जानकारी काल मासिक अगस्त - 2026
जानकारी काल
वर्ष-27 अंक - 03 अगस्त - 2026 पृष्ठ 41 www.sumansangamaashray.com
ॐ नमः शिवाय नमस्ते रुद्र मन्यव उतोत इषवे नमः।
नमस्ते अस्तु धन्वने बाहुभ्यामुत ते नमः॥
हे रुद्र! आपके क्रोध और आपके बाणों को नमस्कार है। आपके धनुष और आपकी भुजाओं को भी बारम्बार नमस्कार है।
अपनों से अपनी बात
भारत 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ आजाद होने के बाद हमने अपना संविधान बनाया और संविधान की प्रस्तावना में कैसा भारत होगा उसकी रूपरेखा उसमें दी। आजाद भारत के सभी नागरिकों को मौलिक अधिकार दिए गए लेकिन एक चूक हो गई की कर्तव्यों का उल्लेख नहीं किया गया हालांकि राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के द्वारा कर्तव्यों को निर्देशित करने का काम किया गया है लेकिन वह कानून की शक्ल नहीं ले सके । स्वतंत्रता के साथ कर्तव्य का होना जरूरी है इसलिए महर्षि अरविंद ने कहा था आजादी अभी अधूरी है बिना कर्तव्यों के आजादी का कोई अर्थ नहीं होता । आजादी के बाद भारत निरंतर विकास की और प्रगतिशील हो रहा है । 2014 के बाद नरेंद्र मोदी जी के दृष्टिकोण व “सबका साथ सबका विकास” के कारण आज भारत की अर्थव्यवस्था एक विकसित देश के अर्थव्यवस्था के रूप में बदलती जा रही है । भारत अब रक्षा उत्पादों में स्वलम्बी हो रहा है । सेमीकंडक्टर जिसका इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग में बहुत बड़ा स्थान है अब सेमीकंडक्टर भी भारत में बना करेंगे, इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन भारत सरकार की एक प्रमुख तकनीकी पहल है। ₹76,000 करोड़ ($10 बिलियन) के शुरुआती निवेश के साथ 2021 में शुरू किए गए इस मिशन का लक्ष्य देश को इलेक्ट्रॉनिक विनिर्माण का वैश्विक केंद्र बनाना और विदेशी चिप्स पर निर्भरता खत्म करना है । उज्ज्वला योजना जैसी अनेकों योजना है,भारत सरकार द्वारा नागरिकों के कल्याण के लिए 4,500 से अधिक विभिन्न प्रकार की केंद्र और राज्य-स्तरीय योजनाएं चलाई जा रही हैं। इनमें से प्रमुख योजनाओं को तीन श्रेणियों- केंद्रीय क्षेत्र (पूरी तरह केंद्र सरकार द्वारा वित्तपोषित), केंद्र प्रायोजित (केंद्र और राज्य द्वारा साझा) और 'कोर ऑफ द कोर' योजनाओं में बांटा गया है। प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी योजनाएं चलाती है। इसके तहत ईडब्ल्यूएस और मध्यम आय वर्ग के लोगों को अपनी जमीन पर घर बनाने के लिए आर्थिक सहायता और घर निर्माण बजट पर सब्सिडी दी जाती है। महिला समृद्धि योजना, पति की मृत्युपरान्त निराश्रित महिला पेंशन योजना, लाडली बहना योजना, सुकन्या समृद्धि योजना, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना जननी सुरक्षा योजना,प्रधानमंत्री मुद्रा योजना,स्टैंड अप इंडिया,वन स्टॉप सेंटर (सखी केंद्र),प्रधान मंत्री जन आरोग्य योजना, जननी सुरक्षा योजना व आयुष्मान भारत योजना। सरकार युवाओं को अपना व्यवसाय शुरू करने के लिए मुख्यमंत्री युवा स्वरोजगार योजना के तहत आर्थिक सहायता देती है। उद्योग के लिए ₹25 लाख और सेवा क्षेत्र के लिए ₹10 लाख तक का लोन मिलता है, जिसमें 25% सब्सिडी (अनुदान) शामिल है ।
युवाओं में घटती मानसिक सहनशीलता
सतीश शर्मा
युवाओं में घटती मानसिक सहनशीलता आज के समय की एक गंभीर चुनौती बन गई है। बदलते लाइफस्टाइल, डिजिटल दबाव और अत्यधिक प्रतिस्पर्धा के कारण युवाओं की तनाव झेलने की क्षमता प्रभावित हो रही है। मानसिक तनाव किसी विशेष परिस्थिति या घटना के कारण शरीर पर पड़ने वाले दबाव की प्रतिक्रिया है। यह घटना कोई भी हो सकती है - शारीरिक, मानसिक या भावनात्मक प्रतिक्रिया।
जब कोई व्यक्ति तनाव का अनुभव करता है, तो उसमें शारीरिक और मानसिक प्रतिक्रिया विकसित होती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि शरीर को इसे अनुभव करने और उस पर प्रतिक्रिया करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। कोई भी तनाव प्रतिक्रिया शरीर को नए वातावरण में ढलने में मदद करती है। यह हमें सतर्क, प्रेरित और खतरे से बचने के लिए तैयार रखकर सकारात्मक करती है। लेकिन यह जानना महत्वपूर्ण है कि तनाव तब एक समस्या बन जाता है जब तनाव के कारण राहत या आराम के बिना भी हम काम करना जारी रखते हैं। तनाव शैक्षणिक परीक्षाओं, पारस्परिक संबंधों, रिश्तों की समस्याओं, जीवन में बदलाव और करियर की खोज से उत्पन्न होता है। इस तरह के तनाव से आमतौर पर मनोवैज्ञानिक, शारीरिक और व्यवहार संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। जब कोई चुनौतीपूर्ण परिस्थिति आती है, तो मस्तिष्क 'लड़ो या भागो' प्रतिक्रिया शुरू करता है। इससे हाइपोथैलेमस कोर्टिसोल और एड्रेनालाईन जैसे हार्मोन छोड़ता है, जो शरीर को खतरे से निपटने के लिए तैयार करते हैं। लगातार बने रहने पर, यह शारीरिक और मानसिक थकान का कारण बनता है ओर जब वह
तनाव नहीं सह पाता तो वह नशा करता या आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाता है।
भारत में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की 'एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड्स इन इंडिया' रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में कुल 1,70,746 लोगों ने आत्महत्या की और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं को लगभग 17.9% मौतों का प्रमुख कारण बताया गया। आत्महत्या के पीछे कई बहुआयामी कारण होते हैं जिनमें पारिवारिक समस्याएं (33.5%), बीमारियां (17.9%), और नशा (7.6%) शामिल हैं। तनाव कई मामलों में एक छिपे हुए कारक के रूप में काम करता है और अवसाद का रूप ले लेता है।
राहुल दिल्ली की एक बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करता था। बाहर से देखने पर उसकी जिंदगी परफेक्ट थी। अच्छा पैकेज, आलीशान फ्लैट और हाथ में लेटेस्ट स्मार्टफोन लेकिन इस चमक-दमक के पीछे एक कड़वा सच छिपा था पर राहुल पिछले कई महीनों से भयंकर मानसिक तनाव से गुजर रहा था। उसके दिन की शुरुआत ऑफिस के पेंडिंग काम की चिंता से होती और रात स्क्रीन स्क्रॉल करते हुए बीतती राहुल का जीवन बिखरा हुआ था व तनाव ने राहुल के शरीर और मन पर कब्जा कर लिया था, वह रात भर करवटें बदलता रहता। उसे छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आ जाता था,राहुल ने दोस्तों के फोन उठाने बंद कर दिए थे। काम की आधिकता के कारण वह कभी दिन मे खाना भी छोड़ देता था । राहुल का काम भी ऐसा था की उसे ऑफिस में हर वक्त उपलब्ध रहना पढ़ता था इस दवाब के कारण वह अंदर से खोखला होता चला गया ओर अंत मे राहुल को लगने लगा कि वह दुनिया की रेस में अकेला पढ़ गया है।
एक बार ऑफिस की एक बड़ी प्रेजेंटेशन के दौरान राहुल के हाथ कांपने लगे। उसका दम घुटने लगा और दिल की धड़कनें तेज हो गईं। उसे पैनिक अटैक आया था। उसे तुरंत ऑफिस के मेडिकल रूम में ले जाया गया। डॉक्टर ने राहुल से सिर्फ एक बात कही, " राहुल तुम्हारा शरीर ठीक है, लेकिन तुम मानसिक रूप से थक चुके हो, तुम्हें आराम की जरूरत है।"
उस दिन राहुल को समझ आ गया कि सफलता की कीमत मानसिक शांति को दांव पर लगाकर नहीं चुकाई जा सकती। राहुल ने थेरेपिस्ट से मिलकर अपनी समस्या बतायी तो थेरेपिस्ट उसे कुछ सुझाव दिये की वह रात 9 बजे के बाद अपना फोन बंद कर दे,वर्क-आवर के बाद ऑफिस के काम ना करे, राहुल ने सुबह प्राणायाम,आसन व घूमना शुरू किया। उसका परिणाम दिखा राहुल को आज भी काम का प्रेशर मिलता पर अब वह तनाव को खुद पर हावी नहीं होने देता। राहुल जान गया है कि जिंदगी में 'ना' कहना और खुद की मानसिक सेहत का ख्याल रखना कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी समझदारी है क्योंकि वह गया था की “जान है तो जहान है” ।
ये सिर्फ राहुल की कहनी नहीं है ये आज के हर युवा की दास्तान है । इसी विषय पर नागपुर में 'समर्पण' माइंड वेलनेस सेंटर के उद्घाटन के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने युवाओं में घटती मानसिक सहनशीलता और संवेदनशीलता पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका कहना था कि पारंपरिक पारिवारिक मार्गदर्शन की कमी और अत्यधिक स्क्रीन टाइम के
कारण आज की युवा पीढ़ी मानसिक रूप से कमजोर हो रही है। ये समस्या दिन प्रति दिन गंभीर होती जा रही है ।
उन्होंने कहा कि संयुक्त परिवारों के टूटने और बड़ों (दादी-नानी) द्वारा कहानियों के माध्यम से दिए जाने वाले संस्कारों के अभाव से युवा अकेलेपन का शिकार हो रहे हैं। माता-पिता बच्चों के रोने पर उन्हें मोबाइल थमा देते हैं, जिससे वे 'गूगल बाबा' के भरोसे पलते हैं और वास्तविक संवाद से वंचित रह जाते हैं। उन्होंने चिंता जताई कि 12वीं में फेल होने या घर में डांट पड़ने जैसी छोटी घटनाओं पर भी युवा आत्महत्या जैसे घातक कदम उठा रहे हैं। भागवत जी के अनुसार, युवा मन की घटती क्षमता केवल बच्चे की गलती नहीं, बल्कि परिवार और समाज की सामूहिक विफलता है।
युवाओं में कम उम्र से ही स्मार्टफोन का उपयोग और सोशल मीडिया पर 'परफेक्ट' जीवन की अवास्तविक तुलना उनके मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा रही है। चोट, बीमारी, या अचानक सदमा लगना। कार्यस्थल पर काम का बोझ, डेडलाइन, या परीक्षा का डर। पैसों की तंगी, रिश्तों में अनबन, या किसी प्रियजन को खोना। इससे वे छोटी-छोटी असफलताओं को पचा नहीं पाते। बढ़ता परीक्षाओं में अंकों की होड़ और भविष्य की अनिश्चितता ने युवाओं को निरंतर दबाव में रखा है। खराब खान-पान और व्यायाम न करने से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के बीच का संतुलन बिगड़ रहा है। आधुनिक जीवनशैली में संवाद की कमी और पारिवारिक समर्थन के कमजोर होने से युवा भावनात्मक रूप से अकेले पड़ जाते हैं।
सहनशीलता और मानसिक क्षमता बढ़ाने के लिए स्क्रीन टाइम सीमित करें और सोशल मीडिया पर दूसरों की जिंदगी से अपनी तुलना करने से बचें। प्राणायाम और नियमित व्यायाम मानसिक शांति देते हैं और भावनाओं को नियंत्रित करने में मदद करते हैं। अपनी भावनाओं को परिवार या दोस्तों के साथ साझा करें। किसी भी प्रकार के मानसिक तनाव में पेशेवर काउंसलर या थेरेपिस्ट की मदद लेने में संकोच न करें। युवाओं को यह समझना चाहिए कि असफलता जीवन का अंत नहीं, बल्कि सीखने की एक प्रक्रिया है। तनाव कम करने के लिए गहरी सांस लें, 10 मिनट तक मेडिटेशन करें या सैर पर जाएं। खुद को शांत करने के लिए ठंडे पानी से कलाई धोएं, अपनी भावनाओं को डायरी में लिखें और किसी करीबी से बात करें। जब भी तनाव महसूस हो, कुछ मिनटों के लिए धीमी और गहरी सांस लें। यह शरीर के नर्वस सिस्टम को शांत करता है । नियमित शारीरिक गतिविधि जैसे टहलना, योग या कोई भी व्यायाम करने से शरीर में खुशी देने वाले हार्मोन का स्तर बढ़ता है । अपने किसी दोस्त या परिवार के सदस्य से अपनी परेशानी साझा करें। कई बार किसी के साथ बात करने से ही मन का बोझ हल्का हो जाता है सोने से पहले मोबाइल और टीवी जैसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से दूर रहें ताकि रात को अच्छी नींद आ सके ।
आधुनिक मनोविज्ञान के साथ-साथ भारतीय ज्ञान परंपरा (जैसे पतंजलि योग सूत्र) को अपनाने पर विशेष जोर दिया जाना चाहिए । “मोबाइल नहीं, बातचीत से बनेगा मजबूत मन । भारत में मानसिक
चिकित्सा और उसके अध्ययन की समृद्ध परंपरा रही है, जिसका अध्ययन किया जाना चाहिए। हमे अपने पुराणों को पढ़ना चाहिए उनमे ऐसी अनेक कहानियां है जो हमे प्रेरणा देती है ।
ओर अंत मे संतुलित आहार लें, पर्याप्त नींद लें और नियमित रूप से व्यायाम करें। स्वयं को आराम देने के लिए कुछ अभ्यास करें। तनाव कम करने के लिए मांसपेशियों को आराम देने वाले व्यायाम करें। प्रकृति के साथ समय बिताएं । "तनाव हमें नहीं मारता, बल्कि तनाव के प्रति हमारी प्रतिक्रिया हमें मार डालती है।”
(लेखक केशव भाग संघचालक नोएडा महानगर।)
सूर्य ग्रह - सूर्य को आत्मा, मान-सम्मान, राजा, उच्च पद, सरकारी सेवा, लीडरशिप आदि का कारक माना जाता है | सूर्य ग्रह, सिंह राशि का देवता है,सूर्य का रत्न माणिक्य | सूर्य ग्रह का रंग लाल,नारंगी |
सूर्य ग्रह के मजबूत होने के लक्षण - मान-सम्मान, सुख-समृद्धि प्राप्त होती है।पिता का सहयोग और प्रेम प्राप्त होता है।नेतृत्व क्षमता और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।सरकारी नौकरी में सफलता मिलती है।
सूर्य ग्रह के कमजोर होने के लक्षण - पिता से संबंध खराब होते हैं।नौकरी में परेशानी और झूठे आरोप लगते हैं।हृदय, आंखों और हड्डियों से संबंधित बीमारियां हो सकती हैं।अहंकार और आत्मविश्वास की कमी होती है।
सूर्य ग्रह की नकारात्मक दशा से जुड़ीं बीमारियां - सिर व मस्तिष्क, हृदय, नेत्र, कान रोग और अस्थि भंग,अल्सर, फेफड़े और दिल की बीमारी,हड्डियों से जुड़ी समस्या |
सूर्य को मजबूत करने के उपाय - प्रतिदिन सूर्य नमस्कार करें,माणिक्य रत्न धारण करें,पीले रंग के वस्त्र पहनें और पीले रंग के खाद्य पदार्थों का सेवन करें,गरीबों को दान करें और सूर्य देव से संबंधित वस्तुओं का दान करें,नियमित रूप से आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें,रविवार का व्रत करें,प्रतिदिन सूर्य को जल अर्पित करें,रविवार को गाय को गेहूं की रोटियां खिलाएं,रविवार को बंदरों को गुड़-चना खिलाएं,तांबा, गेहूं और गुड़ का दान करें,भगवान विष्णु की उपासना करें,पूजा घर में गंगा जल और चांदी का टुकड़ा रखें |
जिनका सूर्य प्रबल होता है वे बहुत तेजस्वी सदगुणी विद्वान उदार स्वभाव दयालु, और मनोबल में आत्मबल से पूर्ण होते है। वे अपने कार्य स्वत: ही करता है किसी के भरोसे रह कर काम करना उन्हे नहीं आता है। वे सरकारी नौकरी और सरकारी कामकाज के प्रति समर्पित होता है। वह अपने को अल्प समय में ही कुशल प्रसाशक बनालेता है। सूर्य को एक प्रभावशाली ग्रह माना जाता है।
रोटी पेड़ पर नहीं उगती
कविता माथुर,हिंदी शिक्षिका एवं शिक्षा-चिंतक
रोटी पेड़ पर नहीं उगतीः क्या हम बच्चों को जीवन का सबसे जरूरी पाठ पढ़ाना भूल गए हैं?
"मिट्टी से नाता टूट रहा है, जीवन का आधार छूट रहा है। ज्ञान के ऊँचे महल खड़े हैं, पर रोटी का सच कहीं पीछे छूट रहा है।"
हाल ही में एक शैक्षिक कार्यशाला में भाग लेने का अवसर मिला। वहाँ बच्चों से एक सरल-सा प्रश्न पूछा गया-"हमारी थाली में भोजन कैसे पहुँचता है?" कुछ बच्चों ने सहजता से उत्तर दिया, "स्विगी और ज़ोमैटो से।" एक छोटे बच्चे ने तो यह भी कहा कि "रोटी पेड़ पर उगती है, हम उसे तोड़कर खा लेते हैं।"
यह उत्तर सुनकर मुस्कान अवश्य आती है, लेकिन साथ ही एक गंभीर चिंता भी जन्म लेती है। क्या हमारी नई पीढ़ी भोजन, कृषि और जीवन के मूलभूत आधारों से इतनी दूर हो चुकी है कि उसे रोटी की वास्तविक यात्रा का ज्ञान भी नहीं है?
आज का बच्चा मोबाइल ऐप चलाना जानता है, ऑनलाइन भोजन मँगाना जानता है, लेकिन यह नहीं जानता कि गेहूँ खेत में कैसे उगता है, किसान किन कठिनाइयों में अन्न पैदा करता है और कितने लोगों के सहयोग से भोजन हमारी थाली तक पहुँचता है। यह केवल जानकारी का अभाव नहीं, बल्कि जीवन से जुड़ी समझ का अभाव है।
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। हमारी थाली में रखा प्रत्येक निवाला अनेक लोगों के श्रम का परिणाम होता है। किसान, खेतिहर मजदूर, परिवहन कर्मी, दुकानदार, रसोइया और परिवार के सदस्य-सभी मिलकर भोजन की इस यात्रा को पूरा करते हैं। किंतु आधुनिक जीवनशैली और बदलती शिक्षा व्यवस्था ने बच्चों को इस वास्तविकता से दूर कर दिया है।
यहीं पर गृह विज्ञान का महत्व सामने आता है।
दुर्भाग्यवश, जिस गृह विज्ञान विषय को कभी जीवनोपयोगी शिक्षा का आधार माना जाता था, उसे धीरे-धीरे विद्यालयों में गौण बना दिया गया। आज अनेक विद्यालयों में यह विषय उपलब्ध ही नहीं है और जहाँ है भी, वहाँ इसे अक्सर केवल वैकल्पिक विषय के रूप में देखा जाता है। इससे भी अधिक दुखद यह है कि समाज में यह धारणा बन गई है कि गृह विज्ञान उन विद्यार्थियों का विषय है जो अन्य विषयों में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाते। यह धारणा न केवल भ्रामक है, बल्कि इस विषय की गरिमा और उपयोगिता दोनों के साथ अन्याय है।
वास्तव में गृह विज्ञान केवल भोजन बनाना नहीं सिखाता। यह पोषण, स्वास्थ्य, स्वच्छता, संसाधन प्रबंधन, बाल विकास, पारिवारिक जीवन, पर्यावरणीय जागरुकता और आत्मनिर्भरता की शिक्षा देता है। यह वह विषय है जो व्यक्ति को केवल रोजगार के लिए नहीं, बल्कि जीवन के लिए तैयार करता है।
आज हम बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञ बनाने के सपने दिखा रहे हैं। यह आवश्यक भी है। लेकिन एक प्रश्न हम सबको स्वयं से पूछना चाहिए-क्या हम अपने बच्चों को अन्न का महत्व भी समझा रहे हैं?
अधिकांश अभिभावक चाहते हैं कि उनके बच्चे प्रतिष्ठित व्यवसायों में जाएँ। परंतु कितने माता-पिता अपने बच्चों को कृषि, खाद्य उत्पादन या उससे जुड़े क्षेत्रों में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं? यदि आने वाली पीढ़ियाँ खेतों से दूर होती जाएँगी, तो अन्न उगाएगा कौन?
यह प्रश्न केवल किसानों का नहीं, पूरे समाज का है।
हम चाहे कितनी भी तकनीकी प्रगति कर लें, कितने भी आधुनिक उपकरण विकसित कर लें, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के कितने ही नए चमत्कार देख लें, लेकिन भोजन का कोई विकल्प नहीं खोज पाए हैं। मोबाइल ऐप भोजन पहुँचा सकते हैं, भोजन पैदा नहीं कर सकते।
यदि खेतों में अन्न नहीं उगेगा, तो अस्पतालों में डॉक्टर भी भूखे रहेंगे और उद्योगों में इंजीनियर भी। इसलिए कृषि, पोषण और जीवन कौशल को शिक्षा के केंद्र में स्थान मिलना चाहिए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि गृह विज्ञान को केवल एक वैकल्पिक विषय न मानकर जीवन कौशल आधारित शिक्षा के रूप में पुनः स्थापित किया जाए। प्राथमिक कक्षाओं से ही बच्चों को भोजन की यात्रा, पोषण, स्वच्छता, घरेलू प्रबंधन, कृषि और आत्मनिर्भरता से परिचित कराया जाना चाहिए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति भी अनुभवात्मक और जीवनोपयोगी शिक्षा पर बल देती है; ऐसे में गृह विज्ञान की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है।समाचार-पत्रों में गृह विज्ञान शिक्षकों की रिक्तियों लगातार कम होती
दिखाई देती हैं। यह केवल रोजगार का विषय नहीं है, बल्कि यह संकेत है कि कहीं न कहीं हम जीवन से जुड़े एक महत्वपूर्ण ज्ञान-विषय को उपेक्षित कर रहे हैं।
"जिसने मिट्टी का मान रखा, उसने जीवन का ज्ञान रखा। रोटी की कीमत जो समझ गया, उसने मानवता का सम्मान रखा।"
समय आ गया है कि हम अपने बच्चों को केवल करियर नहीं, जीवन भी सिखाएँ।
क्योंकि सच यही है-
रोटी पेड़ पर नहीं उगती,
और न ही किसी मोबाइल ऐप में बनती है।
वह किसान के पसीने, प्रकृति के आशीर्वाद और समाज के सामूहिक श्रम से हमारी थाली तक
पहुँचती है।
और शायद यही वह पाठ है जिसे हमारी शिक्षा व्यवस्था को फिर से बच्चों तक पहुँचाने की आवश्यकता है।
शान से सीनियर
कौन कहता है कि रिटायरमेंट के बाद जीवन में कोई सपना, कोई जुनून नहीं रह जाता? 65 साल के इंजीनियर रमेश गेरा ने रिटायरमेंट के बाद एक नए करियर की शुरुआत की; वो भी नोएडा में अपने घर से ही! रमेश बताते हैं, "2002 में मैं काम के सिलसिले में साउथ कोरिया गया था। वहाँ छह महीने में मैंने हाइड्रोपोनिक्स, माइक्रोग्रीन्स और इंडोर केसर खेती जैसी आधुनिक तकनीकों के बारे में सीखा। इन अनुभवों ने मुझे बहुत प्रभावित किया।" 2017 में रमेश ने अपने 100 वर्ग फुट के कमरे में केसर की खेती शुरू की। 6 लाख के निवेश से उन्होंने एक ऐसा सिस्टम तैयार किया, जिससे हर महीने उन्हें 3.5 लाख का मुनाफ़ा होता है!! केसर फार्मिंग में सफलता हासिल करने के बाद रमेश ने Akarshak Saffron Institute की स्थापना की, जहां वह 370 से ज्यादा लोगों को इंडोर केसर उगाने की ट्रेनिंग दे चुके हैं। उन्होंने इस सफलता को केवल अपने तक नहीं रखा, बल्कि औरों को भी दुनिया के इस सबसे महंगे मसाले की खेती करना सिखाते हैं। अगर आप रमेश से संपर्क करना चाहते हैं या इस बिज़नेस के बारे में और जानना चाहते हैं, तो उनके Youtube Channel 'Akarshak Saffron Instutute, Panchkula' से जुड़ सकते हैं।
भारत के लिए स्वतंत्रता का महत्व
सतीश शर्मा
स्वतंत्रता का अर्थ केवल किसी बाहरी शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि बिना किसी दबाव के अपने विचारों और कार्यों को स्वतंत्र रूप से व्यक्त करने की क्षमता है। स्वतंत्रता किसी भी जीवित प्राणी, समाज और राष्ट्र के जीवन का आधार स्तंभ है, जिसके बिना मानव का बौद्धिक, सामाजिक और आर्थिक विकास असंभव है। यह मनुष्य को गरिमापूर्ण जीवन जीने और अपने अधिकारों का सही उपयोग करने का अवसर देती है। अपनी इच्छा से जीवन जीने और करियर चुनने का अधिकार। बिना किसी डर के अपने विचार और राय प्रकट करना। देश के नागरिकों को अपनी सरकार चुनने का लोकतांत्रिक अधिकार। आत्मनिर्भर बनने और व्यापार या आजीविका चुनने की आजादी यही स्वतंत्रता का अर्थ है ।
भारत ने ब्रिटिश साम्राज्य के लगभग 200 वर्षों के क्रूर शासन के बाद 15 अगस्त 1947 को अपनी स्वतंत्रता प्राप्त की थी। हजारों स्वतंत्रता सेनानियों के कड़े संघर्ष और सर्वोच्च बलिदान के बाद हमें यह अमूल्य धरोहर मिली है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में स्वतंत्रता सेनानियों का योगदान अतुलनीय और सर्वोपरि है, जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर भारत को ब्रिटिश गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराया। उनके इस महान संघर्ष और बलिदान के बिना आधुनिक, स्वतंत्र और लोकतांत्रिक भारत की कल्पना करना भी असंभव था। इन वीरों ने देश के कोने-कोने में देशभक्ति की अलख जगाई और एक शक्तिशाली साम्राज्य के खिलाफ एकजुट होकर लड़ाई लड़ी।
भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, और सुखदेव जैसे युवाओं ने ब्रिटिश सरकार की जड़ों को हिलाने के लिए अपनी जान दांव पर लगा दी। महात्मा गांधी ने सत्य, अहिंसा, और सत्याग्रह को अपना हथियार
बनाकर पूरे देश को एक सूत्र में पिरोया और जन-आंदोलन खड़े किए। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने 'आजाद हिंद फौज' का गठन करके "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा" का नारा दिया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव बनाया। बाल गंगाधर तिलक और गोपाल कृष्ण गोखले जैसे नेताओं ने अपने विचारों और लेखों के माध्यम से जनता को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया। रानी लक्ष्मीबाई, बेगम हजरत महल, और सरोजिनी नायडू जैसी वीरांगनाओं ने साबित किया कि आजादी की लड़ाई में महिलाएं किसी से पीछे नहीं थीं।
1857 का विद्रोह स्वतंत्रता की पहली संगठित और बड़ी लड़ाई, जिसने ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी। 1920 मे महात्मा गांधी के नेत्रत्व मे देश के आम नागरिकों, छात्रों और किसानों ने असहयोग आंदोलन द्वारा ब्रिटिश सामानों और संस्थाओं का पूर्ण बहिष्कार किया। काकोरी ट्रेन एक्शन क्रांतिकारियों ने सरकारी खजाना लूटकर यह साबित किया कि वे संसाधनों के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। नमक सत्याग्रह (दांडी मार्च) द्वारा 1930 महात्मा गांधी, सरोजिनी नायडू आदि ने ब्रिटिश सरकार के नमक कानून के एकाधिकार को तोड़कर सविनय अवज्ञा की शुरुआत की। भारत छोड़ो आंदोलन 1942 में महात्मा गांधी ने "करो या मरो" के नारे के साथ अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर करने वाला अंतिम सबसे बड़ा जन-आंदोलन किया।
संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार पहले कांग्रेस में सक्रिय थे। उन्होंने 1921 के असहयोग आंदोलन और 1930 के जंगल सत्याग्रह में भाग लिया, जिसके लिए उन्हें जेल जाना पड़ा। संघ ने अपने स्वयंसेवकों को व्यक्तिगत स्तर पर स्वतंत्रता आंदोलनों (जैसे 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन) में भाग लेने की स्वतंत्रता दी थी। ब्रिटिश काल के दौरान संघ के कई पदाधिकारियों ने भूमिगत क्रांतिकारियों (जैसे राजगुरु) को छिपने के लिए सुरक्षित स्थान और सहायता प्रदान की। संघ का मानना था कि भारत की गुलामी का मुख्य कारण समाज का बिखराव था। युवाओं में चरित्र, अनुशासन और देशभक्ति जगाने पर ध्यान केंद्रित किया। संघ के स्वयंसेवकों ने 1954 में दादरा, नगर हवेली और गोवा मुक्ति संग्राम में पुर्तगालियों के खिलाफ अग्रिम भूमिका निभाई थी।
हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने केवल देश को भौगोलिक रूप से आजाद नहीं कराया, बल्कि हमें एक ऐसा स्वतंत्र वातावरण दिया जहाँ हम अपनी मर्जी से सांस ले सकें, पढ़ सकें और तरक्की कर सकें। आज हम जिस स्वतंत्र भारत में जी रहे हैं, वह उन्हीं के त्याग और बलिदान की नींव पर खड़ा है। भारतीय इतिहास में यह केवल एक तारीख नहीं, बल्कि देश के गौरव और संप्रभुता का प्रतीक है। स्वतंत्रता कभी भी मनमानी करने का लाइसेंस नहीं होती। हमारी आजादी वहीं तक है, जहाँ से दूसरे की आजादी प्रभावित न हो। देश को प्रगति के पथ पर ले जाने के लिए जिम्मेदारी से काम करना होगा।
स्वतंत्रता को बनाए रखना उसे प्राप्त करने से भी अधिक चुनौतीपूर्ण कार्य है। एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में हमें देश की एकता, अखंडता और सामाजिक सद्भाव को मजबूत रखने का निरंतर प्रयास करना चाहिए।
बेटी हुई है
ललित शंकर हरिद्वार
श्रीनगर गढ़वाल में कीर्तिनगर ब्लॉक के मथेला गांव में एक परिवार में बेटी के जन्म पर जो किया वो पूरे देश के लिये एक प्रेरणायाक हैं।अस्पताल में बेटी के जन्म के बाद घर ले जाने के लिये जिस वाहन को लाया गया,उस वाहन को फूलों से,मालाओं से बड़े सुंदर तरीके से सजाया गया था।इससे अलग जो महत्वपूर्ण बात थी वो वाहन पर बड़े बड़े शब्दो मे लिखा था।बेटी हुई है।ये शब्द प्राचीन समय सुनने को मिलता है।कि बेटी हुई है।लेकिन सुनकर जो वातावरण पहले बनता था।एक दम शांत,गमगीन माहौल।जो सामाजिक व पारिवारिक रूप से बहुत खराब था।मथेला गांव के इस परिवार ने जिस प्रकार बेटी के जन्म को सार्वजनिक रूप से एक महोत्सव का रूप दिया वो पूरे देश के लिये प्रेरणादायक है।बेटी के दादा दादी ,माता पिता चाचा आदि सभी की खुशी का ठिकाना नही है।बच्ची के चाचा अंकित ने बताया कि हमारा पूरा परिवार चाहता था कि उनके परिवार में पहली संतान बेटी हो।ईश्वर ने उनकी इच्छा को सुन लिया।बच्ची का परिवार कह रहा है कि बेटी के बिना पूरा परिवार खाली सा लगता है।इन सभी ने बच्ची के नामकरण संस्कार को भी भव्य रूप से मनाने की घोषणा भी है।बेटी के जन्म को महोत्सव के रूप में मनाना कोई सामान्य बात नही है।पिछले समय मे बेटी होने पर खुशियां मनाना लगभग बन्द हो गया था,बेटी होने का मतलब था चिंता,निराशा।इसका मुख्य कारण समाज भी था।यत्र नारी पूज्यंते रमन्ते तत्र देवता,वाली परम्परा में दहेज के कारण नारी का अपमान व हत्याएं,बाल विवाह,बंदिशें,तीन तलाक,हलाला जैसे कुकृत्य जुड़ गए थे।अभी यूपी के नोयडा में दहेज को लेकर एक महिला को जिंदा जलाकर मार दिया।ऐसे ने श्रीनगर के मथेला गांव के इस परिवार ने बेटी हुई है
शब्द को एक प्रेरणादायक बना दिया।वाहन के पीछे बड़े बड़े शब्दो मे लिखा बेटी हुई है।मन को भावुक करने वाले शब्द बन गए हैं।इस परिवार से प्रेरणा लेकर सभी को ऐसी पहल करनी चाहिए।क्योंकि महिला के बिना व्यक्ति,परिवार, समाज,राष्ट्र व धर्म सभी अधूरा है।सभी रिश्ते नाते ,सम्बंध सब अधूरे हैं।इसीलिए भारतीय परंपरा में नारी को पूजनीय बताया गया है।नारी तू नारायणी।जन्म से लेकर मृत्यु तक परिवार व समाज के लिये अपने किरदार बदलकर दुसरो के लिये जीने वाली नारी का सम्मान करना अति आवश्यक है।बेटी बनकर,बहिन बनकर,पत्नी बनकर तो कभी माँ बनकर हर रिश्ते को संभालने के लिये अपनी स्वयं की पहचान बदलती रहती है।राम हो,कृष्ण हो,शिवाजी हो,राणा हो,महाराणा हो, सभी को महान बनाने के पीछे कंही न कंही नारी ही है।इसलिए भारतीय परम्परा में ईश्वर के नाम से पहले भी नारी का नाम आता है, सीताराम,राधे श्याम,गौरी शंकर।इसलिय परिवार में बच्ची का जन्म होना ईश्वर की कृपा होना ही है।ईश्वर की कृपा मानकर आशीष कुमार के परिवार ने ऐसी सुंदर पहल की है।जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है।
इंसानियत का पाठ
एक मोटर पार्ट्स व्यापारी का जवान बेटा सड़क दुर्घटना में मारा गया।
ड्राइवर ने कहा—ब्रेक नहीं लगे।
जाँच में पाया गया —नकली ब्रेक शू लगे थे।
घर में तूफ़ान— मच गया।
छोटे बेटे ने पिता से कहा—
“पिताजी… आप ही मेरे भाई के हत्यारे हैं। आप ही नकली सामान बेचते हैं।”
उस दिन शायद उस पिता को समझ आया—
मुनाफा कभी-कभी सीधे अपने घर की चिता बनकर लौटता है।
डर
बालेश्वर गुप्ता,नोएडा
पापा- पापा, अगले शुक्रवार को सुबह सुबह हम सब कश्मीर घूमने के लिए चल रहे हैं,आप वहां के हिसाब से कपड़े रख लेना।मैने वहां सब व्यवस्था कर दी है,यहां से फ्लाइट से श्रीनगर वहां कार बुक कर दी है,होटल बुक हो गये है।
एक सांस में मुन्ना ने बड़े ही उत्साहित रूप में सब कुछ बता दिया।
हरबंस कौल अपने मुन्ना को अचरज भरी निगाहों से देखने लगे।कश्मीर जाने का उसका उत्साह अपने चरम पर था।
पापा आपने ही तो बताया था कि मैं तब एक डेढ़ वर्ष का ही रहा हूंगा तब आप यहां दिल्ली आ गए थे।फिर वहां आतंकवाद पनप गया,पर मन में तो एक बार अपनी जन्मभूमि देखने की इच्छा तो थी ही,अब सब वहां सामान्य है, इसलिये अपनी आकांक्षा अब पूरी होगी, हैं ना पापा।
हरबंस जी की आँखों में बरबस ही पानी आ गया,वो कुछ बोल नहीं पाए, उनके कानों में सलोनी की चीख गूँज उठी।वे मुन्ना को अपनी बेबसी और दुःखी अतीत का भागीदार नहीं बनाना चाहते थे।बस आगे बढ़कर उन्होंने मुन्ना के हाथों को अपने हाथों में लेकर धीरे से दबा दिया।
कश्मीर कार्यक्रम की सूचना अपनी मां तथा पत्नी को देने मुन्ना घर में अंदर चला गया।घर भर में खुशी की लहर दौड़ गई थी।बस उसकी मां जरूर आँखे फाड़ मुन्ना को देख रही थी। हरबंस जी ने अपनी पत्नी को चुप रहने इशारा कर दिया।पूरे 31 वर्ष बाद कश्मीर जाएंगे,पता नहीं अब कैसी फ़िज़ा होगी?पर मुन्ना के चेहरे की खुशी को दरकिनार भी तो नहीं किया जा सकता,सोचते सोचते हरबंस कौल 31वर्ष यानि 1990 से पहले के अपने कश्मीर में ख्यालो में पहुंच गए।
हरबंस कौल श्रीनगर में कोई मामूली हस्ती नहीं थे,बड़े लोगों में उनका नाम चलता था।ठसक के साथ रहते थे। पहाड़ी पर स्थित आलीशान बंगला और कालीन तथा पश्मीना के शॉल आदि बनाने की उनकी इंडस्ट्री थी।लगभग सब प्रोडक्शन विदेशों में ही जाती थी।उच्च श्रेणी के कालीन बनते थे,6-7 महीने एक एक कालीन के निर्माण में लग जाते थे,उस समय एक एक कालीन की कीमत एक लाख रूपये होती थी।कारीगर आते सारे सारे दिन कालीनों की बुनाई हाथों से करते।उनकी प्रसिद्धि दूर दूर तक फैली थी।परिवार में एक बड़ी बेटी सलोनी थी,जो स्कूल में पढ़ रही थी।दूसरी औलाद का सुख उन्हें नहीं मिल पा रहा था।पति पत्नी दोनों मन्नते माँगते। आखिर 15वर्ष के अंतराल के बाद उनके घर में खीर भवानी की कृपा से मुन्ना का आगमन हो गया।पूरे बंगले में हर्ष की लहर दौड़ गई।खूब बड़ी दावत दी गई।संगीत की व्यवस्था की गई।
सारी व्यवस्था वसीम ने संभाली हुई थी।पूरे उत्साह से वह दौड़ धूप कर रहा था।लगता ही नहीं था वसीम उनका मुलाजिम है।घर का सदस्य जैसा ही तो था।सलोनी हालांकि उससे उम्र में छोटी थी,पर वह उसे आपा ही कहता।कहता आपा ने मुझे दस्तखत करना तक सिखा दिया तो उस्ताद हुईं ना,इसीलिये बाबू जी ये तो मेरी आपा है,आपा यानि बड़ी बहन।
सलोनी को स्कूल से लाना, बाजार ले जाना सब वसीम ही करता।घर और फैक्ट्री का कोई काम ऐसा नहीं था जो क्या मजाल वसीम के बिना पूरा हो जाए।वसीम को हरबंस जी एक तरह से अपना बेटा ही मानते थे।
कुछ दिनों से घाटी की फिजा बदलने लगी थी।हवा में जहर घुलने लगा था।पहले वाला प्यार मोहब्बत,अपना पन अब मात्र दिखावा होता जा रहा था।पर वसीम पहले की तरह ही हरबंस जी के घर का पहरुआ बना रहा। हरबंस जी को वसीम पर गर्व था।
अचानक 19 जनवरी 1990 की वह भयावह रात आ गई,जिसकी किसी ने भी कल्पना तक नहीं की थी। लाउड स्पीकर से हिंदुओं को कश्मीर छोड़ने का पैगाम दे दिया गया था,साथ ही जवान बहु बेटी को वही छोड़कर।अपने पराये हो चुके थे।वहशी हो चुके थे। हड़बड़ाए से हरबंस जी लाउड स्पीकर से फरमान सुनकर घर की ओर भाग लिए, फैक्ट्री को यूं ही छोड़कर।घर के दरवाजे वसीम खड़ा मिला।आज हरबंस जी वसीम को देख सहम से गए।वसीम आगे बढ़ कर हरबंस जी की ओर आया और बोला बाबूजी फिजा खराब हो गई है,लाखों लोग जा रहे हैं,जाना तो आपको भी पड़ेगा।पर आप बेफिक्र रहो,मै आपको सही सलामत यहां से निकालने में मदद करूंगा,आप बिल्कुल भी चिंता न करे। हरबंस जी को सुकून मिला, अपना वसीम औरो जैसा नहीं निकला,उन्होंने आगे बढ़ कर वसीम को गले से लगा लिया।उधर घर से नगदी,जेवर आदि लेकर मुन्ना को गोद में लिए सलोनी के साथ उनकी पत्नी भी बाहर निकल आई। हरबंस जी ने वसीम की ओर अहसान भरी नजरों से देख चलने का उपक्रम किया ही था कि वसीम बोले बाबूजी जा रहे हो,अब जिंदगी में आगे क्या मिल पाओगे,आपकी इतनी खिदमत की है कुछ नजराना तो देकर जाओ ना बाबूजी।अपना सब कुछ फैक्ट्री, बंगला सब कुछ छोड़कर जाते हुए हरबंस जी ने फिर भी अपने हाथ की हीरे की अंगूठी वसीम की ओर बढ़ा
दी।वसीम अट्टहास कर उठा,उसका यह रूप हरबंस जी पहली बार देख रहे थे।अरे बाबूजी,इस अंगूठी की क्या कीमत,अब तो यह बंगला,आपकी फैक्ट्री सब मेरी ही है,बस नजराना में सलोनी को देकर जाओ ना। हरबंस जी मानो आसमान से गिर पड़े,वसीम जो सलोनी को आपा कहता था,आज वह उसकी ही डिमांड कर रहा है।पहले वाला समय होता तो वे वसीम की खाल खिंचवा देते,पर अब तो वे खुद निरीह से खड़े थे।अंदर ही अंदर खून भी खोल रहा था,पर कुछ न कर सकने की स्थिति में वे वसीम की चिरौरी करने लगे।अरे वसीम सलोनी तो तेरी बहन जैसी है तू कैसी बात कर रहा है?वसीम बेहयाई से बोला बहन जैसी ही तो थी,बहन थोड़े ही है,चिंता न करो बाबूजी मै सलोनी को शहज़ादी की तरह रखूंगा। एकाएक हरबंस जी चिंघाड़ उठे व-सी- म, जबान संभाल।तेरी जुबान पर सलोनी का नाम भी कैसे आया,अहसान फरामोश।
तड़ाक एक तमाचा हरबंस जी के मुंह पर पड़ा।वे अचरज भरी निगाहों से वसीम के इस बदलाव को देख रहे थे,समझ नहीं आ रहा था, क्या करे क्या न करे। उधर भीड़ का शोर बढ़ता जा रहा था,मार काट,चीख पुकार बढ़ती जा रही थी। हरबंस वसीम से अपने परिवार को भागने के लिए उससे गुहार कर रहे थे,वसीम ने आगे बढ़ कर सलोनी का हाथ पकड़ लिया,और बोला अब जाओ बाबूजी बेफिक्र जाओ।
सलोनी ने एक झटके से वसीम से अपना हाथ छुड़ाया और दौड़ पड़ी।वसीम जोर जोर से हंस कर कह रहा था,सब इलाका अब उनका है अब कहां जाओगी मेरी जान।
सलोनी ने दौड़कर पहाड़ी से छलांग लगा दी,एक चीख के साथ सलोनी ने अपना बलिदान देकर अपने परिवार की राह आसान कर दी। हरबंस जी अपनी पत्नी और मुन्ना के साथ किसी प्रकार बचते बचाते निकलने में सफल हो तो गए,पर सलोनी ऐसे चली जाएगी,इसकी तो कल्पना तक उन्होंने नहीं की थी।
हरबंस जी की आँखों से अविरल आँसू बह रहे थे,वे मुन्ना को क्या बताते कि उसकी बहन ने किस परिस्थिति में अपनी जान दे दी थी,आज उसी कश्मीर में चलने की बात मुन्ना कर रहा था। उन्होंने कभी कश्मीर के बारे में फिर सोचा भी नहीं था।पर धारा 370 हटने के बाद वहां के सामान्य हालात की खबरें आने पर उन्हें अपनी फैक्ट्री,अपना आलीशान बंगला जरूर याद आता।फिर झटके से वे उन यादों को बिसरा देते।अपनी मेहनत और मुन्ना के कारोबार सम्भाल लेने पर उन्होंने दिल्ली में अपनी पोजीशन बना ली थी,उन्हें किसी चीज की कोई कमी नहीं थी।मुन्ना के कश्मीर जाने की पेशकश वो ठुकरा नहीं सके। उन्होंने चलने की स्वीकृति दे दी।
एयरपोर्ट पर हवाई जहाज लैंड कर गया,10 मिनट बाद जैसे ही सब प्लेन से बाहर आए, हरबंस जी ने झुककर जमीं पर हाथ छू कर माथे से लगा लिया वर्षों बाद जन्म भूमि पर उनके पावं पड़े थे,सबकुछ भूल वे चारों ओर निहार रहे थे।कुछ भी नहीं बदला था,वे ही सुरम्य दृश्य,सुहावना मौसम,सब कुछ वही,बदला था तो तब यहां का मानुष बदला था।एयरपोर्ट के बाहर कार टैक्सी खड़ी थी,उसमें बैठ पहले सीधे पहलगाम गए,पूरे दो दिन रहने के बाद श्रीनगर आ गए, डल झील में हाउस
बोट में रात्रि में रहे।अगले दिन लाल चौक गए।आज लाल चौक पर तिरंगा लहरा रहा था।इन तीन दिनों में हरबंस जी ने महसूस किया कि सब कारोबार होटल हो या बाजार सब मुस्लिम समुदाय के हाथ में था,कारण भी यह था 1990में सब कश्मीरी पंडित,हिंदू यहां से पलायन कर गए थे।अब सब स्थान पर हरबंस जी कश्मीरियत की झलक देख रहे थे,निहायत सलीके सब पेश आ रहे थे,अपने पन का अहसास फैला पड़ा था।पता नहीं यह व्यापारिक मजबूरी थी या फिर यहां दिलों में परिवर्तन आ गया था। हरबंस जी को पुराने दिन जो यहां बिताए थे उनमें और अब में कोई अंतर नहीं लग रहा था।अचानक मुन्ना बोला पापा आप बताते थे कि यहां हमारी फैक्ट्री हुआ करती थी,चलो पापा वहां चलते हैं,देखते है अब भी फैक्ट्री चल रही है या बंद हो गई।आप पुरानी यादें ताजी करना और हम अपने अतीत को देखेंगे। इच्छा हरबंस जी की भी थी,पर वसीम के अमानुषिक व्यवहार याद आने के कारण उनका मन खट्टा हो गया,पर वे मुन्ना की बात टाल नहीं सके।
फैक्ट्री चल रही थी,गार्ड अंदर ले गया। वेटिंग हाल में पहुंच कर सब चौंक पड़े,वही एक कोने में हरबंस जी का सलोनी के साथ का एक स्टेचू लगा था,उसे करीने से सजाया गया था।तभी एक युवक जिसके चेहरे पर हल्की सी दाढ़ी थी,वह लपक कर आया और हरबंस जी के पांव छू लिये।सभी आश्चर्यचकित थे,यह क्या है?तभी वह युवक बोला बाबूजी ताज्जुब मत करो,बस हमें माफ कर दो,यह सब आपका था,आपका ही रहेगा,लौट आओ बाबूजी। हरबंस जी ने उस युवक के कंधे पर हाथ रख दिया,आँखो के पानी को किसी तरह रोक उन्होंने उस युवक की ओर देखा।
बाबूजी वसीम मेरे अब्बा हुजूर हैं, मेरा नाम अब्दुल है,उन्होंने ही हिदायत दी और कहा भी है, बताया भी है कि हरबंस जी हमारे सरपरस्त रहे हैं,यह सब धन दौलत सब उनकी है।अबू कह रहे थे,हम अहसान फरामोश और वहशी निकले, अपनो के साथ ही वहशीपन कर बैठे।बाबूजी आप अब्बू के पास चलो वे भी आपसे माफी मांगना चाहते हैं।सब कुछ अविश्वसनीय सिनेमाई अंदाज में घट रहा था,बिना कुछ सोचे हरबंस जी व मुन्ना,अब्दुल के साथ वसीम से मिलने भी चल दिए। रास्ते भर वसीम का उस रात का क्रूर अट्टहास भरा चेहरा और अपनी सलोनी का पहाड़ी से कूद जाना,मन में वितृष्णा पैदा कर रहा था
अब्दुल उसी बंगले में ले आया जो कभी हरबंस जी का हुआ करता था।बंगले को देख हरबंस जी भाव विभोर हो गए।उनके कदम अपने आप अंदर की ओर बढ़ चले।दौड़ कर अब्दुल अंदर गया जोर से चिल्लाया, अब्बू देखो तो कौन आए हैं,अपने बाबूजी आ गए अब्बू।
अंदर कमरे में एक पलंग पर लकवाग्रस्त हड्डियों का ढांचा पड़ा था,गौर से देखने पर पता चला अरे ये तो वसीम है।वसीम ने धीरे से आँखें खोली अब्दुल के सहारे से कुछ उठकर उसने हरबंस जी के पैर पकड़ लिये।बाबूजी मुझे माफ कर दो।मै लाउड स्पीकर के एनाउंसमेंट से तथा बिरादरी के जमघट से बहक गया था।मै तब से एक रात भी चैन से नहीं सो पाया हूं,बाबूजी मेरी आंखों के सामने मेरी आपा सलोनी मेम पहाड़ी से कूद गई।मै जीते जी जह्नूम चला गया।बाबूजी सब बंगला,फैक्ट्री सब संपत्ति
आपकी ही है,बाबूजी,अब्दुल आपका चाकर बन कर रहेगा।बाबूजी अब यही आकर अपनी अमानत संभाल लो,बाबूजी।
श्रीनगर से लौटते हरबंस जी सोच रहे थे,अपनी जन्म अपनी कर्म भूमि में वापस आना किसे अच्छा नहीं लगेगा,पर अबकी बार फिर यदि लाउड स्पीकर की अजान से,बिरादरी के जमघट के इरादों से अब्दुल बदल गया तो??
इस प्रश्न को लेकर हरबंस कौल दिल्ली लौट आये। अब मन को तसल्ली थी,मरने से पहले वे अपनी जन्म भूमि और अपने घर को एक बार देख आए हैं।
"व्यक्ति नहीं, विचार बड़ा है"
संघ के प्रारंभिक दिनों में नागपुर में एक बैठक चल रही थी। कई वरिष्ठ कार्यकर्ता उपस्थित थे। चर्चा के दौरान किसी स्वयंसेवक ने डॉक्टर हेडगेवार जी की अत्यधिक प्रशंसा करते हुए कहा—
"डॉक्टर जी, आज संघ जिस गति से बढ़ रहा है, वह केवल आपके व्यक्तित्व के कारण संभव हुआ है।"
सभा में बैठे अधिकांश लोगों ने सहमति में सिर हिलाया। तब डॉक्टर जी ने मुस्कुराते हुए सामने बैठे गुरुजी की ओर देखा और कहा—
"यदि संघ केवल किसी एक व्यक्ति के बल पर खड़ा है, तो समझो हमने अभी तक कुछ बनाया ही नहीं।"
कुछ क्षण के लिए वातावरण शांत हो गया।
डॉक्टर जी आगे बोले—
"हमारा उद्देश्य व्यक्तियों का संगठन नहीं, बल्कि राष्ट्रभाव से प्रेरित चरित्रवान स्वयंसेवकों का निर्माण है। व्यक्ति आएंगे, अपना कार्य करेंगे और चले जाएंगे; लेकिन विचार और संस्कार चलते रहने चाहिए।"
गुरुजी यह बात बड़े ध्यान से सुन रहे थे।
डॉक्टर जी ने आगे कहा—
"जिस दिन संघ किसी एक व्यक्ति पर निर्भर हो जाएगा, उसी दिन उसकी शक्ति कमजोर पड़ जाएगी। संघ की वास्तविक शक्ति शाखा में खड़े साधारण स्वयंसेवक में है।"
बाद में जब गुरुजी सरसंघचालक बने, तब उन्होंने भी अनेक बार कहा—
"संघ व्यक्ति-पूजा का संगठन नहीं है। यहाँ विचार, कार्य और राष्ट्र सर्वोपरि हैं।"
यह प्रसंग हमें सिखाता है कि संघ की शक्ति किसी एक नेता में नहीं, बल्कि लाखों स्वयंसेवकों के संस्कार, अनुशासन और राष्ट्रनिष्ठा में निहित है।
"गांव का घर"
डॉ. सतीश "बब्बा"
पहले गांव में गांव के मुहल्लों का नाम होता था, अरखौड़ी, चमरौड़ी, बभनौड़ी, अहिरौड़ी, कोलान, कोल कॉलोनी, झगरहाटोला, बसुहार मुहल्ला आदि आदि! अब तो सब खिचड़ी हो गया है, कहां क्या है पता नहीं चलता; सब कोई सड़क की ओर भागते नजर आ रहे हैं। गांव में अब कोई किसी का नहीं है, सब मतलब के साथी हैं। गांव में खेती से अब पेट भर खाना नसीब हो जाए यही काफी है। आखिर गांव से पलायन करना एक मजबूरी है, वरना अपना आशियाना कौन छोड़ेगा! आज तिवारी रामसुख अपनी बहन के घर अपने ही भानजे की शादी में भाग लेने आया था। एक सप्ताह शादी की रश्मों अदायगी में, भागदौड़, उत्सव के संगीत में कैसे बीत गया कुछ पता ही नहीं चला था।
गांव के शरारती नंगे अधनंगे बच्चों के बीच रामसुख बूढ़ा हो गया मामा फिर से बचपन वाला तिवारी हो गया था। अब बहन के घर से जाना होगा, बेटा दूर शहर में अकेला है, बार-बार फोन पर फोन कर रहा है। शादी में आए मेहमान, मेहमानिनें लगभग - लगभग जा चुके थे, आज के समय में किसी के पास समय कहां है। कुछ मेहमान थे, मामा के साथ फूफा जो साठ पार कर गए थे। रामसुख का बहनोई बगल में बेसुध होकर खर्राटे बजा रहा था। जो भी जहां पाया आज काम से फुर्सत थी बिंदास, बेसुध होकर सो गया था, न बिछौना की फिक्र, न खटिया, तख्त की चाहत बस नींद के साथ आराम से सो गया था, बस! रामसुख से नींद कोसों दूर थी, शायद रामसुख के हिस्से की पूरी की पूरी नींद इन लोगों ने ले लिया था। रामसुख की आंखों में आंसू आ गए थे। रामसुख अपनी बीती जिंदगी के बारे में सोच रहा था। रामसुख को अपना गांव का घर याद आ रहा था। इस बहन की शादी में इसकी बिदाई
के पल याद आ रहे थे। इस बहन के घर भी एक दशक बाद आना हुआ था। रामसुख को याद आ रहा था पिता परमसुख का प्यार, शादी के लिए रामसुख की पत्नी का चयन, जो पिता ने किया था वह स्वयं रामसुख के बस का नहीं था। पंडिताई की पढ़ाई पूरी करके रामसुख को गांव में कहीं पैसा नजर नहीं आ रहा था। पिता ने उसे समझाया था कि, "ब्राह्मण के बेटे हो, गांव में गुजारा हो ही जाएगा! परदेश की पूरी रोटी से अपने घर की आधी रोटी ज्यादा अच्छी होती है!" रामसुख ने अपने पिता से कहा, "तुम पूरी जिंदगी इन खेतों में, गांव की यजमानकी में गंवा दिया है, तुम्हारे पास एक ढंग की साईकिल तक नहीं है। जो बाहर, शहर में चले गए हैं वह चारपहिया गाड़ी में चलते हैं!"
आखिर पिता परमसुख के रहते हफ्ते - दस दिनों के लिए रामसुख महाराष्ट्र चला जाता था। पत्नी घर में ही खुश रहती थी। शहर की आमदनी, चकाचौंध के किस्से घर आकर रामसुख घर में सबको सुनाता था। परमसुख डांटते हुए कहा करता था कि, "वहां की कमाई पंडित लोग ठगा - ठगी करके इकट्ठा किया करते हैं, जीने - मरने पर भी पैसा लेते हैं। महापात्र का काम, मृत्यु भोज खाने का पैसा लेते हैं। तमाम आडंबर करते हैं, ढंग की पूजा नहीं होती फिर भी पैसा लेते हुए शर्म नहीं आती है!"
रामसुख ने कहा, "कुछ भी हो वहां जलवा ही जलवा है, मालपुआ खाओ, काजू-बादाम खाओ, यहां क्या है एक कथा में बीस आने, एक सीधा जिसमें एक किलो भी आटा चावल नहीं रहता है!"
परमसुख उसे पिता की हैसियत से समझाने की कोशिश कर रहा था, "देख रामसुख, यहां अपनापन है। यहां के लोग झगड़ते हैं तो प्यार भी करते हैं। यहां रिश्ते हैं, जो शहर में नहीं है। गलत तरीके से कमाया गया धन सिर्फ दस साल तक चलता है फिर वह घर का धन भी बहाकर ले जाता है। यहां तेरा बचपन खेला है!" रामसुख को पिता की बात अच्छी नहीं लगी थी, रामसुख ने कहा, "तुम अपना ज्ञान अपने पास रखो, ईमानदारी, नंबर एक की कमाई में दोनों समय चूल्हा नहीं जलता है। अब नंबर दो की कमाई में ही पैसा है, अब युग, समय बदल गया है, अब नंबर दो में ही मजा है, फिर हम चोरी चमारी तो करने जा नहीं रहे हैं, पंडिताई करने जा रहे हैं, वहां हमारे बहुत से रिश्तेदार भी हैं!"
आखिर परमसुख कितने दिन जीते, रामसुख के माता-पिता इस दुनिया को अलविदा कह गए थे। इस जीवन बगिया को सींचने, काटने छांटने वाला माली होना चाहिए था जिसे पिता कहते हैं, माता कहते हैं, रामसुख अब माता-पिता के बिना मनमौजी हो गया था। कुछ गुनाह नहीं था रामसुख का, वह अपने पिता की बातों को ध्यान न देकर अपनी पत्नी को लेकर महाराष्ट्र चला गया था। पत्नी गर्भवती थी, पत्नी को वहां का पानी सूट नहीं कर रहा था, इस बात को लेकर रामसुख बिल्कुल चिंतित नहीं था। रामसुख को एक बेटा हुआ था, पत्नी की दवा चल रही थी। रामसुख को पैसे ही पैसे कमाई में मिल रहे थे। रामसुख बढ़िया घर बनवाया, बैंक बैलेंस किया, सोना चांदी खरीदा, पत्नी को लेकर वह गंभीर नहीं था। पैसों की चकाचौंध में अंधा हो गया रामसुख पत्नी को दवा के बल पर जीवित रखा हुआ था। समय चलता रहता है, उसे रोक पाना संभव नहीं है। पत्नी जो जीवन की पतवार होती है, पति के लिए जीवनधारा होती है, रामसुख ने उसपर गौर नहीं किया था। पैसों से बढ़कर होता है कुछ, वह है
अपनापन, रिश्तों का खजाना, अगर पति-पत्नी एक-दूसरे का ख्याल नहीं करेंगे तो फिर जिंदगी किस काम की? आखिर सिर्फ पैसों के साथ ही तो नहीं जिया जा सकता है।
बहुत से परिवार अपने घर पर अपने रिश्तों के साथ गरीबी में भी खुश रहते हैं। पति-पत्नी दोनों एक-दूसरे के पूरक होते हैं, कभी किसी वृक्ष की जड़ को जमीन से अलग करके उस वृक्ष को हरा-भरा रखा जा सकता है क्या? जमीन में वृक्ष नहीं होंगे तो वह भी बंजर हो जाती है, इसी तरह पति-पत्नी एक-दूसरे के पूरक होते हैं। एक दिन रामसुख से उसकी पत्नी ने कहा, "पिता की बात नहीं मानकर तुमने बहुत बड़ी गलती किया है। भला बताओ मुझे कुछ हो गया तो तुम क्या करोगे, लड़का जवान हो गया है, हमें यहां कोई जानता नहीं है, लड़के की शादी कौन करेगा!" रामसुख को आज चार दशक में पहली बार अपनी गलती का एहसास हुआ था। पर 'अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत!'
रामसुख ने कहा, "तुम घबराओ मत, मैं तुम्हें मुम्बई के अच्छे से अच्छे डॉक्टर के पास ले जाकर दवा करवाऊंगा, मैं विदेश में तुम्हारी दवा करवाऊंगा, मेरे पास पैसों की कमी नहीं है, मैं तुम्हारे लिए कुछ होने नहीं दूंगा!" रामसुख की पत्नी एक कड़वी हंसी हंसते हुए कहा, "काश, पैसे किसी को जिला सकते!" आखिर रामसुख का पैसा काम नहीं आया, एक दिन रामसुख के देखते-देखते उसकी पत्नी ने दम तोड़ दिया था। रामसुख, उसका जवान बेटा हाथ मलते रह गए थे।
पत्नी के मरने के बाद रामसुख की जिंदगी में अंधेरा छा गया था। रामसुख को अब गांव का घर याद आ रहा था, जहां खपरैल में भी खुशियां निवास करतीं थीं। जहां सुबह बच्चों की किलकारियां गूंजने लगती थी, जहां गाएं अपने बछड़े को दूध पिलाने के लिए रंभाने लगती थीं। गांव का घर जहां रामू काका सुबह-सुबह फ्री की तम्बाकू मांगने पिता परमसुख के पास आ जाया करता था। रामसुख की मां अपने पति परमसुख से उपरी गुस्सा दिखाते हुए कहती, "इनको शर्म भी नहीं आती है फ्री में तम्बाकू मांगने में, खाते हैं, नशा करते हैं तो चार आने की खरीद क्यों नहीं लिया करते हैं!"
रामसुख के पिता परमसुख कहते, "अरी रामसुख की अम्मा, रामू काका इसी बहाने मुलाकात करने आते हैं, हालचाल जानने आते हैं, इतनी सी तम्बाकू देने में कौन सा हमारा नुकसान हो जाता है!"
हल्की-फुल्की बीमारी दुलहा दीन यादव की जड़ी-बूटियां ठीक कर देती थी। बीमारी खेतों में काम करने से पास नहीं आती थीं।
कभी कोई साधू अतिथि को परमसुख घर ले आया करते थे, कभी कोई रिश्तेदार आ जाया करते थे तो बच्चों का त्योहार हो जाया करता था। बगीचों में, गांव से लगे बूढ़े बरगद में बच्चों की धमाचौकड़ी मन मोह लिया करती थी। गांव में रिश्ते हुआ करते थे, जाली चमार की ससुराल उस टोला में थी, गांव में सभी जातियों के लोग उससे मजाक किया करते थे, कोई फूफा, कोई जीजा, कोई महिमान कहते थे। जाली चमार के बच्चे किसी को मामा, किसी को नाना-नानी, किसी को भैया-भाभी कहते थे, कुल मिलाकर रिश्तों में गांव बंधा हुआ रहा करता था। अब रामसुख को खाना खाने के लिए होटल से टिफिन मंगाना पड़ता था। न खाने का समय, न नहाने का समय बेटा को किसी तरह से एक बनिया की नौकरी में लगा दिया गया था। परदेश तो परदेश होता है, शहर में कहां कोई किसी का होता है, फिर
बाहरी, प्रवासी का कौन होगा। रामसुख के भांजे की शादी थी, इसी बहाने यहां वतन आना हो गया था, वरना खुद बहुत संकुचित था वह! पत्नी की जुदाई में खोया-खोया सा रहता था।
गांव का घर देखने की लालसा थी। उधर बेटा फोन पर फोन कर रहा था। बेटा को स्टील प्लांट में सुपरवाइजरी मिलने वाली थी। आखिर रामसुख क्या करे, इतना बड़ा घर वह शहर का कैसे बेंच दे, अब इस उम्र में कोई पंडिताई नहीं बन पा रही थी, श्लोक बोलने में थकी लग रही थी।
रामसुख को आगे अपने वंश बढ़ाने की चिंता थी। बेटा कोई आफिसर नहीं था, बेटा पंडिताई भी नहीं सीख पाया था। रामसुख को चिंता थी कि, क्या मेरी वंश बेल अब खत्म हो जाएगी!
रामसुख यहां अपने रिश्तेदारों से, अपने जीजा के यहां भी तथा कुछ पुराने जान-पहचान वालों से बेटे की शादी के लिए बात किया था। उसके जीजा ने भी हजारों मील दूर के शहर में मकान तथा संपत्ति के बारे में तस्दीक किया था। जिसे सभी ने यह कहकर नकार दिया था कि, "यहां अच्छा लड़का, मजदूरी करने वाला भी होता तो चलता, वहां उतनी दूर हम कैसे कर सकते हैं, बुलाने भी जाओ तो पैसों के साथ साथ दो दिन का समय जाने में, दो दिन का समय आने में लगेगा!"
रामसुख को सुबह सुबह नींद आ गई थी। रामसुख उस थोड़े से समय में सपने में देखा कि, "पिता परमसुख डांटते हुए कह रहे हैं कि, "ऐ, नालायक मेरी बेटी के समान बहू को तकलीफ दिया, वहां महाराष्ट्र का पानी सूट नहीं किया था, तू पैसों में इतना अंधा हो गया था कि, उससे भी हाथ धो बैठा, अभी भी तुझे शर्म नहीं आती है, क्यों मेरी वंश बेल समाप्त करने में तुला हुआ है!"
रामसुख ने स्वीकार किया कि, "हां पिता जी, आप ठीक कह रहे हैं, अब मैं गांव का घर फिर से ठीक करूंगा, उसकी मरम्मत करके अब अपना बांकी का जीवन यहीं बिताऊंगा। लड़के को रोड़ के किनारे एक दुकान खोलकर बैठा दूंगा, मुझे भी अपने गांव का घर याद आ रहा है, अब वहां शहर में रखा ही क्या है अब सभी जातियों के लोग पंडिताई कर रहे हैं, बहुत पंडित हो गए हैं!"
सुबह छोटे-छोटे बच्चों के शोर से रामसुख जाग गया था। रामसुख अपनी सभी नित्य क्रियाओं को करने के बाद फिर बहन - बहनोई के पास जाकर रोने लगा था।
रामसुख की बहन भी फफक-फफक कर रोते हुए कहा, "भैया, पता नहीं अब मुलाकात हो पाएगी या नहीं, उतनी दूर से आपका आ पाना, या मेरा वहां पहुंचना संभव नहीं है। मैं भी शुगर, ब्लडप्रेशर, हार्ट की मारीज हूं, जाने कब क्या हो सकता है कुछ पता नहीं है। तुम्हारे जीजा का भी आपरेशन हुआ है उतनी दूर चाहकर भी नहीं आ जा सकते हैं। भाभी चली गई, दूर की वजह से उनका पार्थिव शरीर भी नहीं देख पाई, कितना प्यार था हम दोनों ननद - भौजाई में, मेरी भाभी कितनी अच्छी थी। अब जाने क्या होगा, अब जाने कब मुलाकात होगी!"
रामसुख की आंखों से अविरल आंसुओं की धारा बह रही थी, मुंह से आवाज नहीं निकल रही थी। आखिर रामसुख किसी तरह से हिचकते हुए कहा, "बहना, अब मैं वहां नहीं जाऊंगा, मेरे लिए यह गांव का घर ही अच्छा है। मैंने पिताजी से भी आज स्वप्न में वादा किया है कि, मैं गांव में ही रहूंगा, अब बांकी का जीवन यहीं बिताऊंगा!" रामसुख की बातें सुनकर सभी खुश हो गए थे। यहां रिश्ते हैं, रिश्तेदार हैं,
अपने हैं कहीं न कहीं बेटे की भी शादी हो जायेगी। ब्राह्मण के घर जन्मा हूं, पिता की जजमानी में कथा सुनाकर पेट के लिए काम चल जाएगा। रामसुख के बहन-बहनोई बहुत खुश थे। बहनोई ने कहा, "वहां की प्रापर्टी, घर का क्या होगा?" रामसुख ने कहा, "उससे गांव का घर अच्छे से बनवाऊंगा, उस मकान को किराए पर देकर कभी-कभार जब मन करेगा बेटा जाकर देख आया करेगा। वह चाहेगा तो उसे बेचकर यहां कहीं जगह - जमीन खरीद लेगा!"
रामसुख के निर्णय की सभी प्रशंसा कर रहे थे। नाश्ता आ गया था, सभी नाश्ता करने लगे थे।
रामसुख ने अपनी बहन-बहनोई से कहा, "मुझे गांव तक आप लोग पहुंचा दीजिए!"
रामसुख के जीजा ने अपने बेटे से कहा, "तुम अपनी बाइक से अपने मामा को उनके गांव पहुंचाकर आओ, इनके गांव का घर तुम भी देखकर लौट आना!"
रामसुख को बिदा करते हुए सभी की आंखें नम थीं। रामसुख की आंखों में भी आंसू थे जो दुख के नहीं यह खुशी के आंसू थे।
"व्यक्ति का सम्मान ही संगठन की आत्मा है।"
एक कार्यक्रम में हजारों स्वयंसेवक उपस्थित थे। कार्यक्रम के बाद डॉक्टरजी एक युवा स्वयंसेवक से मिले और उसका नाम लेकर हालचाल पूछा।
पास खड़े कार्यकर्ता आश्चर्यचकित रह गए।
उन्होंने पूछा— “डॉक्टरजी, इतने लोगों में आपको इसका नाम कैसे याद है?”
डॉक्टरजी ने उत्तर दिया— “यदि हम स्वयंसेवकों को केवल भीड़ समझेंगे तो संगठन नहीं बनेगा। प्रत्येक स्वयंसेवक एक व्यक्तित्व है, उसे पहचानना और सम्मान देना आवश्यक है।”
उस स्वयंसेवक की आँखें भर आईं। "व्यक्ति का सम्मान ही संगठन की आत्मा है।"
पूर्णिमा का मानव जीवन पर प्रभाव
पूर्णिमा हिंदू धर्म में अत्यधिक महत्वपूर्ण तिथि है, जो मानसिक शांति, आध्यात्मिक ऊर्जा और पूर्णता का प्रतीक है। इस दिन चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से पूर्ण होता है, जिससे वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है। यह दिन भगवान विष्णु, शिव और चंद्रदेव की पूजा, स्नान-दान, और व्रत (विशेषकर मानसिक शांति और समृद्धि के लिए) के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है। पूर्णिमा का दिन आध्यात्मिक, धार्मिक और मानसिक चेतना को उन्नत करने के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। चंद्र देव के स्वामी होने के कारण, पूर्णिमा का व्रत करने से मानसिक अशांति, भय, तनाव और अनिद्रा से मुक्ति मिल सकती है। पूर्णिमा की रात चंद्रमा की किरणों में विशेष शीतलता और ऊर्जा होती है, जो त्वचा, पाचन और नींद के लिए फायदेमंद मानी जाती है।
पूर्णिमा को जन्मे बच्चे चंद्रमा के पूर्ण प्रभाव के कारण शांत, बुद्धिमान, आकर्षक और भावनात्मक रूप से मजबूत होते हैं। इन पर माँ लक्ष्मी की विशेष कृपा रहती है, जिससे ये भाग्यशाली, धनवान और जीवन में मान-सम्मान प्राप्त करते हैं। रचनात्मकता, नेतृत्व क्षमता और खाने-पीने के शौकीन ये बच्चे अपने शांत स्वभाव के बावजूद ठोस फैसले लेने में सक्षम होते हैं। ये बच्चे शांत, सौम्य और आकर्षक व्यक्तित्व वाले होते हैं। इन पर चंद्रमा का गहरा प्रभाव होता है। इनमें रचनात्मकता भरपूर होती है, इसलिए ये कला, संगीत, लेखन या चिकित्सा के क्षेत्र में बहुत अच्छा करते हैं। ये मानसिक रूप से मजबूत होते हैं और अपनी बुद्धि का उपयोग करके कठिन कार्यों को आसानी से कर लेते हैं। इन्हें माँ लक्ष्मी का आशीर्वाद माना जाता है, जिससे इन्हें जीवन में धन-धान्य और सुख की कमी नहीं होती। ये अपनी माँ से बहुत गहराई से जुड़े होते हैं। शांत होने के बावजूद, कभी-कभी वे अंतर्मुखी या अपनी ही दुनिया में खोए रहने वाले हो सकते हैं। इन्हें बहुत ही शुभ और भाग्यशाली माना जाता है।
पूर्णिमा के दिन मां लक्ष्मी और चंद्रमा की पूजा से सुख-समृद्धि, धन और शांति प्राप्त होती है। पूर्णिमा को रात मे चंद्रमा को अर्घ्य देना, पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाना, सफेद वस्तुओं (खीर, चावल, दूध) का दान करना और तुलसी की पूजा करना चाहिए है। पूर्णिमा की शाम को मां लक्ष्मी को केसर से तिलक करें और कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें। साथ ही, 5 लाल कौड़ियों को लाल कपड़े में बांधकर तिजोरी में रखने से धन की कमी नहीं होती। पूर्णिमा की रात चंद्रमा को कच्चे दूध में चीनी और चावल मिलाकर अर्घ्य दें। इससे मानसिक तनाव दूर होता है और क्रोध शांत होता है। पति-पत्नी पूर्णिमा पर पीपल के वृक्ष पर जल चढ़ाएं और शाम को दीपक जलाकर 7 परिक्रमा करें, इससे संतान सुख और दीर्घायु का वरदान मिलता है। पूर्णिमा पर कांसे के बर्तन से तुलसी और केले के पौधे को जल दें, केसर अर्पित करें और तिल का दीपक जलाएं। पूर्णिमा के दिन सफेद रंग की वस्तुओं जैसे दूध, चावल, चीनी, या सफेद वस्त्र का दान करने से भाग्य चमकता है। पूजा स्थल पर लाल कपड़ा बिछाकर चार लौंग रखें और लक्ष्मी-कुबेर का ध्यान करते हुए घी के 5 दीपक जलाएं। इस दिन सत्यनारायण भगवान की कथा, शिवलिंग पर दूध-बेलपत्र चढ़ाना और विष्णु जी की पूजा से परिवार में सुख-समृद्धि आती है। पूर्णिमा पर पवित्र नदियों में स्नान और दान करना अनेक पापों को नष्ट करने वाला माना जाता है व स्नान-दान से अक्षय पुण्य मिलता है और जीवन के कष्ट दूर होते हैं। पूर्णिमा के दिन सफेद वस्तुएं जैसे दूध, चावल, चीनी, घी, और सफेद वस्त्र का दान करना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। साथ ही, जरूरतमंदों को अनाज, गुड़, कंबल या गर्म कपड़े दान करने से चंद्र दोष दूर होता है और घर में धन-धान्य की कमी नहीं होती और मानसिक शांति मिलती है ।अन्न और गुड़ (विशेषकर 7 प्रकार के अनाज) महादान माना जाता है, जिससे दरिद्रता दूर होती है। वस्त्र और कंबल गरीब और जरूरतमंदों को देने से सुख-समृद्धि आती है। गाय के लिए चारा या दूध/दही का दान अत्यंत शुभ है। पूर्णिमा की शाम मंदिर या पवित्र नदी के किनारे दीपक जलाने से पापों का नाश होता है। सुबह ब्रह्म मुहूर्त स्नान-दान के लिए उत्तम है, लेकिन पूरे दिन दान किया जा सकता है। ब्राह्मण, जरूरतमंद या मंदिर में दान करना श्रेष्ठ माना गया है। इस दिन तामसिक भोजन (प्याज, लहसुन, मांस-मदिरा) का सेवन न करें।घर में क्लेश करने या बुजुर्गों का अपमान करने से बचें। ये उपाय घर में दरिद्रता दूर कर धन आगमन (लक्ष्मी प्राप्ति) के मार्ग खोलते हैं । हर महीने की पूर्णिमा का अपना महत्व है, जैसे- कार्तिक पूर्णिमा, शरद पूर्णिमा, बुद्ध पूर्णिमा, और गुरु पूर्णिमा आदि, जो विशेष त्योहारों से जुड़ी हैं।
कामिका एकादशी
कामिका एकादशी श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को बनाई जाती है इसे पवित्रता के नाम से भी जाना जाता है | प्रातः स्नानादि करके भगवान विष्णु की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान कराकर भोग लगाया जाता है | आचमन के पश्चात धूप दीप चंदन आदि सुगंधित पदार्थों से आरती उतारनी चाहिए |
कामिका एकादशी व्रत की कथा - एक समय की बात है कि किसी गांव में एक ठाकुर रहा करते थे | वह बहुत ही क्रोधी स्वभाव के थे क्रोधवश उनकी एक ब्राह्मण से भिड़ंत हो गई जिसका परिणाम यह हुआ कि वह ब्राह्मण मारा गया | उस ब्राह्मण के मरणोपरांत उन्होंने उसकी तेहरवीं करनी चाही लेकिन सब ब्राह्मणों ने भोजन करने से इंकार कर दिया तब उन्होंने सभी ब्राह्मणों से निवेदन किया कि हे भगवान मेरा पाप कैसे दूर हो सकता है कृपया कोई उपाय बताए | भगवान से की इस प्रार्थना पर उन सब ने उसे एकादशी व्रत करने की सलाह दी ठाकुर ने वैसे ही किया | रात में भगवान की मूर्ति के पास जब वह शयन कर रहा था तभी उसने एक सपना देखा सपने में भगवान ने उसे दर्शन देकर कहा कि ठाकुर तेरा सारा पाप दूर हो गया अब तो तू ब्राह्मण की तेहरवीं भी कर सकता है तेरे घर सूतक नष्ट हो गया है | ठाकुर पूरे विधि विधान से तेहरवीं करके ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्त हो गया और अंत में कामिका एकादशी व्रत के प्रभाव से मोक्ष प्राप्त करके विष्णुलोक को चला गया |
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पुत्रदा एकादशी
पुत्रदा एकादशी सावन मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है इस दिन भगवान विष्णु के नाम पर व्रत रखकर पूजा की जाती है इसके बाद ब्राह्मण को भोजन करके दान देकर आशीर्वाद लेना चाहिए |
पुत्रदा एकादशी की कथा - एक समय की बात है महिष्मति नगर में महिजीत नाम का राजा राज करता था | वह बड़ा ही धर्मात्मा शांतिप्रिय और दानी था परंतु उसके कोई संतान नहीं थी यही सोच सोच कर राजा बहुत ही दुखी रहता था | एक बार राजा ने अपने राज्य के समस्त ऋषिओ और महात्माओं को बुलाया और संतान प्राप्त करने के उपाय पूछे इस पर परम ज्ञानी लोमस ऋषि ने बताया कि आपने पिछले जन्म में स्वर्ण मास की एकादशी को अपने तालाब से प्यासी गाय को पानी नहीं पीने दिया था और उसे हटा दिया था | इसी श्राप के कारण आपके कोई संतान उत्पन्न नहीं हुई है इसलिए आप सावन मास की पुत्रदा एकादशी का नियम पूर्वक व्रत रखकर रात्रि जागरण करिए | आपको पुत्र अवश्य प्राप्त होगा ऋषि की आज्ञा अनुसार राजा ने एकादशी का व्रत किया और इसके प्रभाव से उसे पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई तथा इस लोक मे सुख भोग कर अंत मे वैकुंठ मे गया |
अगस्त मास 2026 का पंचांग
भारतीय व्रतोत्सव अगस्त -2026
दि. 2- श्री गणेश चतुर्थी व्रत,दि. 3-नाग पंचमी (मरु. व बं.),दि. 6- कालाष्टमी,दि. १- कामिका एकादशी व्रत,दि. 10- सोम प्रदोष व्रत,दि. 11-मास शिवरात्रि,दि. 12- हरियाली अमावस,दि. 14-सिंधारा,दि. 15- मधुश्रवा तीज, मंगलागौरी पूजन,दि. 16-विनायक-वरद् चतुर्थी,दि. 17- नाग पंचमी, संक्रांति पुण्य,दि. 18- कल्कि जयंती, वरुण छठ,दि. 19- शीतला सप्तमी, गो. तुलसीदास जयंती,दि. 20-दुर्वाष्टमी, दुर्गाष्टमी, मेला नयना देवी व चिंत. (हि.प्र.),दि. 23- पवित्रा एकादशी व्रत,दि. 25- प्रदोष व्रत,दि. 27- सत्य व्रत,दि. 28-रक्षा बंधन, अमरनाथ यात्रा, गायत्री जयंती, ऋषि तर्पण, हयग्रीव जयंती,दि.31-कज्जली तीज, गणेश चतुर्थी व्रत, बहुला चौथ
मूल विचार अगस्त -2026
दि. 3 को 22/00 से दि.,5 को 21/18 तक, दि.12 को 7/59 से दि. 14 को 4/38 तक, दि. 21 को 11/52 से दि. 23 को 17/44 तक, दि. 31 को 3/44 से दि. 2 सित. को 2/42 बजे तक गण्ड मूल नक्षत्र
ग्रह स्थिति अगस्त - 2026
दि. 1 कन्या में शुक्र,दि. 2 मिथुन में मंगल,दि. 5 कर्क में बुध,दि. 10 गुरु उदय,दि. 15 बुध पूर्वास्तवं,दि. 17 सिंह में सूर्य,दि. 22 सिंह में बुध
पंचक विचार अगस्त - 2026
पंचक विचार -(धनिष्ठा नक्षत्र के तृतीय चरण से रेवती नक्षत्र तक) पंचको में दक्षिण दिशा की ओर यात्रा करना मकान दुकान आदि की छत डालना चारपाई पलंग आदि बुनना,दाह संस्कार,बांस की चटाई दीवार प्रारंभ करना आदि स्तंभ रोपण तांबा पीतल तृण काष्ट आदि का संचय करना आदि कार्यों का निषेध माना जाता है समुचित उपाय एवं पंचक शांति करवा कर ही उक्त कार्यों का संपादन करना कल्याणकारी होगा ध्यान रहेगा पंचर नक्षत्रों का विचार मात्र उपरोक्त विशेष कृतियों के लिए ही किया जाता है विवाह मंडल आरंभ गृह प्रवेश प्रवेश उपनयन आदि मुद्दों से तो पंचक नक्षत्रका प्रयोग शुभ माना जाता है पंचक विचार- मासारंभ से दि. 4 को 21/54 तक, दि. 27 को 13/35 से दि. 1 सित. को 3/23 बजे तक पंचक है |
अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527,9560518227
भद्रा विचार अगस्त -2026
भद्रा काल का शुभ अशुभ विचार - भद्रा काल में विवाह मुंडन, गृह प्रवेश, रक्षाबंधन आदि मांगलिक कृत्य का निषेध माना जाता है परंतु भद्रा काल में शत्रु का उच्चाटन करना,स्त्री प्रसंग में,यज्ञ करना,स्नान करना,अस्त्र शस्त्र का प्रयोग,ऑपरेशन कराना, मुकदमा करना,अग्नि लगाना,किसी वस्तु को काटना,भैस,घोड़ा व ऊंट संबंधी कार्य प्रशस्त माने जाते हैं सामान्य परिस्थिति में विवाह आदि शुभ मुहूर्त में भद्रा का त्याग करना चाहिए परंतु आवश्यक परिस्थितिवश अति आवश्यक कार्य भूलोक की भद्रा ,भद्रा मुख छोड़कर कर भद्रा पुच्छ में शुभ कार्य कर सकते है |
दि. 1 को 10/53 से 23/07 तक, दि. 4 को 22/03 से दि. 5 को 9/26 तक, दि. 8 को 3/18 से 13/59 तक, दि. 11 को 4/54 से 15/22 तक, दि. 16 को 5/10 से 16/52 तक, दि. 19 को 19/19 से दि. 20 को 8/16 तक, दि. 23 को 15/11 से दि. 24 को 4/18 तक, दि. 27 को 9/09 से 21/29 तक, दि. 30 को 21/14 से दि. 31 को 8/51 बजे तक भद्रा है।
अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527,9560518227
सर्वार्थ सिद्धि योग अगस्त-2026
दैनिक जीवन में आने वाले महत्वपूर्ण कार्यों के लिए शीघ्र ही किसी शुभ मुहूर्त का अभाव हो,किंतु शुभ मुहर्त के लिए अधिक दिनों तक रुका ना जा सकता हो तो इन सुयोग्य वाले मुहर्तु को सफलता से ग्रहण किया जा सकता है | इन से प्राप्त होने वाले अभीष्ट फल के विषय में संशय नहीं करना चाहिए यह योग हैं सर्वार्थ सिद्धि,अमृत सिद्धि योग एवं रवियोग | योग्यता नाम तथा गुण अनुसार सर्वांगीण सिद्ध कारक है|
अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527,9560518227
चौघड़िया मुहूर्त
चौघड़िया मुहूर्त, ज्योतिष में शुभ और अशुभ समय जानने की एक प्रणाली है। यह 24 घंटों को 8 भागों में विभाजित करता है, जिन्हें चौघड़िया कहा जाता है। प्रत्येक चौघड़िया एक निश्चित अवधि का होता है, और इन्हें शुभ और अशुभ कार्यों के लिए उपयुक्त माना जाता है।
चौघड़िया मुहूर्त क्या है - 24 घंटों को 16 भागों में बांटा जाता है, जिन्हें चौघड़िया कहा जाता है। प्रत्येक चौघड़िया लगभग 1.30 घंटे का होता है।
शुभ-अशुभ - कुछ चौघड़िया शुभ माने जाते हैं, जैसे अमृत, शुभ, लाभ, और चर। कुछ अशुभ माने जाते हैं, जैसे रोग, उद्वेग, और काल। चौघड़िया का उपयोग शुभ कार्यों, जैसे विवाह, यात्रा, और व्यापार शुरू करने के लिए शुभ समय जानने के लिए किया जाता है।
चौघड़िया के प्रकार - दिन का चौघड़िया,सूर्योदय से सूर्यास्त तक के समय को दिन का चौघड़िया कहा जाता है।
रात का चौघड़िया,सूर्यास्त से अगले दिन के सूर्योदय तक के समय को रात का चौघड़िया कहा जाता है।
चौघड़िया का महत्व - चौघड़िया मुहूर्त का उपयोग किसी भी शुभ कार्य को शुरू करने के लिए एक अच्छे समय का चयन करने के लिए किया जाता है। यह माना जाता है कि यदि कोई कार्य शुभ चौघड़िया में शुरू किया जाता है, तो उसके सफल होने की संभावना अधिक होती है।
सुर्य उदय- सुर्य अस्त अगस्त-2026
राहू काल
राहुकाल -राहुकाल दक्षिण भारत की देन है,दक्षिण भारत में राहु काल में कृत्य करना अच्छा नहीं माना जाता, राहु काल में शुभ कृतियों में वर्जित करने की परंपरा अब हमारे उत्तरी भारत में भी अपनाने लगे हैं राहुकाल प्रतिदिन सूर्यादि वारों में भिन्न-भिन्न समय पर केवल डेढ़ डेढ़ घंटे के लिए घटित होता है |
संक्रांति विचार अगस्त - 2026
इस मास की संक्रान्ति सिंह श्रावण शुक्ल पंचमी सोमवार दि. 17 अगस्त को पूर्वाह्न 7/57 बजे 30 मु. बैठी उत्तर गमन ईशान दृष्टि किये वायु मण्डल में प्रवेश कर रही है। गतवार-नक्षत्र 5, वार नाम ध्वांक्षी-वैश्य सुखी, नक्षत्र नाम मन्दाकनी-राजा सुखी। सोमवारी संक्रान्ति होने से सभी प्रकार के धान्य, मूंगा, मोती, तिलहन पदार्थ मन्दे, रस पदार्थ, गुड़, हल्दी, सोना, तांबा आदि तेज ।
आकाश लक्षण अगस्त - 2026
इस मास की ग्रह चाल व नाड़ी परिवर्तन, गुरु न उदय, मावस को चार ग्रहों की युति, बुधास्त से बहुत से स्थानों पर वर्षा होगी। कहीं अधिक वर्षा मासे बाढ़ की स्थिति बनेगी। कई एक स्थानों पर , वर्षा की कमी के कारण सूखा पड़ने की वा सम्भावना बनी है। बुध गुरु की युति से रिमझिम वर्षा होना सम्भव है।
मांगलिक दोष विचार परिहार
वर अथवा कन्या दोनों में से किसी की भी कुंडली में 1,4,7,8 व 12 भाव में मंगल होने से ये मांगलिक माने जाते हैं,मंगली से मंगली के विवाह में दोष न होते हुए भी जन्म पत्रिका के अनुसार गुणों को मिलाना ही चाहिए यदि मंगल के साथ शनि अथवा राहु केतु भी हो तो प्रबल मंगली डबल मंगली योग होता है | इसी प्रकार गुरु अथवा चंद्रमा केंद्र हो तो दोष का परिहार भी हो जाता है |इसके अतिरिक्त मेष वृश्चिक मकर का मंगल होने से भी दोष नष्ट हो जाता है | इसी प्रकार यदि वर या कन्या किसी भी कुंडली में 1,4,7,9,12 स्थानों में शनि हो केंद्र त्रिकोण भावो में शुभ ग्रह, 3,6,11 भावो में पाप ग्रह हों तो भी मंगलीक दोष का आंशिक परिहार होता है, सप्तम ग्रह में यदि सप्तमेश हो तो भी दोष निवृत्त होता है |
स्वयं सिद्ध मुहूर्त
स्वयं सिद्ध मुहूर्त चैत्र शुक्ल प्रतिपदा वैशाख शुक्ल तृतीया अक्षय तृतीया आश्विन शुक्ल दशमी विजयदशमी दीपावली के प्रदोष काल का आधा भाग भारत में से इसके अतिरिक्त लोकाचार और देश आचार्य के अनुसार निम्नलिखित कृतियों को भी स्वयं सिद्ध मुहूर्त माना जाता है बडावली नामी देव प्रबोधिनी एकादशी बसंत पंचमी फुलेरा दूज इन में से किसी भी कार्य को करने के लिए पंचांग शुद्धि देखने की आवश्यकता नहीं है परंतु विवाह आदि में तो पंचांग में दिए गए मुहूर्त व कार्य करना श्रेष्ठ रहता है।
अगस्त मास का राशिफल
आत्म-जागरूकता, मानसिक शांति और भविष्य की चुनौतियों के लिए मानसिक रूप से तैयार होने के लिए राशिफल देखना चाहिये हैं। राशिफल आपको अपनी क्षमताओं, कमियों और स्वभाव को गहराई से समझने में मदद करता है। जीवन के असमंजस भरे फैसलों में यह एक सकारात्मक दृष्टिकोण और संबल प्रदान करता है। आने वाले समय में संभावित समस्याओं या चुनौतियों के बारे में जानकर आप पहले से सतर्क रह सकते हैं। यह कठिन समय में धैर्य रखने और अच्छे समय का लाभ उठाने की प्रेरणा देता है। आप इसे भविष्य का अटल सत्य मानने के बजाय जीवन की योजनाओं को बेहतर बनाने के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में देख सकते हैं।
मेष - पुत्र जन्मदिन मांगलिक कार्य सम्पन्न होंगे, धन लाभ होगा। मित्रवर्ग से सहयोग मिलेगा, व्यापार से लाभ होगा।
वृषभ - अधूरे कार्य पूर्ण होंगे, स्त्री-पुत्र एवं मित्रों का सुख मिलेगा। शरीर कष्ट दूर होगा। चिन्ता दूर, मन शान्त होगा।
मिथुन - पुत्रों की उन्नति होगी, घर में मांगलिक कार्य होगा,धन आगमन योग बना है। कहीं जाना भी होगा।
कर्क - स्वास्थ्य में सुधार आयेगा, जीवन साथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। व्यापार में कुछकमी आये। मन चिन्ताग्रस्त रहेगा।
सिंह - स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानी बढ़ेगी, वाहन दुर्घटना की आशंका है। स्त्री से मनमुटाव होने से मन चिन्तित होगा।
कन्या - ग्रहों स्थिति मध्यम फलदायक है, मन-मस्तिष्क उदास रहेगा। शुभ सन्देश मिलेगा। मन में प्रसन्नता बढ़ेगी।
तुला - बौद्धिक क्षमता सुदृढ़ होगी, वाणी व्यवहार में निखार आयेगा। गृह क्लेश अधिक होगा। खर्च भी अधिक होगा।
वृश्चिक - आप मानसिक रूप से परेशान रहेंगे, अधिकारी वर्ग आप से नाराज रहेंगे। भाईयों से सहयोग मिलेगा। यात्रा से भी लाभ होगा।
धनु - शनि अत्यन्त शुभ फल कारक है, कारोबार में सफलता मिलेगी। मनोवांछित कार्य बनेंगे, कहीं से विशेष लाभ होगा।
मकर - शुभ कार्यों की ओर प्रवृत्ति बनेगी, जायदाद संबंधी कार्यों में प्रगति होगी। भूमि सम्बन्धी विवाद बनेगा। विवाद बढ़ायें नहीं।
कुम्भ - आय में कमी, नौकरी वालों के लिए तनाव हो सकता है। नया वाहन खरीदा जायेगा। खर्च कम करें।
मीन - अपयश सम्भव है, कोई जटिल समस्या खड़ी हो सकती है। मित्रों से सहयोग मिलेगा। व्यापार उत्तम होगा।
अश्विनी नक्षत्र
अश्विनी नक्षत्र वैदिक ज्योतिष के 27 नक्षत्रों में से पहला नक्षत्र है। यह मेष राशि में 0 डिग्री से 13.2 डिग्री तक स्थित है। इस नक्षत्र का स्वामी केतु है और यह अश्विनी कुमार नामक देवताओं से संबंधित है, जो चिकित्सक के रूप में जाने जाते हैं।
अश्विनी नक्षत्र के बारे में कुछ मुख्य बातें-स्वामी ग्रह - केतु,देवता - अश्विनी कुमार,राशि - मेष,नाड़ी - मध्य नाड़ी,शुभ रंग - लाल,गुण - ऊर्जावान, साहसी, गतिशील, चंचल, तीव्र गति से काम करना
व्यवसाय-डॉक्टर, सर्जन, उद्यमी, वैज्ञानिक, तकनीकी विशेषज्ञ, खिलाड़ी, मीडिया, मनोरंजन
अश्विनी नक्षत्र में जन्मे लोगों का व्यक्तित्व-ये लोग ऊर्जा से भरे होते हैं और हमेशा कुछ ना कुछ करते रहना पसंद करते हैं। ये लोग चुनौतियों से नहीं डरते और अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए दृढ़ रहते हैं। ये लोग जल्दी निर्णय लेते हैं और जल्दी काम करते हैं। ये लोग अपने सिद्धांतों पर अडिग रहते हैं और शांत स्वभाव के होते हैं। ये लोग दूसरों की मदद करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। हनुमान जी की पूजा करें और मंगलयंत्र की स्थापना करें। लाल रंग के वस्त्र या रत्न पहनें। ॐ अश्विना तेजसा चक्षु प्राणेन सरस्वती वीर्यम् मंत्र का जाप करें। अश्विनी नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह अश्वमुख (घोड़े का मुख) है, जो गति, ऊर्जा और शक्ति का प्रतीक है। यह नक्षत्र गंडमूल नक्षत्रों में से एक है, इसलिए इस नक्षत्र में जन्मे लोगों को विशेष ध्यान रखना चाहिए। अश्विनी नक्षत्र में जन्मे लोग अक्सर अपनी योजनाओं को सार्वजनिक करने से पहले उन्हें पूरा करने की कोशिश करते हैं। इस नक्षत्र में जन्मे लोग अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह हो सकते हैं, इसलिए उन्हें अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए। अश्विनी नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातकों के लिए कुछ उपाय हैं जो उनकी समस्याओं को दूर करने में मदद कर सकते हैं। इन उपायों में अश्विनी नक्षत्र मंत्र "ॐ अश्विनी कुमारया नमः" का जाप करना, हनुमान जी की पूजा करना, मूंगा रत्न धारण करना, और पीपल वृक्ष की पूजा करना शामिल है । अश्विनी कुमार के स्वास्थ्य मंत्र का जाप करने से गंभीर बीमारियों से बचा जा सकता है ।
मंगलवार, शनिवार, अश्विनी नक्षत्र के दिन पूजा या अभिषेक करने से भी सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं ।
अश्विनी नक्षत्र के जातकों को अपने करियर और स्वास्थ्य के प्रति अधिक ध्यान देना चाहिए। वे रचनात्मक और ऊर्जावान होते हैं, और उन्हें ऐसे क्षेत्र में काम करना चाहिए जो उनकी रचनात्मक क्षमताओं और ऊर्जा का उपयोग करता है ।
अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527,9560518227
अगस्त मास के महत्व पूर्ण दिवस - 2026
1 अगस्त - विश्व स्तनपान सप्ताह(1 से 7 अगस्त),वर्ल्ड वाइड वेब डे,मुस्लिम महिला अधिकार दिवस,विश्व फेफड़े का कैंसर दिवस,विश्व फिनटेक दिवस,लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक पुण्य तिथि स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक और 'स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है' का नारा देने वाले प्रमुख नेता।
2 अगस्त - दादरा एवं नगर हवेली को मुक्त कराए जाने की वर्षगांठ,पिंगली वेंकैया(राष्ट्रीय ध्वज डिजाइन ) जयंती,अर्थ ओवरशूट दिवस 2023,
3 अगस्त - मैथिलीशरण गुप्त का जयंती, हिंदी के महान कवि, जिन्हें 'राष्ट्रकवि' की उपाधि से सम्मानित किया गया
4 अगस्त - राष्ट्रीय अस्थि एवं जोड़ दिवस
6 अगस्त - हिरोशिमा दिवस
7 अगस्त - राष्ट्रीय हथकरगा दिवस,भाला फेंक दिवस(जेवलिन थ्रो डे), रवीन्द्रनाथ टैगोर (नोबेल पुरस्कार विजेता, महान कवि और राष्ट्रगान 'जन गण मन' के रचयिता) का निधन 7 अगस्त, 1941 को हुआ था।
8 - अगस्त - भारत छोड़ो आंदोलन की वर्षगांठ
9 - अगस्त - नागासाकी दिवस, अगस्त क्रान्ति दिवस,विश्व आदिवासी दिवस/स्वदेशी लोगों का अंतरराष्ट्रीय दिवस,सिंगापुर का स्वतंत्रता दिवस
10 अगस्त - विश्व जैव ईंधन दिवस,अंतर्राष्ट्रीय शेर दिवस
11 अगस्त 2008 - महिला हाॅकी अकादमी, अजमेर प्रारम्भ,विश्व स्टीलपैन दिवस, खुदीराम बोस (भारत की आजादी के लिए सबसे कम उम्र में फांसी पर चढ़ने वाले महान क्रांतिकारी) का निधन 11 अगस्त, 1908 को हुआ था।
12 - अगस्त - 1943 को जयपुर में लड़कियों का प्रथम पब्लिक स्कूल - एम. जी. डी. स्कुल खोला गया।,अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस,विश्व हाथी दिवस,विक्रम साराभाई भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के संस्थापक और भारत के महान भौतिक विज्ञानी
13 - अगस्त- विश्व अंगदान दिवस,अंतर्राष्ट्रीय लेफ्ट हैंडर्स डे
14 - अगस्त - पाकिस्तान का स्वतंत्रता दिवस,विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस
15 - अगस्त- स्वतंत्रता दिवस,बांग्लादेश का राष्ट्रीय शोक दिवस, राष्ट्रीय पोषाहार सहायता कार्यक्रम(मिड डे मिल) शुरू,1956 - केन्द्रीय कृषि फार्म सूरतगढ़ की स्थापना रूस की सहायता से
19 - अगस्त - विश्व फोटोग्राफी दिवस,विश्व मानवीय दिवस,संस्कृत सप्ताह 2021(19 से 25 अगस्त)
20 - अगस्त - अक्षय ऊर्जा दिवस,सद्भावना दिवस,पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की जयंती,1949 - राजस्थान लोक सेवा आयोग की स्थापना,विश्व मच्छर दिवस,विश्व जल सप्ताह 2023: (20 से 24 अगस्त)
21 - अगस्त - विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस,अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद पीड़ित स्मृति एवं श्रद्धांजली दिवस
22 - अगस्त - धर्म या मत के आधार पर हिंसक कृत्यों पीड़ितों की स्मृति में अंतर्राष्ट्रीय दिवस
23 - अगस्त - दास व्यापर और उसके उन्मूलन की याद के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस,इंटरनॉट दिवस (WWW),राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस
26 - अगस्त - महिला समानता दिवस,मदर टेरेसा की जयंती,इंटरनेशनल डॉग डे
27 - अगस्त विश्व झील दिवस
29 - अगस्त राष्ट्रीय खेल दिवस,1949 - राजस्थान उच्च न्यायालय की स्थापना,परमाणु परीक्षण के विरुद्ध अंतर्राष्ट्रीय दिवस,ध्यान चंद जयंती 'हॉकी के जादूगर' के नाम से मशहूर, जिनकी याद में 29 अगस्त को भारत में 'राष्ट्रीय खेल दिवस' मनाया जाता है।
30 - अगस्त - जबर्दस्ती गुम किए गए पीड़ितों का अंतर्राष्ट्रीय दिवस,व्हेल शार्क दिवस,राष्ट्रीय लघु उद्योग दिवस
31 - अगस्त - विश्व संस्कृत दिवस ,31 - अगस्त - अफ्रीकी मूल के लोगों के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस
शिव तो वह 'अस्तित्व' हैं, जो तब भी था
जब कुछ नहीं था
जब हम शिव को खोजने निकलते हैं, तो हम किसी व्यक्ति या किसी देवता को नहीं ढूंढ रहे होते। हम उस खालीपन को ढूंढ रहे होते हैं, जहाँ से यह पूरी सृष्टि जनमी है और जहाँ एक दिन सब कुछ विलीन हो जाना है। शिव कोई व्यक्ति नहीं, जिसे आप गले लगा सकें। शिव कोई मूर्ति नहीं, जिसके सामने आप सिर्फ सिर झुका सकें। शिव तो वह 'अस्तित्व' हैं, जो तब भी था जब कुछ नहीं था, और तब भी रहेगा जब कुछ नहीं बचेगा। जब हम शिव के दर्शन को समझने की कोशिश करते हैं, तो हम वास्तव में स्वयं के ही सबसे गहरे और अजन्मे हिस्से से टकरा रहे होते हैं। यह कहानी मेरी उसी खोज की है, जो शायद आपकी भी हो सकती है। मैं दुनिया की भागदौड़ से थक चुका था। दिमाग में विचारों का ऐसा शोर था, जैसे कोई अनियंत्रित बवंडर चल रहा हो। उस रात मैंने तय किया कि मुझे इस शोर से दूर जाना है। मैं बिना किसी योजना के पहाड़ों की तरफ निकल पड़ा। चलते-चलते मैं एक ऐसी जगह पहुँचा, जहाँ सिर्फ गहरी खामोशी थी। आसमान में तारों का जाल बिछा था और सामने हिमालय की विशाल चोटियाँ खड़ी थीं। वहाँ बैठकर जब मैंने आँखें बंद कीं, तो मुझे पहली बार महसूस हुआ कि शिव कोई बाहर बैठी हुई शक्ति नहीं हैं। शिव तो वह शून्यता है, जो हमारे भीतर तब बचती है जब हम अपने सारे मुखौटे, सारी चिंताएँ और सारा अहंकार उतारकर फेंक देते हैं। वह शांत पहाड़, वह ठंडी हवा और वह असीम आकाश—सब कुछ शिवमय लग रहा था।दर्शन की भाषा में जिसे हम 'शून्य' कहते हैं, वही विज्ञान की भाषा में 'अनंत'है। शिव इसी विरोधाभास का नाम हैं। वे सच्चिदानंद हैं—सत्य, चित्त और आनंद का अखंड स्वरूप। जब हम आँखें बंद करके ब्रह्मांड के अंतहीन फैलाव को देखते हैं, तो वह 'अंधकार' शिव है। जब हम चेतना की परम गहराइयों में उतरते हैं, तो वह 'मौन' शिव है। सृष्टि का नियम है कि जो कुछ भी आकार लेता है, वह एक दिन निराकार हो जाता है। यह विसर्जन कोई अंत नहीं, बल्कि अपनी मूल अवस्था में लौटने की प्रक्रिया है। शिव वही मूल अवस्था हैं। हम सब तरंगें हैं, और शिव वह महासागर हैं जिसमें हम उठते हैं, खेलते हैं और अंततः विलीन हो जाते हैं। बैठे-बैठे अचानक रात के तीसरे पहर हवा का रुख बदला। एक भीषण तूफान उठा। पेड़ों की डालियाँ टूटने लगीं, बादलों की गड़गड़ाहट से पूरी घाटी गूंज उठी। प्रकृति का वह रौद्र रूप देखकर मैं अंदर तक काँप गया। लेकिन उसी डर के बीच मुझे एक गहरा बोध हुआ।यह प्रकृति का तांडव था। हम अक्सर शिव के तांडव को सिर्फ विनाश से जोड़कर देखते हैं, लेकिन सच तो यह है कि बिना विनाश के नया सृजन संभव ही नहीं है।पुरानी पत्तियों का गिरना जरूरी है ताकि नई कोपलों को जगह देख सकें अहंकार का टूटना जरूरी है ताकि भीतर प्रेम का जन्म हो सके। भ्रम का मिटना जरूरी है ताकि सत्य का साक्षात्कार हो सके। उस कड़कती बिजली में मुझे शिव का वह रूप दिखा जो संहारक भी है और वही परम रक्षक भी। जब तूफान थमा, तो चारों तरफ जो शांति फैली, वह पहले से कहीं ज्यादा गहरी और दिव्य थी।
शिव इसी विनाश के बाद बची हुई भस्म को अपने शरीर पर मलते हैं और श्मशान में निवास करते हैं। यह कोई डरावना दृश्य नहीं, बल्कि जीवन का सबसे बड़ा वेदांतिक सत्य है। भस्म इस बात का प्रतीक है कि यह नश्वर शरीर, जिसके पीछे इंसान जीवनभर भागता है, अंत में मुट्ठीभर राख में बदल जाएगा। जब आप इस नश्वरता को स्वीकार कर लेते हैं, तो आपके भीतर से मृत्यु का भय हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है। जो मृत्यु से पार पा गया, वही 'महाकाल' है। शिव हमें सिखाते हैं कि वैराग्य का अर्थ संसार को छोड़ना नहीं है, बल्कि संसार के इस अस्थायी स्वरूप को पहचानकर इसके मोह से मुक्त हो जाना है। सुबह की पहली किरण जब बर्फ से ढकी चोटियों पर पड़ी, तो वे सोने की तरह चमक उठीं। मैंने सोचा कि जो शिव इतने परम वैरागी हैं, जो श्मशान की भस्म लपेटते हैं, वही पार्वती के साथ गृहस्थ जीवन के आदर्श भी हैं। हमारा मन हमेशा द्वंद्व में जीता है—अच्छा और बुरा, सही और गलत, पुरुष और स्त्री। शिव का 'अर्धनारीश्वर' रूप इसी द्वंद्व की परम समाप्ति है।
यह दर्शन बताता है कि ब्रह्मांड की दो मुख्य ऊर्जाएं—शिव (पुरुष/चेतना) और शक्ति (प्रकृति/ऊर्जा)—अलग नहीं हैं। बिना चेतना के ऊर्जा अंधी है। बिना ऊर्जा के चेतना निष्क्रिय (शव के समान) है। जब हमारे भीतर का तार्किक मन (शिव) और करुणामयी हृदय (शक्ति) एक हो जाते हैं, तब हमारे भीतर अद्वैत का जन्म होता है। तब कोई दूसरा नहीं बचता, सिर्फ एक ही ब्रह्म का अनुभव होता है। शिव का अर्थ ही है—अतिवादी न होना, बल्कि जीवन के हर रंग को पूरी गहराई से जीना और फिर भी पूरी तरह मुक्त रहना। इस यात्रा के दौरान मुझे समुद्र मंथन की वह कथा याद आई जब अमृत से पहले विष निकला था। उसे ग्रहण करने के लिए कोई तैयार नहीं था, तब शिव ने उस 'हलाहल' को अपने कंठ में रोक लिया और 'नीलकंठ' कहलाए। दार्शनिक स्तर पर, यह विष हमारे भीतर का कड़वा अनुभव, ईर्ष्या, क्रोध और संसार के कष्ट हैं। शिव हमें सिखाते हैं कि उस विष को न तो बाहर उगलना है (दूसरों को चोट पहुँचाना) और न ही अंदर उतारना है (खुद को बीमार करना)। उसे अपने 'कंठ' यानी सजगता के केंद्र पर रोक लेना है। जब आप ध्यान की अग्नि से अपने कष्टों को देखते हैं, तो वह विष भी नीले रंग के एक सुंदर आभूषण में बदल जाता है। आपकी पीड़ा ही आपकी मुक्ति का मार्ग बन जाती है। जब मैं उस यात्रा से वापस लौटने लगा, तो मेरे पैर भले ही नीचे जमीन की तरफ बढ़ रहे थे, लेकिन मेरा मन वहीं ठहर गया था। मैंने समझ लिया था कि शिव को पाने के लिए किसी गुफा या पहाड़ पर हमेशा के लिए रहने की जरूरत नहीं है।
इस दार्शनिक यात्रा के अंत में, जब सारा कोलाहल शांत हो जाता है, तब कोई 'पूजने वाला' नहीं बचता और न ही कोई 'पूज्य' बचता है। दूरी समाप्त हो जाती है। उपनिषदों का वह महावाक्य गूंजने लगता है—"अहं ब्रह्मास्मि" या "शिवोऽहम्" (मैं ही शिव हूँ)। जब भी आप किसी भूखे को देखकर पिघलते हैं, तो आपके भीतर का 'भोलानाथ' जागता है। जब आप अन्याय के खिलाफ खड़े होते हैं, तो आपके भीतर का 'रुद्र' जागता है। और जब आप सब कुछ भूलकर गहरे ध्यान या शांति में डूब जाते हैं, तो आप स्वयं 'शिव' हो जाते हैं। शिव को बाहर ढूंढना बंद कर दीजिए। जब आप अपनी हर सांस के आने और जाने के बीच के उस सूक्ष्म 'ठहराव' को पकड़ पाते हैं, जहाँ कोई विचार नहीं होता, बस वही क्षण शिव है। यह कहानी मेरी डायरी का एक पन्ना मात्र नहीं है, यह मेरे भीतर चल रहे उस निरंतर रूपांतरण की गाथा है जो मुझे हर दिन थोड़ा और मौन, थोड़ा और सरल और थोड़ा और 'शिव' बना रही है....
डॉ. क्रिस्टोफर विल्सन जब बनारस रेलवे पर उतरे, तो उनके पास तीन सूटकेस, दो लैपटॉप, एक हाई-टेक वॉयस रिकॉर्डर और अमेरिकी सरकार से मिला पाँच लाख डॉलर का रिसर्च ग्रांट था। क्रिस्टोफर का मानना था कि दुनिया की हर समस्या का समाधान 'डेटा' और 'स्टैटिस्टिक्स' (आँकड़ों) से हो सकता है। वे रेलवे स्टेशन से टैक्सी में बैठे। जैसे ही टैक्सी गोदौलिया चौराहे के पास पहुँची, क्रिस्टोफर का 'हार्वर्ड लॉजिक' धड़ाम हो गया। सामने का नजारा ऐसा था जैसे पूरी दुनिया की आबादी, सारे सांड, सारी मोटरसाइकिलें, और तीन-चार बारातें एक साथ एक ही संकरी गली में घुसने की जिद कर रही हों।ट्रैफिक पिछले ४५ मिनट से एक इंच भी नहीं हिला था। क्रिस्टोफर ने परेशान होकर टैक्सी ड्राइवर—'कल्लू भाई' से पूछा, "मिस्टर ड्राइवर, यहाँ ट्रैफिक मैनेजमेंट का कोई सिस्टम क्यों नहीं है? व्हाई इज एवरीवन हॉर्निंग? (सब हॉर्न क्यों बजा रहे हैं?)" कल्लू भाई ने आराम से अपनी सीट के नीचे से खैनी का डिब्बा निकाला, हथेली पर चूना रगड़ा, एक 'थप्पड़' खैनी को मारा और मुँह में दबाते हुए बोले, "अरे साहेब, काहे हाइपर हो रहे हैं? ई ट्रैफिक नहीं है, ई 'मिलन समारोह' है। यहाँ हॉर्न बजाने का मतलब ई नहीं है कि सामने वाले को हटना है। हॉर्न बजाने का मतलब होता है—'भैया, हम भी यहीं हैं, तुम भी यहीं हो, जरा सट के चलो, अच्छा लग रहा है!' आराम से बैठिए, अभी आधा घंटा और लगेगा, तब तक गाड़ी का एसी बंद कर दें? पेट्रोल फालतू जल रहा है।"
क्रिस्टोफर ने अपनी डायरी खोली और काँपते हाथों से पहला नोट लिखा: “In Banaras, traffic is not a logistics problem; it is a spiritual get-together. Time has no value, but petrol has.”
क्रिस्टोफर साहब को बनारस रिसर्च के लिए एक लोकल गाइड की जरूरत थी। होटल के मैनेजर ने उन्हें मिलवाया—कतवारू गुरु से। कतवारू गुरु वो शख्स थे जो अस्सी घाट पर पिछले १५ साल से बिना किसी नौकरी के, सिर्फ एक बनारसी गमछा कंधे पर डाल के 'इंटरनेशनल अफेयर्स' पर चर्चा करते थे। उनका मुख्य काम था—विदेशी रिसर्चरों का 'ज्ञान चक्षु' खोलना।
क्रिस्टोफर ने कतवारू गुरु को अपने वीआईपी होटल के कमरे में बुलाया। क्रिस्टोफर ने अपना आईपैड ऑन किया और बोले, "मिस्टर कतवारू, मुझे बनारस के 'टाइम मैनेजमेंट' पर डेटा चाहिए। यहाँ के लोग दुकान कब खोलते हैं और कब बंद करते हैं, इसका कोई फिक्स टाइम टेबल है?"
कतवारू गुरु हँसे। ऐसी हँसी जिसमें हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की पूरी साक्षरता दर पर तरस खाया गया हो। उन्होंने चबाए हुए पान का रस थूकदान में डाला और बोले, "देखो डॉक्टर साहेब, आपके अमेरिका में घड़ी लोगों को चलाती है। हमारे बनारस में लोग घड़ी को चलाते हैं। यहाँ दुकान खुलने का समय ई नहीं है कि सुबह ९ बज गए। यहाँ दुकान तब खुलती है जब दुकानदार की नींद खुलती है, और दुकान की मालकिन (पत्नी) चाय की पत्ती खत्म होने की शिकायत करती है। और बंद होने का समय? जब पप्पू भाई का मूड हो जाए कि 'अब बहुत पैसा कमा लिए, अब जरा घाट पर जाके हवा खाया जाए', तो शटर धड़ाम! यहाँ बिजनेस 'प्रॉफिट' पर नहीं, 'मूड' पर चलता है।"
क्रिस्टोफर ने चश्मा ठीक करते हुए कहा, "बट दिस इज इकोनॉमिक सुसाइड! (यह तो आर्थिक आत्महत्या है!)"
कतवारू गुरु ने क्रिस्टोफर के सूट वाले कंधे पर अपना हाथ रखा और बोले, "यही तो आप नहीं समझ पा रहे हैं गुरु। जो रोज कमा के रोज राजा है, उसको सुसाइड का डर क्या? यहाँ हर आदमी 'किंग' है, बस उसका कोई किंगडम नहीं है।"
क्रिस्टोफर को लगा कि अगर लोगों का मूड समझना है, तो उनके खान-पान पर रिसर्च करनी होगी। कतवारू गुरु उन्हें सुबह-सुबह 'कचौड़ी गली' ले गए। गली इतनी संकरी कि अगर दो मोटे आदमी आमने-सामने से आ जाएं, तो एक को वापस लौटकर सीधे लंका चौराहे जाना पड़े।
वहाँ एक दुकान थी जिसके बाहर करीब दो सौ लोग भूखे शेरों की तरह खड़े थे। कड़ाही में शुद्ध देसी घी में कचौड़ियाँ छन रही थीं। दुकानदार का नाम था—'छोटू बाबा'। छोटू बाबा बिना बनियान के, सिर्फ एक धोती पहने, पसीने से तरबतर होकर कचौड़ी छान रहे थे।
क्रिस्टोफर ने अपनी जेब से एक 'सैनिटाइटर' निकाला, अपने हाथ साफ किए और छोटू बाबा से अंग्रेजी में पूछा, "मिस्टर छोटू, डू यू हैव एनी हाइजीन सर्टिफिकेट फ्रॉम द गवर्नमेंट? (क्या आपके पास सरकार का कोई स्वच्छता प्रमाण पत्र है?)"
छोटू बाबा ने कड़ाही से जलती हुई कचौड़ी निकाली, सीधे क्रिस्टोफर के सामने पत्तल पर रखी और बोले, "साहेब! हमारा सर्टिफिकेट ई सामने खड़ी भीड़ है। ई जो पसीना देख रहे हैं न? ई पसीना नहीं है, ई कचौड़ी का 'सीक्रेट मसाला' है! जो एक बार खाएगा, वो बार-बार आएगा। और रही बात सरकार की, तो कल यहाँ के कोतवाल साहब खुद दो प्लेट पैक करा के ले गए हैं। अब खाओगे कि लैक्चर दोगे?" कतवारू गुरु ने कोहनी मारी—"खा लो गुरु, नहीं तो बाबा खिसिया जाएंगे (गुस्सा हो जाएंगे)।"
क्रिस्टोफर ने डरते-डरते एक कचौड़ी का टुकड़ा मुँह में डाला। कचौड़ी का तीखापन और हींग का ब्लास्ट सीधे क्रिस्टोफर के मेडुला ओबलोंगाटा (दिमाग के पिछले हिस्से) से होता हुआ पेट में उतरा। पहले पाँच सेकंड तो क्रिस्टोफर को लगा कि उनके पेट में कोई परमाणु बम फट गया है, लेकिन छठे सेकंड उनके मुँह से निकला—"ओह माय गॉड! दिस इज हेवनली!" उन्होंने तुरंत अपनी डायरी में लिखा: “Banarasi street food defies all laws of global hygiene, but the taste stimulates the hidden dimensions of human consciousness. Note: Keep antacids ready for the night.” रिसर्च के दूसरे हफ्ते क्रिस्टोफर को लगा कि जब तक वे बनारस के प्रसिद्ध 'शिव तत्व' और 'प्रसाद' (भांग) को नहीं चखेंगे, उनकी मानवविज्ञानी रिसर्च अधूरी रहेगी। वे कतवारू गुरु के साथ गोदौलिया के सरकारी भांग के ठेके पर पहुँचे। क्रिस्टोफर ने बहुत होशियारी दिखाते हुए कहा, "आई वांट द मोस्ट साइंटिफिकली प्रिपेयर्ड कैनबिस (भांग)।" दुकानदार ने उन्हें 'स्पेशल विजया ठंडाई' बनाकर दी। क्रिस्टोफर ने उसे किसी प्रोटीन शेक की तरह एक सांस में पी लिया। पीने के बाद वे बोले, "इट्स जस्ट मिल्क एंड नट्स। नथिंग स्पेशल।" कतवारू गुरु मुस्कुराए और बोले, "गुरु, बनारस की भांग 'बुलेट' नहीं है जो तुरंत मार दे। ई 'टाइम बम' है। आराम से घाट की सीढ़ियों पर चलिए, वहीं फटेगा।"
ठीक पैतालीस मिनट बाद, जब क्रिस्टोफर केदार घाट पर बैठे थे, अचानक उनके चेहरे का रंग गुलाबी से बैगनी होने लगा। उन्हें लगा कि गंगा नदी ऊपर की तरफ बह रही है और आसमान में उड़ने वाली चीलें उनसे हार्वर्ड के इकोनॉमिक्स सिलेबस के बारे में पूछ रही हैं। क्रिस्टोफर धीरे से उठे, अपने दोनों हाथ हवा में फैलाए और घाट पर घूम रहे एक मोटे, काले सांड के सामने घुटनों के बल बैठ गए। क्रिस्टोफर ने सांड की आँखों में आँखें डालीं और रोते हुए बोले, "ओह वाइस ओल्ड मैन! (ओह बुद्धिमान वृद्ध पुरुष!) मुझे पता है कि तुम ही पिछले जनम में मेरे हार्वर्ड के डीन थे! तुम्हारी आँखें बिल्कुल वैसी ही हैं। मुझे माफ कर दो, मैंने अपनी थीसिस समय पर जमा नहीं की थी!" सांड ने क्रिस्टोफर को देखा, एक बार 'हूँ' किया और अपनी पूंछ क्रिस्टोफर के गाल पर मारकर आगे बढ़ गया। क्रिस्टोफर वहीं सीढ़ियों पर लेट गए और जोर-जोर से हंसने लगे—"आई हैव फाउंड द साल्वेशन! आई हैव फाउंड द मोक्ष!" कतवारू गुरु बगल में बैठकर चुपचाप उनका वीडियो बना रहे थे और सोच रहे थे, "चलो, एक और गोरा तर गया! अब इसका वीडियो दिखा के इससे पाँच सौ रुपया और झटकेंगे।" तीन महीने का समय बीत गया। क्रिस्टोफर का वीसा खत्म होने की कगार पर था। उनका शरीर अब कचौड़ी और मलाई योगा करके थोड़ा भारी हो गया था। गोरा रंग धूप और घाट की हवा खाकर थोड़ा 'पक्का' हो चुका था। कंधे पर अब हार्वर्ड का ब्रांडेड बैग नहीं, बल्कि पाँच सौ रुपये वाला बनारसी झोला था, जिस पर लाल रंग से 'महाकाल' लिखा था।
लौटने की आखिरी शाम, वे अस्सी घाट पर पप्पू की अड़ी पर बैठे थे। उनका लैपटॉप बैग में बंद था, और वे हाथ में कुल्हड़ लेकर चाय की चुस्की ले रहे थे। क्रिस्टोफर ने कतवारू गुरु को देखा और बोले, "कतवारू, जब मैं अमेरिका से आया था, तो मेरे पास बहुत सारे सवाल थे और बहुत सारा डेटा था। आज मेरे पास कोई डेटा नहीं है, और कोई सवाल भी नहीं है।"
कतवारू गुरु ने चाय का घूंट लिया और बोले, "तो क्या समझे डॉक्टर साहब? कुछ खोपड़ी में घुसा या सब बाउंस कर गया?"क्रिस्टोफर ने मुस्कुराकर अपनी शुद्ध अमेरिकी अंग्रेजी में थोड़ा बनारसी पुट मिलाते हुए कहा: "मैं यह समझा कि दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं। एक वो जो जिंदगी को 'सॉल्व' (हल) करना चाहते हैं, जैसे हम वेस्टर्न लोग। और दूसरे वो, जो जिंदगी को सिर्फ 'इन्जॉय' करते हैं, जैसे बनारसी लोग। वेस्टर्न लोग मरने के बाद हेवन (स्वर्ग) जाना चाहते हैं, और बनारसी लोग जीते जी मणिकर्णिका को देखकर मुस्कुराते हैं कि—'चलो, टिकट तो यहीं का कटना है, तो अभी काहे का टेंशन!' यहाँ लाइफ कोई प्रॉब्लम नहीं है गुरु, लाइफ एक 'शाश्वत नौटंकी' है, जिसका मजा सिर्फ कुल्हड़ की चाय और बनारसी पान के साथ ही लिया जा सकता है।" क्रिस्टोफर विल्सन हार्वर्ड लौट गए। उन्होंने जो रिपोर्ट जमा की, उसका कोई भी हिस्सा अमेरिकी सरकार को समझ नहीं आया, क्योंकि उसमें केवल ग्राफिक्स की जगह घाटों की तस्वीरें थीं और निष्कर्ष में केवल एक ही लाइन लिखी थी:"Don't try to understand Banaras. Just go there, find a guide named Katwaru Guru, open your mouth for a paan, and let the city digest you." बनारस को समझने की कोशिश मत करो। बस वहाँ जाओ, कतवारू गुरु नाम का गाइड ढूंढो, पान के लिए मुँह खोलो, और शहर को तुम्हें पचाने दो...
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