कर्मयोग
“कर्मयोग”
श्रीमद्भागवद्गीता का तीसरा अध्याय 'कर्मयोग' कहलाता है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण ने निष्काम कर्म (बिना फल की इच्छा के अपने कर्तव्यों का पालन) करने के महत्व को समझाया है। कर्मयोग का अर्थ है की अपने कर्तव्य कर्म को पूरी कुशलता, बिना किसी फल की इच्छा और बिना किसी आसक्ति के करना। तीसरे अध्याय मे 43 श्लोक है ।
अर्जुन पूछते हैं कि यदि ज्ञान कर्म से श्रेष्ठ है, तो आप मुझे इस भयानक युद्ध जैसे कर्म में क्यों लगा रहे हैं? श्रीकृष्ण समझाते हैं कि कोई भी मनुष्य एक पल भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता। प्रकृति के गुण सभी से कर्म करवाते हैं। फल की कामना छोड़कर अपने कर्तव्य का पालन करना ही असली कर्मयोग है। संसार को चलाने के लिए यज्ञ करना यानि की कर्तव्य-भाव से किया गया कार्य करना जरूरी है। विद्वान व समाज के प्रमुख लोगों को समाज के सामने अच्छा उदाहरण पेश करने के लिए कर्म करना चाहिए, ताकि आम लोग उनका अनुसरण कर अपने जीवन को सफल बना सकें। राजा जनक व उन जैसे ज्ञानी पुरुषों ने भी कर्म करते हुए ही जीवन बिताया। भगवान् भी अवतार काल में सदा कर्तव्य-कर्म में लगे रहते हैं, इसलिये जो साधक फलेच्छा व आसक्ति रहित होकर सदा कर्तव्य-कर्म में लगा रहता है, वह सुगमता पूर्वक भगवान् को प्राप्त हो जाता है। अर्जुन ने भगवान कृष्ण से पूछा कि मनुष्य न चाहते हुए भी वह पाप क्यों करता है, श्रीकृष्ण कहते हैं कि मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु काम,इच्छा और क्रोध है, जो राजोगुण से उत्पन्न होते हैं। काम को, ज्ञान और इंद्रियों पर संयम रखकर ही हराया जा सकता है। श्रीमद्भागवद्गीता के तीसरे अध्याय में श्रीकृष्ण द्वारा निष्काम कर्मयोग का मार्ग बताया गया है, जो कर्म से भागने के बजाय सही दृष्टिकोण के साथ कर्तव्य पालन पर जोर देता है।
श्रीमद्भागवद्गीता के तीसरे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने इस मार्ग को संसार में रहने वाले हर व्यक्ति के लिए सबसे सरल और श्रेष्ठ बताया है। कर्म करो लेकिन उसके परिणाम (फल) से मोह मत रखो। फल की चिंता मानसिक तनाव पैदा करती है और काम की गुणवत्ता को खराब करती है। कोई भी व्यक्ति एक क्षण के लिए भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता। सांस लेना, सोचना और बैठना भी एक कर्म है। इसलिए कर्म से भागना कायरता है। अपने स्वभाव और समाज में अपनी स्थिति के अनुसार जो आपका कर्तव्य है, उसे पूरी ईमानदारी से निभाएं। दूसरों के कर्तव्य की नकल करने से बेहतर है अपना काम करना। अपने हर कार्य को एक पूजा या सेवा समझकर समाज और ईश्वर को समर्पित कर दें। जब अहंकार समाप्त हो जाता है, तो कर्म बंधन नहीं बनता। समाज के श्रेष्ठ और समझदार लोगों को हमेशा कर्म करते रहना चाहिए ताकि वे दूसरों के लिए एक सही उदाहरण और प्रेरणा बन सकें। जब आप केवल अपनी मेहनत पर ध्यान देते हैं और नतीजे को स्वीकार करने के लिए तैयार रहते हैं, तो परीक्षा या काम का डर खत्म हो जाता है। श्रीकृष्ण कहते हैं, "योगः कर्मसु कौशलम्" अर्थात् कर्मों में कुशलता ही योग है। ध्यान जब फल पर नहीं बल्कि पूरी तरह काम पर होता है, तो काम सबसे बेहतरीन होता है। यह मार्ग आपको अपनी असफलताओं में टूटने नहीं देता और सफलताओं में अहंकारी नहीं होने देता।
जो कर्म अपने लिये किये जाते हैं, उन कर्मों से मनुष्य बँध जाता है। अतः हमे ये तीन बातें स्वीकार कर लेनी चाहिये की शरीरसहित कुछ भी मेरा नहीं है,मुझे कुछ भी नहीं चाहिये, और मुझे अपने लिये कुछ भी नहीं करना है। पहली बात स्वीकार करने से दूसरी बात सुगम हो जायगी और दूसरी बात स्वीकार करने से तीसरी बात सुगम हो जायगी।
अपने कर्तव्य का पालन करने से अर्थात् दूसरों के लिये निष्काम भाव से कर्म करने से अपना तथा प्राणि मात्र का हित होता है। परन्तु अपने कर्तव्य का पालन न करने से अपना तथा प्राणि मात्र का अहित होता है। कारण कि शरीरों की दृष्टि से तथा आत्मा की दृष्टि से भी मात्र प्राणी एक हैं, अलग-अलग नहीं।
मनुष्य शरीर केवल कल्याण-प्राप्तिके लिये ही मिला है। अतः अपना कल्याण करने के लिये कोई नया काम करना आवश्यक नहीं है, प्रत्युत जो काम करते हैं, उसे ही फलेच्छा और आसक्ति का त्याग करके दूसरों के हित के लिये करने से हमारा कल्याण हो जायगा।
अगर मनुष्य लोक मर्यादा तथा शास्त्र-मर्यादा के अनुसार अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता, उसे संसार में जीने का अधिकार नहीं है। कारण कि मनुष्यों के द्वारा अपने कर्तव्य का पालन न करने से संसार मात्र को हानि पहुँचती है। वर्तमान में जो अन्न, जल, वायु आदि प्रदूषित हो रहे हैं, अकाल, अनावृष्टि आदि प्राकृतिक आपदाएँ आ रही हैं, उसमें मनुष्य का कर्तव्य-च्युत होना ही प्रधान कारण है।
अपने लिये कर्म करना अनधिकृत चेष्टा है। कारण कि जो कुछ मिला है, वह सब संसार की सामग्री है। शरीरादि सब पदार्थ संसार के ही हैं, अपने नहीं। अतः हमपर संसार का ऋण है; जिसे उतारने के लिये हमें सब कर्म संसार के हित के लिये ही करने हैं।
व्यक्ति अपने कर्मों से नहीं बँधता, प्रत्युत आसक्ति से बँधता है ओर आसक्ति ही मनुष्य का पतन करती है, कर्म नहीं। आसक्ति-रहित होकर दूसरों के हित के लिये कर्म करने से मनुष्य संसार-बन्धन से मुक्त होकर परमात्म तत्त्व को प्राप्त हो जाता है। कर्म में परिश्रम और कर्म-योग में विश्राम है। शरीर की आवश्यकता परिश्रम में है, विश्राम में नहीं। कर्मयोग में शरीर से होने वाला परिश्रम (कर्म) दूसरों की सेवा के लिये और विश्राम (योग) अपने लिये है।
अब जैसा मैं चाहूँ, वैसा हो जाय - यह 'काम' अर्थात् कामना है। किसी भी क्रिया, वस्तु और व्यक्ति का अच्छा लगना अथवा उससे कुछ भी सुख चाहना 'काम' है। इस काम रूप एक दोष में अनन्त दोष, अनन्त पाप भरे हुए हैं! अतः जब तक मनुष्य के भीतर काम है, तब तक वह सर्वथा निर्दोष, निष्पाप नहीं हो सकता। कामना के सिवाय पापों का अन्य कोई कारण नहीं है। तात्पर्य है कि मनुष्य से न तो ईश्वर पाप कराता है, न भाग्य पाप कराता है, न समय पाप कराता है, न परिस्थिति पाप कराती है, न कलियुग पाप कराता है, प्रत्युत मनुष्य स्वयं ही कामना के वशीभूत होकर पाप करता है। मोहित करती है।
काम पाँच स्थानों में दीखता है, विषयों में,इन्द्रियोंमें,मनमें,बुद्धि में औरअहम् (जड़-चेतनके तादात्म्य) में । इन पाँच स्थानों में दीखने के कारण ये पाँचों काम के वासस्थान कहे गये हैं। मूल में काम 'अहम्' में ही रहता है।
यह सिद्धान्त है कि पदार्थ और क्रिया से अलग होने पर ही संसार का ज्ञान होता है और परमात्मा से एक होने पर ही परमात्मा का ज्ञान होता है। कारण यह है कि वास्तव में हम संसार से अलग और परमात्मा से एक हैं। तत्त्वज्ञ महापुरुष गुण-विभाग (पदार्थ) और कर्म-विभाग (क्रिया) से सर्वथा अलग होने पर यह जान लेता है कि सम्पूर्ण गुण ही गुणों में बरत रहे हैं। तात्पर्य है कि सम्पूर्ण क्रियाएँ संसार में ही हो रही हैं। स्वरूप में कभी कोई क्रिया नहीं होती।
निष्कर्ष मे हम कह सकते है की कर्मयोग नामक यह अध्याय स्पष्ट करता है कि व्यक्ति कर्म से विमुख नहीं हो सकता, इसलिए उसे फल की चिंता किए बिना समाज कल्याण के लिए ओर ईश्वर को अपने कार्य समर्पित कर अपने कार्य करने चाहिए। काम और क्रोध को बुद्धि का सबसे बड़े शत्रु बताते हुए, तीसरा अध्याय मन पर नियंत्रण रखकर कर्तव्य पथ पर अडिग रहने की शिक्षा देता है।
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