जानकारी काल मासिक जुलाई - 2026

 

जानकारी काल 



   वर्ष-27  अंक - 02           जुलाई  - 2026       पृष्ठ 41   www.sumansangamaashray.com    



“युद्धे च यः पराक्रमी, स एव वीरः।"

जो युद्ध के मैदान में बिना डरे पराक्रम दिखाता है और अपने कर्त्तव्य का पालन करता है, वही सच्चा वीर है

"वीर भोग्या वसुंधरा।"

इस पृथ्वी का उपभोग हमेशा वीर और साहसी लोग ही करते हैं, अर्थात जो डटकर चुनौतियों का सामना करते हैं, सफलता उन्हीं के कदम चूमती है




 प्रधान संपादक व  प्रकाशक

 सतीश शर्मा 



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प्रकाशक व मुद्रक 

सतीश शर्मा के लिय ग्लैक्सी प्रिंटर-106 F,

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 अनुक्रमणिका

अपनों से अपनी बात - 3 

भारतीय संस्कृति में समर्पण और कृतज्ञता का प्रतीक गुरु पूर्णिमा - 4 लेख

सनातन धर्म के गौरव की पुनर्स्थापना और देश की आत्मा को जगाने वाला युग - 6 लेख 

संस्कार - 8 ज्ञानवर्धक लेख 

दादी की बैंक पासबुक - 9 लेख 

ससुराल - 11 कहानी

कुछ तो दे मशवरा - 13 गजल

समर्पण जीवन की सर्वोच्च शक्ति - 14 लेख 

बच्चों में संस्कार डालना माता पिता की पहली जिम्मेदारी  - 16 लेख

मन पंछी - 17 लघु कथा

अंजान मंजिल - 18 कहानी

सोशल मीडिया और हमारा स्वास्थ्य - 20 लेख

पत्नी और प्रेमिका 21 कविता 

बाप है तो सपने हैं - 22 

एक्सपायरी डेट - 23

वानर राज सुग्रीव - 26

अश्वनी नक्षत्र - 29

योगिनी एकादशी - 30

देवशयनी एकादशी - 31

जुलाई मास का पंचांग - 32

मासिक राशिफल- 34 लेख 

जुलाई मास के महत्वपूर्ण दिवस - 37




अपनों से अपनी बात 

अराजकेषु राष्ट्रेषु न धर्मः प्रभवति क्वचित्।परस्परं च खादन्ति दुर्बलान् बलवत्तराः॥

 जिस राज्य में प्रशासन भ्रष्ट,बेईमान या कमजोर हो,वहाँ कभी धर्म नहीं टिक पाता और शक्तिशाली लोग कमजोर लोगों का शोषण करने लगते हैं।

भारत में पेपर लीक एक गंभीर आपराधिक और सामाजिक समस्या बन चुका है, जो देश की पूरी शिक्षा प्रणाली और युवाओं के भविष्य को अंधकार में धकेल रहा है। हाल के वर्षों में NEET, SSC, और विभिन्न राज्य स्तरीय भर्ती परीक्षाओं के प्रश्नपत्र समय से पहले लीक होने की घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। यह केवल एक परीक्षा का विफल होना नहीं है, बल्कि लाखों होनहार छात्रों की सालों की कड़ी मेहनत पर पानी फेरना है। परीक्षा प्रणाली की गोपनीयता भंग होने के पीछे अनेकों  कारण जिम्मेदार हैं। परीक्षा से जुड़े कुछ कर्मचारी और बाहरी शिक्षा माफिया मिलकर करोड़ो-अरबों रुपयों का अवैध धंधा चलाते हैं। डिजिटल युग में भी प्रश्नपत्रों के सुरक्षित ट्रांसफर और प्रिंटिंग प्रेस की सुरक्षा में भारी चूक देखने को मिलती है। परीक्षा कराने वाली राष्ट्रीय और प्रांतीय एजेंसियों में शीर्ष स्तर पर कड़े ऑडिट और जवाबदेही का अभाव रहता है। छात्रों और समाज पर इसका प्रभाव पेपर लीक के परिणाम किसी भी देश के सामाजिक और मानसिक ढांचे को कमजोर करते हैं। दिन-रात एक करके तैयारी करने वाले छात्र परीक्षा रद्द होने पर गहरे मानसिक अवसाद और निराशा का शिकार हो जाते हैं। बेईमानी और अयोग्य लोग आगे निकल जाते हैं, जिससे योग्य उम्मीदवारों को उनका हक नहीं मिल पाता। घोटालों से युवाओं का देश की निष्पक्ष चयन प्रक्रियाओं और पूरी न्याय प्रणाली से भरोसा उठने लगता है। गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों की गाढ़ी कमाई कोचिंग, फॉर्म भरने और यात्राओं में बर्बाद हो जाती है। इस समस्या को जड़ से मिटाने के लिए प्रभावी सुधारात्मक कदमों की आवश्यकता है। केंद्र सरकार द्वारा लाए गए 'पब्लिक एग्जामिनेशन एक्ट' जैसे कानूनों को जमीनी स्तर पर कड़ाई से लागू कर दोषियों को उम्रकैद और भारी जुर्माने की सजा दी जानी चाहिए। प्रश्नपत्रों की छपाई और वितरण के लिए आधुनिक तकनीक जैसे ब्लॉकचेन, सुरक्षित डिजिटल लॉकर और एन्क्रिप्टेड प्रश्नपत्रों का उपयोग होना चाहिए। परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाओं की कार्यप्रणाली को पूरी तरह से पारदर्शी और बाहरी ऑडिट के अधीन किया जाए ताकि किसी भी स्तर पर मिलीभगत को रोका जा सके। पेपर लीक के मामलों की जांच के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतों का गठन हो, ताकि दोषियों को तुरंत सजा मिल सके। युवा किसी भी राष्ट्र की रीढ़ होते हैं, उनके सपनों को सुरक्षित रखना राज्य की पहली जिम्मेदारी है। पेपर लीक केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि राष्ट्र के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। जब तक इस व्यवस्था में पूरी पारदर्शिता, कठोरतम सजा और तकनीकी मजबूती नहीं लाई जाएगी, तब तक "प्रतिभाशाली भारत" का सपना अधूरा ही रहेगा।





भारतीय संस्कृति में समर्पण और कृतज्ञता का प्रतीक - गुरु पूर्णिमा 

सतीश शर्मा 

भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा में गुरु का स्थान ईश्वर से भी ऊपर माना गया है। गुरु न केवल अज्ञान के अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं, बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाते हैं। गुरु द्वारा दिए गए इस अमूल्य ज्ञान और मार्गदर्शन के प्रति अपनी कृतज्ञता, आदर और सम्मान प्रकट करने का माध्यम ही 'गुरु दक्षिणा' है। यह केवल एक औपचारिक उपहार या धन का लेन-देन नहीं है, बल्कि शिष्य का अपने गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण और श्रद्धा का प्रतीक है।

प्राचीन काल में गुरुकुल परंपरा के अंतर्गत शिष्य शिक्षा पूरी होने के बाद अपने गुरु को उनकी इच्छा के अनुसार कोई भेंट देते थे, जिसे गुरु दक्षिणा कहा जाता था। इसका मूल उद्देश्य धन देना नहीं, बल्कि गुरु के प्रति अपनी अटूट निष्ठा और सेवा भाव को प्रमाणित करना था। गुरु दक्षिणा का आध्यात्मिक महत्व यह है कि यह शिष्य के भीतर से 'अहंकार' का नाश करती है। जब एक शिष्य अपना सर्वस्व गुरु के चरणों में अर्पित कर देता है, तो वह सच्चे अर्थों में ज्ञान को आत्मसात करने योग्य बनता है।

भारतीय इतिहास और पुराणों में गुरु दक्षिणा के कई ऐसे अद्भुत उदाहरण मिलते हैं, जो आज भी समाज को प्रेरित करते हैं-

  गुरु दक्षिणा का जब भी जिक्र आता है, एकलव्य का नाम सबसे पहले लिया जाता है। आचार्य द्रोण को साक्षात गुरु न मानते हुए भी, उनकी मूर्ति को साक्षी मानकर एकलव्य ने धनुर्विद्या सीखी। जब द्रोणाचार्य ने दक्षिणा में उनके दाएं हाथ का अंगूठा मांगा, तो एकलव्य ने बिना किसी संकोच या उदासी के तुरंत अपना अंगूठा काटकर गुरु के चरणों में रख दिया। यह समर्पण की पराकाष्ठा थी।

    भगवान श्री कृष्ण और बलराम ने जब महर्षि सांदीपनि के आश्रम में अपनी शिक्षा पूरी की, तो गुरु माता ने दक्षिणा में अपने उस पुत्र को वापस मांगा जो शंखासुर नामक दैत्य द्वारा समुद्र में विलीन हो गया था। श्री कृष्ण ने यमलोक जाकर यमराज से गुरुपुत्र को वापस लाकर गुरु माता को सौंप दिया।

आज के समय में गुरुकुल परंपरा भले ही समाप्त हो गई हो और शिक्षा का स्वरूप व्यावसायिक हो गया हो, लेकिन गुरु दक्षिणा का महत्व आज भी उतना ही प्रासंगिक है। आज के युग में एक शिष्य के लिए सच्ची गुरु दक्षिणा क्या हो सकती है? गुरु द्वारा दी गई शिक्षा और ज्ञान का समाज के कल्याण और देश की प्रगति के लिए उपयोग करना ही सबसे बड़ी दक्षिणा है। गुरु के बताए मार्ग पर चलना, जीवन में ईमानदारी, अनुशासन और मानवता जैसे नैतिक मूल्यों को बनाए रखना। समाज के किसी भी मुकाम पर पहुँचने के बाद भी अपने गुरु के प्रति आदर भाव रखना और उनके प्रति विनम्र रहना।

गुरु दक्षिणा वास्तव में एक शिष्य के चरित्र का परीक्षण है। यह हमें सिखाती है कि ज्ञान मुफ्त में प्राप्त होने वाली वस्तु नहीं है, बल्कि इसकी कीमत सम्मान, अनुशासन और समर्पण से चुकानी पड़ती है। गुरु दक्षिणा की यह पावन परंपरा हमें स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदार बनना सिखाती है। जब एक शिष्य गुरु के आदर्शों को अपने जीवन में उतारता है, वही आधुनिक युग की सबसे सच्ची और अमूल्य गुरु दक्षिणा होती है।









सनातन धर्म के गौरव की पुनर्स्थापना और देश की आत्मा को जगाने वाला युग 

सतीश शर्मा 

आज का समकालीन युग सनातन धर्म के अभूतपूर्व गौरव की पुनर्स्थापना और देश की सोई हुई चेतना को जगाने का युग है। यह कालखंड केवल अतीत के स्मरण तक सीमित नहीं है, बल्कि आधुनिकता और आध्यात्मिकता का समन्वय कर मानवीय मूल्यों को पुनर्जीवित करने का एक स्वर्णिम अध्याय है। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सनातन संस्कृति, आध्यात्मिक विरासत और धार्मिक स्थलों के पुनरुत्थान के लिए कई ऐतिहासिक कार्य किए गए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल को भारत में सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पुनर्जागरण  का एक महत्वपूर्ण दौर माना जाता है। विश्लेषकों का मानना है कि इस दौर ने भारतीय समाज में अपनी विरासत, इतिहास और धार्मिक पहचान को लेकर पुराने 'सांस्कृतिक संकोच' को खत्म किया है और लोगों में एक नया वैचारिक आत्मविश्वास जगाया है। पिछले कुछ वर्षों में देश में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सनातन परंपराओं को राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर एक नई पहचान मिली है । सरकार के "विकास भी, विरासत भी" के विजन के तहत सनातन धर्म के गौरव को वैश्विक स्तर पर पुनर्स्थापित करने के लिए निम्नलिखित प्रमुख कार्य किए गए हैं - 

500 वर्षों के लंबे संघर्ष और कानूनी प्रक्रिया के बाद अयोध्या में प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर का निर्माण और रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा मोदी सरकार के कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाती है । 

बाबा विश्वनाथ के मंदिर परिसर का विस्तार और भव्य सुंदरीकरण किया गया, जिससे पतित पावनी गंगा से सीधे मंदिर तक सुगम मार्ग बना। उज्जैन में भगवान शिव की लीलाओं को दर्शाने वाले एक बेहद विशाल और भव्य 'महाकाल लोक' कॉरिडोर का निर्माण किया गया। उत्तराखंड बाढ़ की त्रासदी के बाद केदारनाथ धाम का भव्य पुनर्निर्माण कराया गया और बद्रीनाथ धाम के लिए भी मास्टर प्लान के तहत विकास कार्य जारी हैं। सोमनाथ मंदिर परिसर में समुद्र दर्शन पथ और अन्य अत्याधुनिक सुविधाओं का विकास किया गया। इसके ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करने के लिए भारत सरकार द्वारा विशेष आयोजन भी किए गए है।

देश के प्रमुख तीर्थस्थलों और ऐतिहासिक धरोहरों के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और आध्यात्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए प्रसाद योजना की शुरुआत की गई। इसके तहत रामायण सर्किट, कृष्णा सर्किट और आध्यात्मिक सर्किट जैसे विशेष पर्यटन मार्गों का निर्माण किया गया ताकि श्रद्धालु भगवान राम और कृष्ण से जुड़े स्थलों के सुगमता से दर्शन कर सके। प्रयागराज महाकुंभ जैसे सनातन धर्म के सबसे बड़े सांस्कृतिक समागमों को वैश्विक स्तर पर स्वच्छ, सुरक्षित और सुव्यवस्थित रूप से आयोजित कराया गया। संयुक्त अरब अमीरात  की राजधानी अबू धाबी में पहले विशाल और पारंपरिक पत्थर के हिंदू मंदिर  का निर्माण प्रधानमंत्री मोदी के प्रयासों से संभव हुआ । बहरीन में 200 साल पुराने भगवान श्री कृष्ण श्रीनाथजी मंदिर के पुनर्विकास और अन्य देशों में मौजूद प्राचीन सांस्कृतिक धरोहरों को सहेजने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की गई।

दशकों पहले भारत के प्राचीन मंदिरों से चोरी कर विदेशों में तस्करी की गई सनातन देवी-देवताओं की सैकड़ों बहुमूल्य मूर्तियों को प्रधानमंत्री मोदी ने अपने राजनयिक संबंधों के माध्यम से वापस भारत मंगवाया। इन सभी कदमों के माध्यम से देश और दुनिया में सनातन परंपराओं, आस्था के केंद्रों और सांस्कृतिक प्रतीकों को एक नया आत्मबल और गौरवशाली पहचान मिली । 

नए संसद भवन में ऐतिहासिक 'सेंगोल' (राजदंड) की स्थापना और स्वतंत्रता सेनानियों व देश के सांस्कृतिक नायकों (जैसे आदि शंकराचार्य, भगवान बिरसा मुंडा) को राष्ट्रीय पटल पर उच्च सम्मान देना इसका उदाहरण है। सनातन संस्कृति के प्राचीन विज्ञान 'योग' को संयुक्त राष्ट्र संघ के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलाई गई, जिसे हर वर्ष दुनिया भर के देश मनाते हैं । संयुक्त राष्ट्र  द्वारा 21 जून को 'अंतरराष्ट्रीय योग दिवस' के रूप में मान्यता दिलाना भारतीय ऋषि परंपरा और दर्शन की वैश्विक स्वीकार्यता का बड़ा प्रतीक बना।

विदेशों में भारतीय संस्कृति की गूंज और वैश्विक मंचों पर पीएम मोदी द्वारा भारतीय दर्शन (जैसे 'वसुधैव कुटुंबकम') को रेखांकित करना सनातन संस्कृति के अंतरराष्ट्रीय विस्तार को दर्शाता है।वैकल्पिक और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण जहां एक बड़ा वर्ग इसे सनातन धर्म के गौरव की पुनर्स्थापना और देश की आत्मा को जगाने वाले युग के रूप में देखता है, वहीं कुछ आलोचकों और राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि विकास के मुख्य एजेंडे में बुनियादी ढांचा, शिक्षा, रोजगार और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को सर्वोपरि रखा जाना चाहिए, ताकि देश आधुनिक और धार्मिक दोनों स्तरों पर संतुलित रूप से आगे बढ़ सके।

भारत की पहचान और उसकी सभ्यता को वैश्विक स्तर पर एक नई स्वीकृति मिल रही है। ऐतिहासिक स्थानों का कायाकल्प तथा प्राचीन विरासत को सहेजने के प्रयास इस युग की मुख्य पहचान हैं। आज का समाज तेजी से विज्ञान और अध्यात्म के संगम को समझ रहा है। योग, आयुर्वेद और वेदों की सार्वभौमिक शिक्षाएं जन-जन तक पहुंच रही हैं। 

लेखक सतीश शर्मा केशव भाग नोएडा राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ  के भाग कार्यवाह है । 

संस्कार 

प्रियंका 

पहले बच्चों को घर में समझाया जाता था कि गाँव/मोहल्ले की लड़की बहन के समान है, कहीं जरुरत पड़े तो उसकी रक्षा की जिम्मेदारी तुम्हारी है, 

परिवार के बच्चो को सही या गलत पर टोकने का हक सभी जन का था पर अब परिवार में ही बच्चो के गलत होने पर देखते हुए भी परिवारजन भी नही बोल सकते , 

मेरी लडकी है या मेरा लड़का है तुमसे क्या मतलब जैसी कड़वी बाते सुना देते है मां बाप...नतीजन

आज आधुनिकता के नाम पर स्कूल से घर आते ही 8 साल के बच्चे से उसी की माँ बत्तीसी दिखाकर पूछती है, कोई गर्ल फ्रेंड बनाई या नहीं? साथ में बैठा बाप भी टोकने की बजाय हँसता है....

घर से नारी सम्मान के संस्कारों की जगह नारी भोग की मानसिकता का विष पिलाया जा रहा है। ऐसे संस्कार राम राज्य नहीं बल्की विनाश काल के राज्य का निर्माण करेंगे। 

पहले नौजवान कालेज जाते... सगी बहन तो छोड़िए, गाँव की लड़की की ओर आँख उठाकर देखने वालो को ढंग से समझा देते थे...उनमें से बहुत सारे ,पीड़ित लड़की को शक्ल से पहचानते तक नहीं होते थे । मगर गाँव की लड़की है बस यही सोच और संस्कार उन्हें उस बहन के सम्मान की खातिर जान पर खेलने से भी परहेज नहीं करने देते थे।

और आज की मानसिकता देखिए…  पड़ोस का आवारा किसी दूर स्थान के आवारा से यह कहता अमूमन मिल जाएगा कि  हमसे तो पटती नहीं, भाई तु पटा ले। 

प्रश्न विचारणीय है साथियों!  अपने घर-परिवार को बदलो देश बदलते देर नहीं लगेगी!

जिन बुजुर्गों के विचारों को हम रद्दी की टोकरी में फेंक आये और आधुनिकता के नाम पर नंगापन और फूहड़ता को ढोते फिर रहे हैं, ऐसी आधुनिकता किस काम की जिसमें हमारी बहन बेटियां ही सुरक्षित नहीं है।


दादी की बैंक पासबुक

नाजुक पंखुड़ी 

दादी मर गई थीं… लेकिन उनकी मौत पर घर में कोई नहीं रोया। रोना तो दूर, दोनों बेटे आपस में बहस कर रहे थे। "मां के खाते में कितने पैसे होंगे?" "जमीन किसके नाम है?" "संदूक की चाबी कहां है?" कमरे के कोने में बैठा सत्रह साल का अमन यह सब सुन रहा था। उसकी आंखों में आंसू थे। उसे लग रहा था कि दादी की लाश घर में नहीं, इंसानियत की लाश पड़ी है। दादी पिछले दस साल से इसी घर में थीं।

जब तक दादाजी जिंदा थे, सब उनका सम्मान करते थे। दादाजी के जाते ही दादी बोझ बन गईं। सुबह की चाय कोई नहीं पूछता। दवा खत्म हो जाए तो कोई नहीं लाता। घर में कोई मेहमान आए तो दादी को कमरे में बैठा दिया जाता। लेकिन दादी कभी शिकायत नहीं करती थीं। हर बार मुस्कुराकर कहतीं,"मेरे बच्चे बहुत अच्छे हैं, बस वक्त नहीं है उनके पास।" अमन यह सब देखता था। उसे सबसे ज्यादा प्यार दादी से था। रात को वह उनके कमरे में बैठकर बातें करता। दादी उसके लिए रोटी पर घी लगाकर खिलातीं। कहतीं,"जब मैं नहीं रहूंगी ना, तब मेरी याद आएगी।"अमन तुरंत नाराज हो जाता।

"आप कहीं नहीं जाओगी।" दादी हंस देतीं। लेकिन शायद उन्हें पता था कि उनका समय करीब है।

मरने से एक दिन पहले दादी ने अमन को बुलाया। एक पुरानी बैंक पासबुक उसके हाथ में दी।और बोलीं,"इसे मेरी मौत के बाद खोलना।"अमन ने पूछा,"इसमें क्या है?"दादी मुस्कुरा दीं।"मेरी पूरी जिंदगी।"अगले दिन दादी चली गईं।अंतिम संस्कार हुआ।तेरहवीं हुई।और फिर शुरू हुआ संपत्ति का हिसाब।लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि दादी के नाम कोई जमीन नहीं निकली।कोई एफडी नहीं निकली।कोई लाखों का खाता नहीं निकला।

दोनों बेटे गुस्से में थे।"पूरी जिंदगी कहां खर्च कर दिए पैसे?"तभी अमन को दादी की दी हुई पासबुक याद आई।उसने पासबुक खोली।अंदर केवल 317 रुपये थे।सभी हंसने लगे।"बस इतने पैसे?" लेकिन पासबुक के अंदर एक मुड़ा हुआ कागज भी रखा था।अमन ने पढ़ना शुरू किया।और अगले ही पल पूरे घर में सन्नाटा छा गया।

उसमें लिखा था—"मेरे बच्चों,जब तुम यह चिट्ठी पढ़ रहे होगे, मैं इस दुनिया में नहीं रहूंगी।तुम शायद मेरी पासबुक में पैसे ढूंढ रहे होगे।लेकिन इसमें पैसे नहीं, मेरा हिसाब है।पहला पन्ना खोलना।" अमन ने पहला पन्ना खोला।वहां दादी की लिखावट थी—"1988 — बड़े बेटे की इंजीनियरिंग की फीस भरने के लिए अपने शादी के कंगन बेचे — 42,000 रुपये।"दूसरा पन्ना—"1992 — छोटे बेटे के इलाज के लिए अपनी मां की दी हुई सोने की चेन बेची — 28,000 रुपये।"तीसरा पन्ना— 1998 — घर बनाने के लिए अपनी बची हुई सारी ज्वेलरी बेच दी — 1,75,000 रुपये।" चौथा पन्ना— "2005 — बेटे का बिजनेस डूब गया था, अपनी एफडी तुड़वाकर 3 लाख रुपये दिए।" पांचवां पन्ना— "2011 — बहू के ऑपरेशन के लिए बचाए हुए पैसे दिए।" हर पन्ने पर एक त्याग लिखा था।हर पन्ने पर मां की कुर्बानी लिखी थी।हर पन्ने पर वह रकम लिखी थी जो उन्होंने अपने बच्चों के लिए खर्च की थी। अंतिम पन्ने तक पहुंचते-पहुंचते दोनों बेटों के हाथ कांपने लगे। आखिरी पन्ने पर लिखा था—"कुल जमा रकम : 18 लाख 67 हजार रुपये।" "कुल वापस मिली रकम : 0 रुपये।" इसके नीचे लिखा था—"यह शिकायत नहीं है।मां अपने बच्चों से हिसाब नहीं मांगती। बस इसलिए लिख रही हूं ताकि मेरी मौत के बाद अगर तुम मेरी पासबुक में पैसा ढूंढो, तो पता चल जाए कि मेरा पैसा कहां गया। मैंने बैंक में जमा नहीं किया था।मैंने अपने बच्चों में जमा किया था।"कमरे में सन्नाटा था।किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी ऊपर देखने की।

लेकिन चिट्ठी अभी खत्म नहीं हुई थी।सबसे नीचे लिखा था—"और हां...मेरे खाते में अभी भी 317 रुपये बचे हैं। इन पैसों से मेरे लिए फूल मत खरीदना।किसी भूखी बूढ़ी औरत को खाना खिला देना।शायद उसमें मुझे अपनी मां दिखाई दे जाए।"यह पढ़ते ही बड़े बेटे की चीख निकल गई।वह जमीन पर बैठकर रोने लगा। छोटा बेटा मां की तस्वीर से लिपट गया। बहुएं सिसकने लगीं। लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।

जिस मां ने पूरी जिंदगी उन्हें दिया...वह पहली बार उनसे कुछ कह रही थी।और वह सुनने के लिए जिंदा नहीं थी।अमन ने दादी की तस्वीर उठाई।उसे लगा जैसे तस्वीर में दादी मुस्कुरा रही हैं।

उसी तरह...जैसे हर बार दर्द छुपाकर मुस्कुराया करती थीं।उस दिन घर में पहली बार किसी को समझ आया—मां की सबसे बड़ी जमा पूंजी बैंक बैलेंस नहीं होती...उसके बच्चे होते हैं।

और सबसे बड़ा दुख तब होता है जब बच्चे ब्याज तो लेते रहते हैं, लेकिन प्यार की एक किस्त भी वापस नहीं करते। 



ससुराल 

जब मेरी शादी हुई तो मुझसे कहा गया पति को शारीरिक और मानसिक तौर पर सुख देना ही तुम्हारा कर्तव्य है .... लेकिन जब शादी हुई तो पता चला की भारत में एक लड़की की शादी सिर्फ एक लड़के से नही होती, बल्कि एक पूरे परिवार से होती है जिसमे सास ससुर, ननद देवर और सबसे अंत में पति आते हैं । 

अब जब मैने इसे महसूस किया तो डर गई की अपने आप से मैं खुद तो संभालती नही हूं 4 5 लोगो को कैसे संभालूंगी जैसे तैसे मेरी शादी हुई और एक नए परिवार ने मुझे अपनाया जिंदगी पूरी तरह बदल गईं एक ही रात में मैं घर की लड़की से किसी के घर की बहु बन गई,मैने अपनी सहेलियों में देखा था की शादी के तुरंत बाद ही उनका और उनके ससुराल वालों से झगड़ा होने लगता था मैं कभी भी नहीं चाहती थी की मेरे साथ भी ऐसा हो । शादी के कुछ दिन सब ठीक चला लेकिन कुछ समय बाद घर के लोगो की नजर में मैं खटकने लगी थी जब मैने ये बात अपने पति से बोली तो उन्हें ने मुझे बोला की सबसे पहले अपने दिमाग से ये निकाल दो की मायका  तुम्हारा घर है और ससुराल तुम्हार ससुराल असल में ये ही तुम्हारा घर, जितना जितना खुल के रहोगी। और बाकी लोगो को समझने की कोशिश करेगी तुम्हे उतना आसानी होगी और यही बात उन्होंने घर के बाकी सदस्यों से कही की ये  इसी घर की सदस्य है अगर इससे गलती हो तो इसे समझाओ अगर इसे समझ ना आए तो डांटो और मुझे भी बोला अगर तुम गैर होती तो घर का कोई सदस्य तुम्हे डांटेगा या समझाएगा नही ये बात मैने भी ध्यान से सुनी और मैने कुछ काम किए । 

मेरी सास के साथ ज्यादा समय बिताना शुरू किया, उन्हें समझने की कोशिश की और मुझे समझ आया जो औरत पिछले 40 साल से घर संभाल रही थी वो कभी नहीं चाहेगी की उनसे ये हक छीन लिया जाए । इस लिए अब मुझे कुछ भी करना होता, तो मै उनसे पूछते, पता होता की वो कभी मना नहीं करेंगी लेकिन फिर भी उनसे पूछ के हर काम करती । इससे उन्हें ये एहसास हुआ की आज भी घर में उनकी कदर हो रही है । क्यों की वो बूढी हो रही थी ऐसे में उनके साधारण काम भी मैं अपनी तरफ से कर देती,अब मैं घर में सास की फेवरेट थी मेरी ननद से ज्यादा मेरी सास मुझे मानने लगी सास खुश हुए तो वो पापा यानी मेरे ससुर से तारीफ करती सास खुश तो पापा जी भी खुश हो गए । अब बचे ननद, और देवर इनके लिए कुछ ज्यादा नही करना पड़ा बस जो इन्हे खाना हो वो बना दो और अगर कभी मन ना करे तो मम्मी जी से बोल दो फालतू खाने की डिमांड कर रहे । और इसके अलावा दोनो मुझसे छोटे हैं तो एक दोस्त जैसा व्यवहार किया धीरे धीरे सब खुश हो गए।  

और आज ये स्थिति है की ना तो मुझे ये फील होता है की ये मेरा ससुराल है । और ना मेरे घर वालों को की ये कही बाहर से आई है । जब परिवार का हर सदस्य खुश है तो पतिदेव भी अपने आप ही खुश और संतुष्ट रहते हैं । 

आजकल लड़किया शादी करती हैं और शादी के कुछ दिन बाद ही परिवार से मनमुटाव होने लगता है यही चीज मेरे साथ भी हुई लेकिन मेरे पति के सूझ बूझ की वजह से मैने समय से पहले ही इसे रोक लिया । हमे ये चाहिए की सबसे पहले हम ये समझना चाहिए की ससुराल अपना ही अपना घर है और सास ससुर ही पूरी जिंदगी अपने साथ होंगे । घर वाले खुश होंगे तो पति अपने आप खुश होंगे और अगर पूरा घर खुश है तो क्या बात है। 


ए-ग़मे-ज़िंदगी कुछ तो दे मशवरा,

                 गुंजन वर्मा  हितैषी

ए-ग़मे-ज़िंदगी कुछ तो दे मशवरा,

आख़िर वो किस किस से वफ़ा करता

ए ग़मे ज़िंदगी, कुछ तो दे मशवरा,

कैसे भूलूँ उसे, जो है मेरी दुआ...

उसकी यादों का मौसम भी अजीब है,

धूप में छाँव सा, रात में चाँद सा..!

जब भी तन्हाइयों ने मुझे घेर लिया,

वो एहसास बनकर जैसे आ मिला,

ए ग़मे ज़िंदगी, बस तू इतना बता,

इश्क़ को जीत कहूं या कह दूँ सज़ा..!

मैंने चाहा उसे इबादत की तरह,

वो मिला मुझे नेमत की तरह...

ए ग़मे ज़िंदगी, अब तो है ये फ़ैसला,

उसके बिन भी जिऊँ, उसकी यादों संग चला।



समर्पण: जीवन की सर्वोच्च शक्ति

सतीश शर्मा 

किसी फल की इच्छा किए बिना कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ने का भाव समर्पण होता है। बिना किसी संशय या डर के अपने लक्ष्य या आराध्य पर अटूट भरोसा रखना ही सच्चा समर्पण है।

 प्रेम, मित्रता और पारिवारिक रिश्तों की नींव समर्पण पर ही टिकती है। एक-दूसरे की खुशियों और जरूरतों के लिए अपनी छोटी-मोटी इच्छाओं का त्याग करना रिश्तों को मजबूत बनाता है। सैनिक और समाज सुधारक इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। वे अपने व्यक्तिगत सुखों को छोड़कर देश की सुरक्षा और समाज के कल्याण के लिए खुद को समर्पित कर देते हैं। ईश्वर या गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण व्यक्ति को मानसिक शांति और आंतरिक शक्ति देता है। मीराबाई का कृष्ण के प्रति और हनुमान जी का श्री राम के प्रति समर्पण इसके ऐतिहासिक उदाहरण हैं।

 जब हम अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित होते हैं, तो हमारा ध्यान भटकना बंद हो जाता है। समर्पित व्यक्ति असफलताओं से घबराता नहीं है, बल्कि हर बार दोगुनी ताकत से खड़ा होता है। समर्पण करने से भविष्य की चिंता और परिणाम का तनाव खत्म हो जाता है, जिससे मन शांत रहता है।

समर्पण कमजोरी की निशानी नहीं, बल्कि सर्वोच्च आंतरिक शक्ति का प्रतीक है। यह व्यक्ति को स्वार्थ के संकुचित दायरे से निकालकर महानता के शिखर पर ले जाता है। यदि हम अपने दैनिक जीवन के छोटे-छोटे कार्यों में भी समर्पण का भाव ले आएं, तो जीवन आनंदमय और सफल बन सकता है।

समर्पण एक ऐसा अमूल्य मानवीय गुण है, जो जीवन को दिशा, गहराई और सार्थकता प्रदान करता है। समर्पण का मतलब ही अपने अहंकार को त्यागकर स्वयं को किसी उच्च लक्ष्य, विचार, व्यक्ति या ईश्वर के प्रति पूरी तरह से सौंप देना। विद्यार्थी जब अपनी पढ़ाई के प्रति समर्पित होता है, तो वह ज्ञान के शिखर को छूता है। इसी तरह, खेल, विज्ञान या कला के क्षेत्र में जगदीश चंद्र बसु,पी टी उषा और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम, जैसे महापुरुषों की सफलता उनके काम के प्रति अटूट समर्पण का ही परिणाम थी। समर्पण से हमारी  एकाग्रता को बढ़ती  है और वह हमे  विपरीत परिस्थितियों में भी टूटने नहीं देती । समर्पण की  भावना समाज को आपस में जोड़ती है और आपसी विश्वास को मजबूत करती है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, समर्पण का अर्थ है 'शरणागति'। जब मनुष्य अपने कर्मों को ईश्वर को समर्पित कर देता है, तो वह परिणाम की चिंता और मानसिक तनाव से मुक्त हो जाता है। हनुमान जी का श्री राम के प्रति और मीराबाई का श्री कृष्ण के प्रति समर्पण हमें सिखाता है कि समर्पण व्यक्ति को अमर बना देता है।

समर्पण जब राष्ट्र के प्रति होता है, तो वह 'देशभक्ति' का रूप ले लेता है। देशभक्ति केवल नारों या उत्सवों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अपने देश की उन्नति, सुरक्षा और संस्कृति के लिए स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर देने की भावना है। समर्पण की  भावना किसी भी नागरिक को स्वार्थ से ऊपर उठाकर परमार्थ की ओर ले जाती है। देशभक्ति के इसी पावन समर्पण को दर्शाती ये पंक्तियाँ मन में राष्ट्रप्रेम जगाती हैं-

तन समर्पित, मन समर्पित, और यह जीवन समर्पित,

चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।

इतिहास गवाह है कि जब-जब देश पर संकट आया, हमारे स्वतंत्रता सेनानियों और वीर जवानों ने अपने प्राणों का हंसते-हंसते बलिदान दे दिया। भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद और सुभाष चंद्र बोस जैसे महापुरुषों का जीवन देश के प्रति पूर्ण समर्पण का सबसे बड़ा उदाहरण है। आज भी हमारे सैनिक सियाचिन की हाड़ कंपाने वाली ठंड और रेगिस्तान की तपती धूप में देश की सीमाओं की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तत्पर रहते हैं।

लेकिन देशभक्ति सिर्फ सीमा पर लड़ने का नाम नहीं है। एक आम नागरिक भी अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करके देश के प्रति समर्पित हो सकता है। एक शिक्षक का बच्चों को सही शिक्षा देना, एक डॉक्टर का ईमानदारी से इलाज करना, एक किसान का अन्न उगाना और हर नागरिक द्वारा कानून का पालन करना व पर्यावरण को स्वच्छ रखना भी देशभक्ति का ही एक रूप है। जब हम अपने व्यक्तिगत हितों को छोड़कर देश के विकास के बारे में सोचते हैं, वही सच्चा समर्पण है।

निष्कर्ष रूप में, देश के प्रति समर्पण ही किसी राष्ट्र को महान और विश्व गुरु बनाता है। यदि हम सब मिलकर अपने देश के प्रति वफादार और समर्पित रहें, तो भारत को उन्नति के शिखर पर पहुँचने से कोई नहीं रोक सकता।

समर्पण स्वार्थ से परमार्थ की ओर बढ़ने का मार्ग है। यह जीवन को भटकने से बचाता है और हर कार्य को एक पवित्र उद्देश्य देता है। यदि हम अपने कर्तव्यों का पालन समर्पण भाव से करें, तो हमारा जीवन आनंदमयी, सफल और प्रेरणादायक बन सकता है।


बच्चों में संस्कार डालना माता पिता की 

पहली जिम्मेवारी!

आजकल मीडिया में पुणे की युवती सिया गुप्ता द्वारा अपने मँगेतर केतन को धक्का देकर खाई में गिरा देने(मौत होने) का विषय गरमाया है।

बहुत ही व्यथित करने वाला समाचार है. क्योंकि दोनों परिवार बड़े संपन्न परिवार हैं।

लेकिन क्योंकि बेटी किसी के साथ प्यार में थी और अपने प्रेमी के साथ मिलकर मंगेतर की हत्या कर बैठी। प्रश्न उठता है कि इस प्रकार का भयंकर विचार उस लड़की के मन में आ कैसे गया?

 माँ बाप ने क्या संस्कार दिए थे उसको? सोशल मीडिया और मोबाइल पर लगातार बच्चों को छूट देना,वे क्या कर रहे हैं,किसके साथ आते जाते हैं? इस पर ध्यान ना देना, लाड़ प्यार में बच्चों को बिगाड़ बैठना।आखिर माँ बाप करते क्या है?

अब दोनों परिवार ही पूरी तरह से बर्बाद,हो गए..किस काम आएगा वो पैसा,जिसके चक्कर में बच्चों को अछे संस्कार देना ही भूल गए?

बच्चों को सत्संग में ले जाना। मंदिर ले जाना,अपने पुरखों के बारे में बताना महापुरुषों की कहानियां सुनाना, यह जो अति आवश्यक परिवार से संस्कार मिलने होते हैं, वे नहीं दिए तो इस प्रकार के दिन देखने पढ़ते हैं।

अनेक बार माताओं को छोटे बच्चों के हाथ में मोबाइल देकर,आप स्वयं दूसरे मोबाइल पर लगे रहते देखता हूं तो बड़ा कष्ट होता है। आखिर हम अपने ही बच्चों को अच्छे संस्कार न देकर अपना जीवन क्यों बर्बाद करते हैं?

संयुक्त और बड़ा परिवार रखना, जिसमें मां बाप, दादा दादी हों, कम से कम 3 बच्चे होना और लगातार बच्चों को देश समाज, धर्म के संस्कारों की प्रक्रिया में रखना ही इलाज है।

अगर इतना नहीं करेंगे तो अपना, अपने परिवार का और देश का भविष्य सुखद नहीं बना पाएँगे।

यह सम्पूर्ण समाज को चिंतन की तरफ मोड़ने वाली घटना है। ठीक है कि यह बड़ी घटना सामन्यतः नहीं होती. लेकिन  सामान्य व्यवहार की कठिनाईयाँ तो आम घरों में देखने को मिलती ही हैं।संस्कारों की कमी देखने को मिलती ही है. अवश्य सोचिए और आज से ही परिवार पर, बच्चों पर ध्यान देना शुरू करें ! स्वदेशी चिट्ठी...सतीश आचार्य जी


मन - पंछी 

नोरिन शर्मा

फ़ैमिली कोर्ट से अकेली बाहर निकलकर मान्या कॉलेज पहुँची। पहली दो सुनवाई तक तो माँ साथ हुआ करती थीं पर अब भाभी और उनके बदलते व्यवहार ने उसकी टीस और बढ़ा दी।

 शादी के बाद मान्या एक एक पैसे को बचाकर सुकांत के साथ मिलकर एक घर खरीदना चाहती थी। ससुराल में एक पैसा भी उसने कभी नहीं दिया; और एक साल से मायके में उसकी आधी से ज़्यादा तनख़्वाह खर्च हो रही थी। सुकांत एक साल रुककर घर के लिए बचत की योजना बना रहा था। बस इतनी सी बात "तू तू मैं मैं " में बदल गई और उसे अहंकारी,कंजूस,बदतमीज़ और भी न जाने क्या क्या सुनना पड़ा।अचानक तलाक़ के काग़ज़ सुकांत की टेबल पर पटक, मान्या मायके आ गई।रिश्तों के पुल की चहल क़दमी में दरारें दिखाई दे रहीं थीं लेकिन हर सुनवाई पर सुकांत का शांत और संयमित व्यवहार उसे और बेचैन कर देता। 

' मुझे मनाकर ले जाएगा या लड़ेगा..? क्या वो भी तलाक़ चाहता है?' उसका मन - पंछी कई बार अपने अहम को छोड़ सुकांत के पास उड़ जाना चाहता।

आज अचानक उसने कार सुकांत के ऑफिस की ओर मोड़ दी। एक साल से दोनों के बीच खाई ने जन्म ले लिया था। मान्या अपने पश्चाताप से उसे पाटना चाहती थी। दरारें कदाचित भरी जा सकती थीं किंतु भरभराकर टूटे रिश्तों के सेतु की मरम्मत कैसे हो..???

ऑफिस कैंटीन में किसी खूबसूरत कन्या के साथ डोसा खाते- खाते सुकांत ने उसके हाथ पर अपना हाथ जिस तरह रखा मान्या के आस के मन - पंछी उड़कर क्षितिज में  विलीन हो गए।


अनजान मंजिल

        बालेश्वर गुप्ता, नोएडा 

अरे रमा तुझे क्या हुआ ,सुबह तक तो ठीक थी?  कुछ नही ललिया, हॉस्पिटल तक गयी थी,सब ठीक हो गया है। क्या ठीक हो गया है?

मुझे वो ही हो गया है, जो झुमरी को हुआ है, मुझे भी एक ग्राहक मिल गया है, ललिया, डॉक्टर साहब  पूरे दो लाख रुपये दिला देंगे,और नौ महीने का सब खर्च पानी भी उन्ही के जिम्मे।

        उस बस्ती में ऐसी कई महिला थी,जो किसी संतानहीन दंपती के लिये सेरोगेट मदर बनने जा रही थी।उन्हें कमाई का ये शानदार तरीका लगता था।लाखो रुपये एक झटके में मिल जाते थे,फिर कुछ करने की जरूरत नही रहती थी,और पैदा किया बच्चा भी पास में नही रहता।बस अपनी कोख ही तो नौ महीने को किराये पर देनी पड़ती थी,फिर उन्हें इसके लिये कौनसा किसी से संबंध बनाना पड़ता था। ऐसे ही एक डॉक्टर ने आज रमा को भी एक निःसंतान दंपति के लिये उसे सरोगेट मदर बनने के लिये दो लाख में सौदा करा दिया।रमा जबसे अपने पेट मे उस दंपति  का बीज स्थापित कराकर आयी बस उसके सामने दो लाख रुपये घूम रहे थे ,वो तो उनसे क्या करेगी उसकी योजनाये बनाने में व्यस्त हो गयी थी।  रमा की कोख में धीरे धीरे एक जान पनपने लगी थी,समय के अनुसार उसकी हलचल उसे महसूस भी होने लगी थी। फिर एक झटके से रमा अपना सिर झटक देती, हुँह ये कोई मेरा बच्चा थोड़े ही है।इधर मैं जन्म दूंगी और उधर वो दो महीने बाद आकर अपने बच्चे को ले जायेंगे।झुमरी के साथ भी ये ही हुआ था,साल भर का झंझट फिर अपनी मर्जी की आजाद जिंदगी।

रमा भी सोचती बस ये समय जल्दी बीत जाये, ढेर सारे पैसे आये और किस्सा खत्म।

    अब समय तो अपने हिसाब से ही व्यतीत होता है।हर पंद्रह दिनों के अंतराल में वो निःसंतान दंपति रमा से अवश्य ही मिलने आते।रमा से क्या वो तो अपने बच्चे को अपनी कोख में पालने वाली से मिलने आते थे,जिससे जन्म होने तक उनका बच्चा रमा के पेट मे स्वस्थ रहे,सुरक्षित रहे।इसके लिये वो रमा को हर सुविधा उपलब्ध कराते थे।

      एक दिन रमा को चक्कर आ गया और वो गिर गयी।कोई और समय होता तो ये कोई बड़ी बात नही थी,पर आज अचानक रमा अत्याधिक परेशान हो अपनी बस्ती के डॉक्टर के पास दौड़ ली,कही पेट मे पलने वाले बच्चे को कुछ हो तो नही गया।जब डॉक्टर ने कह दिया कि सब ठीक है तब रमा ने राहत की सांस ली। अब रमा अपना खूब ध्यान रखने लगी थी,पेट मे बच्चे की हलचल से वो रोमांचित हो जाती।फिर तो कभी ललिया से तो कभी झुमरी से अपने रोमांच का बखान करती,उन्हें पेट मे करवट बदलते बच्चे को दिखाती।झुमरी कहती भी अरे ये तो चला जायेगा,तू क्यों इतना खुश हो रही है,भले ही तेरे पेट मे ये हो,पर इससे तेरा कोई रिश्ता थोड़े ही है?

      हकीकत सुन रमा को अब अजीब सा लगने लगता,पर बात तो झुमरी सही कह रही थी।धीरे धीरे वो समय भी आ ही गया,आज रमा को हॉस्पिटल में दाखिल कर लिया गया,रात्रि में ही उसने एक बच्चे को जन्म दे दिया। निःसंतान दंपती अब निःसंतान नही रह गये थे,रमा की मार्फ़त वो आज उन्हें बेटा प्राप्त हो गया था।बस दो ढाई माह की बात थी,जब वो रमा से अपने बेटे को लेकर घर चले जायेंगे।

उन्होंने रमा को खूब धन्यवाद दिया और कहा कि हमने तुम्हे दिये जाने वाली समस्त धन राशि डॉक्टर साहब को दे दी है, वो तुम्हे दे देंगे।रमा बस हाथ जोड़कर रह गयी।उसे अपने अंदर कुछ टूटता सा लग रहा था।दो लाख रुपयों के साथ देखे सपनों में उसे अब रुचि नही लग रही थी।

     तीन दिन बाद वो मुन्ना को ले अपने घर आ गयी।उसके बाद तो उसका जीवन ही बदल गया,रात दिन वो मुन्ना की देखभाल में ही लगी रहने लगी।एक मिनट को भी मुन्ना को आँखों से औझल नही होने देती। आज ही डॉक्टर साहब का संदेश आया कि रमा अगले सप्ताह रविवार को वो अपना बच्चा ले जायेंगे, तुम हॉस्पिटल आकर अपने पैसे ले जाना।रमा तो धक से रह गयी,क्या मुन्ना उससे छिन जायेगा?कैसे उसके बिना जी पाऊंगी?बावली सी हो गयी रमा।बड़बड़ा रही थी,मुझे नही चाहिये उनके पैसे,मैं अपना मुन्ना नही दूंगी।झुमरी आयी थी रमा से मिलने, सुन बोली,रमा बच्चा तो उन्ही का है,सौदा तय हुआ था,अब तेरा विलाप गलत है।बच्चे में अंश तो उन्ही दोनो का है,तेरा क्या है इसमें?

चिल्लाते हुए बोली रमा इस बच्चे के शरीर मे खून है मेरा,मुन्ना ने दूध मेरा पिया है, इसके कारण ही तो मेरी छाती में दूध उतरा है,पैसे के बल पर मुन्ना से रिश्ता बनाने चले है,मां का दूध बच्चे से छीनकर।नही दूंगी अपने मुन्ना को,मुझे नही चाहिए उनके पैसे।मुझे मुन्ना चाहिये। उसी दिन रात में ही रमा अपने मुन्ना को छाती से चिपकाये ट्रैन में बैठी जा रही थी, अनजान मंजिल की ओर—!


सोशल मीडिया और हमारा स्वास्थ्य

 शिखा सक्सेना 

“अति सर्वत्र वर्जयेत्” अर्थात किसी भी वस्तु की अधिकता हानिकारक होती है। यह कथन आज के सोशल मीडिया युग में पूरी तरह सत्य सिद्ध होता है। सोशल मीडिया आधुनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। इसके माध्यम से हम दुनिया के किसी भी कोने में बैठे व्यक्ति से जुड़ सकते हैं, नई जानकारियाँ प्राप्त कर सकते हैं और अपने विचार साझा कर सकते हैं। किंतु इसके अत्यधिक उपयोग का प्रभाव हमारे शारीरिक, मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है।

सोशल मीडिया ने संचार को सरल और तेज़ बना दिया है। शिक्षा, व्यवसाय, मनोरंजन और सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में इसका योगदान सराहनीय है। अनेक लोग इसके माध्यम से नई चीजें सीखते हैं, अपने कौशल का विकास करते हैं तथा समाज से जुड़े रहते हैं। लेकिन जब इसका उपयोग आवश्यकता से अधिक होने लगता है, तब यह लाभ के स्थान पर हानि पहुँचाने लगता है।

लगातार मोबाइल या कंप्यूटर स्क्रीन देखने से आँखों में जलन, सिरदर्द, नींद की कमी तथा शारीरिक थकान जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। घंटों बैठे रहने के कारण मोटापा और अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का खतरा भी बढ़ जाता है। विशेष रूप से बच्चों और युवाओं पर इसका प्रभाव अधिक देखा जा रहा है।

मानसिक स्वास्थ्य पर सोशल मीडिया का प्रभाव और भी गंभीर हो सकता है। लोग अक्सर दूसरों के जीवन की चमक-दमक देखकर स्वयं की तुलना करने लगते हैं, जिससे हीन भावना, तनाव और चिंता बढ़ सकती है। कई बार लाइक, कमेंट और फॉलोअर्स की संख्या व्यक्ति के आत्मविश्वास को प्रभावित करती है। प्रसिद्ध लेखक साइमन सिनेक का कथन है, “सोशल मीडिया लोगों को जोड़ने का माध्यम है, लेकिन इसका अत्यधिक उपयोग हमें वास्तविक जीवन से दूर कर सकता है।”

इसके अतिरिक्त, सोशल मीडिया की लत व्यक्ति को परिवार और मित्रों से दूर कर सकती है। 

आमने-सामने बातचीत की जगह रिश्तों में दूरी आने लगती है। इसलिए आवश्यक है कि हम सोशल मीडिया का उपयोग संतुलित और जिम्मेदारीपूर्ण ढंग से करें।

महात्मा गांधी ने कहा था, “स्वास्थ्य ही वास्तविक धन है, सोने-चाँदी के टुकड़े नहीं।” यह कथन हमें याद दिलाता है कि तकनीक का उपयोग हमारी सुविधा के लिए होना चाहिए, न कि हमारे स्वास्थ्य के नुकसान के लिए।

अतः निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि सोशल मीडिया एक उपयोगी साधन है, लेकिन इसका विवेकपूर्ण उपयोग ही हमें इसके लाभ दिला सकता है। यदि हम समय की सीमा निर्धारित करें, नियमित व्यायाम करें और वास्तविक जीवन के संबंधों को महत्व दें, तो सोशल मीडिया हमारे जीवन में सकारात्मक भूमिका निभा सकता है।अंत में केवल इतना ही कहना चाहूँगी….सोशल मीडिया का उपयोग करो, पर इतना ध्यान रहे,स्वास्थ्य और खुशियों का भी हर पल सम्मान रहे।तकनीक बने जीवन की राह,न कोई बंधन बने,संतुलन से जो जीना सीखे, वही सच्चा धन बने।


पत्नी और प्रेमिका

निर्मला तिवारी

पत्नी घर की धड़कन है, प्रेमिका दिल की पुकार,

दोनों के अपने रंग हैं, दोनों का अपना प्यार।

पत्नी समर्पण की मूरत, हर सुख-दुख की साथी,

प्रेमिका ख्वाबों की बारिश, मन की मधुर बरसाती।

पत्नी रिश्तों की छाया, जीवन का विश्वास,

प्रेमिका अनकही चाहत, दिल के सबसे पास।

पत्नी हर दिन की पूजा, हर जिम्मेदारी का मान,

प्रेमिका पहली धड़कन जैसी, मीठा सा अरमान।

पत्नी से घर महकता है, प्रेमिका से गीत,

दोनों भावनाओं के रूप हैं, दोनों की अपनी प्रीत।

किसे कम और किसे ज्यादा कहें, ये दिल का काम नहीं,

हर रिश्ते की अपनी कीमत है, कोई रिश्ता आम नहीं।

"पत्नी में समर्पण मिला, प्रेमिका में एहसास,

दोनों ने दिल को छुआ, अपने-अपने अंदाज़।" 

बाप है  तो सपने है 

"बाप की फटी हुई जेब से अक्सर वो खिलौने निकलते हैं, जिन्हें खरीदने की औकात दुनिया के किसी शोरूम में नहीं होती।" शहर की तपती दुपहरी में माधव अपनी पुरानी साइकिल के पैडल मार रहा था। वह शहर के एक बड़े बंगले में माली का काम करता था। आज महीने की आखिरी तारीख थी, तनख्वाह मिली थी—कुल सात हज़ार रुपये। घर पहुँचते ही उसकी सात साल की बेटी दौड़कर आई, "पापा! मेरा स्कूल बैग ला दिए? ज़िप टूट गई है उसकी, सब सहेलियां चिढ़ाती हैं।"

माधव की आँखों में एक चमक आई, उसने चुपके से थैले से एक नया गुलाबी बैग निकाला। बेटी खुशी से झूम उठी। तभी उसकी पत्नी पास आई और धीरे से बोली— "आपकी बनियान जगह-जगह से फट गई है, अपने लिए कुछ क्यों नहीं लाए? और वो जूते... उनके तलवे तो कब के घिस चुके हैं, कंकड़ चुभते होंगे पैरों में।" माधव मुस्कुराया और बात टालते हुए बोला, "अरे! ये जूते तो अभी और चलेंगे। कंकड़ चुभते हैं तो क्या हुआ, ज़मीन से रिश्ता बना रहता है।"

अगले दिन माधव अपने काम पर गया। धूप तेज़ थी। वह नंगे पैर घास काट रहा था क्योंकि जूते का तलवा पूरी तरह अलग हो गया था। बंगले के मालिक ने देखा और चिढ़कर बोले— "माधव! ये क्या फटेहाल घूमते रहते हो? कल से ढंग के जूते पहनकर आना, यहाँ मेहमान आने वाले हैं।"

माधव ने सिर झुका लिया। शाम को घर लौटते वक्त उसने सोचा कि आज अपने लिए एक जोड़ी सस्ते जूते ले ही लेगा। वह दुकान पर गया, पर तभी उसे याद आया कि पत्नी ने कई दिनों से अपनी कमर के दर्द की दवा नहीं ली है। उसने जूते छोड़ दिए और दवाई लेकर घर चला गया।

रात को खाना खाते वक्त माधव ने जानबूझकर अपने पैर मेज के नीचे छिपा लिए। लेकिन बेटी ने देख लिया। उसने देखा कि उसके पिता के पैरों में छाले पड़ गए थे और खून जम गया था।

अगले दिन सुबह, माधव जब काम पर जाने के लिए अपनी साइकिल उठाने लगा, तो उसने देखा कि उसके पुराने जूतों के अंदर किसी ने नरम कागज के गत्ते काटकर रखे हैं ताकि कंकड़ न चुभें। साथ ही, वहाँ एक छोटा सा कागज़ रखा था जिस पर उसकी बेटी ने टूटे-फूटे अक्षरों में लिखा था:

"पापा, जब मैं बड़ी हो जाऊंगी, तो आपके लिए दुनिया के सबसे सुंदर जूते लाऊंगी। तब तक ये गत्ते आपको चुभन से बचाएंगे।"

माधव की आँखों से दो आँसू टपक कर उन पुराने जूतों पर गिरे। उसे महसूस हुआ कि आज उसके पास वो दौलत है जो उस बंगले के मालिक के पास भी नहीं थी। उसने वही जूते पहने और शान से काम पर निकल गया।

समाज जिसे 'गरीब' कहता है, वह अक्सर भावनाओं का सबसे अमीर इंसान होता है। एक पिता या पति अपनी ज़रूरतों का गला घोंटकर परिवार के चेहरे पर मुस्कान लाता है।

अपने घर के बड़ों के उन त्यागों का सम्मान करें जो वो कभी ज़ुबान पर नहीं लाते।इंसान की कीमत उसकी हैसियत से नहीं, उसकी नीयत और त्याग से होती है। 

एक्सपायरी डेट

 रेखा वशिष्ठ मल्होत्रा

हर संबंध की एक एक्सपायरी डेट होती है। अगर बात करें मित्रता की, तब कह सकते हैं कि उसकी एक्सपायरी डेट उसी दिन फिक्स हो जाती है जब दो लोग पहली बार मिले होते हैं, और उन दोनों ने एकदूसरे की मित्रता स्वीकार की होती है। भाग्यशाली हैं वे लोग जिनकी मित्रता की एक्सपायरी उनके संसार से विदा होने पर ही होती है। परंतु, ऐसा बहुत कम होता है।

    हमेशा ऐसा भी नहीं होता कि मित्रता एकदम से ही समाप्त हो जाए। कई बार दो लोग आसपास होते हैं, आपस में बात भी कर रहे होते हैं, परंतु दोनों ही जानते हैं कि अब उनकी मित्रता पहले जैसी नहीं रही। अच्छे मित्र से एक परिचित भर रह जाने तक की यात्रा पर एक किस्सा पढ़िए-

    वर्षों पूर्व की बात है, मेरी एक सहकर्मी हुआ करती थी। वह हर बात में अपनी एक सखी को याद करती पायी जाती थी। जैसे अगर कभी किसी व्यंजन की बात हो रही होती, तब वह कहती, "मेरी वह सखी उक्त व्यंजन बहुत स्वादिष्ट बनाया करती थी।"

    उसकी बातों से पता चलता था कि वे दोनों बहुत घनिष्ठ सखियाँ थीं। वे दोनों साथ घूमती-फिरती, साथ बाजार जाती, साथ जिम जाती, एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़ी रहती। 

    एक दिन एक अन्य सहकर्मी ने पूछ लिया कि अब उसकी वह सखी कहां रहती है। उसने बताया कि वह अब भी उसके पड़ोस में ही रहती है। इस सूचना से सब आश्चर्य में पड़ गए, कि अगर ये दोनों आसपास ही रहते हैं तो यह उसे ऐसे क्यों याद करती है, जैसे अब इनकी मित्रता हो ही न!

    किसी ने उससे इस बाबत प्रश्न पूछा। उसने बताया- हम दोनों बहुत अच्छे दोस्त थे। दोनों के बच्चे समान आयु के थे। हम दोनों के इंटरेस्ट भी सेम थे। हमारी दोस्ती बहुत पक्की थी। लग रहा था कि यह दोस्ती पूरी जिंदगी चलेगी। परंतु, फिर उसके मन में आया कि भारत में नहीं रहना, किसी दूसरे देश में जाकर बस जाना है। मैंने उसे बहुत समझाया कि यहां सब अच्छा चल रहा है। फिर कहीं और जाकर क्यों बसना। परंतु, वह नहीं मानी। तब हम लोगों के बच्चे स्कूल पास करने की स्टेज पर थे। वह अपने पति व बच्चों के साथ कैनेडा शिफ्ट हो गई। उस समय मैंने और मेरे बच्चों ने उन सबको बहुत मिस किया। मेरा बाजार जाना, घूमन-फिरना, जिम जाना, सब लगभग बंद हो गया था। क्योंकि, उसकी ऐसी आदत पड़ी हुई थी कि अकेले कहीं जाने का मन ही नहीं करता था। मेरे बच्चे भी उसके बच्चों के साथ भागते-दौड़ते, खेलते घूमा करते थे। उनके जाने से बच्चे भी गुमसुम से हो गए थे। हम लोग उन से कॉन्टेक्ट करने की कोशिश करते, लेकिन अक्सर उनसे बातचीत नहीं हो पाती थी। एक तो यहां का और वहां का टाइम डिफरेंस आड़े आ जाता था। दूसरा, वो वहां जाकर नए सिरे से गृहस्थी बसाने में व्यस्त हो गई थी, इसलिए फोन भी कम ही उठाया करती थी। उन लोगों की कमी बहुत खलती थी, पर फिर धीरे-धीरे हम लोग भी अपने में व्यस्त हो गए। बच्चे स्कूल पास करके कॉलेज पहुंच गए, वहां उनके नए दोस्त बन गए। मैंने भी दुबारा से अपना फ्रेंड सर्किल बनाना शुरू किया। कुछ हॉबी क्लास भी ज्वाइन की। धीरे-धीरे मैंने अपने लिए फिर से एक नया संसार खड़ा कर लिया, और मैं उसमें व्यस्त हो गई।

एक सहकर्मी ने टोका, "लेकिन तुम्हारी वह भूतपूर्व सखी तो अब भी तुम्हारे पड़ोस में रहती है।" वह मुस्कराई, और उसने अपना किस्सा आगे बढ़ाया- उनके जाने के बाद भी उसकी ससुरालवाले यहीं रहते थे, हमारे पड़ोस में। उसका पति बार-बार अपने भाइयों व माता-पिता से मिलने आया करता था। तब वह वहां अकेली पड़ जाती थी। उसके बच्चे भी स्कूल पास करके कॉलेज में दाखिल हो चुके थे, और पूरी तरह वहीं के कल्चर में ढल गए थे। उनके पास मां के लिए समय ही नहीं होता था। अधिकतर समय पति इंडिया में, व बच्चे दोस्तों के साथ बाहर। ऐसे हालात में वह अकेला महसूस करने लगी, और वापस भारत लौट आई। वे दोनों पति-पत्नी यहां हैं, और उनके बच्चे बाहर रहते हैं। अब जब घर में बच्चे हैं नहीं, और वापस आकर नौकरी उसने की नहीं, तो उसके पास खाली समय खूब होता है। ऐसे में मुझसे उसकी एक्सपेक्टेशंस बढ़ गई थी। वो चाहती थी कि हम पहले की तरह खूब घूमें, बातें करें, साथ-साथ जिम जायें। मैंने कुछ दिन उसका साथ निभाने का प्रयास किया, परंतु वो पहले वाली बात नहीं बनी। क्योंकि, जब वह बाहर थी, तब उन पांच-छ वर्षों में जो मेरा नया संसार और नई व्यस्तताएं बन गई, वो भी मुझे निभानी होती हैं। इसलिए, अब पहले जितना समय एकसाथ व्यतीत करना संभव नहीं था। दोस्ती टूटने का दूसरा कारण वह स्वयं थी। अब वह बिल्कुल खाली थी, तो उसे पूरा समय सास, जेठानी, देवरानी, नन्द की बुराइयां करनी थी, जिसे सुनने में मेरा कोई इंटरेस्ट नहीं था। उसने अपनी क्रिएटिविटी व ग्रोथ बिल्कुल समाप्त कर दी थी। फिर भी मैंने उसका साथ निभाने का भरपूर प्रयास किया। लेकिन, वह हर बार और ज्यादा समय की डिमांड करती थी। वह कहती, "मेरी ओर भी तेरी जिम्मेदारी है। तुझे मेरे साथ ज्यादा समय बिताना चाहिए।", उसकी इस बात पर मैं सोचती कि जब वह यहां से गई थी, तब क्या मेरी ओर उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं थी। उसने ही मुझे नए लोगों व नए कार्यों के साथ बिजी होने का समय दिया था। अब उस नए संसार को, व उन नए लोगों को अचनक से कैसे छोड़ दूं, जो मेरे अकेलेपन में मेरे साथी बने थे। फिर मेरा मन यह भी कहता कि वह तो अपनी बेहतरी के लिए बाहर गई थी। मेरे प्रति उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं थी। लेकिन, अब मेरी भी ऐसी कोई जिम्मेदारी नहीं है कि हर समय उसकी जली-कटी सुनूँ। धीरे-धीरे उसके कटाक्ष बढ़ते गए। जिस कारण हमारा मिलना कम होता गया। अब हम रास्ते में आते-जाते मिल जाते हैं तो नॉर्मल जानने वालों की तरह एकदूसरे को हाय-हेल्लो कर लेते हैं। पर अब वह पहले वाली दोस्ती नहीं रही। शायद हमारी दोस्ती की लिमिट यहीं तक थी।

    अपनी बात समाप्त करते-करते वह यादों में खोकर उदास हो गई थी। पर उसकी उदासी भी अब उनकी एक्सपायर्ड दोस्ती को दुबारा से हरा-भर नहीं कर सकती थी।

    आज बहुत समय पश्चात उन पूर्व सह-अध्यापिका का कॉल आया तो मुझे उनकी दोस्ती का यह किस्सा स्मरण हो आया। उनकी मित्रता की समाप्ति इसी भांति लिखी थी, सो उन दोनों के आसपास होते हुए भी वह समाप्त हो गई।

जानते हैं, हम मित्र बनाते हैं, परंतु केवल कुछ ही लोगों से मित्रता लंबी चलती है। कुछ मित्र हमारे अनुसार व्यवहार नहीं कर पाते, तो कुछ मित्रों के अनुसार हमारा व्यवहार नहीं होता। कुछ न कुछ ऐसा हो ही जाता है कि संबंध लंबा नहीं चल पाता।

    वैसे, आज के समय का सत्य यह है कि किसी भी संबंध, किसी भी मित्रता से अधिक अपेक्षाएं मत रखिए, तभी संबंध लंबे चलेंगे। सब से प्रसन्न मन से बात कीजिए, अगर संभव हो तो सहायता भी कर दीजिए। परंतु, न तो किसी को अपने ऊपर डिपेंडेंट कीजिए, और न ही किसी के ऊपर डिपेंड होइये। डिपेंडेंसी या किसी की भी आदत पड़ जाने के परिणाम बहुत बुरे होते हैं। फिर चाहे वह डिपेंडेंसी इमोशनल हो, समय खर्चने की हो, रुपये-पैसे की हो, किसी कार्य में सहायता की हो, या फिर घर-बाहर की चुगलियां करने-सुनने की हो... सबके साथ समान भाव से हार्मलेस चुगलियां कीजिए भई, सेम एंजॉयमेंट मिलेगा । 


   "वानर राज सुग्रीव"

                      डॉ. सतीश "बब्बा"

   समुद्र में सेतु बना दिया गया था। बांधे गए सेतु से राम की वानर, रीछ आदि वीरों की सेनाएं उतरकर समुद्र तट लंका में प्रवेश किया था। विभीषण सेतु की निगरानी में था तभी वेश बदलकर आए शुक, सारण नामक राक्षसों को विभीषण पहचान गया, वहां उपस्थित वानर वीरों से उनको पकड़ा कर राम के सामने पेश करते हुए विभीषण ने स्पष्ट कहा कि, "हे वीर धनुर्धर राम यह रावण के विश्वस्नीय गुप्तचर हैं, मैं इन्हें अच्छी तरह से पहचानता हूं!"  यह बातें मैं प्रसंगवश बता रहा हूं। राम ने शुक -  सारण से स्पष्ट कहा था कि, "अपने राजा से कहना कि, जिस तरह से परशुराम सहस्त्रार्जुन का वंश खत्म कर दिया था, पिता का अपमान करने से, उसी तरह मैं अपने पिता जटायु का बदला लूंगा, उसके वंश में अब कोई नहीं बचेग। यह मेरा वादा है!" 

            रात बीती सुबह सूर्य लंका में प्रवेश किया था। अभी सूर्य लंका के अगल-बगल से जाता था, शायद आज इसे आभास हो गया था कि, यह धनुर्धर आए हैं, रावण को मारकर विजय पताका लहराएंगे।राम ने सुबेल पर्वत शिखर पर चढ़ना शुरू किया,देखूं तो लंका कैसी है। राम के साथ सुग्रीव, विभीषण राम के आजू-बाजू चल रहे थे। सुबेल पर्वत के शिखर से लंका के वैभव को राम निहारने लगे ।उधर रावण अपने साथ उर्वशी, तिलोत्तमा आदि अनेकों देव सुंदरियों,नर्तकियों के साथ लंका के उस ऊंचे प्राचीर पर गया जो देखने में सुमेरु पर्वत के समान था। रावण भी दुश्मन सेना को देखना चाहता था।  रावण अपने प्राचीर से राम को देखकर अपने मंत्रियों से पूछा, "शायद यही राम है, जो सबसे अलग है!" मंत्रियों के हां कहने से पहले ही रावण क्रोध में भरकर अपने होंठों को काटने लगा था। इधर राम की निगाह रावण पर पड़ी, राम ने विभीषण से कहा,तमाम सुंदरियों से घिरा हुआ यह कौन हो सकता है?" राम अपनी सीता को भी देखना चाहते थे पर ऐसा नहीं हो सका था।  विभीषण ने राम को बताया, "हे धनुर्धर वीर यह कज्जल गिर जैसा रावण है जिसके मुकुटों में जड़ित मणियों का प्रकाश दिन में भी सूर्य की रौशनी से भी अधिक चमक रहा है। यह तमाम देव सुंदरियों से घिरा हुआ है। ऐसा सुनकर वानर राज सुग्रीव के होंठ फड़फड़ा उठे थे, वह क्रोध से लाल हो गया था। उसने किसी से कुछ नहीं कहा वह ऐसे दौड़ा कि रावण के पास जाकर रावण को पटक दिया।  रावण भी क्रोधित होकर उससे भिड़ गया था। दोनों एक-दूसरे को लात-घूंसों से मारने लगे थे। दोनों एक-दूसरे को नाखूनों से चीरकर लहूलुहान कर दिया था।  रावण ने सुग्रीव को खाईं में पटक दिया था, खाई से उछलकर सुग्रीव क्रोधित होकर रावण को भी खाई में पटक दिया। रावण बिना किसी देरी के खाईं से ऊपर आ गया। अब दोनों गुत्थम-गुत्था होकर दोनों खाई में गिर गए। अब खाईं में ही कुछ देर तक मल्लयुद्ध चलता रहा। रावण सुग्रीव को अपनी हथेली में ऐसे जकड़ कर पकड़ लिया जैसे, केतु लाल किरण माली सूर्य को जकड़ लिया हो। सुग्रीव ने एक लात रावण की छाती पर मारी, रावण एक छण के लिए मुर्छित हो गया, सुग्रीव उसकी पकड़ से छूट गया था। रावण अब भारी क्रोध करके सुग्रीव पर झपट्टा मारा, दोनों कुछ देर तक आकाश में ही भिड़े रहे। दोनों बहुत क्रोधित होकर लड़ रहे थे। सुग्रीव के हाथ की मुठिका से, लात के प्रहार से रावण गिर गया था। रावण के मकुटों की मणियों को सुग्रीव क्रोध करके ऐसे नोचने लगा था जैसे रावण का सिर नोच रहा हो, रावण का सिर काट लिया हो!

  इधर सुग्रीव को बहुत देर तक नहीं आया देखकर  राजा राम बहुत दुखी हुए, राम कहने लगे कि, "अकेले सुग्रीव जाकर दुश्मन के गढ़ में ठीक नहीं किया है। अगर मेरे मित्र को कुछ हो गया तो मैं भी जीवित नहीं रहूंगा!"  राम की आंखों से आंसुओं की धारा बह रही थी। वह बहुत चिंतित हो गए थे। 

 तभी सुग्रीव रावण के मुकुट की मणियों के साथ आ गया। राम ने कहा, "मित्र, तुम अकेले दुश्मन के गढ़ में जाकर ठीक किया है क्या? इतना ज्यादा गुस्सा, गुस्से में लिया गया निर्णय, वह भी सबल दुश्मन के यहां जाना ठीक था क्या!" सुग्रीव ने कहा, "हां, आप ठीक कहते हैं! पूर्व में गया आपका ऐंद्र व्याकरण आदि शास्त्रों में निपुण आपका महिमावान दूत हनुमान लंका में गया, भयंकर युद्ध में भाले की शक्ति, धनु का बल दिखाते हुए युद्ध करनेवालों को अपनी पूछ का बल दिखा आया। उसी समृद्ध नगर में मैं गया जो अपने पैरों का बल दिखा, भाग आया! हा! मेरे भुजबल की भी कोई सीमा है क्या?"

 वानर राज सुग्रीव ऐसी बातें करते हुए सिर झुकाकर श्री राम के सामने खड़ा रहा। तब विभीषण चक्रवर्ती श्रीराम से यों बोलने लगा, "सुग्रीव! जो मणियां तुम छीन लाए हो, वे रावण के सिरों पर रहने वाले किरीटों में जड़ित मणियां हैं न? उनसे भी बढ़कर यशदायी पदार्थ हैं जो तुम हर लाते? वे अत्याचारी रावण के सिरों और प्राणों से भी अधिक मूल्यवान हैं। तुमने उनको छीनकर उसके विपुल यश को जड़ से उखाड़ दिया है!"  विभीषण ने आगे कहा, "रावण ऐसा है जो भूभारवाही शेषनाग की फणिमुक्ताओं को भी चाहे तो अपनी लम्बी पायलधारी चरणों से ही छीन सकता है! सोचो तो उसके हारालंकृत दसों किरीटों से अपूर्व मणियों को छीन लाने में जो वीरता है, वह ऋषभवाहन शिव जी के पास भी हो सकती है क्या? इससे बढ़कर यशदायी काम क्या हो सकता है?"

   विभीषण ने कहा, "गृहीत मणियों के प्रकाश से शोभित कंधों वाले! नीलकंठ महादेव के सिर पर से सकलंक श्वेत चंद्र को छीनो, या स्थूलमणिवर्ण श्रीविष्णु की छाती से लाल कौस्तुभमणि को छीनो पर दशमुख के किरीटों में जड़ित श्रेष्ठ मणियों को छीनने में जो विजय मिली वह उनसे श्लाघ्य नहीं है क्या?"

  विभीषण कहना जारी रखते हुए कहा, "हरिकुलपति! बाहुवलय की मणियों से शोभायमान कंधों वाले! मणियों एवं हीरों की चंद्रहास तलवार को जिसने शिव जी से प्राप्त किया था, उसकी मुकुट - मणियों को क्या छीन लाए हो! श्रीराम के विजय की नींव की मणि न रख लिया है। इससे बढ़ कर यश क्या हो सकता है!"  राम ने आश्वासन देते हुए कहा, "विजयी लोगों को कभी अपने विजय से तृप्ति नहीं होती है। वह यही कहते हैं कि, यह कोई विजय नहीं है। यह कार्य वाराह भगवान ही कर सकते थे जो भूमि को अपने दांतों में लेकर आ गए थे। यही विजय है। उसी समय सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ा शायद उसे डर था कि, मेरे बेटे ने जो दशमुख के किरीटों से मणियां छीनी हैं उससे जरूर कुछ अनर्थ होकर रहेगा।

 रात आ गई थी। वीर पायलधारी राक्षस की मुकुट मणियां प्रकाश दे रही थी। लाल किरण माली के पुत्र सुग्रीव के किए गए विजय कार्य की भूरि भूरि प्रशंसा को मन में भरकर फूले हुए कन्धों के साथ श्रीराम वहां से उतरकर अपने डेरे में चले! 

  जैसा सुग्रीव ने किया था, ऐसा अपमान रावण का कभी नहीं हुआ था। रावण को बड़ी शरम आ रही थी कि, देवता उसका पराभव देखते खड़े रहे। तब सखियों से घिरी हुई नायिकाओं की प्रेम दृष्टि भी उस पर कोई असर नहीं कर सकी। जीवित रहते भी मृतक बना वह अपने यश के ही समान नीचे उतर कर चला। ऐसा वीर पराक्रमी योद्धा सुग्रीव वानरों का राजा था जो राम का बहुत करीबी मित्र था। 

 साभार - कम्ब रामायण (तमिल) मुकुटभंगपटल (युद्ध काण्ड पूर्वार्ध) सृजन कर्ता डॉ. सतीश "बब्बा"


अश्विनी नक्षत्र

अश्विनी नक्षत्र वैदिक ज्योतिष के 27 नक्षत्रों में से पहला नक्षत्र है। यह मेष राशि में 0 डिग्री से 13.2 डिग्री तक स्थित है। इस नक्षत्र का स्वामी केतु है और यह अश्विनी कुमार नामक देवताओं से संबंधित है, जो चिकित्सक के रूप में जाने जाते हैं। 

अश्विनी नक्षत्र के बारे में कुछ मुख्य बातें-स्वामी ग्रह - केतु,देवता - अश्विनी कुमार,राशि - मेष,नाड़ी - मध्य नाड़ी,शुभ रंग - लाल,गुण - ऊर्जावान, साहसी, गतिशील, चंचल, तीव्र गति से काम करना

व्यवसाय-डॉक्टर, सर्जन, उद्यमी, वैज्ञानिक, तकनीकी विशेषज्ञ, खिलाड़ी, मीडिया, मनोरंजन 

अश्विनी नक्षत्र में जन्मे लोगों का व्यक्तित्व-ये लोग ऊर्जा से भरे होते हैं और हमेशा कुछ ना कुछ करते रहना पसंद करते हैं। ये लोग चुनौतियों से नहीं डरते और अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए दृढ़ रहते हैं। ये लोग जल्दी निर्णय लेते हैं और जल्दी काम करते हैं। ये लोग अपने सिद्धांतों पर अडिग रहते हैं और शांत स्वभाव के होते हैं। ये लोग दूसरों की मदद करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। हनुमान जी की पूजा करें और मंगलयंत्र की स्थापना करें। लाल रंग के वस्त्र या रत्न पहनें। ॐ अश्विना तेजसा चक्षु प्राणेन सरस्वती वीर्यम् मंत्र का जाप करें।  अश्विनी नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह अश्वमुख (घोड़े का मुख) है, जो गति, ऊर्जा और शक्ति का प्रतीक है। यह नक्षत्र गंडमूल नक्षत्रों में से एक है, इसलिए इस नक्षत्र में जन्मे लोगों को विशेष ध्यान रखना चाहिए। अश्विनी नक्षत्र में जन्मे लोग अक्सर अपनी योजनाओं को सार्वजनिक करने से पहले उन्हें पूरा करने की कोशिश करते हैं। इस नक्षत्र में जन्मे लोग अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह हो सकते हैं, इसलिए उन्हें अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए। अश्विनी नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातकों के लिए कुछ उपाय हैं जो उनकी समस्याओं को दूर करने में मदद कर सकते हैं। इन उपायों में अश्विनी नक्षत्र मंत्र "ॐ अश्विनी कुमारया नमः" का जाप करना, हनुमान जी की पूजा करना, मूंगा रत्न धारण करना, और पीपल वृक्ष की पूजा करना शामिल है । अश्विनी कुमार के स्वास्थ्य मंत्र का जाप करने से गंभीर बीमारियों से बचा जा सकता है ।मंगलवार, शनिवार, अश्विनी नक्षत्र के दिन पूजा या अभिषेक करने से भी सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं । अश्विनी नक्षत्र के जातकों को अपने करियर और स्वास्थ्य के प्रति अधिक ध्यान देना चाहिए। वे रचनात्मक और ऊर्जावान होते हैं, और उन्हें ऐसे क्षेत्र में काम करना चाहिए जो उनकी रचनात्मक क्षमताओं और ऊर्जा का उपयोग करता है ।


योगिनी एकादशी वह एकादशी जो निर्जला एकादशी के बाद और देवशयनी एकादशी से पहले आती है उसे योगिनी एकादशी कहते हैं। उत्तर भारतीय पञ्चाङ्ग के अनुसार आषाढ़ माह में कृष्ण पक्ष के दौरान योगिनी एकादशी पड़ती है। अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार योगिनी एकादशी का व्रत जून अथवा जुलाई के महीने में होता है। योगिनी एकादशी का व्रत करने से सारे पाप मिट जाते हैं और जीवन में समृद्धि और आनन्द की प्राप्ति होती है। योगिनी एकादशी का व्रत करने से स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है। योगिनी एकादशी तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। यह माना जाता है कि योगिनी एकादशी का व्रत करना अठ्यासी हज़ार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर है। एकादशी के व्रत को समाप्त करने को पारण कहते हैं। एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण किया जाता है। एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अति आवश्यक है। यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के बाद ही होता है। द्वादशी तिथि के भीतर पारण न करना पाप करने के समान होता है। एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए। जो श्रद्धालु व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत तोड़ने से पहले हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि है। व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है। व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्याह्न के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए। कुछ कारणों की वजह से अगर कोई प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं है तो उसे मध्याह्न के बाद पारण करना चाहिए। कभी कभी एकादशी व्रत लगातार दो दिनों के लिए हो जाता है। जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब 

स्मार्त-परिवारजनों को पहले दिन एकादशी व्रत करना चाहिए। दुसरे दिन वाली एकादशी को दूजी एकादशी कहते हैं। सन्यासियों, विधवाओं और मोक्ष प्राप्ति के इच्छुक श्रद्धालुओं को दूजी एकादशी के दिन व्रत करना चाहिए। जब-जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब-तब दूजी एकादशी और वैष्णव एकादशी एक ही दिन होती हैं। भगवान विष्णु का प्यार और स्नेह के इच्छुक परम भक्तों को दोनों दिन एकादशी व्रत करने की सलाह दी जाती है। 

 

देवशयनी एकादशी

आषाढ़ शुक्ल की एकादशी को देव सोते हैं इसलिये इसे देवशयनी एकादशी कहते हैं। यह एकादशी आषाढ़ शुक्ल की एकादशी को मनाई जाती है। इसके बाद कार्तिक सुदी एकादशी को देव उठते हैं इसलिये इसे देवउठान कहते हैं। आषाढ़ की इस एकादशी को व्रत करना चाहिए। भगवान का नया बिछौनार बिछा कर भगवान को सजाना चाहिए और जागरण करके पूजा करनी चाहिये

देवशयनी एकादशी व्रत की कथा

सूर्यवंश में मान्धाता नामक प्रसिद्ध सत्यवादी राजा अयोध्यापुरी में राज्य करता था। एक समय उसके राज्य में अकाल पड़ गया। प्रजा दुखी होकर भूखी मरने लगी, हवनादि शुभ कर्म बन्द हो गये। राजा को कष्ट हुआ। इसी चिंता में वह वन को चल पड़ा और अंगिरा ऋषि के आश्रम में जा पहुँचा। वह ऋषि से बोला- "हे सप्तऋषियों में श्रेष्ठ अंगिराजी! मैं आपकी शरण में आया हूं। मेरे राज्य में अकाल पड़ गया है, प्रजा कहती है राजा के पापों से प्रजा को दुख मिलता है। मैंने अपने जीवन में किसी प्रकार कोई पाप नहीं किया। आप दिव्य दृष्टि से देखकर कहो कि अकाल पड़ने का क्या कारण है?" अंगिरा ऋषि बोले- "सतयुग में ब्राह्मणों का वेद पढ़ना और तपस्या करना धर्म है परन्तु आपके राज्य में आजकल एक शूद्र तपस्या कर रहा है। शूद्र को मारने से दोष दूर हो जायेगा, प्रजा सुख पायेगी।" मान्धातार बोले- "मैं उस निरपराध तपस्या करने वाले शूद्र को नहीं मारूंगा। आप इस कष्ट से छूटने का कोई और सरल उपाय बताइये।" ऋषि बोले-"सरल उपाय बताता हूं. भोग तथा मोक्ष देने वाली देवशयनी एकादशी है। इसका विधिपूर्वक व्रत करो। उसके प्रभाव से चातुर्मास तक वर्षा होती रहेगी। इस एकादशी का व्रत सिद्धियों को देने वाला तथा उपद्रवों को शांत करने वाला है। मुनि की शिक्षा से मान्धाता ने प्रजा सहित प‌द्मा एकादशी का व्रत किया और कष्ट से छूट गया। इसका माहात्म्य पढ़ने या सुनने से अकाल मृत्यु के भय दूर हो जाते हैं। आज के दिन तुलसी का बीज पृथ्वी या गमले में बोया जाये तो महापुण्य होता है। तुलसी के प्रताप से यमदूत भय खाते हैं। जिनका कण्ठ तुलसी माला से सुशोभित हो उनका जीवन धन्य समझना चाहिए।

जुलाई मास 2026 का पंचांग 

भारतीय व्रतोत्सव जुलाई -2026

दि 3 गणेश चतुर्थी व्रत,दि. 7-कालाष्टमी,दि. 10-योगिनी एकादशी व्रत (स्मा.),दि. 11-योगिनी एकादशी व्रत (वै.),दि. 12-प्रदोष व्रत, मास शिवरात्रि,दि. 14-अमावस्या पुण्य,दि. 15-गुप्त नवरात्र प्रारम्भ,दि. 16-श्री जगदीश रथयात्रा (पुरी),दि. 17-संक्रांति पु., विनायक चतुर्थी,दि. 19-कुमार-स्कन्द षष्ठी,दि.21-दुर्गाष्टमी,दि.22-भड्डली नवमी, मेला शरीफ भवानी (का.), मनसा पूजा (बं.) प्रारम्भ, गुप्त नवरात्र समाप्त,दि.25-देवशयनी एकादशी व्रत, चातुर्मास व्रत प्रारम्भ,दि. 26-प्रदोष व्रत,दि. 27-जया पार्वती व्रतारंभ,दि. 29- सत्य व्रत, संन्यासियों का चातुर्मास प्रारम्भ, व्यास पूजा, गुरु पूर्णिमा,दि.30-हिण्डोले प्रारम्भ ब्रजमण्डल

मूल विचार जुलाई -2026 

दि. 7 को 16/24 से दि.9 को 14/56 तक, दि.15 को 21/41 से दि. 17को 18/34 तक, दि. 25,को 4/36 से दि. 27 को 10/28 बजे तक गण्ड मूल नक्षत्र हैं।

ग्रह स्थिति जुलाई - 2026

दि. 4 बुध पश्चिमास्त,दि. 4 सिंह में शुक्र,दि. 7 मिथुन में बुध,दि. 15 गुरु अस्त,दि. 16 कर्क में सूर्य,दि. 22 बुध पूर्वोदय,दि. 23 बुध मार्गी,दि. 26 शनि वक्री

पंचक विचार जुलाई - 2026   

पंचक विचार -(धनिष्ठा नक्षत्र के तृतीय चरण से रेवती नक्षत्र तक) पंचको में दक्षिण दिशा की ओर यात्रा करना मकान दुकान आदि की छत डालना चारपाई पलंग आदि बुनना,दाह संस्कार,बांस की चटाई दीवार प्रारंभ करना आदि स्तंभ रोपण तांबा पीतल तृण काष्ट आदि का संचय करना आदि कार्यों का निषेध माना जाता है समुचित उपाय एवं पंचक शांति करवा कर ही उक्त कार्यों का संपादन करना कल्याणकारी होगा ध्यान रहेगा  पंचर नक्षत्रों का विचार मात्र उपरोक्त विशेष कृतियों के लिए ही किया जाता है विवाह मंडल आरंभ गृह प्रवेश प्रवेश उपनयन आदि मुद्दों से तो पंचक नक्षत्रका प्रयोग शुभ माना जाता है पंचक विचार- दिनांक 04 को 00-48 से दिनांक 08 को 16-00 तक,31 को 06-37 से दिनांक 04 को 21-54 बजे तक पंचक है | 

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527,9560518227

भद्रा विचार जुलाई -2026

भद्रा काल का शुभ अशुभ विचार - भद्रा काल में विवाह मुंडन, गृह प्रवेश, रक्षाबंधन आदि मांगलिक कृत्य का निषेध माना जाता है परंतु भद्रा काल में शत्रु का उच्चाटन करना,स्त्री प्रसंग में,यज्ञ करना,स्नान करना,अस्त्र शस्त्र का प्रयोग,ऑपरेशन कराना, मुकदमा करना,अग्नि लगाना,किसी वस्तु को काटना,भैस,घोड़ा व ऊंट संबंधी कार्य प्रशस्त माने जाते हैं सामान्य परिस्थिति में विवाह आदि शुभ मुहूर्त में भद्रा का त्याग करना चाहिए परंतु आवश्यक परिस्थितिवश अति आवश्यक कार्य भूलोक की भद्रा ,भद्रा मुख छोड़कर कर भद्रा पुच्छ में शुभ कार्य कर सकते है |

दि. 2 को 22/29 से दि. 3 को 11/20 तक, दि. 6 को 13/47 से दि. 7 को 1/36 तक, दि. 9 को 21/27 से दि. 10 को 8/16 तक, दि. 12 को 22/30 से दि. 13 को 8/40 तक, दि. 17 को 17/34 से दि. 18 को 4/42 तक, दि. 21 को 4/03 से 16/39 तक, दि. 24 को 22/23 से दि. 25 को 11/34 तक, दि. 28 को 18/19 से दि. 29 को 8/11 बजे तक भद्रा  है।


अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527,9560518227

सर्वार्थ सिद्धि योग जुलाई-2026 

दैनिक जीवन में आने वाले महत्वपूर्ण कार्यों के लिए शीघ्र ही किसी  शुभ मुहूर्त का अभाव हो,किंतु शुभ मुहर्त के लिए अधिक दिनों तक रुका ना जा सकता हो तो इन सुयोग्य वाले मुहर्तु  को सफलता से ग्रहण किया जा सकता है | इन से प्राप्त होने वाले अभीष्ट फल के विषय में संशय नहीं करना चाहिए यह योग हैं सर्वार्थ सिद्धि,अमृत सिद्धि योग एवं रवियोग | योग्यता नाम तथा गुण अनुसार सर्वांगीण सिद्ध कारक  है| 

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527,9560518227

दिनांक

प्रारंभ

दिनांक

समाप्त

03

05-32

03

11-46

07

05-34

07

16-24

09

05-35

09

14-56

11

11-03

12

05-37

17

18-34

18

05-39

19

05-39

20

05-40

24

01-42

24

05-42

26

07-34

27

05-43


चौघड़िया मुहूर्त 

चौघड़िया मुहूर्त, ज्योतिष में शुभ और अशुभ समय जानने की एक प्रणाली है। यह 24 घंटों को 8 भागों में विभाजित करता है, जिन्हें चौघड़िया कहा जाता है। प्रत्येक चौघड़िया एक निश्चित अवधि का होता है, और इन्हें शुभ और अशुभ कार्यों के लिए उपयुक्त माना जाता है। 

चौघड़िया मुहूर्त क्या है - 24 घंटों को 16 भागों में बांटा जाता है, जिन्हें चौघड़िया कहा जाता है। प्रत्येक चौघड़िया लगभग 1.30 घंटे का होता है। 

शुभ-अशुभ - कुछ चौघड़िया शुभ माने जाते हैं, जैसे अमृत, शुभ, लाभ, और चर। कुछ अशुभ माने जाते हैं, जैसे रोग, उद्वेग, और काल। चौघड़िया का उपयोग शुभ कार्यों, जैसे विवाह, यात्रा, और व्यापार शुरू करने के लिए शुभ समय जानने के लिए किया जाता है। 

चौघड़िया के प्रकार - दिन का चौघड़िया,सूर्योदय से सूर्यास्त तक के समय को दिन का चौघड़िया कहा जाता है। 

रात का चौघड़िया,सूर्यास्त से अगले दिन के सूर्योदय तक के समय को रात का चौघड़िया कहा जाता है। 

चौघड़िया का महत्व - चौघड़िया मुहूर्त का उपयोग किसी भी शुभ कार्य को शुरू करने के लिए एक अच्छे समय का चयन करने के लिए किया जाता है। यह माना जाता है कि यदि कोई कार्य शुभ चौघड़िया में शुरू किया जाता है, तो उसके सफल होने की संभावना अधिक होती है।   

सुर्य उदय- सुर्य अस्त जुलाई  -2026   


दिनांक 

01 

05 

10 

15

20 

25 

30

उदय 

05-28

05-29

05-32

05-34

05-37

05-40

05-42

अस्त 

19-21

19-21

19-20

19-18

19-16

19-14

19-11


 राहू काल 

 राहुकाल -राहुकाल दक्षिण भारत की देन है,दक्षिण भारत में राहु काल में कृत्य करना अच्छा नहीं माना जाता, राहु काल में शुभ कृतियों में वर्जित करने की परंपरा अब हमारे उत्तरी भारत में भी अपनाने लगे हैं राहुकाल प्रतिदिन सूर्यादि वारों में भिन्न-भिन्न समय पर केवल डेढ़ डेढ़ घंटे के लिए घटित होता है |

संक्रांति विचार जुलाई - 2026

इस मास की संक्रान्ति कर्क आषाढ़ शुक्ल द्वितीया गुरुवार दि. 16 जुलाई रात्रि में 23/30 बजे 30 मु. बैठी धापी पूर्व गमन, आग्नेय दृष्टि किये अग्नि मण्डल में प्रवेश करेगी। गतवार 4, गत नक्षत्र 6, वार नाम नन्दा-द्विज सुखी, नक्षत्र नाम घोरा-शुद्र सुखी। गुरुवारी संक्रान्ति होने से सभी प्रकार के धान्य वस्तु, सभी प्रकार के तेल पदार्थ, पीत वर्ण की वस्तुएं मन्दी रहेंगी।

आकाश लक्षण जुलाई - 2026

मास में ग्रह चाल और नाड़ी परिवर्तन और बुधास्त, गुरु अस्त, बुधोदय, बुध मार्गी, शनि वक्री आदि को देखते हुए कहीं-कहीं कुछ वर्षा होगी। आमतौर पर वर्षा की परेशानी बनी रहेगी। कहीं पहाड़ी क्षेत्रों पर वर्षा होगी। रास्तों में अवरोध उत्पन्न होंगे। कहीं पहाड़ी क्षेत्रों पर धन-जन हानि होगी।

  मांगलिक दोष विचार परिहार

वर अथवा कन्या दोनों में से किसी की भी कुंडली में 1,4,7,8 व 12 भाव में मंगल होने से ये मांगलिक माने जाते हैं,मंगली से मंगली के विवाह में दोष न होते हुए भी जन्म पत्रिका के अनुसार गुणों को मिलाना ही चाहिए यदि मंगल के साथ शनि अथवा राहु केतु भी हो तो प्रबल मंगली डबल मंगली योग होता है | इसी प्रकार गुरु अथवा चंद्रमा केंद्र हो तो दोष का परिहार भी हो जाता है |इसके अतिरिक्त मेष वृश्चिक मकर का मंगल होने से भी दोष नष्ट हो जाता है | इसी प्रकार यदि वर या कन्या किसी भी कुंडली में 1,4,7,9,12 स्थानों में शनि हो केंद्र त्रिकोण भावो में शुभ ग्रह, 3,6,11 भावो में पाप ग्रह हों तो भी मंगलीक दोष का आंशिक परिहार होता है, सप्तम ग्रह में यदि सप्तमेश हो तो भी दोष निवृत्त होता है |

स्वयं सिद्ध मुहूर्त

 स्वयं सिद्ध मुहूर्त चैत्र शुक्ल प्रतिपदा वैशाख शुक्ल तृतीया अक्षय तृतीया आश्विन शुक्ल दशमी विजयदशमी दीपावली के प्रदोष काल का आधा भाग भारत में से इसके अतिरिक्त लोकाचार और देश आचार्य के अनुसार निम्नलिखित कृतियों को भी स्वयं सिद्ध मुहूर्त माना जाता है बडावली नामी देव प्रबोधिनी एकादशी बसंत पंचमी फुलेरा दूज इन में से किसी भी कार्य को करने के लिए पंचांग शुद्धि देखने की आवश्यकता नहीं है परंतु विवाह आदि में तो पंचांग में दिए गए मुहूर्त व कार्य करना श्रेष्ठ रहता है।

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527,9560518227

जुलाई मास 2026 का राशिफल 

आत्म-जागरूकता, मानसिक शांति और भविष्य की चुनौतियों के लिए मानसिक रूप से तैयार होने के लिए राशिफल देखना चाहिये हैं। राशिफल आपको अपनी क्षमताओं, कमियों और स्वभाव को गहराई से समझने में मदद करता है। जीवन के असमंजस भरे फैसलों में यह एक सकारात्मक दृष्टिकोण और संबल प्रदान करता है। आने वाले समय में संभावित समस्याओं या चुनौतियों के बारे में जानकर आप पहले से सतर्क रह सकते हैं। यह कठिन समय में धैर्य रखने और अच्छे समय का लाभ उठाने की प्रेरणा देता है। आप इसे भविष्य का अटल सत्य मानने के बजाय जीवन की योजनाओं को बेहतर बनाने के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में देख सकते हैं।

मेष - स्वास्थ्य ठीक रहेगा। यात्रा पर जाना उत्तम होगा।शत्रु स्वयं समाप्त हो जायेंगे पर सभी कार्यों में बाधा आयेगी।

वृष - अच्छे व मांगलिक कार्यों में खर्च होगा।परिजनों-मित्रों से मतभेद होगा, कारोबार में वृद्धि होगी।

मिथुन - मन में नये-नये विचार आयेंगे। व्यापार ठीक रहेगा। नये पद अधिकार की प्राप्ति होगी, विवाहादि-पुत्रजन्म का योग है।

कर्क - शत्रु पक्ष परास्त होगा। कोई मित्र भी बन सकता है। व्यवसाय में वृद्धि होगी, आय के कार्यक्षेत्र में क्षमता की वृद्धि होगी।

सिंह - जन सम्पर्क से लाभ होगा, यात्रा करनी पड़ेगी। नौकरी पेशा वालों के लिए वर्ष प्रतिकूल है, मान-सम्मान की कमी।

कन्या - भाइयों से मतभेद बढ़ेगा। यात्रा भी व्यर्थ की रहेगी। संतान से शुभ समाचार की प्राप्ति, धार्मिक कार्य में रुचि बढ़ेगी।

तुला - स्त्री एवं सन्तान को कष्ट, कुछ चिन्ता भी बनेगी। भौतिक सुख सुविधा के साधन में वृद्धि होगी, रुका कार्य संपन्न होगा।

वृश्चिक - जन सम्पर्क से आर्थिक लाभ मिलेगा, यश भी मिलेगा। हर बाधाओं को पार करते हुए आप अपना कार्य करते रहेंगे।

धनु - किसी साधु के दर्शन से लाभहोगा। जमा पूंजी बढ़ेगी। अनेक प्रकार की कठिनाइयाँ आती रहेंगी, मन पूरी तरह संतुष्ट रहेगा।

मकर - चल-अचल सम्पत्ति में वृद्धि होगी। अच्छा लाभ होगा। मनोविकार से मुक्ति मिलेगी, भूमि-भवन वाहन का सुख मिलेगा।

कुम्भ - समय विपरीत है, संयम रखें, हानि हो सकती है। अध्यात्मिक विषयों में रुचि होगी, स्त्री-संतान से कष्ट होगा।

मीन - नौकरी में उन्नति के साथ स्थान परिवर्तन होगा। आय में कमी तथा खर्च अधिक होने से मानसिक तनाव बढ़ेगा।सबंधी परेशानी हो सकती है । परिवरिक उलझनों  के कारण अधिक खर्च होने की संभावना है  फिजूल खर्च से बचे ।

जुलाई 2026 के महत्वपूर्ण दिवस 

1 जुलाई – भारत में राष्ट्रीय डॉक्टर दिवस। भारत में, हमारे जीवन में डॉक्टरों के महत्व को दर्शाने के लिए 1 जुलाई को डॉक्टर दिवस मनाया जाता है। यह दिन चिकित्सा उद्योग और इसकी प्रगति को भी याद करने के लिए है।

1 जुलाई - राष्ट्रीय डाक कर्मचारी दिवस। राष्ट्रीय डाक कर्मचारी दिवस हर साल 1 जुलाई को उन सभी पुरुषों और महिलाओं को धन्यवाद और सराहना देने के लिए मनाया जाता है जो हमारे सभी डाक और पैकेजों को पहुंचाने के लिए लगातार और लगन से काम करते हैं।

1 जुलाई - चार्टर्ड अकाउंटेंट्स दिवस। इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया (आईसीएआई) की स्थापना 1 जुलाई 1949 को हुई थी, इसलिए भारत में इस दिन को चार्टर्ड अकाउंटेंट्स दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह विश्व का दूसरा सबसे बड़ा पेशेवर लेखा और वित्त संगठन है।

1 जुलाई - बी. सी. रॉय / डॉ. बिधान चंद्र रॉय 1 जुलाई 1882 भारत के महान चिकित्सक, पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री, और उन्हीं के जन्मदिवस 1 जुलाई पर 'राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस' मनाया जाता है।

2 जुलाई - विश्व यूएफओ दिवस। विश्व यूएफओ दिवस 2 जुलाई को मनाया जाता है। इसकी स्थापना यूएफओ खोजकर्ता हक्तान अकदोगन ने की थी। पहला विश्व यूएफओ दिवस 2001 में मनाया गया था और इसका उद्देश्य लोगों में अज्ञात उड़ने वाली वस्तुओं (यूएफओ) की खोज के लिए आकाश की ओर देखने की जागरूकता फैलाना था।

3 जुलाई - जमशेदजी टाटा 3 जुलाई 1839 महान उद्योगपति और भारत के आधुनिक औद्योगिकरण के जनक, जिन्होंने 'टाटा समूह' की नींव रखी। 

4 जुलाई - संयुक्त राज्य अमेरिका का स्वतंत्रता दिवस। संयुक्त राज्य अमेरिका का स्वतंत्रता दिवस 4 

जुलाई को मनाया जाता है। इसे फोर्थ ऑफ जुलाई या फोर्थ के नाम से भी जाना जाता है। यह दिन 4 जुलाई 1776 को ग्रेट ब्रिटेन साम्राज्य से स्वतंत्रता की घोषणा को अपनाने की याद में मनाया जाता है।

7 जुलाई - एम. एस. धोनी ,7 जुलाई 1981 भारतीय क्रिकेट के सबसे सफलतम पूर्व कप्तानों में से एक, जिन्हें विश्व स्तर पर 'कैप्टन कूल' के रूप में जाना जाता है। 

7 जुलाई - विश्व चॉकलेट दिवस ,यह दिवस 7 जुलाई को मनाया जाता है क्योंकि इसी दिन 1550 में चॉकलेट पहली बार यूरोप में लाई गई थी। विश्व चॉकलेट दिवस विभिन्न देशों में अलग-अलग दिनों में मनाया जाता है। 

7 जुलाई - वैश्विक क्षमा दिवस ,7 जुलाई को मनाया जाने वाला वैश्विक क्षमा दिवस, जिसे अंतर्राष्ट्रीय क्षमा दिवस के रूप में भी जाना जाता है, एक अपेक्षाकृत नया आयोजन है जो वैश्विक स्तर पर क्षमा और सुलह को बढ़ावा देने के लिए समर्पित है। वैश्विक क्षमा दिवस की सटीक उत्पत्ति और इतिहास के बारे में पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन क्षमा की अवधारणा विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों में गहराई से निहित है।

10 जुलाई - वैश्विक ऊर्जा स्वतंत्रता दिवस,वैश्विक ऊर्जा स्वतंत्रता दिवस प्रतिवर्ष 10 जुलाई को विश्व भर में मनाया जाता है। यह सरकारों, संगठनों और व्यक्तियों को गैर-नवीकरणीय संसाधनों पर निर्भरता कम करने और स्वच्छ एवं अधिक टिकाऊ ऊर्जा प्रणालियों की ओर बढ़ने के महत्व की याद दिलाता है। 

11 जुलाई - विश्व जनसंख्या दिवस। जनसंख्या संबंधी मुद्दों की तात्कालिकता और महत्व पर ध्यान केंद्रित करने के लिए विश्व जनसंख्या दिवस प्रतिवर्ष 11 जुलाई को मनाया जाता है।

12 जुलाई - राष्ट्रीय सादगी दिवस। राष्ट्रीय सादगी दिवस प्रतिवर्ष 12 जुलाई को हेनरी डेविड थोरो के सम्मान में मनाया जाता है, जो एक लेखक, दार्शनिक, इतिहासकार, कर विरोधी, दास प्रथा विरोधी, विकास आलोचक, सर्वेक्षक और अग्रणी आध्यात्मिक विचारक थे। मूलतः, वे सादगीपूर्ण जीवन जीने के समर्थक थे।

12 जुलाई - पेपर बैग दिवस। पेपर बैग दिवस हर साल 12 जुलाई को मनाया जाता है ताकि पेपर बैग के आविष्कार के महत्व को पहचाना जा सके, जिसे हम अक्सर सामान्य मानते हैं। 1852 में, स्कूल शिक्षक फ्रांसिस वोले ने बड़े पैमाने पर पेपर बैग बनाने वाली पहली मशीन का आविष्कार किया था। 

12 जुलाई - मलाला दिवस,मलाला दिवस हर साल 12 जुलाई को कार्यकर्ता मलाला यूसुफजई के जन्मदिन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। मलाला दिवस को संयुक्त राष्ट्र द्वारा उस युवती को सम्मानित करने के लिए नामित किया गया था जो वर्षों से महिलाओं की शिक्षा की वकालत कर रही हैं। 

14 जुलाई - बैस्टिल दिवस या फ्रांसीसी राष्ट्रीय दिवस। बैस्टिल दिवस हर साल 14 जुलाई को मनाया जाता है। यह दिन 14 जुलाई 1789 को बैस्टिल पर हुए हमले की वर्षगांठ का प्रतीक है, जो फ्रांसीसी क्रांति का एक महत्वपूर्ण मोड़ था।

15 जुलाई -  विश्व युवा कौशल दिवस,विश्व युवा कौशल दिवस हर साल 15 जुलाई को मनाया जाता है 

ताकि तकनीकी, व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण के महत्व और स्थानीय और वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं से संबंधित अन्य कौशलों के विकास के बारे में जागरूकता बढ़ाई जा सके।

15 जुलाई - सोशल मीडिया दान दिवस,यह दिवस 15 जुलाई को मनाया जाता है। इस दिन की शुरुआत 2013 में ट्विटर के माध्यम से धन जुटाने के लिए समर्पित एक प्लेटफॉर्म, Givver.com द्वारा की गई थी।

15 जुलाई - के. कामराज (15 जुलाई 1903): तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री, स्वतंत्रता सेनानी और भारत के 'शिक्षा किंगमेकर'। 

17 जुलाई - अंतर्राष्ट्रीय न्याय दिवस। अंतर्राष्ट्रीय न्याय दिवस प्रतिवर्ष 17 जुलाई को मनाया जाता है। इसे अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्याय दिवस या अंतर्राष्ट्रीय न्याय दिवस के रूप में भी जाना जाता है। यह दिन अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्याय की उभरती प्रणाली को मान्यता देता है।

17 जुलाई - विश्व इमोजी दिवस,विश्व इमोजी दिवस वर्ष 2014 से हर साल 17 जुलाई को मनाया जाता है। यह दिन इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से किसी विचार या भावना को व्यक्त करने के लिए मनाया जाता है। 

18 जुलाई - अंतर्राष्ट्रीय नेल्सन मंडेला दिवस। अंतर्राष्ट्रीय नेल्सन मंडेला दिवस हर साल 18 जुलाई को मनाया जाता है। यह दिन मंडेला के जीवन और विरासत का स्थायी रूप से जश्न मनाने के लिए समर्पित है, जिससे आवश्यक बदलाव लाए जा सकें।

19 जुलाई - मंगल पांडे 19 जुलाई 1827, 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम (सिपाही विद्रोह) के महान अग्रदूत और अमर शहीद। 

20 जुलाई - अंतर्राष्ट्रीय शतरंज दिवस,यह दिवस फेडरेशन इंटरनेशनेल डेस एचेस (एफआईडीएस) की स्थापना के सम्मान में 20 जुलाई को मनाया जाता है।

20 जुलाई - चंद्र दिवस,चंद्र दिवस उस दिन की याद में मनाया जाता है जब 1969 में मनुष्य ने पहली बार चंद्रमा पर कदम रखा था।

22 जुलाई – पाई सन्निकटन दिवस। पाई सन्निकटन दिवस हर साल 22 जुलाई को मनाया जाता है क्योंकि पाई का मान 22/7 होता है। वहीं पाई दिवस 14 मार्च को मनाया जाता है, जो लगभग 3.14 के मान के समान है और अल्बर्ट आइंस्टीन के जन्मदिन के साथ भी मेल खाता है।

22 जुलाई - राष्ट्रीय ध्वज दिवस,भारतीय राष्ट्रीय ध्वज भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, स्वतंत्रता के लिए किए गए संघर्ष और एक एकजुट एवं समृद्ध राष्ट्र के लिए जनता की आकांक्षाओं का प्रतीक है। पिंगली वेकय्या द्वारा डिजाइन किए गए तिरंगे को भारत के ध्वज के रूप में अपनाने की वर्षगांठ के उपलक्ष्य में प्रतिवर्ष 22 जुलाई को राष्ट्रीय ध्वज दिवस मनाया जाता है।

22 जुलाई - राष्ट्रीय आम दिवस या आम दिवस,यह दिवस 22 जुलाई को मनाया जाता है। इस दिन रसीले और स्वादिष्ट फल आम के इतिहास और कुछ कम ज्ञात तथ्यों के बारे में जानने का अवसर मिलता है।

23 जुलाई - लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक 23 जुलाई 1856 महान स्वतंत्रता सेनानी और 'लाल-बाल-पाल' की तिकड़ी के प्रमुख सदस्य। इन्होंने "स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा" का प्रसिद्ध नारा दिया था। चंद्रशेखर आज़ाद 23 जुलाई 1906 भारत के सबसे निडर और महान क्रांतिकारी, जिन्होंने 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम में अभूतपूर्व योगदान दिया। 

24 जुलाई - राष्ट्रीय थर्मल इंजीनियर दिवस। राष्ट्रीय थर्मल इंजीनियर दिवस हर साल 24 जुलाई को मनाया जाता है ताकि थर्मल इंजीनियरिंग उद्योग को आगे बढ़ाने के महत्व को दर्शाया जा सके और इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग को नवीन, उच्च-गुणवत्ता वाले और लागत प्रभावी थर्मल प्रबंधन और पैकेजिंग समाधान प्रदान किए जा सकें।

25 जुलाई - विश्व भ्रूणविज्ञानी दिवस 25 जुलाई 1978 को, लुईस जॉय ब्राउन आईवीएफ या इन विट्रो फर्टिलाइजेशन के माध्यम से गर्भधारण करने वाली पहली बच्ची बनीं और इसलिए इस तारीख को हर साल विश्व भ्रूणविज्ञानी दिवस के रूप में मनाया जाता है।

26 जुलाई - कारगिल विजय दिवस। कारगिल विजय दिवस 26 जुलाई को मनाया जाता है और इसका नाम विजय अभियान की सफलता के उपलक्ष्य में रखा गया है। लगभग 60 दिनों तक चले कारगिल युद्ध का अंत 26 जुलाई को हुआ था। यह दिन कारगिल युद्ध के नायकों को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए मनाया जाता है।

27 जुलाई - एपीजे अब्दुल कलाम की पुण्यतिथि,अवुल पकिर जैनुलबदीन अब्दुल कलाम, जिन्हें एपीजे अब्दुल कलाम के नाम से भी जाना जाता है, भारत के 11वें राष्ट्रपति थे। उनका निधन 27 जुलाई 2015 को हुआ। इस वर्ष 'मिसाइल मैन' की सातवीं पुण्यतिथि है। इस दिन हम उन्हें इतिहास के सर्वश्रेष्ठ शिक्षाविदों में से एक के रूप में श्रद्धांजलि अर्पित कर सकते हैं, जिन्होंने भारतीय अंतरिक्ष और सैन्य अनुसंधान की उन्नति में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

28 जुलाई - विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस। विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस प्रतिवर्ष 28 जुलाई को मनाया जाता है ताकि यह स्वीकार किया जा सके कि स्वस्थ पर्यावरण एक स्थिर और उत्पादक समाज और आने वाली पीढ़ियों की नींव है। हमें अपने प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा, संरक्षण और सतत प्रबंधन करना चाहिए।

28 जुलाई - विश्व हेपेटाइटिस दिवस। विश्व हेपेटाइटिस दिवस प्रतिवर्ष 28 जुलाई को मनाया जाता है ताकि हेपेटाइटिस के खिलाफ राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों को बढ़ावा देने का अवसर मिल सके । साथ ही, यह दिन लोगों को हेपेटाइटिस रोग और इससे पीड़ित लोगों के जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में जागरूक करता है।

29 जुलाई - अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस,हर साल 29 जुलाई को हम अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस मनाते हैं ताकि 

बाघों के संरक्षण की आवश्यकता के बारे में जागरूकता बढ़ाई जा सके और उनके प्राकृतिक वातावरण के संरक्षण में सहयोग दिया जा सके। इस दिन को वैश्विक बाघ दिवस के रूप में भी मनाया जाता है।

 29 जुलाई - जे. आर. डी. टाटा 29 जुलाई 19,04 भारत के पहले लाइसेंस प्राप्त पायलट, प्रमुख उद्योगपति और टाटा समूह के लंबे समय तक चेयरमैन रहे।

30 जुलाई - अंतर्राष्ट्रीय मित्रता दिवस,अंतर्राष्ट्रीय मित्रता दिवस 30 जुलाई को मनाया जाता है, जो जीवन में मित्रों और मित्रता के महत्व को दर्शाता है। यह दिन विश्व भर की विभिन्न संस्कृतियों में शांति को बढ़ावा देने में मित्रता की भूमिका को भी रेखांकित करता है।

31 जुलाई - मुंशी प्रेमचंद 31 जुलाई 1880 'उपन्यास सम्राट' के नाम से प्रसिद्ध, हिंदी और उर्दू साहित्य के महानतम कहानीकार और लेखक।


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