नीरा आर्य
नीरा आर्य - स्वतंत्रता संग्राम की अनसुनी नायिका
सतीश शर्मा
नीरा आर्य भारत की पहली महिला जासूस और स्वतंत्रता संग्राम की अनसुनी नायिका थीं।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास वीरों और वीरांगनाओं की गौरवगाथाओं से भरा हुआ है, लेकिन कुछ नाम ऐसे हैं जो समय के अंधकार में कहीं गुम हो गए। उन्हीं में से एक नाम है – नीरा आर्य। भारत की पहली महिला जासूस, जिन्होंने आज़ादी की खातिर असाधारण साहस का परिचय दिया, अत्याचारों को झेला और अपनी जान की बाज़ी लगाकर भी अपने मिशन और कर्तव्य से डिगीं नहीं।इन्हें नीरा नागिनी के नाम से भी जाना जाता है।
नीरा आर्य का जन्म उत्तर प्रदेश के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। इनके जन्मदाता पिता महावीर सिंह जबकि इन्हें गोद लेने वाले धर्मपिता छज्जूराम लांबा थे। बचपन में माता-पिता के निधन के बाद उन्हें सेठ छज्जू राम लांबा और उनकी पत्नी ने गोद लिया था। इनके धर्मपिता सेठ छज्जूमल अपने समय के एक प्रतिष्ठित व्यापारी थे, जिनका व्यापार देशभर में फैला हुआ था। वे पढ़ी-लिखी, साहसी और राष्ट्रप्रेम से ओतप्रोत महिला थीं। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उनका संपर्क नेताजी सुभाष चंद्र बोस और इंडियन नेशनल आर्मी (INA) से हुआ। उन्होंने आज़ाद हिंद फौज की महिला विंग "रानी झांसी रेजिमेंट" में शामिल होकर जासूसी का कार्यभार संभाला।
नीरा की शादी एक ब्रिटिश समर्थक पुलिस अधिकारी से हुई थी, जिसे नेताजी सुभाष चंद्र बोस की गतिविधियों पर नजर रखने और उन्हें पकड़वाने की जिम्मेदारी दी गई थी। जब नीरा को यह पता चला कि उसका पति श्रीकांत जयरंजन दास नेताजी की जान लेने की साज़िश कर रहा है, तो उनके सामने कर्तव्य और निजी जीवन के बीच एक असंभव सी स्थिति आ गई।आजाद हिन्द फौज के समर्पण के बाद जब लाल किले में मुकदमा चला तो सभी बंदी सैनिकों को छोड़ दिया गया, लेकिन इन्हें पति की हत्या के आरोप में काले पानी की सजा हुई थी, जहां इन्हें घोर यातनाएं दी गई।
देशप्रेम ने उनके निर्णय को स्पष्ट किया — नीरा ने अपने पति की हत्या कर दी ताकि नेताजी की जान बचाई जा सके। यह कदम आज़ादी के प्रति उनके समर्पण और दृढ़ निश्चय का प्रतीक है।
पति की हत्या के बाद नीरा को गिरफ्तार कर लिया गया। जेल में उनके साथ अमानवीय अत्याचार किए गए। इतिहास के पन्नों में दर्ज एक हृदय विदारक विवरण के अनुसार, अंग्रेज़ जेलरों ने उनसे नेताजी और आज़ाद हिंद फौज के बारे में जानकारी पाने के लिए उनके दोनों स्तनों को काट डाला। नीरा ने अपनी एक आत्मकथा भी लिखी है,
‘‘मैं जब कोलकाता जेल से अंडमान पहुंची, तो हमारे रहने का स्थान वे ही कोठरियाँ थीं, जिनमें अन्य महिला राजनैतिक अपराधी रही थी अथवा रहती थी।
हमें रात के 10 बजे कोठरियों में बंद कर दिया गया और चटाई, कंबल आदि का नाम भी नहीं सुनाई पड़ा। मन में चिंता होती थी कि इस गहरे समुद्र में अज्ञात द्वीप में रहते स्वतंत्रता कैसे मिलेगी, जहाँ अभी तो ओढ़ने बिछाने का ध्यान छोड़ने की आवश्यकता आ पड़ी है?जैसे-तैसे जमीन पर ही लोट लगाई और नींद भी आ गई। लगभग 12 बजे एक पहरेदार दो कम्बल लेकर आया और बिना बोले-चाले ही ऊपर फेंककर चला गया। कंबलों का गिरना और नींद का टूटना भी एक साथ ही हुआ। बुरा तो लगा, परंतु कंबलों को पाकर संतोष भी आ ही गया।।अब केवल वही एक लोहे के बंधन का कष्ट और रह-रहकर भारत माता से जुदा होने का ध्यान साथ में था।
‘‘सूर्य निकलते ही मुझको खिचड़ी मिली और लुहार भी आ गया। हाथ की सांकल काटते समय थोड़ा-सा चमड़ा भी काटा, परंतु पैरों में से आड़ी बेड़ी काटते समय, केवल दो-तीन बार हथौड़ी से पैरों की हड्डी को जाँचा कि कितनी पुष्ट है।।मैंने एक बार दुःखी होकर कहा, ‘‘क्या अंधा है, जो पैर में मारता है?’’‘‘पैर क्या हम तो दिल में भी मार देंगे, क्या कर लोगी?’’
उसने मुझे कहा था।‘‘बंधन में हूँ तुम्हारे कर भी क्या सकती हूँ…’’ फिर मैंने उनके ऊपर थूक दिया था, ‘‘औरतों की इज्जत करना सीखो?’’
जेलर भी साथ थे, तो उसने कड़क आवाज में कहा, ‘‘तुम्हें छोड़ दिया जाएगा,यदि तुम बता दोगी कि तुम्हारे नेताजी सुभाष कहाँ हैं?’’
‘‘वे तो हवाई दुर्घटना में चल बसे,’’ मैंने जवाब दिया, ‘‘सारी दुनिया जानती है।’’
‘‘नेताजी जिंदा हैं….झूठ बोलती हो तुम कि वे हवाई दुर्घटना में मर गए?’’ जेलर ने कहा।
‘‘हाँ नेताजी जिंदा हैं।’’
‘तो कहाँ हैं…।’’
‘‘मेरे दिल में जिंदा हैं वे।’’
जैसे ही मैंने कहा तो जेलर को गुस्सा आ गया था और बोले, ‘‘तो तुम्हारे दिल से हम नेताजी को निकाल देंगे।’’ और फिर उन्होंने मेरे आँचल पर ही हाथ डाल दिया और मेरी आँगी को फाड़ते हुए फिर लुहार की ओर संकेत किया…लुहार ने एक बड़ा सा जंबूड़ औजार जैसा फुलवारी में इधर-उधर बढ़ी हुई पत्तियाँ काटने के काम आता है, उस ब्रेस्ट रिपर को उठा लिया और मेरे दाएँ स्तन को उसमें दबाकर काटने चला था…लेकिन उसमें धार नहीं थी, ठूँठा था और उरोजों (स्तनों) को दबाकर असहनीय पीड़ा देते हुए दूसरी तरफ से जेलर ने मेरी गर्दन पकड़ते हुए कहा, ‘‘अगर फिर जबान लड़ाई तो तुम्हारे ये छाती से अलग कर दिए जाएँगे…’’उसने फिर चिमटानुमा हथियार मेरी नाक पर मारते हुए कहा, ‘‘शुक्र मानो महारानी विक्टोरिया का कि इसे आग से नहीं तपाया, आग से तपाया होता तो तुम्हारे दोनों स्तन पूरी तरह उखड़ जाते।’’ सलाम हैं ऐसे देश भक्त को। आजादी के बाद इन्होंने फूल बेचकर जीवन यापन किया, लेकिन कोई भी सरकारी सहायता या पेंशन स्वीकार नहीं की।।
उनके इस बलिदान ने यह साबित कर दिया कि भारतीय महिलाएं भी स्वतंत्रता की लड़ाई में किसी से कम नहीं थीं, और जब बात देश की हो, तो वे अपने प्राण तक न्यौछावर करने को तैयार होती हैं।
नीरा आर्य स्वतंत्रता के बाद गुमनामी में जीती रहीं। उन्होंने अपना शेष जीवन साध्वी के रूप में बिताया। ना कोई सम्मान, ना सरकारी मदद, ना समाज की कृतज्ञता — उनके बलिदान को इतिहास की धूल में दबा दिया गया।
कहा जाता है कि नीरा आर्य ने अपने अंतिम दिन गुमनामी में बिताए। वह फूल बेचकर अपना गुजारा करती थीं, एक झोपड़ी में रहती थीं और गरीबी में ही उनकी मृत्यु हुई । वह हैदराबाद के फलकनुमा में बस गईं और फूल बेचकर अपना जीवन यापन करती थीं। वह वहां एक छोटी सी झोपड़ी में रहती थीं।वृद्धावस्था में बीमारी की हालत में चार मीनार के पास उस्मानिया अस्पताल में इन्होंने रविवार 26 जुलाई, 1998 में एक गरीब, असहाय, निराश्रित, बीमार वृद्धा के रूप में मौत का आलिंगन कर लिया।
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