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस
11 सितंबर (1921) - महान तमिल कवि और स्वतंत्रता सेनानी सुब्रह्मण्य भारती का निधन।
11 सितंबर (1987) - हिंदी साहित्य की प्रसिद्ध छायावादी कवयित्री महादेवी वर्मा की पुण्यतिथि।
14 सितंबर: हिंदी दिवस
15 सितंबर: अभियंता दिवस (इंजीनियर दिवस - एम. विश्वेश्वरैया की जयंती)
15 सितंबर: अंतर्राष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस
16 सितंबर: विश्व ओजोन दिवस (ओजोन परत संरक्षण दिवस)
17 सितंबर: विश्व रोगी सुरक्षा दिवस
17 सितंबर:जन्म दिवस नरेंद्र मोदी (भारत के प्रधानमंत्री) / ई.वी. रामसामी 'पेरियार’ जन्म दिवस
21 सितंबर: अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस (विश्व शांति दिवस)
22 सितंबर (2011)भारतीय क्रिकेटर,पटौदी के नवाब मंसूर अली खान पटौदी का निधन हुआ था।
23 सितंबर: सांकेतिक भाषा का अंतर्राष्ट्रीय दिवस
25 सितंबर: अंत्योदय दिवस (पंडित दीनदयाल उपाध्याय जयंती)
27 सितंबर: विश्व पर्यटन दिवस
27 सितंबर (1833)'ब्रह्म समाज के संस्थापक राजा राममोहन राय का निधन ब्रिस्टल,इंग्लैंड मेंहुआ था।
28 सितंबर: सार्वभौमिक पहुँच के लिए सूचना का अंतर्राष्ट्रीय दिवस
28 सितंबर: भगत सिंह (महान स्वतंत्रता सेनानी व क्रांतिकारी)
29 सितंबर: लता मंगेशकर (भारत रत्न स्वर कोकिला - 29 सितंबर 1929)
29 सितंबर: विश्व हृदय दिवस
30 सितंबर (1990): बहुमुखी प्रतिभा के धनी कन्नड़ अभिनेता, निर्देशक और लेखक शंकर नाग की पुण्यतिथि।
"प्रेरणा और विचारों की धार से ही क्रांति की तलवार तेज़ होती है।”
“मैं इश्क भी लिखना चाहूँ तो इंकलाब लिखा जाता है” भगत सिंह
अपनों से अपनी बात
भारतीय लोकतंत्र में 'संसद ठप करने की राजनीति' एक गंभीर और पुरानी चुनौती बन चुकी है, जो हाल के सत्रों में और अधिक तीव्र हो गई है। पक्ष और विपक्ष दोनों ही इसके लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराते हैं, जिससे जनता के पैसे की बर्बादी के साथ-साथ देश के विधायी कार्यों को भारी नुकसान पहुंचता है । हालिया मानसून सत्र में विपक्ष ने नीट पेपर लीक विवाद, दिल्ली छात्र विरोध प्रदर्शन पर पुलिस कार्रवाई, और राम मंदिर दान में कथित अनियमितताओं जैसे गंभीर मुद्दों पर गृह मंत्री और सरकार से सीधे जवाब की मांग की। राजनीतिक दलों को यह लगने लगा है कि गंभीर और शांत बहस की तुलना में संसद में हंगामा करने और वाकआउट करने से उन्हें मीडिया और जनता के बीच अधिक राजनीतिक लाभ मिलता है। बजट और विधायी प्रस्तावों का एक बड़ा हिस्सा बिना किसी विस्तृत चर्चा के सीधे मतदान के जरिए पारित हो गया । संसद नीति निर्माण और कानून संशोधनों का सर्वोच्च मंच है । व्यवधानों के कारण इस लोकतांत्रिक संस्था की प्रासंगिकता और गरिमा पर आम जनता के बीच प्रश्नचिह्न खड़े हो रहे हैं। विपक्षी दलों के भारी विरोध के कारण लोकसभा की उत्पादकता लगातार घट रही है । महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा के लिए विपक्ष को 'विशेष दिन' या निश्चित समय आवंटित किया जाना चाहिए ताकि उन्हें विरोध के लिए संसद ठप न करनी पड़े। सदन के नियमों का उल्लंघन करने वाले, तख्तियां लहराने वाले या अध्यक्ष के आसन के करीब आकर हंगामा करने वाले सांसदों के खिलाफ बिना किसी पक्षपात के कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। सत्तापक्ष को विपक्ष के जायज सवालों के प्रति अधिक संवेदनशील और जवाबदेह होना होगा, तथा विपक्ष को भी यह समझना होगा कि विरोध का सही मंच बहस है, न कि बहिष्कृत करना।संसद केवल सरकार और विपक्ष के बीच शक्ति संघर्ष का अखाड़ा नहीं, बल्कि करोड़ों नागरिकों की आकांक्षाओं,समस्याओं और अधिकारों पर विचार करने वाली सर्वोच्च प्रतिनिधि संस्था है। इसलिए उसका समय नष्ट होना अंततः जनता के अधिकारों और सार्वजनिक संसाधनों की क्षति है। विपक्ष का दायित्व सरकार से प्रश्न पूछना, नीतियों की आलोचना करना और वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत करना है। इसके लिए बहस,प्रश्नकाल,स्थगन प्रस्ताव और संसदीय समितियां अधिक प्रभावी माध्यम हैं। दूसरी ओर, सत्ता पक्ष को भी बहुमत के आधार पर असहमति को दबाने के बजाय गंभीर विषयों पर पर्याप्त चर्चा सुनिश्चित करनी चाहिए। यदि सरकार संवाद से बचेगी और विपक्ष लगातार व्यवधान को रणनीति बनाएगा, तो दोनों मिलकर संसदीय संस्थाओं की विश्वसनीयता कमजोर करेंगे। संसद में हंगामे का सबसे गंभीर परिणाम यह निकलता है कि महत्वपूर्ण विधेयकों, जनसमस्याओं और नीतिगत प्रश्न पर्याप्त विमर्श से वंचित रह जाते हैं। समाधान के लिए सर्वदलीय संवाद, चर्चा का पूर्वनिर्धारित समय, संसदीय समितियों की मजबूती और व्यवधान के प्रति समान आचार संहिता आवश्यक हैं। लोकतंत्र की शक्ति सदन बंद कराने में नहीं, असहमति को तर्कपूर्ण बहस में रूपांतरित करने में निहित है।
नीरा आर्य - स्वतंत्रता संग्राम की अनसुनी नायिका
सतीश शर्मा
नीरा आर्य भारत की पहली महिला जासूस और स्वतंत्रता संग्राम की अनसुनी नायिका थीं।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास वीरों और वीरांगनाओं की गौरवगाथाओं से भरा हुआ है, लेकिन कुछ नाम ऐसे हैं जो समय के अंधकार में कहीं गुम हो गए। उन्हीं में से एक नाम है – नीरा आर्य। भारत की पहली महिला जासूस, जिन्होंने आज़ादी की खातिर असाधारण साहस का परिचय दिया, अत्याचारों को झेला और अपनी जान की बाज़ी लगाकर भी अपने मिशन और कर्तव्य से डिगीं नहीं।इन्हें नीरा नागिनी के नाम से भी जाना जाता है।
नीरा आर्य का जन्म उत्तर प्रदेश के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। इनके जन्मदाता पिता महावीर सिंह जबकि इन्हें गोद लेने वाले धर्मपिता छज्जूराम लांबा थे। बचपन में माता-पिता के निधन के बाद उन्हें सेठ छज्जू राम लांबा और उनकी पत्नी ने गोद लिया था। इनके धर्मपिता सेठ छज्जूमल अपने समय के एक प्रतिष्ठित व्यापारी थे, जिनका व्यापार देशभर में फैला हुआ था। वे पढ़ी-लिखी, साहसी और राष्ट्रप्रेम से ओतप्रोत महिला थीं। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उनका संपर्क नेताजी सुभाष चंद्र बोस और इंडियन नेशनल आर्मी (INA) से हुआ। उन्होंने आज़ाद हिंद फौज की महिला विंग "रानी झांसी रेजिमेंट" में शामिल होकर जासूसी का कार्यभार संभाला।
नीरा की शादी एक ब्रिटिश समर्थक पुलिस अधिकारी से हुई थी, जिसे नेताजी सुभाष चंद्र बोस की
गतिविधियों पर नजर रखने और उन्हें पकड़वाने की जिम्मेदारी दी गई थी। जब नीरा को यह पता चला कि उसका पति श्रीकांत जयरंजन दास नेताजी की जान लेने की साज़िश कर रहा है, तो उनके सामने कर्तव्य और निजी जीवन के बीच एक असंभव सी स्थिति आ गई।आजाद हिन्द फौज के समर्पण के बाद जब लाल किले में मुकदमा चला तो सभी बंदी सैनिकों को छोड़ दिया गया, लेकिन इन्हें पति की हत्या के आरोप में काले पानी की सजा हुई थी, जहां इन्हें घोर यातनाएं दी गई।
देशप्रेम ने उनके निर्णय को स्पष्ट किया — नीरा ने अपने पति की हत्या कर दी ताकि नेताजी की जान बचाई जा सके। यह कदम आज़ादी के प्रति उनके समर्पण और दृढ़ निश्चय का प्रतीक है।
पति की हत्या के बाद नीरा को गिरफ्तार कर लिया गया। जेल में उनके साथ अमानवीय अत्याचार किए गए। इतिहास के पन्नों में दर्ज एक हृदय विदारक विवरण के अनुसार, अंग्रेज़ जेलरों ने उनसे नेताजी और आज़ाद हिंद फौज के बारे में जानकारी पाने के लिए उनके दोनों स्तनों को काट डाला।
नीरा ने अपनी एक आत्मकथा भी लिखी है,
‘‘मैं जब कोलकाता जेल से अंडमान पहुंची, तो हमारे रहने का स्थान वे ही कोठरियाँ थीं, जिनमें अन्य महिला राजनैतिक अपराधी रही थी अथवा रहती थी।
हमें रात के 10 बजे कोठरियों में बंद कर दिया गया और चटाई, कंबल आदि का नाम भी नहीं सुनाई पड़ा। मन में चिंता होती थी कि इस गहरे समुद्र में अज्ञात द्वीप में रहते स्वतंत्रता कैसे मिलेगी, जहाँ अभी तो ओढ़ने बिछाने का ध्यान छोड़ने की आवश्यकता आ पड़ी है?जैसे-तैसे जमीन पर ही लोट लगाई और नींद भी आ गई। लगभग 12 बजे एक पहरेदार दो कम्बल लेकर आया और बिना बोले-चाले ही ऊपर फेंककर चला गया। कंबलों का गिरना और नींद का टूटना भी एक साथ ही हुआ। बुरा तो लगा, परंतु कंबलों को पाकर संतोष भी आ ही गया।।अब केवल वही एक लोहे के बंधन का कष्ट और रह-रहकर भारत माता से जुदा होने का ध्यान साथ में था।
‘‘सूर्य निकलते ही मुझको खिचड़ी मिली और लुहार भी आ गया। हाथ की सांकल काटते समय थोड़ा-सा चमड़ा भी काटा, परंतु पैरों में से आड़ी बेड़ी काटते समय, केवल दो-तीन बार हथौड़ी से पैरों की हड्डी को जाँचा कि कितनी पुष्ट है।।मैंने एक बार दुःखी होकर कहा, ‘‘क्या अंधा है, जो पैर में मारता है?’’‘‘पैर क्या हम तो दिल में भी मार देंगे, क्या कर लोगी?’’
उसने मुझे कहा था।‘‘बंधन में हूँ तुम्हारे कर भी क्या सकती हूँ…’’ फिर मैंने उनके ऊपर थूक दिया था, ‘‘औरतों की इज्जत करना सीखो?’’
जेलर भी साथ थे, तो उसने कड़क आवाज में कहा, ‘‘तुम्हें छोड़ दिया जाएगा,यदि तुम बता दोगी कि तुम्हारे नेताजी सुभाष कहाँ हैं?’’
‘‘वे तो हवाई दुर्घटना में चल बसे,’’ मैंने जवाब दिया, ‘‘सारी दुनिया जानती है।’’
‘‘नेताजी जिंदा हैं….झूठ बोलती हो तुम कि वे हवाई दुर्घटना में मर गए?’’ जेलर ने कहा।
‘‘हाँ नेताजी जिंदा हैं।’’
‘तो कहाँ हैं…।’’
‘‘मेरे दिल में जिंदा हैं वे।’’
जैसे ही मैंने कहा तो जेलर को गुस्सा आ गया था और बोले, ‘‘तो तुम्हारे दिल से हम नेताजी को निकाल देंगे।’’ और फिर उन्होंने मेरे आँचल पर ही हाथ डाल दिया और मेरी आँगी को फाड़ते हुए फिर लुहार की ओर संकेत किया…लुहार ने एक बड़ा सा जंबूड़ औजार जैसा फुलवारी में इधर-उधर बढ़ी हुई पत्तियाँ काटने के काम आता है, उस ब्रेस्ट रिपर को उठा लिया और मेरे दाएँ स्तन को उसमें दबाकर काटने चला था…लेकिन उसमें धार नहीं थी, ठूँठा था और उरोजों (स्तनों) को दबाकर असहनीय पीड़ा देते हुए दूसरी तरफ से जेलर ने मेरी गर्दन पकड़ते हुए कहा, ‘‘अगर फिर जबान लड़ाई तो तुम्हारे ये छाती से अलग कर दिए जाएँगे…’’उसने फिर चिमटानुमा हथियार मेरी नाक पर मारते हुए कहा, ‘‘शुक्र मानो महारानी विक्टोरिया का कि इसे आग से नहीं तपाया, आग से तपाया होता तो तुम्हारे दोनों स्तन पूरी तरह उखड़ जाते।’’ सलाम हैं ऐसे देश भक्त को। आजादी के बाद इन्होंने फूल बेचकर जीवन यापन किया, लेकिन कोई भी सरकारी सहायता या पेंशन स्वीकार नहीं की।।
उनके इस बलिदान ने यह साबित कर दिया कि भारतीय महिलाएं भी स्वतंत्रता की लड़ाई में किसी से कम नहीं थीं, और जब बात देश की हो, तो वे अपने प्राण तक न्यौछावर करने को तैयार होती हैं।
नीरा आर्य स्वतंत्रता के बाद गुमनामी में जीती रहीं। उन्होंने अपना शेष जीवन साध्वी के रूप में बिताया। ना कोई सम्मान, ना सरकारी मदद, ना समाज की कृतज्ञता — उनके बलिदान को इतिहास की धूल में दबा दिया गया।
कहा जाता है कि नीरा आर्य ने अपने अंतिम दिन गुमनामी में बिताए। वह फूल बेचकर अपना गुजारा करती थीं, एक झोपड़ी में रहती थीं और गरीबी में ही उनकी मृत्यु हुई । वह हैदराबाद के फलकनुमा में बस गईं और फूल बेचकर अपना जीवन यापन करती थीं। वह वहां एक छोटी सी झोपड़ी में रहती थीं।वृद्धावस्था में बीमारी की हालत में चार मीनार के पास उस्मानिया अस्पताल में इन्होंने रविवार 26 जुलाई, 1998 में एक गरीब, असहाय, निराश्रित, बीमार वृद्धा के रूप में मौत का आलिंगन कर लिया।
"जिसके अंदर 'सनक' नहीं होती, वह कभी महान नहीं बन सकता। अगर संघर्ष न रहे, किसी भी भय का सामना न करना पड़े, तब जीवन का आधा स्वाद ही समाप्त हो जाता है। सफलता हमेशा असफलता के स्तंभ पर खड़ी होती है।"
“एक असाधारण व्यक्तित्व - नरेंद्र दास दामोदर मोदी”
मनमीत सोनी
इस 17 सितंबर को यह व्यक्ति छिहत्तर वर्ष का हो जाएगा। यह व्यक्ति पिछले चार दशकों से खुली राजनीति में है। जिनमें से लगभग 26 वर्ष बिलकुल सत्ता की राजनीति की है और कभी मुँह की नहीं खाई। कुछ तो बात होगी। कोई तो करिश्मा होगा। उन आलोचकों की तरह मूर्खता की भाषा मत बोलिये कि दो धर्मों को लड़वा के वोट लिए / झूठ बोलता है / फेंकता है / मीडिया मैनेज करता है। सारी बातों को पीछे धकेल दीजिये। आप विपक्षी या विरोधी हैं, तब भी "सब्जेक्टिव अप्रोच" से इस व्यक्ति को देखिये।
सब कुछ खिलाफ़ था। यह व्यक्ति गुजरात की राजनीति में भी उपेक्षित था। एक "चांस" की बात है कि भारतीय जनता पार्टी ने वहाँ भेजा। उसके बाद 26 वर्ष से यह व्यक्ति या तो गुजरात की सत्ता में रहा या केंद्र की सत्ता में।
कितने ही नेता लाइन में थे। आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, राजनाथ, वेंकय्या, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, नितिन गडकरी। लेकिन यह व्यक्ति सब को पीछे छोड़ देता है। इसके भीतर कितनी तेज़ ललक रही होगी। कितनी ऊर्जा। कितना जोश। कितनी चतुराई। कितना धैर्य। यह व्यक्ति कितनी जल्दी परिस्थिति में ढल जाता है। इसे कड़क / रिजिड कहने वाले सचमुच भोले हैं। यह व्यक्ति राम मंदिर के निर्माण में केंद्रीय भूमिका निभाता है। 370 हटाता है। तीन तलाक़ हटाता है। मिलिट्री
ओपरेशन करवाता है। लेकिन जब हालात हाथों से बाहर निकलते हैं तो रिवर्स गियर ले लेता है।
कितनी चतुराई से किसान आंदोलन निपटाया। कितनी योजना से जंतर मंतर को उसी ज़हर से काटा, जो ज़हर बोया जा रहा था।
पिचहत्तर वर्ष की आयु में अचानक इंस्टाग्राम पर आ जाना। यह जानते हुए भी कि जेन ज़ी को कंविन्स करना आसान नहीं, कोशिश करना। अपने मंत्री का इस्तीफ़ा ले लेना। बिलकुल चुप हो जाना। फिर एक दिन कुछ बोल कर यह बता देना कि मुझे सब जानकारी है।
यह व्यक्ति कितना संवाद कुशल है। बारह बरस से केंद्रीय सत्ता का केंद्र। और चाहे तो आगे भी रह सकता है। यानी ऐसी कोई गोपन तकनीक है ज़रूर कि सत्ता के सारे समीकरण साध लेता है। यह तकनीक नेहरू के पास भी थी लेकिन इतनी "वाईब्रैंट" नहीं। अटल के पास भी। लेकिन उनका समय दूसरा था। यह व्यक्ति "प्रिसिजन" से वार करता है। इस व्यक्ति को कैमरे के एंगल से लेकर पूजा में बैठने के ढंग तक, सब कुछ पर "कमांड" है।
यह कला ऐसे ही नहीं आती। मैं तो सबसे कुछ न कुछ सीखता हूँ। मुझे कम बैक करना नरेन्द्र मोदी ने ही सिखाया। अपने विरोधी को चुभना मगर उसे पूरी तरह लाचार कर देना। झटके नहीं हलाल का इस्तेमाल करना।
मीडिया - संस्थान - संसद - मन्त्रिमंडल - विधायक - जनता - अंतर्राष्ट्रीय राजनीति तक, सब कुछ पर एक साथ नज़र। यदि कभी मुँह की खानी पड़ भी जाए तो हाथों हाथ सम्भल जाना। यह मैंनेजमेंट आसान नहीं है। इसके लिए आपके पास ईश्वर - प्रदत्त - प्रतिभा होनी चाहिए।
सोने पर सुहागा राहुल जैसा ढीला और बेहद गैर-ज़िम्मेदार और मरा हुआ विपक्ष।
फिर कहता हूँ। इस व्यक्ति को एक "इंस्टिट्यूट" की तरह देखिये। 2002 से 2026 तक यह व्यक्ति भारत में सबसे अधिक चर्चा में रहा है। मुझे लगता है 2032 तक रहेगा। कहने में क्या जाता है कि जब तक जीवित रहेगा, आकर्षण और समाचारों का केंद्र रहेगा।
ऐसा चक्रवर्ती भाग्य मैंने तो किसी का नहीं देखा।
हाँ, बहुत कमियाँ हैं। कहीं - कहीं अलोकतांत्रिक हो जाना। अटेंशन सीकर होना। बहुत महत्वाकांक्षी होना। बहुत बड़े दावे करना। लेकिन फिर वही बात कि परफेक्ट कोई नहीं होता। मोदी भी नहीं है। लेकिन परफेक्ट होने का पीछा ज़रूर किया जा सकता है।
यदि मैं राहुल गाँधी होता तो मन ही मन मोदी को गुरु मान लेता। हार मान लेता कि भाई हमसे आप नहीं सध सकते। लेकिन हार मानने के बाद मैं मोदी की तकनीक अपना कर ही मोदी की जगह पहुँचता। तू - तड़ाक नहीं करता। मेलोनी - फेलोनी वाली सस्ती नौटंकी नहीं करता। टी-शर्ट पहनकर तफ़री नहीं करता। संसद को गंभीरता से लेता और अठारह घंटे नहीं तो बारह घंटे ज़रूर काम करता।
मोदी से ही सीखता कि इतने बड़े जन-समुदाय को कैसे अपने पीछे किया जाता है। मोदी से ही सीखता
कि कब, क्या, कैसे कौन-सी बात बोलनी है। क्या बोलनी है और क्या छुपा जानी है।
मोदी भारतीय राजनीति के लिए ही बने हैं। मोदी के भीतर "प्रेडिक्शन" और "जजमेंट" और "टाइमिंग" जैसी तीनों चीज़ें हैं।
मैं बहुत सामान्य व्यक्ति हूँ। एक प्राइवेट कॉलेज में लेक्चरर। थोड़ी - बहुत कविता भी कर लेता हूँ। लेकिन मैं जब भी किसी मुसीबत में फंस जाता हूँ तो यही सोचता हूँ कि मोदी यहाँ होते तो क्या करते? क्या वह "रियेक्ट" करते ? या, चुप रह जाते? या, ध्यान ही नहीं देते!
बहुत सारी बातें हैं। आप मुझे भक्त / अंधभक्त या "अंडभक्त" भी कह सकते हैं। लेकिन हर पीढ़ी का एक हीरो होता है। मेरा भी है। मैं इसे आपसे क्यों छुपाऊँ। छुपाकर बेईमानी ही करूँगा।
आप भले ही मोदी से नफ़रत करें, लेकिन लक्ष्मण भी तो रावण के पास कुछ सीखने ही गए थे। यदि आप मोदी को विश्वामित्र समझकर राम की तरह नहीं जा सकते तो रावण समझकर लक्ष्मण की तरह ही चले जाइये।
आपका क़द छोटा नहीं हो जाएगा। उलटे यह विनम्रता आपको लाभ ही देगी।
दोस्तो!
अपने "रिसीविंग हैंड" को हमेशा खुला रखिये। यह जीवन को बहुत सरल और सुविधाजनक बनाता है और मुश्किलों से उबार भी लेता है। बाक़ी आप पर। हाँ, मुझे मोदीजी को केवल मोदी कहना पड़ा, इसके लिए क्षमा! यह केवल समझाने के लिए था। और आख़िरी बात। अमित शाह जैसा एक दोस्त ज़रूर बनाइये। दोस्ती कीजिये। दोस्ती निभाइये। आख़िरी हद तक निभाइये। मैंने अपने जीवन में मोदी और शाह से बढ़कर दोस्त नहीं देखे। यह दोनों तो ख़ून के रिश्ते को भी पीछे छोड़ चुके।
हम उसी मुस्कान पर हैं
कंचन तिवारी कशिश
जाने किस दुकान पर हैं।
सालों से नुकसान पर हैं।
छोड़ देते हम भी उनको,
रिश्ता दी जुबान पर है।
दिल पर जितने ज़ख्म हैं
उनका नाम हर निशान पर है।
अब ख़ामोशी ओढ़ ली है,
ताला इस जुबान पर है।
पूछते हैं हाल मेरा
तीर जिनका कमान पर है।
जिंदा हम रहेंगे या मरेंगे,
यह बात मेरी जान पर है।
दर्द से डरते नहीं हम,
दर्द के उनवान पर हैं।
वो बदलते होंगे चेहरे,
हम उसी मुस्कान पर हैं।
प्रश्न पूछना अध्ययन प्रक्रिया का प्रथम सोपान है
दिलीप बेतकेकर
“समझे या नहीं?”, हैव् यू अण्डरस्टेण्ड? कक्षा में पढ़ाते समय ऐसे प्रश्न शिक्षक अपने विद्यार्थियों से अनेक बार पूछते रहते हैं। भिन्न-भिन्न प्रान्तों में भाषा अलग होने पर भी प्रश्न पूछते रहते हैं। ‘जी हां’, ‘यस सर’, ‘हो सर’……… ऐसे ही निश्चित उत्तर विद्यार्थियों से मिलते हैं, और विद्यार्थियों से संयुक्त सुर में ‘हां’ उत्तर मिलने पर तो शिक्षक प्रसन्न होकर दूसरा प्रश्न उछालता हैं।
‘कुछ आशंका?’ ‘कुछ कठिनाई?’, ‘एनी डिफिक्लटी?’…… जैसे प्रश्नों का उत्तर भी ‘नो सर’, ‘नहीं सर’ संयुक्त रूप से मिलते ही प्रसन्न शिक्षक आगे पढ़ाना जारी रखते है………….
गहराई से परखने पर ध्यान में आता है कि कुछ विद्यार्थियों को कुछ भी समझ में नहीं आया होता है, और कुछ समझ में आने पर भी उत्तर नहीं दे पाते! इसका क्या कारण हो सकता है? गहन अध्ययन पश्चात् जो कारण समझ में आते हैं – ये हैं – विद्यार्थियों के मन में उभरते अनेक प्रकार के डर!
उत्तर गलत होने का डर: अनेक विद्यार्थियों के मन में एक अदृश्य डर बैठा बैठा रहता है कि गलत उत्तर बताने पर कक्षा में हंसी उड़ेगी, शिक्षक गुस्सा होंगे, डाटेंगे, ये डर भी उन्हें उत्तर देने से रोकता हैं।
परीक्षा केन्द्रित शिक्षा: हमारी शिक्षा पद्धति उत्तर-केन्द्रित अधिक हैं, प्रश्न-केन्द्रित विचारों पर नहीं, परिणामस्वरूप परीक्षा में जो पूछा जाना अपेक्षित नहीं उस सम्बन्ध में प्रश्न क्यों पूछें ऐसी मानसिकता बन जाती हैं।
शिक्षक केन्द्रित कक्षा: शिक्षक ही केवल निरन्तर बोलता जाए और विद्यार्थी केवल सुनते रहे, ऐसी कक्षा में विद्यार्थियों को बोलने-पूछने का अवसर और उनका अधिकार नहीं मिलता हैं।
प्रश्न पूछना भी एक कौशल्य है, जो प्रयास से ही प्राप्त होता है, जहां बाल्यकाल से ही प्रश्नों को दबा दिया जाता है वहां प्रश्न उभरते ही नहीं।
‘मुझे उत्तर ज्ञात नहीं, ऐसा कहने में विद्यार्थी शरमाता है, और ज्ञात न होना अर्थात् अपयश यह भावना मन में बैठी होती हैं। कभी-कभी शिक्षकों के प्रश्न पूछने का सुर विद्यार्थी को अरूचिकर लगता है। कभी शिक्षक उलझन भरे अथवा उपहास करने हेतु प्रश्न पूछते हैं। सदैव कुछ विशेष होशियार विद्यार्थियों को ही प्रश्न पूछे जाए तो अन्य विद्यार्थी मौन बैठने को विवश होते हैं। पाठ्य पुस्तक और परीक्षा-केन्द्रित अध्यापन के कारण उत्तर महत्वपूर्ण और प्रश्न गौण ऐसी मानसिकता बनती हैं। परिणाम स्वरूप विद्यार्थी की जिज्ञासा अनदेखी रह जाती है। “और कोई प्रश्न तो पूछना नहीं है”? ऐसा शिक्षक के बोलने पर उत्तर मौन होता हैं।
वास्तविकता तो है कि इन्हीं बच्चों ने अपने बाल्यकाल में अपने माता-पिता को हजारों प्रश्न पूछे होते हैं, तो फिर कक्षा में मौन क्यों हो जाते हैं यह प्रश्न पालक गण और शिक्षकों को स्वयं से पूछना होगा। बच्चों द्वारा पूछे प्रश्नों के उत्तर अनेक बार पालकों के पास नहीं होते हैं, उनके प्रश्नों का महत्व और उसकी गंभीरता पालक समझ नहीं पाते हैं, उनके प्रश्न पालकों को उबाऊ, झंझट वाले लगते हैं। इसलिए पालक उन्हें ‘चुप बैठ’, ‘मूर्खो’ जैसे सवाल मत कर, कहते हुए बच्चों को निराश कर देते हैं। परिणाम स्वरूप नये पालकों से प्रश्न पूछना कम कर देते हैं, जैसे-जैसे बच्चे ऊँची कक्षाओं में जाते हैं, जैसे वे अधिक मौन हो जाते हैं – शिक्षक द्वारा प्रश्न पूछने पर कक्षा में बच्चे मौन रहते हैं, शिक्षक की नजर से हटने का प्रयास होता है, आँखे नीचे की ओर झुका लेते हैं बच्चे! कक्षा में प्रश्नों का अभाव अच्छे अनुशासन की श्रेणी में नहीं रखा जाता है, वह निःशब्दता है, शान्त, मौन कक्षा जीवित कक्षा नहीं कहलाती है।
कक्षा में जब प्रश्न पूछे जाते हैं, तब कक्षा केवल सीखने की जगह न होकर विचारों की कार्यशाला हो जाती है – शैक्षणिक मानस शास्त्र के अनुसार प्रश्न पूछना उच्च स्तरीय वैचारिक कौशल्य है, विश्लेषण, मूल्यांकन और सृजनशीलता के स्तर पर प्रश्नों की भूमिका निर्णायक होती है, प्रश्नों द्वारा ही संकल्पनाएं स्पष्ट होती है, चिकित्सकीय विचारशक्ति विकसित होकर ज्ञान प्राप्ति की प्रेरणा जागृत होती है।
कुशल प्रश्नोत्तर – अर्थात् – अच्छे अध्यापन शास्त्र का धड़कता दिल हैं। भारतीय ज्ञान परम्परा प्रश्नोतरों से ही प्रारम्भ होती है, उपनिषद् के संवाद प्रश्नोत्तरों के रूप में ही हैं।
“कस्मिन्न भगवो विज्ञाते सर्व मिदं विज्ञानतं भवति?” यह मुंडकोपनिषद् का प्रश्न ही सम्पूर्ण मुंडकोपनिषद् का आधार है।
“अथातो ब्रह्म जिज्ञासा, येन ज्ञानं सर्वमिदं ज्ञातं भवति, कोऽहं, तत्वमसि, नायमात्या प्रवचनेन लभ्यो, किम कर्म किमकर्मेति?” यह सब वचन चिंतन को प्रवृत करती हैं। इतनी विशाल ज्ञान परम्परा होते हुए भी आज हमारे विद्यार्थियों में प्रश्न क्यों उभरते नहीं, यह गहन विचारणीय समस्या हैं।
बच्चे कक्षा में क्यों मौन रहते हैं, क्यों उत्तर नहीं देते, प्रश्न पूछते नहीं, यह है शिक्षकों की शिकायत,
परन्तु शिकायत करना ही समस्या का हल नहीं। इस हेतु कोई ठोस प्रामाणिक विचार विमर्श आवश्यक
हैं।
प्रश्न न पूछने वाला विद्यार्थी समूह एक अनुशासित समूह हैं ऐसा मानना उचित नहीं, वास्तव में देखा जाए तो ऐसे विद्यार्थी विचार शून्य हो सकते हैं। प्रश्न पूछना केवल जिज्ञासा की अभिव्यक्ति नहीं, अपितु ज्ञान प्राप्ति का प्रारम्भ हैं। प्रश्न पूछना अध्ययन प्रक्रिया का प्रथम सोपान है – प्रश्न से ही ज्ञान निर्मिति और विचार प्रक्रिया प्रारम्भ होती है, जहां प्रश्नों का अभाव वहां विचारों का भी अभाव और विचारों के अभाव में वास्तविक शिक्षा अवरूद्ध होती है।
चीनी भाषा में एक कहावत के अनुसार – यदि आप प्रश्न पूछते हैं, तो लोग आपको मूर्ख समझेंगे, आपकी हंसी उड़ायेंगे, परन्तु केवल पांच-दस मिनिट! परन्तु यदि आपने प्रश्न पूछा नहीं तो आप आजीवन मूर्ख रहने की सम्भावना हैं। एक अंगेज लेखक रूड़याई किपलिंग के अनुसार – “मैंने छह मित्रों को अपने पास जोड़ रखा है, वे मेरे हर कार्य में सहायक होते हैं ओर वे छह मित्र है – क्या, कौन, कहां, कैसे, कब, और, क्यों?” साक्रेटिस की प्रश्नोत्तर पद्धति एक प्रभावी प्रक्रिया मानी जाती हैं। जॉन हुई के मतानुसार शिक्षा एक समस्या निवारण की प्रक्रिया है, और समस्या प्रश्नों के अभाव में अस्तित्व में नहीं आती।
अपनी अधिकतर कक्षाओं में मौन संस्कृति ही विद्यमान है – प्रश्न पूछने की आदत विद्यार्थी में अपने आप ही निर्मित नहीं होती, वरन उसे प्रयास पूर्वक ही विद्यार्थी में निर्माण करनी पड़ती हैं। इसलिए शिक्षकों से अपेक्षा की जाती है कि वे अध्यापन पद्धति में परिवर्तन लाकर, प्रश्नों को महत्वपूर्ण स्थान दें तभी कक्षा जीवित-संवादमय और विचार-समृद्ध हो सकेगी। प्रश्न पूछने वाला विद्यार्थी ही वास्तव में ज्ञान प्राप्त करने वाला विद्यार्थी होता है, यह शिक्षा का मूल मंत्र स्वीकार करना होगा। प्रश्न पूछने की आदत शिक्षा-प्रक्रिया में से ही विकसित होती है। प्रश्न केन्द्रित अध्यापन पद्धति स्वीकारने से ही विद्यार्थी का सहयोग, आकलन और चिकित्सकीय विचार शक्ति का लाक्षणिक विकास हो पायेगा।
प्रश्न-संस्कृति निर्मिति - सुरक्षित और मित्रता का वातावरण निर्मित कीजिये, प्रश्नों का स्वागत आवश्यक है, प्रश्न पूछना पुलिस अधिकारी जैसा न हो। विद्यार्थी द्वारा पूछे प्रश्न की खिल्ली न उड़ाए ना ही उसे अनदेखा करें। स्वयं को उत्तर ज्ञात ना हो तो प्रामाणिकता से स्वीकार कर कहें कि प्रश्न अच्छा है, हम अन्तर के लिए अध्ययन कर बताते हैं। प्रश्न पूछने का मॉडल बनें, स्वयं मनन करें, स्वयं को प्रश्न पूछे, ऐसा क्यों? प्रश्न का अन्य पर्याय क्या हो सकता है? इस पर भी मंथन करें। छोटे-छोटे समूहों में चर्चा करें, सम्पूर्ण कक्षा में चर्चा करने से दो-तीन समूहों में चर्चा करने से प्रश्न सहजता से उभरेंगे।
प्रश्न पूछने के लिए पर्याप्त समय दें, जल्दबाजी न करें, अध्यापन में शीघ्रता के कारण प्रश्न पूछने के लिए पर्याप्त समय नहीं दे पाते, विचार करने हेतु शान्ति और समय आवश्यक हैं।
प्रश्न पूछने के लिए भी प्रशिक्षण देना पड़ता है, कौशल्य का पाठ भी पढाएं, समूह चर्चा, प्रकल्प पद्धति, समस्या आधारित शिक्षा द्वारा प्रश्नों की संख्या में वृद्धि होती है, मूल्यांकन केवल उत्तरों का ही नहीं, प्रश्नों
को भी महत्व देकर उनका मूल्यांकन करें।
अधिकतर विद्यार्थी कक्षा में बोलने में शरमाते है अथवा झिझकते है, या डरते हैं, इसलिए उन्हें उनके
प्रश्न कागज पर लिखकर पश्चात् उन्हें पढ़ने को कहें, प्रश्न पूछने की आदत और कौशल्य विकसित करने हेतु अनेक खेल अथवा उपक्रम उपयोग में लाए जा सकते हैं।
शिक्षक अपने एजेण्डा में ‘प्रश्न कोशल्य’ विषय रखें और इस पर क्या कर सकते हैं इसका विचार-विमर्श करें जिससे अनेक उपाय समक्ष आएंगे, परन्तु इस हेतु शिक्षकों के समक्ष ही यह प्रश्न उभरना चाहिये, तभी उत्तर कही अन्य स्थान से न आकर शिक्षक स्वयं से ही प्राप्त होगा। मार्ग प्रशस्त होगा। विद्यार्थी के मन में प्रश्न पूछने की क्षमता निर्मित होना इसी में शिक्षक का सुयश छुपा हुआ हैं।
ब्रह्मसूत्र का सूत्र ‘अथातो जिज्ञासा’ पर आधारित ‘अथातो प्रश्न जिज्ञासा’ अर्थात् अब प्रश्न पूछने की जिज्ञासा जागृत करने का समय आ गया हैं।
अथातो प्रश्न जिज्ञासा,दिलीप बेतकेकर-लेख (मूल मराठी) दिलीप बसंत बेतकेकर
-अनुवाद (हिन्दी) डॉ. रमेश चौगांवकर (लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।)
भीड़ में भी माँ को अपना बच्चा दिख जाता है
हम लोग समाचार पत्र पढ़ रहे थे। आदि से अंत तक पूरा अखबार पढ़ डाला। इतने में श्री गुरुजी आये और समाचार पत्र उठाकर इधर-उधर निगाह डाली। बातचीत के दौरान संघ संबंधी समाचार का जिक्र आ गया, जो इसी समाचार पत्र में छपा था। मैंने पूछा समाचार है कहाँ? उन्होंने कहा इसी अखबार में तो है। मैंने पूरा अखबार पढ़ा, पन्ने उलटे पर वह समाचार नहीं दिखा। मेरी हैरानी देखकर श्री गुरुजी ने वह समाचार दिखाया, जो बाजारभाव के पन्ने पर छपा था। मैं मन ही मन सोचने लगा, कहाँ छाप दिया है। हम लोग क्या व्यापारी हैं, जो इस पन्ने पर निगाह जाती? फिर दूसरे ही क्षण विचार आया- 'श्री गुरुजी भी तो व्यापारी नहीं है। फिर उनकी निगाह कैसे गयी? मैंने अपनी शंका रखी भी नहीं, पर शायद वे समझ गये।
श्री गुरुजी ने इस पर इतना ही कहा भीड़ में भी माँ को अपना बच्चा दिख जाता है और कोलाहल में भी अपने आत्मीय जनों के शब्द साफ समझ मेंआते हैं।
मेरी समझ में आ गया। ध्येय के साथ उनका यह तादात्म्य है जिसके कारण वे उस समाचार को देख सके। श्री गुरुजी अक्सर कहा करते थे कि मैं तो समाचार पत्र नहीं पढ़ता, परन्तु मैं कहूँगा कि श्री गुरुजी ही समाचार पत्र पढ़ते हैं, और हम लोग तो उन्हें मात्र देखते हैं और बहुत देर तक देखते रहते हैं।
-पं. दीनदयालजी उपाध्याय (श्रीगुरुजी के प्रेरक संस्मरण : पृष्ठ-18)
शिक्षा में अपव्यय व अवरोधन
सतीश शर्मा
शिक्षा में अपव्यय (बिना प्राथमिक शिक्षा पूरी किए बीच में स्कूल छोड़ना) और अवरोधन (एक ही कक्षा में फेल होकर दोबारा रुकना) मुख्य रूप से गरीबी, अशिक्षा और दोषपूर्ण शिक्षण व्यवस्था के कारण होते हैं। ये दोनों समस्याएँ प्राथमिक शिक्षा स्तर पर सबसे अधिक देखी जाती हैं। अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा के प्रचार में जहाँ अन्य बाधाएँ सामने आई उनमें अपव्यय तथा अवरोधन की समस्याएँ भी प्रमुख रही है। शिक्षा में जब अपव्यय पर बात होती है तो पाया जाता है कि प्राथमिक शिक्षा में अपव्यय और अवरोधन अधिक है। हमारी प्राथमिक शिक्षा के लिए यह एक गम्भीर समस्या है। हम जब तक इस समस्या से निजात नहीं पाते तब तक शिक्षा के सार्वजनीकरण का हमारा सपना पूरा नहीं हो सकता।
अपव्यय का आशय बालक का अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी किए बिना ही विद्यालय छोड़ देना, जिससे बालक पर खर्च किया गया धन, समय और श्रम बेकार चला जाता है। हार्टोग कमेटी के अनुसार-"प्राइमरी शिक्षा पूरी करने से पहले बच्चे का किसी स्तर पर स्कूल छोड़ देना अपव्यय है।" अवरोधन का आशय कक्षा में असफल रहने से लिया जाता है। अर्थात एक ही कक्षा में दोबारा पढ़ाई के लिए ठहरना।
आर्थिक कारण से गरीब माता-पिता बच्चों से घरेलू काम करवाते हैं या उन्हें मजदूरी पर भेजते हैं।खर्च का बोझ इतना होता है की मुफ्त शिक्षा के बावजूद कॉपियाँ, किताबें और कपड़ों का खर्च उठाना कठिन होता है। माता-पिता का पढ़ा-लिखा न होना, जिससे वे शिक्षा का महत्व नहीं समझ पाते ओर
उनकी उदासीनता बच्चों की पढ़ाई के प्रति परिवार का लापरवाह रवैया भी इसकी वजह है । लड़कियों की शिक्षा को कम महत्व देना।ये कुछ एसे कारण है रुकावट करते है ।
रटने पर जोर देना और पुराने पढ़ाने के तरीके अपनाना। बच्चों के जीवन और रुचि से पाठ्यक्रम का मेल न खाना। स्कूलों में कमरों, शौचालय, और शिक्षण सामग्री का अभाव। शिक्षकों का बच्चों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण न होना।
एन.सी.ई.आर.टी. द्वारा प्रकाशित "Encyclopedia of Indian Education Vol. 2 में कहा गया है कि "शोध अध्ययनों से निरिक्षण कर यह पाया गया है 20% बच्चे ग्रामीण इलाकों में विद्यालय से बाहर तथा 25% बच्चे शहरी क्षेत्र में विद्यालय से बाहर है, ये सभी बच्चे किसी रोजगार में सलंग्न है, जिनसे उन्हें कुछ आमदनी होती है।"
इस संदर्भ में हम प्रवेश लेने वाले ड्राप आउट, अनामांकित बालक-बालिकाओं की स्थिति वर्ष 2004 के तथ्यों में निम्न प्रकार से देख सकते हैं।
कक्षा 1 में प्रवेश लेने वाले बच्चें,बालक -610148,बालिका 544894,कुल 1155042
ड्राप आउट बालक-बालिकाओं की संख्या- बालक 103881,बालिका -151028,कुल 254909
अपव्यय व अवरोधन के कुछ निम्नलिखित कारण है - निर्धनता-निर्धन अभिभावक अपने भोजन-वस्त्र की व्यवस्था ही ठीक प्रकार से नहीं कर पाते, ऐसी दशा में वे अपने बालकों को शिक्षा कैसे दिलाएँ। वे अपने बच्चों के लिए पढ़ाई के साधन नहीं जुटा पाते जिससे बालक बीच में पढ़ना छोड़ देता है। निर्धन अभिभावक शिक्षा की अपेक्षा जीविका को अधिक महत्व देते है। अतः वे अपने बच्चों को पढ़ाना छुडाकर किसी काम में लगा देते है इससे अपव्यय और अवरोधन अधिक बढ़ रहा है।
शिक्षा में अपव्यय एवं अवरोधन की समस्याओं को दूर करने के प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं, गरीब बच्चों को मुफ्त वर्दी, कॉपियां, किताबें और छात्रवृत्ति देना। पढ़ाई का समय ऐसा रखना जिससे बच्चे परिवार की मदद भी कर सकें। माता-पिता को शिक्षा के महत्व के प्रति जागरूक करना। लड़कियों के लिए मुफ्त और सुरक्षित शिक्षा का प्रबंध करना।सिलेबस को बच्चों के दैनिक जीवन से जोड़ना और आसान बनाना। रटने के बजाय गतिविधि-आधारित शिक्षण पद्धतियों का उपयोग करना। प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति और उनका बच्चों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार। सतत एवं व्यापक मूल्यांकन (CCE) लागू करना ताकि बच्चे परीक्षा के डर से स्कूल न छोड़ें। प्रत्येक गांव में उचित दूरी पर स्कूल खोलना। स्कूलों में पीने का साफ पानी, बिजली और अलग शौचालय (विशेषकर लड़कियों के लिए) सुनिश्चित करना। दोपहर के भोजन की गुणवत्ता में सुधार करना ताकि बच्चे स्कूल आने के लिए प्रेरित हों।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) में शिक्षा में अपव्यय (ड्रॉपआउट) और अवरोधन को रोकने तथा स्कूली शिक्षा में 100% सकल नामांकन अनुपात (GER) हासिल करने के लिए कई क्रांतिकारी कदम उठाए गए हैं:1. 5+3+3+4 स्कूली ढांचाप्रारंभिक बचपन की देखभाल और शिक्षा (ECCE),
खेल-आधारित शिक्षा के जरिए 3 साल की उम्र से ही बच्चों को औपचारिक शिक्षा से जोड़ा गया है, जिससे बच्चे स्कूल से डरने के बजाय आकर्षित हों। कक्षा 1 और 2 में पारंपरिक परीक्षाओं का दबाव
हटा दिया गया है, ताकि अवरोधन (फेल होने) की समस्या खत्म हो। स्कूल छोड़ चुके लगभग 2 करोड़ बच्चों को मुख्यधारा की शिक्षा में वापस लाने का लक्ष्य तय किया गया है । डिजिटल माध्यमों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद से प्रत्येक बच्चे की उपस्थिति और सीखने के स्तर की लगातार ट्रैकिंग की जाएगी। प्राथमिक स्तर (कम से कम कक्षा 5 तक) की शिक्षा मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा में देने का प्रावधान है। भाषा की समझ न होने के कारण होने वाले अपव्यय को रोकने में यह बहुत मददगार है। पाठ्यक्रम को कम करके व्यावहारिक समझ (Conceptual Understanding) पर केंद्रित किया गया है। आर्ट्स, साइंस या कॉमर्स के बीच की दीवारें हटा दी गई हैं। छात्र अपनी पसंद के विषय चुन सकते हैं, जिससे पढ़ाई में उनकी रुचि बनी रहती है। कक्षा 6 से ही व्यावसायिक शिक्षा (Vocational Education) और इंटर्नशिप को शामिल किया गया है। समावेशी और समानता-आधारित फंडजेंडर इंक्लूजन फंड (Gender Inclusion Fund), लड़कियों और ट्रांसजेंडर छात्रों को स्कूल तक पहुँचाने और सुरक्षित माहौल देने के लिए अलग से फंड की व्यवस्था की गई है। विशेष शिक्षा क्षेत्र (SEZ), शैक्षिक रूप से पिछड़े और वंचित क्षेत्रों में विशेष स्कूल खोले जा रहे हैं । ओपन स्कूलिंग का विस्तार वैकल्पिक रास्ते खोले जा रहे है ,जो बच्चे नियमित स्कूल नहीं जा सकते, उनके लिए राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (NIOS) के माध्यम से दूरस्थ शिक्षा (Distance Learning) के दायरे को बढ़ाया गया है।
शिक्षा के सार्वजनीकरण हेतु राज्य व केंद्र सरकार अनेको उपाय कर रहे है ताकि छात्र अपनी पढ़ाई बीच मे ना छोड़े । लेकिन सब काम सरकारों पर नहीं छोड़ना चाहिए हम भी जागरूकता चला कर अपना योगदान दे सकते है । अनेको सामाजिक संगठन इस काम मे लगे हुए है ।
"संगठन ही राष्ट्र की प्रमुख शक्ति होती है। संसार में कोई भी समस्या हल करनी हो, तो वह शक्ति के आधार पर ही हो सकती है। शक्तिहीन राष्ट्र की कोई आकांक्षा सफल नहीं होती। परन्तु सामर्थ्यशाली राष्ट्र अपनी इच्छानुसार कोई भी काम कर सकता है।यहीं आत्मीयता हर व्यक्ति में होनी चाहिए।"
संस्कार भी एक वसीयत है
श्रीमती शिखा सक्सेना
“धन-दौलत की वसीयत कुछ पीढ़ियों तक चलती है, लेकिन संस्कारों की वसीयत पीढ़ियों को संवार देती है।”
वसीयत का नाम सुनते ही हमारे मन में धन, संपत्ति, ज़मीन-जायदाद या आभूषणों का विचार आता है। लेकिन जीवन की सबसे मूल्यवान वसीयत वह नहीं होती जिसे कागज़ पर लिखा जाए, बल्कि वह होती है जो व्यवहार, आदर्शों और संस्कारों के रूप में अगली पीढ़ी को सौंप दी जाए। यही संस्कार ऐसी अमूल्य विरासत हैं जो कभी नष्ट नहीं होती और पीढ़ी दर पीढ़ी समाज को श्रेष्ठ बनाती रहती है।
बच्चे अपने माता-पिता की बातों से कम और उनके आचरण से अधिक सीखते हैं। यदि परिवार में ईमानदारी, अनुशासन, करुणा, सेवा, बड़ों का सम्मान और सत्यनिष्ठा का वातावरण होगा, तो यही गुण बच्चों के व्यक्तित्व का आधार बनेंगे। इसलिए कहा जाता है कि संस्कार सिखाए नहीं जाते, बल्कि जीए जाते हैं।
महात्मा गांधी ने कहा था—
“यदि हम संसार में वास्तविक परिवर्तन देखना चाहते हैं, तो उसकी शुरुआत स्वयं से करनी होगी।”
आज के आधुनिक युग में भौतिक सुख-सुविधाओं की होड़ ने जीवन को सुविधाजनक तो बनाया है,
परंतु कई बार मानवीय मूल्यों को पीछे छोड़ दिया है। माता-पिता अपने बच्चों के लिए महँगे विद्यालय, आधुनिक साधन और आर्थिक सुरक्षा तो जुटा देते हैं, लेकिन यदि वे उन्हें अच्छे संस्कार नहीं दे पाए, तो
यह सारी संपत्ति भी उनके जीवन को सही दिशा नहीं दे सकती। दूसरी ओर, सीमित संसाधनों वाला परिवार भी यदि अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दे दे, तो वे जीवन में सम्मान, सफलता और संतोष—तीनों प्राप्त कर सकते हैं।
स्वामी विवेकानंद का कथन है—
“हम वही बनते हैं जो हमारे विचार और संस्कार हमें बनाते हैं।”
संस्कारों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्हें कोई चुरा नहीं सकता, कोई बाँट नहीं सकता और समय भी उन्हें नष्ट नहीं कर सकता। वे व्यक्ति के चरित्र में बस जाते हैं और हर निर्णय में उसका मार्गदर्शन करते हैं। ईमानदारी, विनम्रता, सहनशीलता, कर्तव्यनिष्ठा और दूसरों के प्रति सम्मान जैसे संस्कार जीवन भर कठिन परिस्थितियों में भी व्यक्ति को सही मार्ग पर बनाए रखते हैं।
वास्तव में, माता-पिता की सबसे बड़ी सफलता यह नहीं कि वे अपने बच्चों के लिए कितनी संपत्ति छोड़कर गए, बल्कि यह है कि उन्होंने उन्हें ऐसा चरित्र दिया या नहीं, जिसके बल पर वे स्वयं अपना भविष्य बना सकें। संस्कारों की यह वसीयत केवल परिवार ही नहीं, पूरे समाज और राष्ट्र को समृद्ध बनाती है।
अंततः हमें यह समझना होगा कि धन की विरासत समाप्त हो सकती है, लेकिन संस्कारों की विरासत अमर रहती है। इसलिए अपने बच्चों के लिए बैंक बैलेंस के साथ-साथ प्रेम, नैतिकता, मानवता और सदाचार की पूँजी भी अवश्य छोड़ें। यही वह वसीयत है जो आने वाली पीढ़ियों को सच्चे अर्थों में समृद्ध और महान बनाती है।
“संपत्ति से घर बनता है, लेकिन संस्कारों से परिवार बनता है।
अंत में कहना चाहूँगी ——
धन-दौलत की चमक तो समय के साथ ढल जाएगी,
संस्कारों की ज्योति हर पीढ़ी में जल जाएगी।।
जो विरासत चरित्र और मानवता की दे दी जाए,
वही सच्ची वसीयत बनकर दुनिया में अमर हो जाएगी।।
"विपरीत परिस्थितियों में हमें अपने अंदर के सर्वोत्तम को प्रकट करने, अपने पौरुष की परीक्षा करने और विश्व के समक्ष एक महान व्यक्तित्व के रूप में खड़े होने का अवसर मिलता है।"
माता के संस्कार ओर पुत्र
डॉ निर्मला शर्मा
महाभारत में मुख्य रूप से दो माँए समानांतर अपने पुत्रों की परवरिश करती हैं - एक कुंती और दूसरी गांधारी।
राजमहल एक ही है, वंश एक ही है, लेकिन फिर भी दोनों माँए अपने बच्चों को अलग-अलग तरह से संस्कारित करती है। जहाँ एक और थोड़ा सा भी गलत बोलने पर, अपनों से बड़ों की आज्ञा की थोड़ी सी अवमानना करने पर कुंती अपने पुत्रों को डाँट देती है और तुरंत क्षमा मांगने के लिए कहती है , वहीं दूसरी ओर गांधारी अपने पुत्र की हर गलती को छुपा कर, बड़ों के अपमान को अपना प्रतिशोध समझकर खुश होती है और चुप रहती है।
जैसे-जैसे ये बच्चे बड़े होते हैं देखिए उनमें किस तरह के संस्कार आते हैं। एक इस जिद पर अड़कर बैठ जाता है कि सब कुछ मेरा ही है। किसी को कुछ नहीं दूंगा और दूसरी तरफ संस्कारित पुत्र थोड़ा सा मिलने पर भी खुश होकर लेने को राजी हो जाते हैं, किंतु जिद्दी पुत्र अपने कुल का सर्वनाश के लिए तुला रहता है। युद्ध को निमंत्रण देता है और एक दिन अपना और अपने कुल का पूरी
तरह से सर्वनाश कर देता है।
इस बात के माध्यम से यही कहना चाहती हूँ कि पांडवों को भले ही हमेशा राजमहल में रहने का सौभाग्य नहीं मिला किंतु उनकी माता ने उनको बहुत अच्छी तरह से पाला- पोसा और संस्कार सिखाएं। दुर्योधन भले ही हमेशा राजमहल में रहा किंतु उसके संस्कार गड़बड़ ही रहे। जिसका नतीजा पूरे कुरूवंश को भुगतना पड़ा। ऐसा अनेक घरों में भी होता रहा है जो बच्चा है हमेशा बाहर रहे हैं वे संस्कारी होते हैं क्योंकि बाहर की दूरियों के थपड़े पड़ते हैं और जो हमेशा घर में ही रहे वह आराम की वजह से जिद्दी ही हो जाते हैं।
इन माताओं के संस्कारों को एक शिक्षक के संस्कारों से जोड़कर भी देखा जा सकता है कि एक ही विद्यालय या महाविद्यालय में पढ़ाते हुए, एक गुरु अपने बच्चों को सीखाता है कि बड़ों का सम्मान करो, उनको इज्जत दो, राष्ट्र की संपत्ति को अपनी संपत्ति समझो, उसे कभी नुकसान मत पहुंचाओ यही राष्ट्रवाद है। दूसरी ओर एक गुरु अपने बच्चों के गाली -गलौज करने पर खुश होता है। बड़ों का अपमान करने पर उनको शाबाशी देता है और राष्ट्र की संपत्ति को नुकसान पहुंचाने पर भी उसको नजरअंदाज करता है ,यही वामपंथ है।
"मेरे लिए नहीं, राष्ट्र के लिए"
एक बार श्रीगुरुजी का स्वास्थ्य बहुत खराब था। तेज़ बुखार और लगातार यात्रा के कारण शरीर थक चुका था। साथ के कार्यकर्ताओं ने आग्रह किया कि कुछ दिनों का विश्राम कर लें और कार्यक्रम स्थगित कर दें।
श्रीगुरुजी मुस्कुराए और बोले—
"यदि शरीर की चिंता करके कार्य रोक दूँ, तो स्वयंसेवकों को त्याग का संदेश कैसे दूँ? यह शरीर मेरा नहीं, राष्ट्रकार्य का है। जब तक इसमें प्राण हैं, तब तक इसका प्रत्येक क्षण मातृभूमि के लिए समर्पित है।" उन्होंने स्वास्थ्य की कठिनाइयों के बावजूद निर्धारित कार्यक्रम पूरे किए। उनके इस आचरण को देखकर अनेक स्वयंसेवकों ने संकल्प लिया कि वे भी सुविधा नहीं, कर्तव्य को प्राथमिकता देंगे।
इस प्रसंग का संदेश केवल इतना नहीं कि बीमारी में भी काम करना चाहिए, बल्कि यह कि कर्तव्य के प्रति निष्ठा, आत्मानुशासन और राष्ट्रसेवा की भावना व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में भी दृढ़ बनाए रखती है। स्वयंसेवकों के लिए संदेश - "थकान शरीर में होती है, संकल्प में नहीं। जब लक्ष्य राष्ट्र हो, तो हर कदम साधना बन जाता है।"
“अर्जुनविषाद योग”
सतीश शर्मा
श्रीमद्भगवद्गीता का प्रथम अध्याय, जिसे 'अर्जुनविषादयोग' कहा जाता है, अर्जुन विषाद योग पूरी गीता की पृष्ठभूमि और आधारशिला है। इस अध्याय में कुल 47 श्लोक हैं, जो कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में उपजे एक महान मानसिक और नैतिक संकट को दर्शाते हैं। यह अध्याय केवल एक ऐतिहासिक युद्ध का वर्णन नहीं है, बल्कि मानव मन के भीतर चलने वाले अंतर्द्वंद का जीवंत चित्रण है। अध्याय की शुरुआत हस्तिनापुर के नेत्रहीन राजा धृतराष्ट्र के प्रश्न से होती है, जो अपने सारथी संजय से पूछते हैं -
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥
धृतराष्ट्र पूछते हैं कि धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे और पांडु के पुत्रों ने क्या किया ? यहाँ 'धर्मक्षेत्र' शब्द दर्शाता है कि यह लड़ाई केवल भूमि के टुकड़े के लिए नहीं, बल्कि धर्म और अधर्म के बीच थी । संजय अपनी दिव्य दृष्टि से युद्ध के मैदान का हाल सुनाना शुरू करते हैं।
शुरुआती श्लोकों में दुर्योधन की कूटनीति और भय का वर्णन है, साधारणतः जो अधर्म के साथ होते हैं उनको भय रहता ही है। दुर्योधन सेनापति पितामह भीष्म व गुरु द्रोणाचार्य के पास जाकर उनको पांडवों की सेना की व्यवस्था दिखाता है। अपनी सेना और पांडवों की सेना की तुलनात्मक अध्ययन
करते हुए उनसे चर्चा करता है । इसके बाद, कौरव सेना के सेनापति पितामह भीष्म सिंह की दहाड़ के समान अपना शंख बजाकर युद्ध की घोषणा करते हैं। प्रत्युत्तर में, भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन अपने दिव्य शंख (पांचजन्य और देवदत्त) बजाते हैं, जिससे अधर्म के पक्ष में खड़े कौरवों के हृदय दहल जाते हैं।
अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना करते हैं कि उनके रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा किया जाए ताकि वे देख सकें कि उन्हें किन-किन से युद्ध करना है । जब श्रीकृष्ण अर्जुन के रथ को भीष्म और द्रोणाचार्य के सामने खड़ा करते हैं, तो अर्जुन के सामने एक अत्यंत कठिन परिस्थिति उत्पन्न हो जाती है । जैसे ही अर्जुन दोनों ओर अपने सगे-संबंधियों, पिताओं, पिताओं के भाइयों, गुरुओं, मामाओं, भाइयों, पुत्रों और मित्रों को देखते हैं, उनका हृदय गहरे शोक और करुणा से भर जाता है।
सगे-संबंधियों को मारने की कल्पना मात्र से अर्जुन का शरीर कांपने लगता है, उनका मुख सूख जाता है और उनके हाथ से प्रसिद्ध 'गांडीव' धनुष गिर जाता है। वे तर्क देते हैं कि अपनों को मारकर मिलने वाले राज्य-सुख या विजय का कोई मूल्य नहीं है। अर्जुन को कुल-नाश (परिवार के विनाश) और उसके कारण समाज में फैलने वाले अधर्म का डर सताने लगता है। वे युद्ध के मैदान में हताश होकर रथ के पिछले हिस्से में बैठ जाते हैं। पहले अध्याय का आध्यात्मिक और व्यावहारिक महत्व है मानव मन जो हमे विचलित कर्ता है तो यह अध्याय हमे शोक से ज्ञान की ओर ले जाता है । कुरुक्षेत्र का मैदान हमारा जीवन है, जहाँ पांडव हमारी अच्छी प्रवृत्तियों (गुणों) के और कौरव हमारी बुरी आदतों (विकारों) के प्रतीक हैं। अर्जुन का यह 'विषाद' (दुख) साधारण अवसाद नहीं है, बल्कि एक आध्यात्मिक खोज की शुरुआत है। जब तक मनुष्य अपनी सीमाओं को पहचानकर व्याकुल नहीं होता, तब तक वह गुरु (श्रीकृष्ण) की शरण में नहीं जाता।
पहला अध्याय हमे सिखाता है कि जब हमारी बुद्धि मोह, ममता और 'मैं और मेरा' की भावना से घिर जाती है, तो हम कर्तव्य पथ से भटक जाते हैं। तो निर्णय लेने में असमर्थ हो जाते है । अर्जुनविषादयोग' हमें सिखाता है कि जीवन की विकट परिस्थितियों में मोहग्रस्त होकर अपने कर्तव्यों से भागना कायरता है। यह अध्याय मनुष्य को उसकी कमजोरियों का आईना दिखाता है की हमारे मन मे जो कमजोरियाँ होती है वह हमारी कायरता है । अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण के सामने युद्ध न करने के लिए जो सबसे बड़ा सामाजिक और नैतिक तर्क दिया, उसे 'कुल-नाश का तर्क' कहा जाता है।
अर्जुन का मानना था कि इस युद्ध में दोनों तरफ उनके अपने ही परिवार के लोग खड़े हैं। यदि वे मारे गए, तो संपूर्ण समाज की व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाएगी।
पहले हम अर्जुन के इन तर्कों को विस्तार से समझते हैं -
अर्जुन का पहला तर्क था कि युद्ध में परिवार के मुख्य पुरुषों (बुजुर्गों और संरक्षकों) के मारे जाने पर कुल की प्राचीन और पवित्र परंपराएं (कुल-धर्म) समाप्त हो जाती हैं।
जब परिवार के मार्गदर्शक ही नहीं रहेंगे, तो आने वाली पीढ़ियों को अच्छे संस्कार और धर्म की शिक्षा कौन देगा? इसके परिणामस्वरूप, बचे हुए परिवार में अधर्म और अनैतिकता तेजी से पैर पसार लेती
है।
कुल में अधर्म फैलने का सबसे पहला और बुरा प्रभाव परिवार की महिलाओं पर पड़ता है। अर्जुन कहते हैं कि पुरुषों के अभाव और असुरक्षा के कारण कुल की स्त्रियां दूषित (पथभ्रष्ट) हो जाती हैं। समाज में नैतिक मूल्यों की कमी के कारण महिलाओं का शोषण और चरित्र हनन होने की संभावना बढ़ जाती है।
जब स्त्रियां दूषित या धर्म से विमुख हो जाती हैं, तो समाज में 'वर्णसंकर' संतानें पैदा होती हैं। वर्णसंकर का अर्थ है ऐसी संतानें जो बिना किसी नैतिक मूल्य, संस्कार और सामाजिक नियमों के पैदा होती हैं। ऐसी भावी पीढ़ी समाज में केवल अराजकता, अपराध और पतन को बढ़ावा देती है।
अर्जुन एक गहरा धार्मिक तर्क देते हुए कहते हैं कि कुल का नाश होने पर पूर्वजों (पितरों) को दिया जाने वाला पिंड और जल ये कहे की श्राद्ध कर्म बंद हो जाता है।
सनातन परंपरा में माना जाता है कि पुत्र द्वारा किया गया श्राद्ध पितरों को उच्च लोकों में स्थान दिलाता है। जब कुल की परंपरा ही नष्ट हो जाएगी, तो श्राद्ध करने वाला कोई नहीं बचेगा, जिससे पितरों का भी पतन हो जाता है और पूरा परिवार पाप का भागी बनता है। इन वर्णसंकर दोषों के कारण केवल उस विशिष्ट परिवार का ही नहीं, बल्कि पूरी जाति (समाज) और राष्ट्र का सनातन धर्म नष्ट हो जाता है। समाज की नींव हिला देने वाले इस विनाश के कारण पूरी सामाजिक व्यवस्था, मर्यादा और कानून का अंत हो जाता है।
अपने तर्कों का उपसंहार करते हुए अर्जुन कहते हैं कि उन्होंने आचार्यों से सुना है कि जो लोग कुल-धर्म का नाश करते हैं, उन्हें और उनके पूरे परिवार को अनिश्चित काल तक नरक में वास करना पड़ता है। इसलिए, ऐसे घोर पाप को करके राज्य-सुख भोगने से बेहतर है कि मैं युद्ध न करूँ और कौरव मुझे निहत्था ही मार दें। अर्जुन के यह तर्क सतही तौर पर बहुत ही धार्मिक, व्यावहारिक और दयालुता से भरे लगते हैं। लेकिन भगवान श्रीकृष्ण अगले ही अध्याय (द्वितीय अध्याय) में इन तर्कों को 'मूर्खतापूर्ण' और 'मोह जनित' बताते हैं।
श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि अर्जुन का यह ज्ञान असल में 'मोह' से पैदा हुआ है, विवेक से नहीं। यदि सामने कोई और शत्रु होता, तो अर्जुन को कुल-नाश की याद नहीं आती। दुर्योधन और कौरवों ने समाज में पहले ही अधर्म फैला रखा था। ऐसे आततायियों को दंड न देना समाज के लिए और भी बड़े विनाश का कारण बनता। अगले अध्यायों में भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य ज्ञान के माध्यम से उन कमजोरियों को दूर किया जा सके।
नेता जी ने कहा था - "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा! याद रखिए, सबसे बड़ा अपराध अन्याय सहना और गलत के साथ समझौता करना है। अधिकार मांगने से नहीं मिलते, उन्हें छीनना पड़ता है।
संतान योग
सतीश शर्मा
संतान कब होगी ?,संतानोत्पत्ति के बारे में जानने के लिए स्त्री-पुरुष दोनों की कुंडलियों पर विचार करके ही निर्णय करना चाहिए।संतान तभी होगी, जब कुंडली में संतान योग होगा इसलिए सर्व प्रथम यह देखिए कि संतान योग है या नहीं। फिर यह देखिए कि कोई संतान बाधा योग तो नहीं है। यदि संतान योग है और संतान बाधा योग नहीं है, तब दोनो कुंडलियों में ग्रह स्थिति एवं गोचर में ग्रहों के भ्रमण देखने के साथ-साथ यह भी देखिए कि विशोत्तरी महादशा तथा अंतर्दशा किस ग्रह की चल रही है, इन सब बातों पर विचार करके ही आप ठीक निर्णय पर पहुंच सकेंगे।
निम्नलिखित में से किसी की महादशा या अंतर्दशा चल रही हो तो पुत्र की उत्पत्ति संभव होती है:-ज्योतिष के अनुसार, पुत्र या पुत्री का निर्धारण जन्मकुंडली के पंचम भाव (संतान भाव), उसके स्वामी (पंचमेश), और ग्रहों की स्थिति (जैसे गुरु, सूर्य, मंगल, चंद्र, शुक्र) के विश्लेषण से किया जाता है, जहाँ पुरुष ग्रहों (सूर्य, मंगल, गुरु) और पुरुष राशियों (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुंभ) का प्रभाव पुत्र योग बनाता है, और स्त्री ग्रहों (चंद्र, शुक्र) व स्त्री राशियों (वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन) का प्रभाव कन्या योग बनाता है, लेकिन यह केवल ज्योतिषीय गणना है, जो वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं है और संतान का लिंग प्राकृतिक रूप से तय होता है।
पंचम भाव और पंचमेश व पुत्र योग - यदि पंचम भाव में बुध, गुरु, शुक्र जैसे बलवान ग्रह हों, पंचमेश बली हो और पुरुष ग्रहों (सूर्य, मंगल, गुरु) से देखा जाए, तो पुत्र की संभावना बढ़ जाती है।
कन्या योग: यदि पंचमेश चंद्र के साथ हो या पंचम भाव में कर्क राशि का द्रेष्काण हो, तो कन्या जन्म
की संभावना होती है।
ग्रहों का प्रभाव व संतान कारक ग्रह - बृहस्पति (गुरु) संतान का मुख्य कारक है, विशेषकर पुत्र के लिए। सूर्य और मंगल भी पुरुष संतान से जुड़े हैं।
स्त्री ग्रह प्रभाव - चंद्र और शुक्र स्त्री ग्रहों के रूप में कन्या संतान का संकेत देते हैं।
पुरुष ग्रह दृष्टि - यदि गुरु (संतान कारक) पर मंगल या सूर्य जैसे पुरुष ग्रहों की दृष्टि हो और वह पुरुष राशि में हो, तो पुत्र का योग बनता है।
भाव और राशियाँ व पुरुष दिन/राशियाँ, मंगलवार, गुरुवार, रविवार जैसे पुरुष दिनों में गर्भधारण (ज्योतिष के अनुसार) या पुरुष राशियों (मेष, सिंह, धनु) में ग्रहों की स्थिति पुत्र का संकेत देती है।
महिला दिन/राशियाँ: महिलाओं के लिए चंद्र, शुक्र और स्त्री राशियाँ (कर्क, वृषभ, मकर) कन्या योग बनाती हैं। पंचम भाव का स्वामी बलवान हो और लग्न से शुभ भावों (1, 2, 5, 9) में हो, तो पुत्र से भाग्य वृद्धि होती है। पंचम भाव में शुभ ग्रहों का होना या उन पर शुभ दृष्टि होना संतान के लिए अच्छा माना जाता है।
यह सभी ज्योतिषीय विधियाँ जन्मकुंडली और ग्रहों की स्थिति पर आधारित हैं। ये केवल संभावनाएं बताती हैं, निश्चित भविष्यवाणी नहीं करतीं। संतान का लिंग (लिंग निर्धारण) केवल प्रकृति और विज्ञान का विषय है, ज्योतिष इसका केवल एक सांकेतिक पहलू बताता है।
अजा ( प्रबोधिनी ) एकादशी
अजा ( प्रबोधिनी ) एकादशी - अजा (प्रबोधिनी) एकादशी भाद्रपद मास में कृष्ण पक्ष की एकादशी को कहते हैं। इस एकादशी को और भी कई नामों से पुकारा जाता है जैसे प्रबोधिनी, जया, दामिनी अजा, इस दिन विष्णु भगवान की उपासना कर रात में जागरण करना चाहिए व्रत के करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
अजा एकादशी की कथा - एक बार सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र के सपने में ऋषि विश्वामित्र को अपना राज्य दान कर दिया। अगले दिन ऋषि विश्वामित्र दरबार में गए तो राजा ने सचमुच में अपना सारा राजपाट सौंप दिया। ऋषि ने अपनी दक्षिणा की 500 स्वर्ण मुद्राएं और मांगी दक्षिणा चुकाने के लिए राजा को अपनी पत्नी पुत्र और खुद को बेचना पड़ा। राजा हरिश्चंद्र को डोम ने खरीदा था। उसने हरिश्चंद्र को श्मशान में नियुक्त किया और उन्हें यह कार्य सौंपा कि वह मृतकों के संबंधियों से कर ले कर अंतिम संस्कार करने दे। उन्हें यह कार्य करते हुए जब अधिक वर्ष बीत गए तब अचानक ही उनकी भेंट गौतम ऋषि से हुई राजा ने गौतम ऋषि को अपनी सारी आपबीती सुनाई तब उन्हें इसी अजा एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। राजा ने यह व्रत कथा करना आरंभ कर दिया इसी बीच उसके पुत्र रोहतास को सर्प के डसने के कारण स्वर्गवास हो गया। जब उनकी पत्नी अपने पुत्र का अंतिम संस्कार करने हेतु शमशान पर अपने पुत्र कि लाश का वहाँ लेकर आई तो राजा हरिश्चंद्र ने उसे श्मशान का कर मांगा। परंतु उसके पास शमशान का कर्ज चुकाने के लिए कुछ भी नहीं था। उसने अपनी चुनरी का आधा भाग देकर शमशान का कर्ज चुकाया। तत्काल आकाश में बिजली चमकी प्रभु ने प्रकट होकर बोले "महाराज! तुमने सत्य को जीवन में धारण करके उच्चतम आदर्श प्रस्तुत किया है। अतः तुम्हारी कर्तव्यनिष्ठा धन्य है। तुम इतिहास में सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र के नाम से अमर रहोगे। भागवत कृपा से रोहित जीवित हो गया। तीनों प्राणी चिरकाल तक सुख भोगकर अन्त मे स्वर्ग को चले गए।
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परिवर्तनी ( पद्मा ) एकादशी
कथा सुनने के लिए क्लिक करें -
https://youtu.be/dX-MvXuXbbI?si=lG_JQ5xVRxGHf-iQ
परिवर्तनी एकादशी को पद्मा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। यह श्रीलक्ष्मी जी का परम आह्लादकारी व्रत है। यह भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की एकादशी को किया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषशैय्या पर शयन करे हुए करवट बदलते हैं। इसीलिये इसे करवटनी एकादशी भी कहा जाता है। इस दिन लक्ष्मी जी की पूजा करना उत्तम माना जाता है, क्योंकि देवताओं ने अपने राज्य को फिर से पाने के लिये महालक्ष्मी का ही पूजन किया अर्चना की थी।
परिवर्तनी (पद्मा) एकादशी की कथा - त्रेता युग में प्रहलाद का पौत्र राजा राज्य करता था। वह ब्राह्मणों का सेवक तथा भगवान विष्णु का उपासक था और इन्द्र आदि सभी देवताओं का शत्रु था। अपने बल के कारण उसने देवताओं पर विजय प्राप्त कर ली और इन्द्र से इन्द्रासन छीन कर देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया। देवताओं को दुखी देखकर भगवान ने बामन का वेष धारण करके बलि के द्वार पर आकर भिक्षा मांगते हुए कहा- "हे राजन मुझे केवल तीन पग भूमि का दान चाहिए।" राजा बलि ने उत्तर दिया- "मैं आपको तीन लोक दे सकता हूँ, विराट रूप धारण करके नाप लो।" बामन (भगवान) ने विराट रूप धारण किया और दो पग में पूरी पृथ्वी को नाप लिया। जब उन्होंने तीसरा पग उठाया तो बलि ने सिर नीचे धर दिया। प्रभु ने चरण धरकर दबाया तो बलि पाताल लोक में जा पहुंचा। जब भगवान चरण उठाने लगे तो बलि ने हाथ पकड़कर कहा-"मैं इन्हें मन्दिर में रखूंगा।" भगवन बोले- "यदि तुम बामन एकादशी का पूर्ण विधि पूर्वक व्रत करो तो मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूँगा और मैं तुम्हारे द्वार पर कुटिया बनाकर रहूँगा।" आज्ञानुसार राजा बलि ने बामन एकादशी का व्रत विधि पूर्वक किया। और तभीसे भगवानकी एक प्रतिमा द्वारपाल बनकर पातालमें औरएक क्षीरसागर मेंनिवास करने लगी।
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सितंबर मास 2026 का पंचांग
भारतीय व्रतोत्सव सितंबर -2026
दि. 2-हल छठ, चंद्र छठ,दि. 4-श्री कृष्णजन्माष्टमी, कालाष्टमी,दि. 5-गोगा नवमी, नन्द महोत्सव,दि. 7-अजा एकादशी व्रत,दि. 8-वत्स द्वादशी, भौम प्रदोष व्रत,दि. 9-मास शिवरात्रि,दि. 11-कुशोत्पाटिनी-पिठोरी अमावस्या,दि. 13-वाराह जयंती,दि. 14-हरितालिका तीज, श्री गणेश जन्मोत्सव, सिद्धि विनायक व्रत, कलंक चतुर्थी, चंद्रदर्शन निषेध,दि. 17-सूर्य षष्ठी, बलदेव षष्ठी, मेला बृज मण्डल, संक्रांति पुण्य, श्री विश्वकर्मा पूजा,दि. 18-ज्येष्ठा गौरी आवाहन, मुक्ताभरण सप्तमी, अपराजिता पूजा, महालक्ष्मी व्रत प्रारम्भ,दि. 19- दुर्गाष्टमी, राधाष्टमी दि. 20- भागवत सप्ताह प्रा.,दि. 21- रामदेव जी का मेला (नवलदुर्ग),दि. 22- पद्मा एकादशी व्रत, जलझूलनी मेला, श्रीचारभुजा नाथ गणगौर,दि. 23- वामन जयंती,दि. 24- प्रदोष व्रत,दि. 26- सत्य व्रत, प्रौष्ठपदी पूर्णिमा श्राद्ध, भागवत सप्ताह समाप्त,दि. 26- महालय प्रारम्भ,दि. 29- गणेश चतुर्थी व्रत
मूल विचार सितंबर -2026
मासारंभ से दि. 2 को 2/42 तक, दि. 8 को 16/39 से, दि. 10 को 14/04 तक, दि. 17 को 19/53 से दि. 20 को 1/42 तक, दि. 27 को 11/07 से दि. 29 को 9/03 बजे तक गण्ड मूल नक्षत्र हैं।
ग्रह स्थिति सितम्बर - 2026
दि. 2 तुला में शुक्र,दि. 7 कन्या में बुध,दि. 12 बुध पश्चिमोदय,दि. 17 कन्या में सूर्य,दि. 18 कर्क में मंगल,दि. 26 तुला में बुध
पंचक विचार सितम्बर - 2026
पंचक विचार -(धनिष्ठा नक्षत्र के तृतीय चरण से रेवती नक्षत्र तक) पंचको में दक्षिण दिशा की ओर यात्रा करना मकान दुकान आदि की छत डालना चारपाई पलंग आदि बुनना,दाह संस्कार,बांस की चटाई दीवार प्रारंभ करना आदि स्तंभ रोपण तांबा पीतल तृण काष्ट आदि का संचय करना आदि कार्यों का निषेध माना जाता है समुचित उपाय एवं पंचक शांति करवा कर ही उक्त कार्यों का संपादन करना कल्याणकारी होगा ध्यान रहेगा पंचर नक्षत्रों का विचार मात्र उपरोक्त विशेष कृतियों के लिए ही किया जाता है विवाह मंडल आरंभ गृह प्रवेश प्रवेश उपनयन आदि मुद्दों से तो पंचक नक्षत्रका प्रयोग शुभ माना जाता है पंचक विचार- दि. 1 सित. को 3/23 बजे तक दि 23 को 21-26 से दि 28 को 10-16 पंचक है |
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भद्रा विचार सितम्बर -2026
भद्रा काल का शुभ अशुभ विचार - भद्रा काल में विवाह मुंडन, गृह प्रवेश, रक्षाबंधन आदि मांगलिक कृत्य का निषेध माना जाता है परंतु भद्रा काल में शत्रु का उच्चाटन करना,स्त्री प्रसंग में,यज्ञ करना,स्नान करना,अस्त्र शस्त्र का प्रयोग,ऑपरेशन कराना, मुकदमा करना,अग्नि लगाना,किसी वस्तु को काटना,भैस,घोड़ा व ऊंट संबंधी कार्य प्रशस्त माने जाते हैं सामान्य परिस्थिति में विवाह आदि शुभ मुहूर्त में भद्रा का त्याग करना चाहिए परंतु आवश्यक परिस्थितिवश अति आवश्यक कार्य भूलोक की भद्रा ,भद्रा मुख छोड़कर कर भद्रा पुच्छ में शुभ कार्य कर सकते है |
दि. 3 को 4/26 से 15/27 तक, दि. 6 को 8/41 से 19/29 तक, दि. 9 को 12/31 से 23/32 तक, दि. 14 को 19/25 से दि. 15 को 7/44 तक, दि. 18 को 13/01 से दि. 19 को 2/14 तक, दि. 22 को 8/51 से 21/43 तक, दि. 25 को 23/06 से दि. 26 को 10/43 तक, दि. 29 को 6/12 से 17/10 बजे तक भद्रा है।
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सर्वार्थ सिद्धि योग सितम्बर-2026
दैनिक जीवन में आने वाले महत्वपूर्ण कार्यों के लिए शीघ्र ही किसी शुभ मुहूर्त का अभाव हो,किंतु शुभ मुहर्त के लिए अधिक दिनों तक रुका ना जा सकता हो तो इन सुयोग्य वाले मुहर्तु को सफलता से ग्रहण किया जा सकता है | इन से प्राप्त होने वाले अभीष्ट फल के विषय में संशय नहीं करना चाहिए यह योग हैं सर्वार्थ सिद्धि,अमृत सिद्धि योग एवं रवियोग | योग्यता नाम तथा गुण अनुसार सर्वांगीण सिद्ध कारक है|
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चौघड़िया मुहूर्त
चौघड़िया मुहूर्त, ज्योतिष में शुभ और अशुभ समय जानने की एक प्रणाली है। यह 24 घंटों को 8 भागों में विभाजित करता है, जिन्हें चौघड़िया कहा जाता है। प्रत्येक चौघड़िया एक निश्चित अवधि का होता है, और इन्हें शुभ और अशुभ कार्यों के लिए उपयुक्त माना जाता है।
चौघड़िया मुहूर्त क्या है - 24 घंटों को 16 भागों में बांटा जाता है, जिन्हें चौघड़िया कहा जाता है। प्रत्येक चौघड़िया लगभग 1.30 घंटे का होता है।
शुभ-अशुभ - कुछ चौघड़िया शुभ माने जाते हैं, जैसे अमृत, शुभ, लाभ, और चर। कुछ अशुभ माने जाते हैं, जैसे रोग, उद्वेग, और काल। चौघड़िया का उपयोग शुभ कार्यों, जैसे विवाह, यात्रा, और व्यापार शुरू करने के लिए शुभ समय जानने के लिए किया जाता है।
चौघड़िया के प्रकार - दिन का चौघड़िया,सूर्योदय से सूर्यास्त तक के समय को दिन का चौघड़िया कहा जाता है।
रात का चौघड़िया,सूर्यास्त से अगले दिन के सूर्योदय तक के समय को रात का चौघड़िया कहा जाता है।
चौघड़िया का महत्व - चौघड़िया मुहूर्त का उपयोग किसी भी शुभ कार्य को शुरू करने के लिए एक अच्छे समय का चयन करने के लिए किया जाता है। यह माना जाता है कि यदि कोई कार्य शुभ चौघड़िया में शुरू किया जाता है, तो उसके सफल होने की संभावना अधिक होती है।
सुर्य उदय- सुर्य अस्त सितम्बर-2026
राहू काल
राहुकाल -राहुकाल दक्षिण भारत की देन है,दक्षिण भारत में राहु काल में कृत्य करना अच्छा नहीं माना जाता, राहु काल में शुभ कृतियों में वर्जित करने की परंपरा अब हमारे उत्तरी भारत में भी अपनाने लगे हैं राहुकाल प्रतिदिन सूर्यादि वारों में भिन्न-भिन्न समय पर केवल डेढ़ डेढ़ घंटे के लिए घटित होता है |
संक्रांति विचार सितम्बर - 2026
इस मास की संक्रान्ति कन्या भाद्रपद शुक्ल षष्ठी गुरुवार दि. 17 सितम्बर पूर्वाह्न 7/51 बजे 30 मु. बैठी आग्नेय दृष्टि पूर्व गमन कर माहेन्द्र मण्डल में प्रवेश करेगी। गतवार नक्षत्र 4, वार नक्षत्र नाम नन्दा-विप्र सुखी हों। गुरुवारी संक्रान्ति होने से सभी रस पदार्थ तेज होकर मन्दे। तिल, तेल, मूंगफली, अलसी, सरसों, बिनौला के भावों में घट-बढ़ से तेज होंगे।
आकाश लक्षण सितम्बर - 2026
ग्रहचाल नाड़ी परिवर्तन, बुधोदय से पहाड़ी स्थानों पर वर्षा होना सम्भव है। मौसम में शनैः शनैः परिवर्तन प्रारम्भ होगा। तापमान में कुछ गिरावट आयेगी, परन्तु गर्मी का प्रकोप बना रहेगा। रात में गर्मी में कुछ कमी आयेगी। कहीं-कहीं वायुवेग के साथ खण्ड वर्षा सम्भव है।
मांगलिक दोष विचार परिहार
वर अथवा कन्या दोनों में से किसी की भी कुंडली में 1,4,7,8 व 12 भाव में मंगल होने से ये मांगलिक माने जाते हैं,मंगली से मंगली के विवाह में दोष न होते हुए भी जन्म पत्रिका के अनुसार गुणों को मिलाना ही चाहिए यदि मंगल के साथ शनि अथवा राहु केतु भी हो तो प्रबल मंगली डबल मंगली योग होता है | इसी प्रकार गुरु अथवा चंद्रमा केंद्र हो तो दोष का परिहार भी हो जाता है |इसके अतिरिक्त मेष वृश्चिक मकर का मंगल होने से भी दोष नष्ट हो जाता है | इसी प्रकार यदि वर या कन्या किसी भी कुंडली में 1,4,7,9,12 स्थानों में शनि हो केंद्र त्रिकोण भावो में शुभ ग्रह, 3,6,11 भावो में पाप ग्रह हों तो भी मंगलीक दोष का आंशिक परिहार होता है, सप्तम ग्रह में यदि सप्तमेश हो तो भी दोष निवृत्त होता है |
स्वयं सिद्ध मुहूर्त
स्वयं सिद्ध मुहूर्त चैत्र शुक्ल प्रतिपदा वैशाख शुक्ल तृतीया अक्षय तृतीया आश्विन शुक्ल दशमी विजयदशमी दीपावली के प्रदोष काल का आधा भाग भारत में से इसके अतिरिक्त लोकाचार और देश आचार्य के अनुसार निम्नलिखित कृतियों को भी स्वयं सिद्ध मुहूर्त माना जाता है बडावली नामी देव प्रबोधिनी एकादशी बसंत पंचमी फुलेरा दूज इन में से किसी भी कार्य को करने के लिए पंचांग शुद्धि देखने की आवश्यकता नहीं है परंतु विवाह आदि में तो पंचांग में दिए गए मुहूर्त व कार्य करना श्रेष्ठ रहता है।
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विंशोत्तरी दशा का मानव जीवन मे महत्व
विंशोत्तरी दशा वैदिक ज्योतिष में जीवन के समय और घटनाओं का पता लगाने की एक 120 वर्ष की चक्रीय प्रणाली है, जिसमें मुख्य ग्रह सूर्य, चंद्रमा और मंगल आते हैं। यह जन्म के समय चंद्रमा के नक्षत्र पर निर्भर करती है।
ग्रहों की महादशा का समय (वर्ष)
सूर्य - 06 वर्ष,चन्द्रमा - 10 वर्ष,मंगल - 07 वर्ष,राहु - 18 वर्ष,गुरु (बृहस्पति) - 16 वर्ष,शनि - 19 वर्ष ,बुध - 17 वर्ष,केतु - 07 वर्ष,शुक्र - 20 वर्ष
दशा के स्तर महादशा - यह किसी एक ग्रह का बड़ा समय होता है जो कई वर्षों तक चलता है।
अंतर्दशा - यह महादशा के अंदर छोटे ग्रहों के आने वाले समय का हिस्सा है।
प्रत्यंतर्दशा - यह और भी छोटा समय होता है जो दिनों या महीनों में फल देता है।
दशा को समझने का तरीका महादशा और अंतर्दशा - हर बड़ी महादशा के अंदर सभी ग्रहों की छोटी अंतर्दशा आती हैं। जैसे गुरु की महादशा में शनि की अंतर्दशा। मुख्य फल महादशा नाथ का होता है, और विशेष समय का बदलाव अंतर्दशा तय करती है।
कुंडली में स्थिति - कोई ग्रह फल अपनी महादशा में तब देता है, वह कुंडली में किस भाव (घर) का स्वामी है और कहाँ बैठा है।
शुभ और अशुभ फल - 1, 5, 9 वें घर के स्वामी ग्रह आम तौर पर शुभ फल देते हैं, जबकि 3, 6, 11 वें घर के स्वामी संघर्ष या कष्ट दे सकते हैं। उच्च या मित्र राशि के ग्रह अच्छा परिणाम देते हैं। अपनी जन्म तिथि, समय और स्थान या अपना जन्म का नक्षत्र साझा करें, तो मैं आपकी वर्तमान दशा और उसके प्रभावों को समझाने में और मदद कर सकता हूँ संपर्क करें पंडित जी 9312002527
योगिनी दशा एक नक्षत्र-आधारित विशेष दशा प्रणाली है
वैदिक ज्योतिष में योगिनी दशा एक नक्षत्र-आधारित विशेष दशा प्रणाली है, जो कुल 36 वर्षों की होती है। यह जन्म के समय चंद्रमा के नक्षत्र पर निर्भर करती है और जीवन के शुभ-अशुभ परिणामों का अनुमान लगाने के लिए उपयोग की जाती है।
आठ योगिनियां और उनकी अवधि - यह चक्र 8 अलग-अलग योगिनियों और उनके स्वामी ग्रहों से जुड़ा होता है-
मंगला (स्वामी: चंद्रमा) - 1 वर्ष,पिंगला (स्वामी: सूर्य) - 2 वर्ष,धान्या (स्वामी: गुरु) - 3 वर्ष,भ्रामरी (स्वामी: मंगल) - 4 वर्ष,भद्रिका (स्वामी: बुध) - 5 वर्ष,उल्का (स्वामी: शनि) - 6 वर्ष,सिद्धा (स्वामी: शुक्र) - 7 वर्ष,संकटा (स्वामी: राहु) - 8 वर्ष,
शुभ दशाएं - पहली (मंगला), तीसरी (धान्या), पांचवीं (भद्रिका) और सातवीं (सिद्धा) दशा को आमतौर पर अच्छा और लाभदायक माना जाता है।
अशुभ दशाएं - दूसरी (पिंगला), चौथी (भ्रामरी), छठी (उल्का) और आठवीं (संकटा) दशा जीवन में कठिनाइयों, चुनौतियों या संघर्ष का संकेत देती हैं। आप अपनी कुंडली के अनुसार जन्म का नक्षत्र या वर्तमान दशा के बारे में जानना चाहते हैं, तो संपर्क करें पंडित जी 9312002527
ग्रह गोचर क्या होता है
ज्योतिष में 'ग्रह गोचर' का अर्थ है ग्रहों का एक राशि से दूसरी राशि में चलना या प्रवेश करना। 'गो' का मतलब तारा या ग्रह और 'चर' का मतलब चलना होता है। जब आकाश में सभी नौ ग्रह अपनी गति से घूमते हुए एक नक्षत्र या राशि से निकलकर दूसरी राशि में जाते हैं, तो उसे उस ग्रह का गोचर कहा जाता है।
ग्रहों की गोचर अवधिचंद्रमा - सबसे तेज गति से चलता है और हर ढाई दिन में राशि बदलता है।सूर्य: हर महीने (लगभग 30 दिन में) एक राशि से दूसरी राशि में जाता है।
बुध और शुक्र: लगभग 20 से 26 दिनों में राशि परिवर्तन करते हैं।
मंगल: करीब 45 दिनों तक एक राशि में रहता है।
गुरु (बृहस्पति): एक राशि में लगभग 1 साल रहता है।
राहु और केतु: लगभग 18 महीने तक एक राशि में रहते हैं।
शनि: सबसे धीमी गति से चलता है और एक राशि में करीब ढाई साल रहता है।
जीवन पर प्रभाव जन्म कुंडली व्यक्ति के जन्म के समय ग्रहों की स्थिति दिखाती है।गोचर उन ग्रहों की वर्तमान चाल को दिखाता है।ज्योतिष के अनुसार, ग्रहों के इस राशि बदलने से हर इंसान के जीवन, करियर, सेहत और मन पर असर पड़ता है। यदि आप जानना चाहते हैं कि वर्तमान में कौन सा ग्रह किस राशि में गोचर कर रहा है या इसका आपकी राशि पर क्या असर होगा, तो आप अपनी राशि निम्नलिखित नंबर पर बता सकते हैं।
सितम्बर-2026 मास का राशिफल
आत्म-जागरूकता, मानसिक शांति और भविष्य की चुनौतियों के लिए मानसिक रूप से तैयार होने के लिए राशिफल देखना चाहिये हैं। राशिफल आपको अपनी क्षमताओं, कमियों और स्वभाव को गहराई से समझने में मदद करता है। जीवन के असमंजस भरे फैसलों में यह एक सकारात्मक दृष्टिकोण और संबल प्रदान करता है। आने वाले समय में संभावित समस्याओं या चुनौतियों के बारे में जानकर आप पहले से सतर्क रह सकते हैं। यह कठिन समय में धैर्य रखने और अच्छे समय का लाभ उठाने की प्रेरणा देता है। आप इसे भविष्य का अटल सत्य मानने के बजाय जीवन की योजनाओं को बेहतर बनाने के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में देख सकते हैं ।
मेष - पुत्र जन्मदिन मांगलिक कार्य सम्पन्न होंगे, धन लाभ होगा। मित्रवर्ग से सहयोग मिलेगा, व्यापार से लाभ होगा। राजनैतिक एवं सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ेगी, लाभ होगा। 18 से मंगल नीच राशिगत परंतु गुरु युक्त रहने से व्यवसाय के क्षेत्र में संघर्ष अधिक रहेगा।
वृषभ - अधूरे कार्य पूर्ण होंगे, स्त्री-पुत्र एवं मित्रों का सुख मिलेगा। शरीर कष्ट दूर होगा। चिन्ता दूर, मन शान्त होगा। विरोधी नतमस्तक होंगे, यात्रा लाभकारी होगी। किसी दुष्ट व्यक्ति से धोखे की संभावना बनी हुई है।
मिथुन - पुत्रों की उन्नति होगी, घर में मांगलिक कार्य होगा,धन आगमन योग बना है। कहीं जाना भी होगा। नयी योजनाओं के साथ कोई चिन्ता भी बनेगी। क्रोध की अधिकता से परेशानी के योग हैं।
कर्क - स्वास्थ्य में सुधार आयेगा, जीवन साथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। व्यापार में कुछ कमी आये। मन चिन्ताग्रस्त रहेगा। बिगड़े कार्यों में सुधार, यात्रा में सफलता मिलेगी। लेनदेन करते वक्त सावधानी भरते।
सिंह - स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानी बढ़ेगी, वाहन दुर्घटना की आशंका है। स्त्री से मनमुटाव होने से मन चिन्तित होगा। भूमि-वाहन, पशु के व्यापार से लाभ, यात्रा शुभी होगी। दिनांक 16 से परिस्थितियों बदलेंगी। पितृ स्तोत्र का पाठ करें।
कन्या - ग्रहों स्थिति मध्यम फलदायक है, मन-मस्तिष्क उदास रहेगा। शुभ सन्देश मिलेगा। मन में प्रसन्नता बढ़ेगी। स्थान परिवर्तन के योग बने हैं। घर में तनाव बढ़ेगा। पितृ स्तोत्र का पाठ करें।
तुला - बौद्धिक क्षमता सुदृढ़ होगी, वाणी व्यवहार में निखार आयेगा। गृह क्लेश अधिक होगा। खर्च भी अधिक होगा। भाग्य आपका साथ देगा, लाभके अवसर मिलेंगे। वाहन या भूमि क्रय विक्रय के योग हैं।
वृश्चिक - आप मानसिक रूप से परेशान रहेंगे, अधिकारी वर्ग आप से नाराज रहेंगे। भाईयों से सहयोग मिलेगा। यात्रा से भी लाभ होगा। स्त्री को पीड़ा, मन अशान्त रहेगा। मन चिन्तातुर रहे। 18 से मंगल नीचस्थ रहने से व्यय अधिक रहे।
धनु - शनि अत्यन्त शुभ फल कारक है, कारोबार में सफलता मिलेगी। मनोवांछित कार्य बनेंगे, कहीं से विशेष लाभ होगा। भाइयों से सहयोग मिलेगा। बिगड़े कार्य बनेंगे। पेट में विकार से परेशानी।
मकर - शुभ कार्यों की ओर प्रवृत्ति बनेगी, जायदाद संबंधी कार्यों में प्रगति होगी। भूमि सम्बन्धी विवाद बनेगा। विवाद बढ़ायें नहीं। यात्रा के प्रबल योग हैं। लाभ भी अच्छा मिलेगा। मन अशांत रहेगा।
कुम्भ - आय में कमी, नौकरी वालों के लिए तनाव हो सकता है। नया वाहन खरीदा जायेगा। खर्च कम करें। व्यापार उत्तम, धार्मिक कार्यों में खर्च अधिक होगा। अधिकांश समय व्यर्थ के कामों में लगा रहेगा।
मीन - अपयश सम्भव है, कोई जटिल समस्या खड़ी हो सकती है। मित्रों से सहयोग मिलेगा। व्यापार उत्तम होगा। वाणी में कठोरता नहीं, झगड़ा हो सकता है। क्रोध व उत्तेजना से कोई बना काम बिगड़ सकता है।
अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527,9560518227
सितंबर मास 2026 के महत्वपूर्ण दिवस
1 सितंबर - 1947 को भारतीय मानक समय (IST) को आधिकारिक तौर पर पूरे देश के लिए अपनाया गया था।
2 सितंबर - विश्व नारियल दिवस
5 सितंबर: डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन (भारत के दूसरे राष्ट्रपति और शिक्षक दिवस)
5 सितंबर: वयोवृद्ध गायक फ्रेडी मर्करी
5 सितंबर (1997): नोबेल शांति पुरस्कार विजेता और भारत रत्न से सम्मानित समाजसेविका मदर टेरेसा का निधन हुआ था।
5 सितंबर (2012): प्रसिद्ध हिंदी व्यंग्यकार और लेखक शरद जोशी की पुण्यतिथि।
5 सितंबर: अंतर्राष्ट्रीय दान दिवस
7 सितंबर: नीले आसमान के लिए स्वच्छ वायु का अंतर्राष्ट्रीय दिवस
8 सितंबर: अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस
8 सितंबर: सुरेश गोयल प्रसिद्ध बैडमिंटन खिलाड़ी / आशा भोसले प्रसिद्ध गायिका - 8 सितंबर 1933
8 सितंबर: अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस
10 सितंबर: विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस
11 सितंबर (1921) - महान तमिल कवि और स्वतंत्रता सेनानी सुब्रह्मण्य भारती का निधन।
11 सितंबर (1987) - हिंदी साहित्य की प्रसिद्ध छायावादी कवयित्री महादेवी वर्मा की पुण्यतिथि।
14 सितंबर: हिंदी दिवस
15 सितंबर: अभियंता दिवस (इंजीनियर दिवस - एम. विश्वेश्वरैया की जयंती)
15 सितंबर: अंतर्राष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस
16 सितंबर: विश्व ओजोन दिवस (ओजोन परत संरक्षण दिवस)
17 सितंबर: विश्व रोगी सुरक्षा दिवस
17 सितंबर:जन्म दिवस नरेंद्र मोदी (भारत के प्रधानमंत्री) / ई.वी. रामसामी 'पेरियार’ जन्म दिवस
21 सितंबर: अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस (विश्व शांति दिवस)
22 सितंबर (2011)भारतीय क्रिकेटर,पटौदी के नवाब मंसूर अली खान पटौदी का निधन हुआ था।
23 सितंबर: सांकेतिक भाषा का अंतर्राष्ट्रीय दिवस
25 सितंबर: अंत्योदय दिवस (पंडित दीनदयाल उपाध्याय जयंती)
27 सितंबर: विश्व पर्यटन दिवस
27 सितंबर (1833)'ब्रह्म समाज के संस्थापक राजा राममोहन राय का निधन ब्रिस्टल,इंग्लैंड मेंहुआ था।
28 सितंबर: सार्वभौमिक पहुँच के लिए सूचना का अंतर्राष्ट्रीय दिवस
28 सितंबर: भगत सिंह (महान स्वतंत्रता सेनानी व क्रांतिकारी)
29 सितंबर: लता मंगेशकर (भारत रत्न स्वर कोकिला - 29 सितंबर 1929)
29 सितंबर: विश्व हृदय दिवस
30 सितंबर (1990): बहुमुखी प्रतिभा के धनी कन्नड़ अभिनेता, निर्देशक और लेखक शंकर नाग की पुण्यतिथि।
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