जानकारी काल हिन्दी मासिक अक्टूबर - 2025
जानकारी काल
वर्ष-26 अंक - 06 अक्टूबर - 2025 , पृष्ठ 34 www.sumansangam.com
या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
अपनों से अपनी बात
भविष्य में बड़े पैमाने पर देश विरोधी आंदोलनों को रोकने के लिए कदम उठाते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो (BPR&D) को निर्देश दिए हैं। केन्द्रीय गृह मंत्री ने निर्देश दिया कि केन्द्रीय और राज्य कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बेहतर अंतर-एजेंसी समन्वय के साथ उन भगोड़ों को देश वापस लाने के लिए विशेष उपाय किए जाएँ जो आतंकी गतिविधियों और तस्करी में लिप्त हैं। साथ ही, आतंकियों और अपराधियों के बीच देश के अंदर चल रहे गिरोह के घरेलू संबंधों को ध्वस्त करने के लिए अपनाए जा रहे दृष्टिकोण को पुन: अंशांकित किया जाए। केन्द्रीय गृह मंत्रालय को सभी हितधारकों के साथ मिलकर एक मंच स्थापित करने और आतंकी नेटवर्कों द्वारा उपयोग किए जा रहे एन्क्रिप्टेड संचार से निपटने के लिए समाधान की तलाश करने के निर्देश दिए गए। आतंक वित्तपोषण के तरीकों की समीक्षा करते हुए एजेंसियों को वित्तीय अनियमितताओं के विश्लेषण के माध्यम से आतंकी मॉड्यूल का खुलासा करने का निर्देश दिया गया। गृह मंत्रालय से यह भी कहा गया कि पुलिस संगठनों द्वारा केवल स्वदेशी तकनीक का ही उपयोग सुनिश्चित किया जाए।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो (BPR&D) से स्वतंत्रता के बाद भारत में हुए सभी विरोध प्रदर्शनों, विशेष रूप से 1974 के बाद हुए प्रदर्शनों का अध्ययन करने को कहा है,वे चाहते हैं कि ब्यूरो उन प्रदर्शनों के “वित्तीय पहलुओं”, अंतिम परिणामों और “पर्दे के पीछे के खिलाड़ियों” की जांच करे और एक मानक संचालन प्रक्रिया तैयार करे, जो भविष्य में “स्वार्थी हितधारकों द्वारा बड़े पैमाने पर आंदोलनों” को रोकने की दिशा में एक कदम हो। जुलाई में इंटेलिजेंस ब्यूरो द्वारा आयोजित दो दिवसीय ‘राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीतियाँ सम्मेलन-2025’ में शाह के भाषण के दौरान जारी किए गए थे।
“BPR&D को विशेष रूप से उन प्रदर्शनों के कारणों, पैटर्न और परिणामों का विश्लेषण करने को कहा गया है, जिसमें पर्दे के पीछे के खिलाड़ी भी शामिल हैं,” “निर्देश दिया गया है कि अध्ययन के परिणाम के आधार पर एक SOP तैयार किया जाए ताकि भविष्य में स्वार्थी हितधारकों द्वारा बड़े पैमाने पर आंदोलनों को रोका जा सके।” BPR&D, कथित तौर पर इस पर एक समिति बनाने की प्रक्रिया में है जो इस मामले की जांच करेगी। यह टीम “राज्य पुलिस विभागों के साथ पुराने केस फाइलों के लिए समन्वय करेगी, जिसमें उनके अपराध जांच विभागों की रिपोर्टें भी शामिल हैं । देशभर से लगभग 800 अधिकारियों ने इसमें हिस्सा लिया और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबन्धित विभिन्न मुद्दों पर गहन चर्चा की ।
विजयादशमी - एकता में शक्ति
सतीश शर्मा
हमारा देश महान् एवं अति प्राचीन होने के कारण इसके उत्सव भी उतने ही महान् एवं प्राचीन है। अतः कालक्रम से उत्सवों के साथ अनेकों घटनाओं व प्रसंगों का जुड़ जाना स्वाभाविक है। हिन्दू समाज पुरुषार्थ में विश्वास रखता है अतः अंतिम लक्ष्य मोक्ष के रुप में अखण्डानंद की ही प्राप्ति है। हिन्दू-जीवन पद्धति में इसीलिए नित नूतन उत्सवों की मालिका देखने में आती है।
दशहरा को अच्छाई की बुराई पर जीत के लिए मनाया जाता है। इसी दिन भगवान श्री राम जी ने रावण का वध किया था। दशहरा नवरात्रि के नौ दिनों के उपवास और पूजा का समापन भी होता है। इन नौ दिनों में हम देवी दुर्गा के रूपों की पूजा करते हैं और बुराई से लड़ने की शक्ति मांगते हैं।
प्रतिवर्ष आश्विन शुक्लपक्ष दशमी को हिन्दू समाज उत्साह तथा आशा से परिपूर्ण होकर विजयदशमी का पावन पर्व मनाता है। आसुरी शक्ति पर सज्जन शक्ति की विजय के रूप में राम की रावण पर विजय की यह गौरव गाथा विश्व विख्यात है। यह न्याय की अन्याय पर, सदाचार की अनाचार पर सत्य की असल्य पर, धर्म की अधर्म पर तथा सात्विकता की पाशविकता पर विजय गाथा है। साथ ही मां दुर्गा से जुड़ी है, जिसमें देवी दुर्गा ने महिषासुर नामक राक्षस का वध किया था। देवी दुर्गा ने नौ दिनों तक युद्ध करके उसे पराजित किया। इस महत्व के कारण भी दसवें दिन को विजयदशमी के रूप में मनाया जाता है।
आदि कवि वाल्मीकि ने राम की विजय गाथा को सर्वप्रथम लिखा। इसके पश्चात अनेक कवियों ने राम चरित्र का वर्णन अपने भावनाओं के अनुकूल किया परन्तु सर्वाधिक प्रसिद्ध गोस्वामी तुल्सीदास रचित
रामचरितमानस को प्राप्त हुई। महाबलशाली अतुल संपत्ति का स्वामी, पुष्पक विमान सहित अनेकों मन्त्र दीक्षित अस्त्र शास्त्रों से सुसज्जित, साधन संपन्न सेनानायक लंकाधिपति रावण से बडे-बडे बलशाली प्रतापी एवं शूरवीर राजा भी भय खाते थे। परन्तु निरंकुश शक्ति समाज के लिए घातक हो जाती है। आसुरी आचार व्यवहार के साथ संस्कृति का हास होने लगता है। अपनी शक्ति के शिखर पर रावण राज्य में भी यही सब कुछ हो रही था। ऋषि मुनि व तपस्वी अत्याचार के शिकार थे। यज्ञ और धार्मिक कृत्य करना कठिन था। समाज मर्माहत था। ऐसे में ही दशरथ नंदन राम का आविर्भाव हुआ और उन्होंने अयोध्या का राजमहल छोड़कर वन गमन किया। राम ने समाज की सही स्थिति का आंकलन करते हुए वनवास के समय समाज के श्रेष्ठ जनों से विद्वानों से ऋषि मुनियों से संबंध बनाए। इसके साथ ही साथ वनवासी जातिया जैसे वानर भील, निषाद, रीक्ष आदि समुदायों का संगठन खड़ा करने को सफल प्रयास किया। इस संगठित शक्ति के बल पर आसुरी शक्तियों को ध्वस्त किया।यहां एक बात और समझना आवश्यक है हम राम को ईश्वर अवतार मानते हैं ऐसा ही गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने ग्रंथ रामचरितमानस में कहा है, इसी कारण वनवास के कुछ वर्ष व्यतीत होने के बाद जब राम को लगा कि अब रावण वध का समय आ गया है तब उन्होंने सीता जी को अग्नि प्रवेश करा दिया और छाया सीता को अपने साथ रखा जिसका अपहरण रावण ने किया था। उस छाया सीता को ढूंढते हुए भगवान राम जब घने जंगलो में पहुंचे तब वहां उन्होंने हड्डियों का ढेर देखा। जिसको देखकर उन्होंने वहां के निवासी ऋषि मुनियों से पूछा कि यह हड्डियों का ढेर किसका है। तब उन्हें उत्तर मिला कि यह उन ऋषियों और मुनियों की हड्डियों का ढेर है, जिनको मारकर खाकर हड्डियां राक्षसो ने यहां फेंक दी है। यह उन्ही ऋषियों की हड्डियों का ढेर है। तब राम ने हाथ उठाकर प्रतिज्ञा की थी
निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह। सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह ।।
अर्थात राम कहते हैं कि वे इस पृथ्वी को राक्षसो से रहित कर देंगे। इससे स्पष्ट है कि रावण का वध तो होना ही था, सीताहरण तो एक बहाना था।
साथ ही यदि राम चाहते तो वह और लक्ष्मण बिना किसी अन्य की सहायता के ही रावण का वध कर सकते थे और सीता को छुड़ा सकते थे। जटायु ने राम को बात ही दिया था की सीता को रावण हरण करके दक्षिण दिशा की ओर ले गया है। ऋषियों से राम को पता चल ही सकता था की रावण का निवास कहां है और वह अकेले जाकर समुद्र को पार करके युद्ध में रावण को परास्त करके सीता को छुड़ा सकते थे। परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया, क्योंकि उनका मानना था की आसुरी शक्तियों से युद्ध करना पूरे समाज का कर्तव्य है। पूरे समाज को दुष्ट शक्तियों से युद्ध करने के लिए संगठित होना जरूरी है। इस कारण उन्होंने वानरों और अन्य जातियों का एक अद्भुत संगठन खड़ा किया जिसमें हनुमान, अंगद, सुग्रीव और जामवंत जैसे जैसे महा बलशाली भी थे। यह सज्जन शक्ति का एक अजेय संगठन था। भगवान श्रीराम का स्पष्ट सन्देश है, कि न्याय की अन्याय पर सदाचार की अत्याचार पर सत्य की असत्य पर धर्म की अधर्म पर विजय के लिये सज्जन शक्ति का संगठित होना आवश्यक है।
यह एक शक्तिशाली संगठन होना चाहिए। और एक बात, धर्मयुद्ध में भाग लेने का कर्तव्य केवल जन्म से क्षत्रियो का ही नहीं परन्तु समाज के सभी वगों का दायित्व है।
राम का जीवन सामाजिक समरसता के के रूप में भी अनुकरणीय है। वह एक और जहां भारद्वाज और वाल्मीकि के आश्रम में गए दूसरी ओर शबरी के आश्रम में जाकर उनके झूठे बेर खाने में संकोच नहीं किया। वह निषाद राज को भी गले लगाते हैं और उनका आतिथ्य स्वीकार करते हैं। राम के इस व्यवहार के ही परिणाम को गोस्वामी जी ने निम्न चौपाई में प्रकट किया है -
करि के हरि कपि कोल कुरंगा। बिगत बैर विचरहिं सब संगा ।।
इसका भावार्थ है की हाथी शेर, वानर कोल और अन्य जातियों के सभी लोग आपस में वैर भाव को भूलकर एक साथ विचरण करते हैं। अर्थात उन्होंने समाज में सब प्रकार के लोगों को संगठन में सम्मिलित किया।
शान्ति के समय मे भी ऐसा संगठन आवश्यक सज्जन शक्ति का संगठन मात्र युद्ध के लिए ही आवश्यक नहीं है परन्तु शान्ति के समय में भी शक्तिशाली होना आवश्यक है। प्रत्येक शान्ति प्रेमी अगर शक्तिशाली नहीं होगा तो आसुरी शक्तियां उसकी शान्ति को भंग कर देगी। इसका सबसे बड़ा प्रमाण हमे विगत अनेक वर्षों पूर्व की घटना से मिलता है। जब रूस ने आणविक हथियार क्यूबा में लगा दिए थे। तब अमेरिका के राष्ट्रपति ने चेतावनी दी थी कि, अगर रूस ने इन इन आणविक हथियारो को नहीं हटाया तो अमेरिका रूस के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर देगा। इससे घबरा कर रूस ने आणविक हथियार वहां से हटा लिए थे। सोचिए अगर उस समय अमेरिका रूस से अधिक शक्तिशाली नहीं होता तो क्या रूस वहां से आणविक हथियार हटाता और क्या हमेशा के लिए अमेरिका आणविक हथियारों के आक्रमण के भय में नहीं जीता नहीं रहता। अभी हाल मैं अमेरिका द्वारा भारत पर टैरिफ बढ़ाना ऐसे अनेकों उदाहरण है। शक्ति हो तो राम मंदिर बन जाता है, शक्ति हो तो धारा 370 है जाती है और अगर शक्ति हो तो ऑपरेशन सिंदूर हो जाता है इसलिए शक्ति का संचय और संगठन जरूरी है ।
यही सन्देश हमे त्रेता युग की घटना से भी मिलता है, जब राम ने समुद्र से सागर पार जाने का मार्ग देने का आग्रह किया। परन्तु समुद्र लंका जाने का मार्ग बताने के लिए तैयार नहीं हुआ। राम तीन दिन तक अनुनय करते रहे। इस घटना को गोस्वामी तुलसीदास जी ने निम्नलिखित चौपाई में वर्णित किया है
विनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीत। बोले राम सकोप तब भय बिन होय न प्रीत।।
तब राम ने समुद्र को सुखाने हेतु धनुष पर अग्निबाण का संघान किया। और समुद्र ने घबराकर डर कर राम को सागर पर जाने के लिए सेतु निर्माण की प्रक्रिया बता दी। सोचिये अगर श्री राम मे समुद्र सुखा देने की शक्ति न होती तो क्या समुद्र सेतु बंधन का तरीका बताता।
विजयदशमी का पर्व शस्त्र पूजन की परम्परा का भी स्मरण करवाता है शास्त्र और शास्त्र दोनों में निपुणता के बिना कोई भी राष्ट्र अपनी उन्नति नहीं कर सकता यह ध्रुव सत्य है।
धर्मादर्थः प्रभावति धर्मात्प्रभवते सुखम्। धर्मेण लभते सर्वं धर्मसारमिदं जगत्॥
धर्म से ही धन, सुख और सब कुछ प्राप्त होता है। इस संसार में धर्म ही सार वस्तु है।
अपनी यह मातृभूमि है, हम उसके पुत्र हैं, और हजारों वर्षों से हम यहां एक साथ रहते आये हैं। इस दीर्घ कालखण्ड में हमने भूतकाल का उज्ज्वल इतिहास निर्माण किया है, यह भावनात्मक अधार तो होगा ही, किन्तु क्या यही पर्याप्त है ? क्या इस भावना के साथ ही कोई व्यावहारिक पक्ष होना आवश्यक नहीं ? सब लोगों को 'हम सभी एक हैं' का भावनात्मक बोध होना आवश्यक है, वैसा ही प्रत्यक्ष व्यवहार में भी इस एकता का अनुभव सदा सहज रूप से होना चाहिये। अपने दैनंदिन व्यवहार में जब तक हम सभी को अपनी इस 'एकता' की अनुभूति नहीं होती, तब तक एकता की नींव मजबूत और चिरस्थायी नहीं हो सकती। यदि आप ऐसा समझते हैं, और मुझे विश्वास है कि आप भी ऐसा ही सोचते हैं, तो फिर इस दृष्टि से हममें क्या कमी है, इसका विचार करना भी आवश्यक हो जाता है।
संघ शताब्दी के इस आनंद और उत्साह से भरे पुण्य अवसर पर, हर्षोल्लासपूर्वक विभिन्न आयोजनों को संपन्न करने के साथ ही हमको अंतर्मुख होकर यह विचार भी करना चाहिए कि हमारे कार्य का प्रयोजन यदि भारत के जीवन में स्व की अभिव्यक्ति से होने वाला है, तो वह भारत का स्व क्या है? विश्व जीवन में भारत के योगदान के उस प्रयोजन को सिद्ध करने के लिए हमको भारत को किस प्रकार शक्तिशाली बनाना होगा? इन कार्यों को संपन्न करने के लिए हमारे कर्तव्य क्या हैं? उसका निर्वाह करने के लिए समाज को कैसे तैयार किया जाए? वह कार्य पूर्ण करने हेतु यह चिंतन तथा हम सबके कर्तव्य के दिशा की स्पष्टता आवश्यक है।
हारिए न हिम्मत
पंजाब-केसरी महाराजा रणजीत सिंह को जब गुप्तचरों से समाचार मिला कि कबाइलियों के दल ने राज्य की सीमा में प्रवेश कर लिया है। और शहर में लूटमार मचा रखा है, तो महाराज ने तुरन्त सेनापति को बुलाया और डांटते हुए पूछा, कबाइलियों का दल राज्य की सीमा में प्रवेश कर पेशावर तक कैसे पहुँच गया? आप उसकी रक्षा क्यों नहीं कर सके ? सेनापति ने झिझकते हुए उत्तर दिया, 'महाराज, तब पेशावर में हमारे केवल 150 सैनिक थे और कबाइलियों की संख्या 1500 थी। इस हालत में उनसे मुकाबला करना कोई मायने नहीं रखता।' इस उत्तर से महाराज की, भौंहे तन गई। तत्क्षण घोड़े पर सवार हो उन्होंने अपने साथ 150 सैनिक लिये और पेशावर जा पहुँचे और लुटेरे कबाइलियों पर टूट पड़े। उनकी वीरता और तलवारबाजी के आगे कबाइली ज्यादा देर तक टिक न सके और भाग खड़े हुए। उन्हें खदेड़कर राजधानी में वापस आने के बाद महाराज ने सेनापति को बुलाकर पूछा, 'कितने सैनिक थे मेरे पास? सेनापति ने सिर झुकाकर जवाब दिया, "150 सैनिक, महाराज।" "और कबाइली कितने थे?" "जी! वे 1500 थे, "लज्जापूर्वक धीमे स्वर में उसने जवाब दिया। "लेकिन वे फिर भी भाग गए ! ऐसा क्यों?" "जी, आपकी बहादुरी और दृढ़ संकल्प के कारण।” "नहीं, मेरी बहादुरी नहीं, हमारी बहादुरी के कहो। रक्षा करने वाले हर एक सिपाही की ताकत सवा लाख सिपाहियों की ताकत के बराबर होती है। वास्तव में आपकी हिम्मत पस्त हो गयी थी, सिपाहियों पर आप कैसे भरोसा करते?"
महर्षि वाल्मीकि
महर्षि वाल्मीकि का जन्म आश्विन मास की शारद पूर्णिमा के दिन हुआ था। मनुष्य ने पहली कविता कब लिखी, यह बता पाना बहुत कठिन है। परन्तु संस्कृत के आदि कांवि वाल्मीकि के बारे में कहा जाता है कि प्रथम काव्याभियक्ति उन्हीं के स्वर से हुई है।
उन्होंने रामायण तब लिखी, जब रावण वध के बाद राम का राज्याभिषेक हो चुका था। वनवास काल के दौरान भगवान श्रीराम लक्ष्मण व सीता सहित महर्षि वाल्मीकि के आश्रम गए थे।
मुनि वाल्मीकि अपने शिष्य भारद्वाज के साथ स्नान के लिए गए। वहां नदी के किनारे पेड़ पर क्रौंच पक्षी का एक जोड़ा अपने में मग्न था, तभी व्याध ने इस जोड़े में से नर क्रौंच को अपने बाण से मार गिराया। रोती हुई मादा क्रौंच भयानक विलाय करने लगी। इस हृदयविदारक घटना को देखकर वाल्मीकि का हृदय इतना द्रवित हुआ कि उनके मुख से अचानक श्लोक फूट पडा:-
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमरू शास्वती समा। यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधीरू काममोहितम् ।।
वाल्मीकि जब अपनी ओर से रामायण की रचना पूरी कर चुके थे तब सीता उनके आश्रम में आ पहुंची। बेटी की तरह सीता को उन्होंने अपने आश्रय में रखा। वहां सीता ने दो जुड़वां बेटों, लव और कुश को जन्म दिया। दोनों बच्चों को वाल्मीकि ने शास्त्र के साथ ही शस्त्र की शिक्षा प्रदान की। इन्हीं बच्चों को मुनि ने अपनी लिखी रामकथा याद कराई जो उन्होंने सीता के आने के बाद फिर से लिखनी शुरू की थी और उसे नाम दिया-उत्तरकांड। उसी रामकथा को कुश और लव ने राम के दरबार में अश्वमेघ यज्ञ के अवसर पर सम्पूर्ण रूप से सुनाया था। लव और कुश को ज्ञान प्रदान करने वाले ऋषि वाल्मीकि ही थे। महर्षि कश्यप और अदिति के नवम पुत्र वरुण से इनका जन्म हुआ। इनकी माता चर्षणी और भाई भृगु थे। वरुण का एक नाम प्रचेत भी है. इसलिए इन्हें प्राचेतस् नाम से उल्लेखित किया जाता है। उपनिषद के विवरण के अनुसार यह भी अपने भाई भृगु की भांति परम ज्ञानी थे।
ऐसी मान्यता है कि जन्म के बाद उन्हें भील परिवार के लोग चुरा कर ले गए थे और उन्होंने ही उनका पालन पोषण किया था। वाल्मीकि ने रामायण में स्वयं को प्रचेता का पुत्र कहा है।
भील समुदाय में वे रत्नाकर के नाम से जाने जाते थे तथा परिवार के पालन हेतु लोगों को लूटा करते थे। लेकिन नारद मुनि के संपर्क में आने पर वे अध्यात्म की ओर मुड़ गए और राम का नाम जपने लगे।
एक बार ध्यान में बैठे हुए वरुण पुत्र के शरीर को दीमकों ने अपना घर बनाकर ढंक लिया था। साधना पूरी करके जब यह दीमकों के घर, जिसे वाल्मीकि कहते हैं, से बाहर निकले तो लोग इन्हें वाल्मीकि कहने लगे।
ब्रह्माजी के कहने पर ही महर्षि वाल्मीकि ने रामायण लिखी थी। ब्रह्माजी की प्रेरणा से सारस पक्षी के वध पर महर्षि वाल्मीकि के मुख से श्लोक निकला था। जो बात स्वयं ब्रह्मा जी नें उन्हे बताई थी। उसी के बाद उन्होने रामायण की रचना की थी। वाल्मीकि द्वारा रामायण में 24000 श्लोक लिखे हैं।
ईश्वर है, पर दिखता नहीं
एक संत से किसी ने पूछा, "ईश्वर है, तो दिखाई क्यों नहीं देता ?'
उस संत ने कहा, "ईश्वर कोई वस्तु नहीं है, वह तो अनुभूति है। उसे देखने का उपाय नहीं। हाँ, अनुभव करने का अवश्य है।"
इतने पर भी वह जिज्ञासु संतुष्ट नहीं दिखाई दिया। उसकी आँखों में प्रश्न वैसे ही दिखई दे रहा था। तब उस संत में पास में पड़ा एक बड़ा पत्थर उठाया और अपने पैर पर पटक लिया। उसके पैर को गहरी चोट पहुँची थी और उससे रक्त की धार बहने लगी। यह देखकर वह व्यक्ति बोला- 'यह आपने क्या किया? इससे तो आपको बहुत पीड़ा हो रही होगी?' वह संत हंसने लगे और बोले-"पीड़ा दिखती नहीं, फिर भी है। प्रेम दिखता नहीं, फिर भी होता है। ऐसा ईश्वर भी है। जीवन में जो दिखाई पड़ता है, उसकी ही नहीं, उसकी भी सत्ता है, जो दिखाई नहीं पड़ता है। और उस दृश्यमान से उस अदृश्य की सत्ता बहुत गहरी है।"
स्वामी विवेकानन्द ने कहा- भारत का पुनरुत्थान होगा।
जड़ की शक्ति से नहीं, चेतना की शक्ति से। विनाश का विजयध्वज लेकर नहीं, बल्कि शान्ति और प्रेम के ध्वज फैलाकर संन्यासियों के गेरुआ वस्त्र का सहारा लेकर, अर्थशक्ति से नहीं, बल्कि भिक्षा पात्र की शक्ति से सम्पादित होगा... मैं मानो अपनी दिव्यदृष्टि से देख रहा हूँ- हमारी मातृभूमि फिर जाग उठी है। नव जीवन लाभ करके पहले से भी अधिक गौरवमय मूर्ति धारण कर अपने सिंहासन पर आरुढ़ होकर।
शरद् पूर्णिमा
शरद् पूर्णिमा का पर्व आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन प्रातः काल स्नानादि नित्य कर्मों से निवृत्त होकर अपने आराध्या देव, कुल देवता की षोडशोपचार से पूजा अर्चना एवं शंकर भगवान् के पुत्र कार्तिकेय की भी पूजा इस दिन करने का विधान है। एक पाटे घर जल से भरा लोटा और गेहू से से भरा एक गिलास रखकर उस पर रोली से स्वास्तिक बनाकर चावल और दक्षिणा चढ़ाएं। फिर टीका लगाकर हाथ में गेहूं के तेरह दाने ले व्रत की कथा का श्रवण करें। इसके पश्चात् गेहू से भरे गिलास को किसी ब्राह्मणी को सौंप दें। लोटे के जल और गेहू को चंद्रमा को अध्यं देते हुए चढ़ाए।
रात्रि में गाय के दूध में गोघृत और चीनी या मिस्त्री मिलाकर उसे चंद्रमा की किरणों में रखें। अर्धरात्रि को अपने आराध्य को अर्पण कर सभी को प्रसाद स्वरूप बांट दे। रात्रि जागरण करके भगवद् भजन कीर्तन करें।
विवाहोपरांत पूणमासी के व्रत को करने के लिये शरद पूर्णिमा से ही प्रारम्भ करें। कार्तिक मास का व्रत भी शरद पूर्णिमा से आरम्भ करना चाहिए।
यदि कोई इस शरद पूर्णिमा को वत रखे तो 13 पूनम होने के बाद उद्यापन करें। उजमन में एक चांदी के लोटे में मेवा भरकर रोली, चावल से पूजकर और रूपये चढ़ाकर उस सबको सासुजी को पाय लगकर दे देखें। यदि कोई चुनड़ पुनों के दिन व्रत रखे तो इसी भांति एक पूज्यों करने के बाद सासुजी को चुनही दे देखें। यदि कोई चुड़ा पूल्यों के दिन व्रत रखे तो वह तेरह पून्यों करने के बाद एक चूड़ा तो सासुजी को दे देवें और तेरह बूढ़ी ब्राह्माणियों को दे देखें।
कथा: प्राचीन समय की बात है एक जमींदार के दो पुत्रियां थी। पहली इस व्रत को पूरा करती थी तथा
दूसरी अधूरा ही किया करती थी। अतः दूसरी के जो सन्तान होती वह भर जाया करती थी। उसने पंडितों से पूछा कि मेरी संतान जीवित क्यू नहीं रहती तब पणिडतों ने बताया कि तुम पूर्णिमा का व्रत अधूरा करती करती हो इससे तुम्हारी संतान जीवित नहीं रहती।इतना जान लेने पर दूसरी पुत्री व्रत करने लगी। किन्तु थोड़े दिन बाद लड़का हुआ और होते ही मर गया तो उसने मृत लड़के को सुलाया व बड़ी बहन के पास गई। उसे बुलाकर लाई। वो जैसे ही बैठने लगी उसे छूते ही बच्चा जीवित हो उठा और रोने लगा। बच्चे की आवाज सुनते ही छोटी बहिन हर्षित होकर कहने लगी बहिन ये तेरे भाग्य से जीवित हो गया है। क्योंकि तू व्रत पूरा करती थी और मैं अधूरा। इस दोष से मेरे बच्चे मर जाते थे और गांव में ढिंढोरा पिटवा दिया कि जो कोई पूर्णिमा का व्रत करे वह पूरा करे। अधूरा न करें।
शिक्षक का महत्त्व
एक बार डॉ. अब्दुल कलाम ने अपने सहयोगी सृजन पाल सिंह से कहा, 'तुम युवा हो, शिक्षित हो। तुम अपने उत्तम कार्यों से देश को बहुत कुछ दे सकते हो। यह बताओ कि तुम स्वयं को किस प्रकार से याद किये जाना चाहते हो। डॉ. कलाम का यह प्रश्न सुनकर सृजनपाल स्तब्ध रह गये कि अभी तो उन्होंने अपने जीवन में कुछ विशेष उपलब्धियाँ प्राप्त भी नहीं की हैं, जिन्हें पूरा राष्ट्र अथवा विश्व याद रख सके। सृजनपाल की यह स्थिति देख डॉ. कलाम बोले, क्या हुआ। भाई, तुम्हें अभी तक के अपने कार्यकाल में जो भी उल्लेखनीय व बढ़िया कार्य लगा हो, वही बता दो। सृजनपाल ने विनम्रतापूर्वक कहा, सर, जीवन में अभी सर्वोत्तम करना शेष है। दूसरे, मैंने तो अभी तक ऐसी कोई विशेष उपलब्धियाँ पाई भी नहीं है। ऐसे में कुछ समझ नहीं आ रहा है कि आपके प्रश्न का क्या उत्तर दूँ? डॉ. कलाम बोले, 'चलो बताओ, तुम अपनी उपलब्धियों के कारण याद किये जाना चाहते हो, या अपने कार्य के माध्यम से? सृजनपाल ने कहा, दोनों कारणों से सर। लेकिन कृपया आप बताइये, आप स्वयं को किस रूप में याद किया जाना चाहते हैं- राष्ट्रपति, वैज्ञानिक, लेखक या मिसाइलमैन। अपने प्रश्न के बाद सृजनपाल डॉ. कलाम की ओर देख ही रहे थे कि वह बोले, 'मैं तो चाहूँगा कि लोग मुझे एक शिक्षक के रूप में याद रखें। एक शिक्षक ही ऐसा होता है जो बच्चों को शिल्पकार की तरह तराशकर उसे जीवन में सफल बनाता है। इसलिये मैं प्रयास करूँगा कि लोग मुझे शिक्षक के रूप में ही जानें।
पति पत्नी ओर सास
मेरी मासिक तनख्वाह 35,000 रुपये है, मेरी सास ने मुझे अपने देवर को 20,000 रुपये देने के लिए मजबूर किया। उन्होंने यह भी कहा: "अगर तुम नहीं दोगे, तो हम तलाक ले लेंगे", मैंने बस इतना ही कहा कि पूरा परिवार अवाक रह गया।
मेरा नाम अनन्या है, 28 साल की, मैं मुंबई की एक आयात-निर्यात कंपनी में अकाउंटेंट के पद पर कार्यरत हूँ। कई सालों की कोशिशों के बाद, मुझे 35,000 रुपये मासिक तनख्वाह मिल गई है - कई लोगों की तुलना में बहुत ज़्यादा नहीं, लेकिन मेरे लिए यह पढ़ाई और कड़ी मेहनत का नतीजा है। मैंने सोचा था कि जब मेरी शादी होगी, तो मेरे पति मेरा सहारा होंगे, मेरा ससुराल ही वह जगह होगी जहाँ मुझे सुकून मिलेगा। लेकिन ज़िंदगी किसी सपने जैसी नहीं है।
मेरे पति, राज, भले ही सौम्य हों, लेकिन कमज़ोर हैं। शादी के बाद से ही, मैंने हमेशा अपने परिवार की देखभाल के लिए पैसे बचाने की कोशिश की है। हालाँकि, मेरी सास - श्रीमती कमला देवी - की सोच बिल्कुल अलग है। वह अपने सबसे छोटे बेटे - मेरे देवर - से इतना प्यार करती हैं कि घर की हर चीज़ उसी के इर्द-गिर्द घूमती है।
एक शाम, रात के खाने के बाद, उन्होंने मुझे और राज को बात करने के लिए बुलाया:
- अनन्या, इस महीने तुम्हारी तनख्वाह कितनी है?
मैंने सच-सच जवाब दिया:
- हाँ, 35,000 रुपये।
उन्होंने सिर हिलाया और मानो आदेश दे रही हों:
- अच्छा। अब से मुझे अमित (मेरे देवर) की देखभाल के लिए हर महीने 20,000 रुपये देना। उसे
कॉलेज के लिए पैसे चाहिए, गुज़ारे के लिए पैसे चाहिए। जब बेटी की शादी होती है, तो उस पर अपने पति के परिवार की देखभाल की ज़िम्मेदारी होती है।
मैं दंग रह गई। ज़रूरत पड़ने पर मैं अब भी मदद करती थी, लेकिन मुझसे अपनी तनख्वाह का ज़्यादातर हिस्सा देवर को देने के लिए कहना बेमानी था। मैंने राज की तरफ़ देखा, उम्मीद थी कि वह कुछ कहेगा, लेकिन उसने बस सिर झुका लिया और चुप रहा।
मैंने धीरे से जवाब दिया:
- माँ, मुझे इसका कोई अफ़सोस नहीं है, लेकिन मुझे अपना भी ध्यान रखना है, और मैं भविष्य के लिए भी कुछ बचत करना चाहती हूँ। 20,000 रुपये बहुत ज़्यादा हैं, मैं इसे वहन नहीं कर सकती।
सास ने तुरंत मेज़ पटक दी, उनकी आवाज़ कर्कश थी:
- अगर मुझे नहीं दोगे, तो तलाक ले लो! इस परिवार को स्वार्थी बहू की ज़रूरत नहीं है!
बैठक कक्ष में भारी माहौल छा गया। मेरा दिल दुख रहा था, लेकिन राज फिर भी शांत बैठा रहा, अपनी माँ से बहस करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। मेरी आँखों में आँसू आ गए, लेकिन मैंने गहरी साँस ली और शांति से कहा:
माँ, मैंने राज से उसकी पत्नी बनने के लिए शादी की है, अमित का माता-पिता बनने के लिए नहीं। मैं बाँटने को तैयार हूँ, लेकिन किसी को भी यह हक़ नहीं है कि वह मुझे किसी और के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी कुर्बान करने के लिए मजबूर करे। अगर तलाक ही एकमात्र विकल्प है, तो मैं तैयार हूँ।
पूरा परिवार स्तब्ध रह गया। मेरी सास मुझे घूर रही थीं, राज ने सिर झुका लिया था, और मेरे बगल में बैठा मेरा देवर भी शर्मिंदा था।
मैं उठी और भारी मन से कमरे में चली गई। उस शाम, राज चुपचाप अंदर आया और मेरा हाथ थाम लिया:
मुझे माफ़ करना। मुझे पता है कि आपने बहुत कुछ सहा है। मैं माँ से फिर बात करूँगा।
अगले दिन, राज मुझे पुणे में मेरी माँ के घर ले गया और मेरे माता-पिता से माफ़ी माँगी। उसने कबूल किया कि वह कई सालों से मेरी माँ पर बहुत ज़्यादा निर्भर था, विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया और मुझे अकेले ही सारा दबाव सहना पड़ा। मेरे पिता ने बस आह भरी:
– शादी करना साथ मिलकर खुशियाँ बनाना है। अगर तुम अपनी पत्नी की रक्षा करना नहीं जानते, तो उसे खोने पर किसी को दोष मत दो।
ये शब्द सुनकर राज मानो जाग गया। वह मुड़ा और अपनी माँ से खुलकर बात की। पहले तो माँ नाराज़ हुईं, लेकिन जब उन्होंने अपने बेटे का दृढ़ निश्चय देखा, तो धीरे-धीरे शांत हो गईं। मेरे देवर भी बोले:
माँ, मैं बड़ा हो गया हूँ, मैं पार्ट-टाइम काम कर सकता हूँ। मैं नहीं चाहता कि मेरे भाई-बहन मेरी वजह से झगड़ें।
उस दिन से, सब कुछ बदल गया। अब मुझे अपनी ज़्यादातर तनख्वाह देने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ा। राज और मैंने नवी मुंबई के उपनगरीय इलाके में एक छोटा सा अपार्टमेंट खरीदने के लिए बचत करना शुरू कर दिया। ज़िंदगी अभी भी मुश्किल थी, लेकिन कम से कम मुझे अपने पति की कद्र तो महसूस हुई।
कभी-कभी मैं सोचती, अगर मैं उस दिन चुपचाप सह लेती, तो ज़िंदगी भर बेतुकेपन के भंवर में फँसी रहती। खुशकिस्मती से, मुझमें कुछ कहने की हिम्मत थी, सबको सोचने पर मजबूर करने की।
बहू होना आसान नहीं है। लेकिन मेरा मानना है कि जब हम अपनी और अपने परिवार की खुशियों की रक्षा करना सीख जाएँगे, तो धीरे-धीरे दूसरे भी हमारा सम्मान करना सीख जाएँगे।
जिंदगी और कुछ भी नहीं,मेरी मेरी कहानी हैं
नई दिल्ली रेलवे स्टेशन प्लेटफार्म दोपहर के 12:00 बजे है। मुंबई जाने वाली गोदावरी यमुना एक्सप्रेस चलने के लिए तैयार खड़ी है। तभी 28 साल का एक नौजवान 3 टायर एसी डिब्बे में चढ़ता है। मैडम यह 9 नंबर विंडो वाली सीट मेरी है प्लीज आप थोड़ा इधर हट जाए। देखिए यह 10 नंबर मिडिल बर्थ मेरी है। यदि आप बुरा ना माने तो मैं थोड़ी देर के लिए विंडो वाली सीट पर बैठ जाऊं। ठीक है आप बैठ जाएं पर जब मैं कहूं तब आप सीट चेंज कर लेना। चौबीस 25 साल की खूबसूरत सी लड़की जिसने जींस और टी-शर्ट पहनी हुई है, ने हां में सिर हिलाया और बाहर विंडो की तरफ देखने लगी और ट्रेन चल दी।
ट्रेन अपनी स्पीड पकड़ चुकी थी। दोनों पास पास चुपचाप बैठे हैं। लगभग 20 घंटे का सफर है, मतलब की सफर लंबा है। थोड़ी देर बाद लड़की ने अपने बैग में से चिप्स का पैकेट निकाला। और चिप्स खाने लगी। फिर उसने चिप्स का पैकेट बराबर बैठे हुए लड़के की तरफ कर दिया। नहीं नहीं थैंक्स।। अरे ले लीजिए, अभी आपके सामने ही तो खोला है। इसमें कुछ भी नशे वाला नहीं मिलाया हुआ। क्या आपको मैं ऐसी लड़की लगती हूं कि आप को बेहोश करके आप को लूट कर अगले स्टेशन पर उतर जाऊंगी? यह कहकर लड़की जोर से हंसने लगी। लड़के ने भी एक चिप्स उठाया और हंसने लगा। अरे मेरा यह मतलब नहीं था। दोनों की नेचर हंसमुख और बातूनी थी। बस स्टार्ट अप चाहिए था और वह चिप्स के पैकेट ने करवा दिया। फिर दोनों में खूब बातें होने लगी। बातों बातों में दोनों को एक दूसरे का नाम भी पता चल गया, मोहनी और मनीष।। फिर दोनों खाना पीना भी मिल बांट कर खाने लगे।।।
थोड़ी देर बाद मोहिनी ने अपना लैपटॉप निकाला। अरे मनीष टाइमपास के लिए पिक्चर देखोगे? अरे आप कह रही हैं तो जरूर देखें। पर कोई कॉमेडी पिक्चर दिखाना। ठीक है मेरे पास संजीव कुमार की पुरानी फिल्म अंगूर है। हंस-हंसकर पेट फूल जाएगा। मोहनी ने अपना लैपटॉप ऑन करा, मोहनी ने लैपटॉप के कवर पेज पर एक गाना लगा रखा था। मनीष उसे पढ़ने लगा।
इक प्यार का नगमा है,मौजों की रवानी है,जिंदगी और कुछ भी नहीं,मेरी मेरी कहानी हैं
जीवन को खोना है,मौत को पाना है,आना, बहुत जल्दी जाना है,दो पल के जीवन से
इक उम्र चुरानी है,जिंदगी और कुछ भी नहीं,मेरी मेरी कहानी है,मौत को आना है
मुझे लेकर जाना है,जीवन है मेरा कुछ पल का,आ कर चले जाना है,परछाइयां रह जाती है
रह जाती निशानी है,जिंदगी और कुछ भी नहीं,मेरी मेरी कहानी हैं
अरे मोहनी यह क्या है? तुमने तो पूरे गाने के बोल ही बदल दिए। इतना खूबसूरत गाना तुमने दुख भरा गाना बना दिया। अरे मनीष कुछ नहीं, मुझे गाने तोड़ने फोड़ने की आदत है। इसको भी तोड़फोड़ कर लिख दिया और अपने कवर पेज पर लगा लिया। लो अंगूर फिल्म स्टार्ट हो गई। मजे ले ले कर देखो। खूब मजा आएगा। मोहनी हेडफोन का एक स्पीकर अपने कान में और एक स्पीकर मनीष के कान में लगा देती है। फिल्म अपनी गति से और गाड़ी अपनी गति से चल रही है।
डिनर डिनर किसी को डिनर बुक कराना है, बता दीजिए। मेरा एक डिनर वेज बुक कर लीजिए। डिनर की आवाज सुनकर मोहनी की आंख खुल जाती है। अरे मैं आपके कंधे पर कब सर रखकर सो गई पता ही नहीं चला और आपने मुझे उठाया नहीं। आपको खूब दिक्कत हुई होगी। कैसी दिक्कत मैंने अंगूर पिक्चर देखी नहीं हुई है। मुझे तो पिक्चर देखने में मजा आ रहा था। ऐ डिनर वाले भैया, इनका डिनर कैंसिल कर दो। क्या कर रही हो मोहनी रात भर मुझे भूखा रखोगी। अरे नहीं मेरे पास खूब खाना है, मैं पैक करके लाई हूं।
मोहनी दिल्ली में क्या करती हो और आपके घर में कौन-कौन हैं? एक कंपनी में एचआर मैनेजर हूं। घर पर मम्मी पापा है।। पापा का चावड़ी बाजार में शादी कार्ड का व्यापार है। अकेली औलाद हूं मां बाप की। खूब मस्ती में रखते हैं मुझे मम्मी पापा। तुम भी तो अपना कुछ बताओ मनीष।। मैं तो बिल्कुल ही अकेला रहता हूं दिल्ली में। क्यों अकेले क्यों? केदारनाथ हादसे में मेरा बड़ा भाई और मम्मी पापा, तीनों बाबा के पास चले गए, तब से अकेला ही हूं। कंपनी की मीटिंग में मुंबई जा रहा हूं। इतनी देर में मोहनी खाने का सामान खोल लेती है। दोनों आराम से खाना खाते हैं। 10 बज चुके हैं सोने का टाइम है। मोहनी तुम अपनी बर्थ सोऊगी या नीचे वाली? मनीष यदि तुम्हें दिक्कत ना हो तो मैं नीचे सो जाऊं। दोनों एक दूसरे को गुड नाइट कहते हैं और आराम से सो जाते हैं।
सुबह के 6 बजे है और चाय चाय की आवाजें शुरू हो गई है। मनीष दो चाय ले लेता है। उठो मोहनी सुबह हो गई है, चाय पी लो। दोनों चाय पीते हैं और बातों का सिलसिला शुरू हो जाता है। ठीक 10:00 बजे मुंबई आ जाता है।
दोनों प्लेटफार्म पर उतरते हैं। मोहनी मुझे तो सन एंड सैंड होटल में जाना है। तुम्हें कहां जाना है? मोहनी के मुंह से निकल जाता है टाटा कैंसर हॉस्पिटल।। टाटा कैंसर हॉस्पिटल, क्या कोई रिश्तेदार एडमिट है उसे देखने जाना है? मोहनी चुप हो जाती है। मनीष ने पहली बार उसे उदास देखा है। मनीष मोहनी को पकड़कर पास वाली बेंच पर बिठा देता है। मोहनी चुप क्यों हो बताओ ना? मोहनी का चेहरा जड़ सा हो जाता है। मोहनी तुम्हें रास्ते में बिताए हुए समय की कसम सच सच बताओ।
मनीष मुझे कैंसर है, मैं अपने को दिखाने आई हूं। अब मनीष की हवाइयां उड़ रही है। और उसे लैपटॉप पर लिखे हुए गाने का मतलब भी समझ आने लगा है, मेरी मेरी कहानी है।
मोहनी तुम अकेले दिल्ली से मुंबई दिखाने आई हो। मोहनी अब नॉर्मल हो चुकी थी। हां, इसमें क्या दिक्कत है? दिल्ली से इलाज चल ही रहा है। पर किसी ने बताया टाटा कैंसर वाले सही राय देते हैं। मौत का समय भी बता देते हैं। इसलिए समय पूछने ही आई हूं। पापा आने की जिद कर रहे थे। मैंने उन्हें समझाया, 2:00 का मेरा अपॉइंटमेंट है। और रात को 7:00 बजे की फ्लाइट! 9:00 बजे मैं दिल्ली पहुंच जाऊंगी। आप परेशान ना हो।
मनीष रास्ते में मोहनी के बारे में कुछ सपने देख चुका था। अब मनीष सोच रहा था, हकीकत पता चलने के बाद, क्या मैं अपने सपनों से भाग जाऊं? मनीष के दिमाग में कभी हां कभी ना की आवाज आ रही थी। पर मनीष के दिल ने कहा, अपने और मोहनी के सपने पूरे करो। हिम्मत करके मनीष ने मोहनी से कहा, मैडम गाने के दो पैरे आपने लिखे हैं, तीसरा पैरा मैं आपको सुनाना चाहता हूं और आप सुने....
तू धार है नदिया की, मैं तेरा किनारा हूं,तू मेरा सहारा है, मैं तेरा सहारा हूं, आंखों में समंदर है, आशाओं का पानी है, जिंदगी और कुछ भी नहीं तेरी मेरी कहानी है, इक प्यार का नगमा है।
मनीष इसका क्या मतलब? मोहनी इसका मतलब मैं तुम्हें दिल्ली पहुंच कर बताऊंगा। तुम डॉक्टर को दिखाकर दिल्ली पहुंचो। मैं 3 दिन बाद आता हूं तब तक फोन पर बात होती रहेगी। अपना नंबर दो मैं तुम्हें मिस कॉल मारता हूं।
मनीष अगले दिन मोहनी को फोन करके कहता है। दिल्ली आकर मैं तुम्हारे घर पर रहूंगा घर जमाई बनकर। अरे मनीष मैं तो केवल 6 महीने की मेहमान हूं। कोई बात नहीं पगली। मां-बाप तो दोबारा मिलेंगे मुझे। फिर दूसरी शादी कर लूंगा। तुम्हारे मम्मी पापा के लिए बहू ला दूंगा। दूसरी मोहनी ला दूंगा। दोनों जोर जोर से हंसने लगे। मोहनी ने पहली बार ठीक से गाना गाया।
इक प्यार का नगमा है,मौजों की रवानी है। जिंदगी और कुछ भी नहीं,तेरी मेरी कहानी.......
गुरु नानक देव ने कहा - लाख बार सोचना व्यर्थ है यदि एक बार भी कार्य न करो। केवल मौन रहना व्यर्थ है, यदि मन को भटकने से न रोका जाये। पेट पर रोटी का भारी वजन बाँध लेने से ही भूख नहीं मिट जाती है।
वे जोड़ने वाले लोग थे
वे जोड़ने वाले लोग थे,हर चीज जोड़ कर रखते थे
चश्मा टूटा तब कतरन बांधी,ढीली अंगूठी पर लपेटा धागा
फटे कुर्ते पर पैबंद ,चप्पल पर कील ढोंक रस्सी की गाँठ खींच ली।
बड़े चतुर, मेहनती लोग थे,पतीले के हैंडल पर लकड़ी जोड़ लेते
चाकू की धार खुद तेज करते,उनके घर की कुंडी कसी रही
लकड़ी एक कुल्हाड़ी से दो फांक कर लेते।,वे संभाल कर रखते थे
उनके यहाँ मैंने बेकार चीजें नहीं देखी,पुराने कपड़ों के गुदड़े बने
परात पर पतावे लगा कर संभाला गया,कहीं घिस न जाए
फूटी टोकनी पर तली लगवा ली,बाल्टी पर पैंदी
मटके की दरार पर सीमेंट लेप ली,साल भर का ईंधन समेटते थे
पूरे साल का अनाज।,वे मेरा मेरा नहीं
आपणी बेटी, आपणी बहू, आपणा भाई, आपणा गाम पुकारते थे
सब साझा था,पंचायती बर्तनों में जीमते- जूठते
ऊँची परस( धर्मशाला) वाले लोग थे।,एक दिन जुड़ी जुड़ाई सब चीजें टूट गई
कैसे, कब पता नहीं ,हाँ! इतना जानती हूँ
अब कोई जोड़ने वाला भी नहीं रहा
यहाँ टूटी चीजें बस फेंक दी जाती हैं।
सुनीता करोथवाल
सतुआ!
अरूणिमा सिंह
मां कहती हैं कि सतुआ तब तक सतुआ नहीं कहलाता जब तक वो सात अनाज से मिलकर न बना हो।
मक्की, जौ, ज्वार, मटर, चना, बाजरा और चावल मां डालती थी।
इन सभी अनाज को भिगो कर सुखाती थी और फिर भाड़ में भूनने के लिए भिजवा देती थीं।
भुजैइन काकी की पारिश्रमिक अलग से चावल बांध कर देती थीं। अगर उन्हें अलग से मेहनताना नहीं दिया जाता था तो काकी भूनने के लिए आए अनाज का कुछ हिस्सा भुजाई के मूल्य के रूप में रख लेती थीं।
भाड़ में पहले से ही भीड़ लगी रहती है। कोई पसर भर मटर ले आया है तो कोई चना लाया है, किसी के पास एक सिकौहुली मकई के दाने हैं तो कोई भुजिया चाउर लाया है।
काकी जिसका भूजा भूजती थी उससे ही भाड़ झोकवाती थीं। बगिया के पेड़ो से गिरी पत्तियां बहार कर खांची में दबा दबा कर भर लाती थीं और यही उनके भाड़ का ईंधन होता था।
भाड़ जलते ही भाड़ से हवा के सर पर सवार हो कर उड़ती आती सोंधी सुगंध जब नाक में चढ़ती थी तो फिर मन गर्म गर्म भूजा चबाने के लिए बेताब हो उठता था।
मां फिर कुछ न कुछ देकर भुजाने भेज देती थीं।
जो आनंद गर्म गर्म भूजे भूजा का होता है उतना स्वाद रखे हुए में नहीं आता है।
खैर सतुआ से चले थे भूजा पर आ अटके तो सतुआ की तरफ वापिस चलते हैं।
सतुआ जब भुजा कर आ जाता था तब जांता धोया जाता था आस पास चिकनी मिट्टी से लीप कर साफ किया जाता था और फिर मां, काकी मिलकर सतुआ पीसती थीं।
दोपहर जब तीन बजे वाली भूख लगती थी तब भोजन के बजाय हमारे गांव का दो मिनट वाला
चटपटा, स्वास्थ्य वर्धक, पौष्टिक आहार तैयार होता था।
फटाफट नमक डाल कर घोल लिया चटनी, प्याज, सिरका, हरी मिर्च संग खा कर आनंद लिया।
हमारे सनातन धर्म में बेटी के घर का पानी पीना निषेध किया गया है सो हमारे बुजुर्ग जब कभी बिटिया के घर जाते थे तो संग में सतुआ बांध ले जाते थे। गांव में किसी के घर से पानी मंगवा कर घोलकर सतुआ खा लेते थे।
खाने से मेरा तात्पर्य खाना ही है अब आप लोग सोचेंगे कि सत्तू तो पिया जाता है और मैं खाना लिख रही हूं तो सत्तू अब पिया जाने लगा है पहले गाढ़ा सा घोलकर उंगली से चाट चाट कर खाया ही जाता था।
जिसको मीठा पसंद होता था वो सत्तू में राब डालकर मुट्ठी बना कर खाता था।
घर का कोई सदस्य सुबह जल्दी कहीं जाने लगता था तो सत्तू सबसे उत्तम भोजन होता था। दूर जाना है तो सत्तू बांध कर साथ ले जाता था।
हमारे यहां सतुआन नाम से बाकायदा एक लोकपर्व है उसमें उस दिन घर के सभी सदस्य एक समय सतुआ ही खाते हैं और उस दिन सतुआ खाना अनिवार्य माना जाता है।
चाय मसाला विधि
चाय का मसाला घर पर बहुत ही आसानी से बन सकता है और इससे आपकी रोज़ की चाय का स्वाद और ख़ुशबू दोनों कई गुना बढ़ जाते हैं।
चाय मसाला रेसिपी (Chai Masala Recipe)
सामग्री (Ingredients)
इलायची (Green Cardamom) – 8 से 10 दाने
दालचीनी (Cinnamon Stick) – 2 छोटे टुकड़े
लौंग (Cloves) – 6 से 8
काली मिर्च (Black Pepper) – 1 छोटी चम्मच
सौंठ पाउडर (Dry Ginger Powder) – 2 छोटी चम्मच
जायफल (Nutmeg) – 1/4 टुकड़ा (कद्दूकस किया हुआ)
सौंफ (Fennel Seeds) – 1 छोटी चम्मच (optional)
बनाने की विधि (Method)
सबसे पहले इलायची, दालचीनी, लौंग और काली मिर्च को हल्का सा भून लें (बहुत ज़्यादा नहीं, बस हल्की महक आने तक)।
इन्हें ठंडा होने दें और फिर मिक्सी या सिल-बट्टे पर बारीक पाउडर बना लें।
अब इसमें सौंठ पाउडर और जायफल (कद्दूकस किया हुआ) मिलाएँ।
तैयार पाउडर को एयरटाइट डिब्बे में भरकर रख लें।
उपयोग (How to Use)
एक कप चाय बनाते समय उबालते हुए दूध/पानी में 1/4 छोटी चम्मच चाय मसाला डालें।
इससे चाय में जबरदस्त खुशबू और स्वाद आ जाएगा।
टिप्स (Tips)
अगर आपको ज़्यादा तेज़ मसालेदार चाय पसंद है तो काली मिर्च और अदरक की मात्रा थोड़ी बढ़ा सकते हैं
अक्टूबर मास 2025 का पंचांग
भारतीय व्रतोत्सव अक्टूबर -2025
दि. 1- महानवमी, नवरात्र पूर्ण, सरस्वती बलिदान,दि. 2- विजयादशमी, सरस्वती विसर्जन,दि. 3- भरत मिलाप, पापांकुशा एकादशी व्रत,दि. 4- शनि प्रदोष व्रत,दि. 6- सत्य व्रत, शरद् पूर्णिमा, कोजागरी व्रत,दि. 7- कार्तिक स्नान प्रारम्भ, वाल्मीकि जयंती,दि. 10-करवा चौथ व्रत, गणेश चतुर्थी व्रत,दि. 13-अहोई अष्टमी व्रत, कालाष्टमी,दि. 17-संक्रांति पुण्य,रमा एकादशी व्रत, गोवत्स द्वादशी,दि. 18-यमदीप दान, शनि प्रदोष व्रत, धन त्रयोदशी,दि. 19-धन्वन्तरी जयं., मास शिवरात्रि,दि. 14-नरकहरा 14, हनुमान जयंती दि. 21-दीपावली, अमावस्या पुण्य हि गोवर्धन पूजा, अन्नकूट, बलि पूजा, दि. 23-भाई दूज यम द्वितीया, चित्रगुप्त पूजा, विश्वकर्मा पूजा, दि. 25-विनायक चतुर्थी व्रत,दि. 29-गोपाष्टमी,दि.30-दुर्गाष्टमी,दि 31 अमला नवमी , अक्षय नवमी कुष्मांडा नवमी
संक्रांति विचार
इस मास की संक्रान्ति तुला कार्तिक कृष्ण एकादशी शुक्रवार दि 17 अक्टूबर अपराह्न 13/45 पर 30 मु उठी धापी दक्षिण गमन नैऋत्य दृष्टि किये अग्निमण्डल में प्रवेश करेगी। शुक्रवारी संक्रान्ति होने से चौपाए वाहन, हाथी, घोड़े, ऊंट आदि पशु ,गुड़ आदि पदार्थों में ओर धान्य पदार्थ में तेजी रहेगी ।
आकाश लक्षण
आसमान साफ होगा। कुछ प्रान्तों में वायुवेग के कारण खण्डवृष्टि हो सकती है। उत्तरी भारत में बुधोदय से बादल चाल होने से वायुवेग से मौसम में परिवर्तन होगा। रात के तापमान में गिरावट आयेगी। पहाड़ी उच्च क्षेत्रों में ठंड का प्रभाव बनेगा।
मूल विचार अक्टूबर -2025
दि. 7 को 4/01 से दि.8 को 22/44 तक, दि.15 को 11/59 से दि.17 को 13/57 तक,दि. 25 को 7/51 से दि. 27 को 13/27 बजे तक गण्डमूल नक्षत्र हैं।
ग्रह स्थिति अक्टूबर -2025
दि. 2 तुला में बुध,दि. 3 बुधोदय पश्चिम,दि. 9 शुक्र कन्या में,दि. 17 तुला में सूर्य,दि. 18 कर्क में गुरु,दि. 24 वृश्चिक में बुध,दि. 27 वृश्चि. में मंगल
पंचक विचार अक्टूबर -2025
पंचक विचार -(धनिष्ठा नक्षत्र के तृतीय चरण से रेवती नक्षत्र तक) पंचको में दक्षिण दिशा की ओर यात्रा करना मकान दुकान आदि की छत डालना चारपाई पलंग आदि बुनना,दाह संस्कार,बांस की चटाई दीवार प्रारंभ करना आदि स्तंभ रोपण तांबा पीतल तृण काष्ट आदि का संचय करना आदि कार्यों का निषेध माना जाता है समुचित उपाय एवं पंचक शांति करवा कर ही उक्त कार्यों का संपादन करना कल्याणकारी होगा ध्यान रहेगा पंचर नक्षत्रों का विचार मात्र उपरोक्त विशेष कृतियों के लिए ही किया जाता है विवाह मंडल आरंभ गृह प्रवेश प्रवेश उपनयन आदि मुद्दों से तो पंचक नक्षत्रका प्रयोग शुभ माना जाता है पंचक विचार- दिनांक 03 को 21-27 से दिनांक 08 को 01-23 बजे तक दिनांक 31 को 06-48 से मासान्त तक पंचक है। जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527
भद्रा विचार अक्टूबर -2025
भद्रा काल का शुभ अशुभ विचार - भद्रा काल में विवाह मुंडन, गृह प्रवेश, रक्षाबंधन आदि मांगलिक कृत्य का निषेध माना जाता है परंतु भद्रा काल में शत्रु का उच्चाटन करना,स्त्री प्रसंग में,यज्ञ करना,स्नान करना,अस्त्र शस्त्र का प्रयोग,ऑपरेशन कराना, मुकदमा करना,अग्नि लगाना,किसी वस्तु को काटना,भैस,घोड़ा व ऊंट संबंधी कार्य प्रशस्त माने जाते हैं सामान्य परिस्थिति में विवाह आदि शुभ मुहूर्त में भद्रा का त्याग करना चाहिए परंतु आवश्यक परिस्थितिवश अतिआवश्यक कार्य भूलोक की भद्रा ,भद्रा मुख छोड़कर कर भद्रा पुच्छ में शुभ कार्य कर सकते है ।
दि. 3 को 6/52 से 18/33 तक, दि. 6 को 12/24 से 22/50 तक, दि. 9 को 12/37 से 22/54 तक, दि. 12 को 14/17 से दि. 13 को 1/20 तक, दि. 15 को 22/34 से दि. 16 को 10/35 तक, दि. 19 को 13/51 से दि. 20 को 2/48 तक. दि. 25 को 14/35 से दि. 26 को 3/48 तक, दि. 29 को 9/23 से 21/44 बजे तक भद्रा है। जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527,9560518227
सर्वार्थ सिद्धि योग अक्टूबर -2025
दैनिक जीवन में आने वाले महत्वपूर्ण कार्यों के लिए शीघ्र ही किसी शुभ मुहूर्त का अभाव हो,किंतु शुभ मुहर्त के लिए अधिक दिनों तक रुका ना जा सकता हो तो इन सुयोग्य वाले मुहर्तु को सफलता से ग्रहण किया जा सकता है | इन से प्राप्त होने वाले अभीष्ट फल के विषय में संशय नहीं करना चाहिए यह योग हैं सर्वार्थ सिद्धि,अमृत सिद्धि योग एवं रवियोग | योग्यता नाम तथा गुण अनुसार सर्वांगीण सिद्ध कारक है| अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527,9560518227
चौघड़िया मुहूर्त
चौघड़िया मुहूर्त, ज्योतिष में शुभ और अशुभ समय जानने की एक प्रणाली है। यह 24 घंटों को 8 भागों में विभाजित करता है, जिन्हें चौघड़िया कहा जाता है। प्रत्येक चौघड़िया एक निश्चित अवधि का होता है, और इन्हें शुभ और अशुभ कार्यों के लिए उपयुक्त माना जाता है।
चौघड़िया मुहूर्त क्या है - 24 घंटों को 16 भागों में बांटा जाता है, जिन्हें चौघड़िया कहा जाता है। प्रत्येक चौघड़िया लगभग 1.30 घंटे का होता है।
शुभ-अशुभ - कुछ चौघड़िया शुभ माने जाते हैं, जैसे अमृत, शुभ, लाभ, और चर। कुछ अशुभ माने जाते हैं, जैसे रोग, उद्वेग, और काल। चौघड़िया का उपयोग शुभ कार्यों, जैसे विवाह, यात्रा, और व्यापार शुरू करने के लिए शुभ समय जानने के लिए किया जाता है।
चौघड़िया के प्रकार - दिन का चौघड़िया,सूर्योदय से सूर्यास्त तक के समय को दिन का चौघड़िया कहा जाता है।
रात का चौघड़िया,सूर्यास्त से अगले दिन के सूर्योदय तक के समय को रात का चौघड़िया कहा जाता है।
चौघड़िया का महत्व - चौघड़िया मुहूर्त का उपयोग किसी भी शुभ कार्य को शुरू करने के लिए एक अच्छे समय का चयन करने के लिए किया जाता है। यह माना जाता है कि यदि कोई कार्य शुभ चौघड़िया में शुरू किया जाता है, तो उसके सफल होने की संभावना अधिक होती है।
सुर्य उदय- सुर्य अस्त अक्टूबर -2025
राहू काल
राहुकाल -राहुकाल दक्षिण भारत की देन है,दक्षिण भारत में राहु काल में कृत्य करना अच्छा नहीं माना जाता, राहु काल में शुभ कृतियों में वर्जित करने की परंपरा अब हमारे उत्तरी भारत में भी अपनाने लगे हैं राहुकाल प्रतिदिन सूर्यादि वारों में भिन्न-भिन्न समय पर केवल डेढ़ डेढ़ घंटे के लिए घटित होता है |
अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527,9560518227
मांगलिक दोष विचार परिहार
वर अथवा कन्या दोनों में से किसी की भी कुंडली में 1,4,7,8 व 12 भाव में मंगल होने से ये मांगलिक माने जाते हैं,मंगली से मंगली के विवाह में दोष न होते हुए भी जन्म पत्रिका के अनुसार गुणों को मिलाना ही चाहिए यदि मंगल के साथ शनि अथवा राहु केतु भी हो तो प्रबल मंगली डबल मंगली योग होता है | इसी प्रकार गुरु अथवा चंद्रमा केंद्र हो तो दोष का परिहार भी हो जाता है |इसके अतिरिक्त मेष वृश्चिक मकर का मंगल होने से भी दोष नष्ट हो जाता है | इसी प्रकार यदि वर या कन्या किसी भी कुंडली में 1,4,7,9,12 स्थानों में शनि हो केंद्र त्रिकोण भावो में शुभ ग्रह, 3,6,11 भावो में पाप ग्रह हों तो भी मंगलीक दोष का आंशिक परिहार होता है, सप्तम ग्रह में यदि सप्तमेश हो तो भी दोष निवृत्त होता है |
स्वयं सिद्ध मुहूर्त
स्वयं सिद्ध मुहूर्त चैत्र शुक्ल प्रतिपदा वैशाख शुक्ल तृतीया अक्षय तृतीया आश्विन शुक्ल दशमी विजयदशमी दीपावली के प्रदोष काल का आधा भाग भारत में से इसके अतिरिक्त लोकाचार और देश आचार्य के अनुसार निम्नलिखित कृतियों को भी स्वयं सिद्ध मुहूर्त माना जाता है बडावली नामी देव प्रबोधिनी एकादशी बसंत पंचमी फुलेरा दूज इन में से किसी भी कार्य को करने के लिए पंचांग शुद्धि देखने की आवश्यकता नहीं है परंतु विवाह आदि में तो पंचांग में दिए गए मुहूर्त व कार्य करना श्रेष्ठ रहता है।
पापांकुशा एकादशी
पापांकुशा एकादशी यह व्रत आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को रखा जाता है | इस दिन भगवान श्री हरि विष्णु की पूजा करके ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिए | इस एकादशी में भगवान पदमनाभ की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है | प्रातकाल उठकर नित्यकर्मो,स्नानादि से निवृत्त होकर भगवान विष्णु का विधिवत पूर्ण भक्ति भाव से पूजन करें और भोग लगाएं | प्रसाद वितरण कर सामर्थ्य अनुसार ब्राह्मण को तिल,भूमि,अन्न ,जूता,वस्त्र,छाता आदि का दान कर भोजन कराएं | भगवान के निकट भजन कीर्तन कर रात्रि जागरण करें | उपवास के दौरान अन्न का सेवन ना करें एक समय फलाहार करें |
पापांकुशा एकादशी की कथा
एक बहेलिया था जो विंध्याचल पर्वत पर निवास करता था | जिसका काम के अनुरूप ही नाम क्रोधन था | उसने अपना समस्त जीवन हिंसा,लूटपाट,मिथ्या,भाषण,शराब और वैश्यागमन कर बिता दिया | यमराज ने उसके अंतिम समय से एक दिन पहले अपने दूत को उसे लाने के लिए भेजा दूतों ने क्रोधन को बताया कि कल तुम्हारा अंतिम दिन है | हम तुम्हें लेने के लिए आए हैं | मोत के डर से वह ऋषि के आश्रम पहुंचा | उसने ऋषि से अपने प्राण रक्षा के लिए उपाय पूछा व भक्तिपूर्वक प्रार्थना कर अनुनय विनय करने लगा | ऋषि को उस पर दया आ गई उन्होंने उसे आश्विन शुक्ल एकादशी का व्रत और भगवान विष्णु की पूजा की सारी विधि बताई | संयोगवश उस दिन एकादशी थी क्रोधन ने ऋषि द्वारा बताएं पापांकुशा एकादशी का व्रत विधिपूर्वक किया | भगवान की कृपा से वह विष्णुलोक को चला गया | यम दूत हाथ मलते रह गए |
रमा एकादशी के प्रभाव से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं | यहां तक कि ब्रह्म हत्या जैसे महापाप भी दूर हो जाते हैं | ईश्वर के चरणों में स्थान मिलता है व सभी मनोकामना पूर्ण होती है | यह व्रत कार्तिक कृष्ण पक्ष एकादशी को किया जाता है | इस दिन भगवान का भक्ति पूर्ण पूजन कर नैवेद्य अर्पित कर आरती करे | प्रसाद वितरित करके ब्राह्मणों को भोजन खिलाएं तथा दक्षिणा दें |
रमा एकादशी की कथा - प्राचीन समय में मुचकुंद नाम का राजा था उसे एकादशी व्रत का पूरा विश्वास था | वह प्रत्येक एकादशी का व्रत करता था | प्रजा को भी एकादशी व्रत करने का आवहन करता था | उसकी चंद्रभागा नाम की एक कन्या थी | वह भी पिता से अधिक एकादशी व्रत पर विश्वास करती थी | उसका विवाह राजा चंद्रसेन के पुत्र शोभन के साथ हुआ जो राजा मुचकुंद के साथ ही रहता था | एकादशी के दिन सभी व्यक्तियों ने व्रत किया | शोभन ने भी व्रत किया | अत्यंत कमजोर होने से भूख से व्याकुल हो राज कुमार की मृत्य हो गई | इससे राजा-रानी और पुत्री बहुत दुखी हुए | शोभन को एकादशी व्रत के प्रभाव से मंदराचल पर्वत पर एक उत्तम देवनगर में जो की धनधन्य से युक्त व शत्रु से मुक्त आवास मिला वहां उसकी सेवा में आप्स्राए तत्पर थी | अचानक एक दिन राजा मुचकुंद मंदराचल पर्वत पर पहुंचा तो वहां पर उसने अपने दामाद शोभन को देखा | राजा ने घर जाकर सारी अपनी पुत्री को बताई | पुत्री समाचार पाकर पति के पास चली गई तथा दोनों मंदराचल पर्वत पर सुख पूर्वक एकादशी व्रत के प्रभाव से वहा निवास करने लगे |
भारतीय शिक्षा के आध्यात्मिक आधार –
अन्तःकरण व उसकी शिक्षा
– ब्रज मोहन रामदेव
करण अर्थात् उपकरण या साधना। ज्ञान प्राप्त करने के दो साधन है। 1. बाह्य करण 2. अन्तः करण। ज्ञानेन्द्रियां कर्मेन्द्रियां बाह्य करण है। हाथ, पैर, वाणी, वायु और उपस्थ कर्मेन्द्रियां है। तथा आंख, कान, नाक, जीभ व त्वचा ज्ञानेन्द्रियां है। अन्तःकरण के अन्तर्गत मन, बुद्धि, अंहकार तथा चित आते हैं। मन का कार्य विचार करना है। बुद्धि विवेक करती है, अंहकार कर्तापन व भोलापन का अनुभव कराता है तथा चित संस्कार ग्रहण करता है। बातों को स्मृति में रखने का कार्य चित करता है। अन्तःकरण के शुद्ध होने से चित पर संस्कारों की छाप पड़ती है। शुद्ध अंतःकरण की अवस्था में ही ब्रह्म ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। शिक्षा व अभ्यास से अन्तःकरण को शुद्ध किया जा सकता है। आध्यात्मिक शिक्षा के इन चारों का विवरण निम्न प्रकार से हैं –
मन : मन भावों का भण्डार है जो घटते-बढ़ते रहते हैं, इसलिये मन को सोम या चन्द्रमा कहा गया है। यह भारतीय मनोविज्ञान की छटी ज्ञानेन्द्रिय है। मन विचार करता है, इच्छा करता है और भावों को अनुभव करता है। मन की गति सृष्टि में सबसे अधिक है। यह बिना किसी अवलम्बन के जहां चाहे वहां
पहुंच जाता है। पांच कर्मेन्द्रिय और पांच ज्ञानेन्द्रिय को वश में रखने वाला व कार्य में प्रवृत करने वाला मन है। मन को शांत, एकाग्र व अनासक्त करना मन का विकास करना है। मन का प्रभाव एक और शरीर पर पड़ता है तो दूसरी ओर बुद्धि पर पड़ता है। मन जब तक शांत और एकाग्र नहीं होगा, बुद्धि सही ढ़ंग से अपना कार्य नहीं करेगी। बुद्धि का कार्य प्रशस्त करने के लिए मन को प्रशिक्षित करना आवश्यक है। मन को विभिन्न उपायों यथा- संयम, ध्यान, शुद्ध आचार-विचार, काम, क्रोध, मोह, मद, मत्सर, इन षडरिपुओं से मुक्त करना तथा मन को एकाग्र व अनासक्त बनाना आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त करने के लिये आवश्यक हैं।
बुद्धि : बुद्धि का काम जानना है। ज्ञान शब्द बुद्धि के साथ जुड़ा हुआ है। बुद्धि ज्ञानेन्द्रियों की सहायता से निरीक्षण परीक्षण करती है, संश्लेषण, विश्लेषण करती हैं। तर्क व अनुमान करती है तथा विवेक व निर्णय करती है। प्रतिभा, मेधा, धी आदि सभी बुद्धि के ही विभिन्न रूप हैं। बुद्धि अपना विवेक व निर्णय ठीक प्रकार से कर सके, इसके लिये मन का स्वस्थ रहना आवश्यक है। मन यदि ठीक रहा तो बुद्धि भी ठीक रहती है। बुद्धि को तीक्ष्ण, शुद्ध व ग्रहणशील बनाने के लिये मन की एकाग्रता, शांति व अनाशक्ति आवश्यक है। बुद्धि, मन को अपने वश में करे और स्वयं आत्मनिष्ठ बने तो ज्ञानार्जन का काम ठीक होता है। बुद्धि का संबंध एक ओर मन के साथ होता है। तो दूसरी ओर चित के साथ होता है। मन को बुद्धि के नियंत्रण में रखना, बुद्धि को प्रशिक्षित करना है। योग के अष्टांग मार्ग द्वारा मन को बुद्धि के नियंत्रण में लाया जा सकता है। बुद्धि हमें सोचने व विकल्प चुनने में सहायता करती है। बुद्धि के ठीक होने के लिये मन का ठीक होना आवश्यक है।
अंहकार : अंहकार की अभिव्यक्ति ‘मैं’ द्वारा होती है। यह आत्मा को शरीर के साथ ‘मैं’ के रूप में पहचानता है। यह व्यक्ति केन्द्रित है, जिसके चारों ओर व्यक्तित्व का गठन होता है। अंहकार लोकेषण तथा लोक प्रसिद्धि की आंकाक्षा को जन्म देता है। प्रतयेक क्रिया का कर्ता अहंकार होता है। जैसे – “यह कार्य मैंने किया” आदि। यह कर्ता और भोला दोनों है। अंहकार क्रिया करने का निर्णय शुद्धि के साथ मिलकर लेता है। अंहकार जब आत्मनिष्ठ होता है तब यह सकारात्मक बन जाता है तथा दायित्व बोध अनुभव करता है। दायित्व बोध से ही कार्य की सार्थकता प्राप्त होती है। अंहकार हमें अपनी पहचान का एहसास कराता है। बुद्धि अंहकार से पोषण प्राप्त करती है। अंहकार की धुरी पर ही बुद्धि काम कर सकती है।
चित : चित शुद्ध प्रज्ञा तथा चेतना होती है। जो स्मृतियों से पूरी तरह मुक्त रहती है। आत्म तत्व का यह सबसे पारदर्शी आवरण है। यह आत्मतत्व के प्रकाश से आलोकित है। मनुष्य के व्यक्तित्व की यह सबसे प्रगत अवस्था है। चित पर सभी प्रकार के संस्कार होते हैं। चित पर पूर्वजन्म के संस्कार भी होते हैं और अनुवांशिक संस्कार भी होते हैं। इन संस्कारों से चित को मुक्त करना ही चित को शुद्ध करना है। चित जब शुद्ध रहता है तो साफ दर्पण के समान रहता है, जिसमें आत्मतत्व स्पष्ट प्रतिबिम्बित होता है। जब विभिन्न प्रकार के संस्कारों से मुक्त रहता है। धूल की परत से छाये हुए दर्पण के समान रहता
है, जिसमें आत्मतत्व का प्रतिबिम्ब अस्पष्ट दिखाई देता है या दिखाई नहीं देता। इसलिये चित को शुद्ध करना चाहिये।
अन्तःकरण व उसकी शिक्षा
अन्तःकरण का यह भाग व्यक्ति को याद रखने या भूलने से संबंधित है। क्रिया, संवेदना, विचार, विवेक आदि सभी चित पर संस्कार अंकित करते हैं। चित पर संस्कार होने से ही किसी भी कार्य या अनुभव की स्मृति बनती है। स्मृति के कारण सीखी हुई बात हमारे साथ रहती है। चित मन तथा अन्य तत्वों को आधार प्रदान करता है। योग दर्शन का सारा अनुसंधान ही चितवृतियों का निरोध करना है। चितवृतियों का निरोध करना ही चित को शुद्ध करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना हैं।
चेतना की तीन अवस्थाएं : 1. जागृत (जागृत अवस्था) 2. स्वप्न (स्वप्न अवस्था) 3. सुषुप्ति (गहन निद्रावस्था)। अन्तःकरण प्रथम दो अवस्थाओं में कार्य करता है। तीसरी अवस्था में वह निष्क्रिय रहता है। चित पर संस्कार होने के लिये कर्मेन्द्रियों से लेकर अंहकार तक के सभी करण सक्रिय और सक्षम होने चाहिये। ज्ञानार्जन के इन करणों को सक्षम बनाना, शिक्षा का कार्य है। अन्तःकरण चतुष्टय का परिष्कार करके आध्यात्मिक तत्वों को सरल, सुगम व बोधगम्यं बनाना शिक्षा का प्रमुख कर्तव्य हैं।
निम्न प्रयोगों द्वारा अनतःकरण को शुद्ध किया जा सकता है –
इन्द्रियों की क्रियाओं को भगवान की सेवा में लगाना।
अच्छा साहित्य पढ़ना।
षड्विकारों (काम, क्रोध, मोह, लोभ, मत्सर) को मन से निकालना।
तप, दान, तयाग, ध्यान आदि में मन को लगाना।
मन से कामनाओं का त्याग करना।
सत्य मार्ग पर चलना।
समदर्शी व निष्पाप होना आदि। अन्तःकरण की शुद्धि में सहायक होते हैं। अन्तःकरण के शुद्ध होने पर ही ईश्वरीय सत्ता का अनुभव होता है।
और पढ़े : भारतीय शिक्षा के आध्यात्मिक आधार – भाग दो (उपनिषद् एवं शिक्षा)
(लेखक आर्ष साहित्य के अध्येता है।)
स्वतंत्रता सेनानी व लेखक काशीनाथ त्रिवेदी
– शिरोमणि दुबे
विद्वानों की मान्यता है कि करने योग्य लिखा जाए, उससे अधिक अच्छा है कि लिखने योग्य किया जाए। काशीनाथ त्रिवेदी इस कसौटी पर खरे उतरे तथा ‘निमाड़’ के गाँधी के रूप में प्रतिष्ठित हो गए। अपने लिए तो पशु-पक्षी भी जीते हैं परन्तु जीवन की सार्थकता औरों के लिए जीने में निहित होती है। यही सहृदयता, संवेदनशीलता, करुणा का मूल स्रोत है। कवि शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ ने जैसे विश्व मानव को शिक्षा दी है-
जो समेटते हो सब सपना है। जो लुटा रहे सब अपना है।।
उज्ज्वल-उदात्त मन तथा उन्नत आत्मा की चमक जीवन को अनमोल बना देती है। मन-मस्त फकीरी धारी है, अब एक ही धुन जय-जय भारत। मन की फकीरी मानव जीवन को बदल देती है तथा भारतमाता की जय की सरगम जब जिन्दगी के साथ बजने लगती है, तब व्यक्तित्व हिमालय जैसा ऊँचा हो जाता है। सादगी-सेवा-सौम्यता जैसे दैवीय गुणों के कारण काशीनाथ त्रिवेदी साहित्यिक क्षेत्र के ध्रुव तारा बन गए, जिनकी चमक आज तक मैली नहीं हो पाई है।
कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिन्हें सीमाओं में बाँधना संभव नहीं होता। कुछ ऐसे महामानव होते हैं, जिनकी जिन्दगी का एक-एक पन्ना, एक-एक अध्याय इतना प्रेरक होता है कि आने वाली पीढ़ियों को उससे सीख मिलती है। मध्यप्रदेश के धार जिले के पावन भूमि ने अनेक महापुरुषों को जन्म दिया है, जिन्होंने अपने विचारों, कर्मों और समाजसेवा से सम्पूर्ण देश को प्रभावित किया। एक ऐसे ही युगदृष्टा समाजसेवी, चिन्तक और राष्ट्रनिष्ठ व्यक्तित्व थे काशीनाथ त्रिवेदी। उनका जीवन सतत संघर्ष, सेवा और सृजन की अनुपम गाथा
है। वो एक ऐसे सेनानी साहित्यकार थे, जिन्हें अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया परन्तु अहमन्यता से बहुत दूर उनकी साहित्य साधना तथा देशसेवा का सफर प्राणों की अंतिम सीमा तक और साँसों के अंतिम छोर तक न कभी रुका, न कभी ठहरा।
काशीनाथ त्रिवेदी के पिता बड़वानी रियासत में सरकारी नौकरी में कार्यरत थे। वे विद्यार्थी जीवन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सम्पर्क में आए। उन्होंने 1928 में क्रिश्चियन महाविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की और बाद में महात्मा गांधी के नेतृत्व में 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में कूद गए। अंग्रेजों द्वारा देशभर में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध प्रदर्शन करने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को जेलों में ठूँस दिया गया। इस आंदोलन में उन्होंने 2 अक्टूबर 1942 को अपने 67 अन्य कैदियों के साथ महात्मा गांधी के जन्मदिन पर मण्डलेश्वर की जिला जेल तोड़कर घण्टाघर चौक पर तिरंगा फहराया था। परिणामस्वरूप दो वर्ष से अधिक नागपुर सेण्ट्रल जेल में निरुद्ध रहे। 1947 में भारत विभाजन के बाद फैले साम्प्रदायिक दंगों को रोकने में काशीनाथ त्रिवेदी ने अपनी जान की परवाह नहीं की। उन्हीं के प्रयत्नों से बड़वानी को साम्प्रदायिक दंगों की आग में झुलसने से बचाया जा सका। स्वतंत्रता के बाद काशीनाथ जी ने जनसंघ के विचारों से प्रेरित होकर राष्ट्रवादी विचारधारा का प्रचार-प्रसार किया और संगठन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका जीवन राष्ट्रभक्ति, त्याग, समर्पण का प्रतीक रहा है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के विषय में ‘हुतात्मा चन्द्रशेखर आजाद’ ग्रन्थ की ये पंक्तियाँ बहुत प्रेरणा देती हैं-
प्रेरणा शहीदों से अगर हम नहीं लेंगे,तो स्वतंत्रता ढलती हुई साँझ हो जायेगी।
पूजा वीरों की यदि हम नहीं करेंगे,तो सच मानो वसुन्धरा बाँझ हो जायेगी।।
एक वरिष्ठ गांधीवादी तथा स्वतंत्रता सेनानी श्री त्रिवेदी ने एक शिक्षक के रूप में अपनी यात्रा प्रारंभ की।
1925 में गांधी जी के सम्पर्क में आने के बाद ‘नवजीवन’ पत्रिका के सहसम्पादक के रूप में वे साबरमती आश्रम से जुड़ गए। 1935 में वर्धा पहुँचकर हिन्दी के शिक्षक, महिला आश्रम के सचिव तथा प्रधानाचार्य के पद पर कार्य किया। यह सब करते हुए उन्होने लोकतंत्र और उत्तरदायी सरकार की स्थापना के लिए उग्र आंदोलन भी किया। बाद में वे मध्यप्रदेश के शिक्षामंत्री बने। 70 वर्षों तक गांधी जी के रचनात्मक कार्यक्रमों के लिए समर्पित ‘निमाड़ के गांधी’ काशीनाथ त्रिवेदी ने गांधीवादी और सर्वोदयी कार्यकर्ताओं की एक पूरी पीढ़ी को मार्गदर्शन और प्रेरणा दी। उन्होने मध्यप्रदेश के धार जिले के तबलाई गाँव में ‘ग्रामभारती आश्रम’ स्थापित किया। इस आश्रम के द्वारा ग्रामोन्मुख, आत्मनिर्भर भारत के विकास का मॉडल प्रस्तुत किया। उन्होने गुजराती से हिन्दी भाषा में 125 से अधिक पुस्तकों का अनुवाद करके गांधीवादी दर्शन, सर्वोदय, बालशिक्षा तथा ग्रामविकास से सम्बन्धित हिन्दी साहित्य को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। त्रिवेदी जी ने ही अपनी धर्मपत्नी कलावती को भी स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने के लिए प्रेरित किया था।काशीनाथ त्रिवेदी का बचपन सादगी और संघर्ष से भरा रहा। वे बचपन से ही मेधावी, जिज्ञासु तथा समाज के प्रति संवेदनशील थे। छात्र जीवन में ही वे सामाजिक समस्याओं तथा असमानताओं से परिचित हो गए थे। उन्होने अनुभव किया कि केवल शिक्षा और जागरुकता ही समाज को अज्ञानता, रूढ़िवाद और
अन्याय से मुक्ति दिला सकती है। शिक्षा को जन-जन तक पहुँचाने के लिए अनेक नवाचार किए। ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षण संस्थानों की स्थापना, निर्धन विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति तथा व्यावहारिक शिक्षा को बढ़ावा देना उनके प्रमुख प्रयासों में शामिल था। वे इस बात में विश्वास रखते थे कि शिक्षा केवल पाठ्यक्रम तक सीमित न रहे, बल्कि समाज को सशक्त बनाने का माध्यम बने। 1995 में उन्हें जमनालाल बजाज ‘पुरस्कार’ से विभूषित किया गया। गांधीदर्शन के प्रसारक प्रसिद्ध चिन्तक काशीनाथ त्रिवेदी 26 जून 1996 को पंचतत्व में विलीन हो गए। आज भी काशीनाथ त्रिवेदी को सामाजिक सुधार और नवजागरण के पुरोधा के रूप में याद किया जाता है। उन्होंने जातिवाद, छुआछूत और सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध प्रभावी कार्य किए। उन्होने सामाजिक समरसता स्थापित करने के लिए विभिन्न जनजागरण अभियानों का नेतृत्व किया था। वे महिला सशक्किरण के पक्षधर थे। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा और स्वावलम्बन के लिए विशेष योजनाएं बनाईं। मध्यप्रदेश के शिक्षामंत्री के रूप में श्री काशीनाथ त्रिवेदी जी का कार्यकाल न केवल प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था के लिए स्वर्ण युग साबित हुआ, बल्कि उनके दूरदर्शी नेतृत्व ने शिक्षा क्षेत्र में स्थायी परिवर्तन भी किए। वे एक समाजसेवी, चिन्तक और कर्मठ कार्यकर्ता थे। उनका उद्देश्य शिक्षा को पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित करना नहीं था, बल्कि उसे समाज परिवर्तन का वाहक बनाना था। उन्होने शिक्षा को समाज और संस्कृति से जोड़ने का कार्य किया और उसे रोजगारपरक बनाने का प्रयास किया।
काशीनाथ त्रिवेदी ने पॉलीटेक्निक कॉलेजों, तकनीकी संस्थानों तथा व्यावसायिक शिक्षा के केन्द्रों की स्थापना को प्रोत्साहित किया ताकि युवा केवल सरकारी नौकरियों पर निर्भर न रहे। ‘गाँव-गाँव में स्कूल’ की अवधारणा को मूर्तरूप देने का श्रेय उन्हीं को जाता है। उन्होंने शिक्षकों के नियमित प्रशिक्षण और उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए नई नीतियां लागू कीं। वे मानते थे कि जब तक शिक्षक सशक्त और प्रेरित नहीं होगा तब तक शिक्षा व्यवस्था में सुधार संभव नहीं है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में जिन शैक्षिक सुधारों
का उल्लेख किया गया है वास्तव में श्री त्रिवेदी ने अपने शिक्षामंत्री के कार्यकाल में उन्ही सुधारों की पहल की थी। उनके कार्यकाल में बाल केन्द्रित, आनन्ददायी तथा अनुभव आधारित शिक्षा प्रणाली को प्राथमिकता दी गई। भयमुक्त वातावरण में स्थानीय भाषा तथा मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा का प्रावधान सुनिश्चित किया गया, जिससे शिक्षा अधिक प्रभावी व सृजनात्मक बन सकी। इस प्रकार त्रिवेदी जी के नेतृत्व में मध्यप्रदेश की शिक्षा प्रणाली प्रगतिशील बनी, जो आज भी शिक्षाविदों और नीति निर्माताओं के लिए प्रेरणास्रोत बनी हुई है।
(लेखक विद्या भारती मध्यभारत प्रांत के प्रांत सचिव है।)
अक्टूबर - 2025 मास के महत्वपूर्ण दिवस
अक्टूबर - 2025 मास के महत्वपूर्ण दिवस
1 अक्टूबर - अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस,अंतर्राष्ट्रीय कॉफी दिवस,विश्व शाकाहारी दिवस,पेशावर सत्याग्रह के वीर गढ़वाली सैनिक चन्द्रसिंह गढ़वाली की पुण्यतिथि (1979 ई.)। ब्रिटिश मूल की भारतीय स्वतंत्रता सेनानी श्रीमती एनी बिसेंट की जयन्ती (1847) ई.)।
2 अक्टूबर- गांधी जयन्ती 1889 ई.। द्वितीय प्रधानमंत्री व सादगी की प्रतिमूर्ति लाल बहादुर शास्त्री की जयंती (1904 ई.),अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस
3 अक्टूबर- जर्मन एकता दिवस
3 अक्टूबर- आसाम के महान सेनापति लाचित फूकन द्वारा मुगल सेना की भीषण पराजय (1607 ई.)। राष्ट्रवादी इतिहासकार एवं पुरातत्वविद् डॉ. स्वराजप्रकाश गुप्त की पुण्यतिथि (2007
4 अक्टूबर - महान क्रांतिकारी श्री श्यामजी कृष्ण वर्मा की जयन्ती (1847 ई.),1957: सोवियत संघ ने पहला कृत्रिम उपग्रह, स्पुतनिक, अंतरिक्ष में भेजा, जिससे अंतरिक्ष युग का शुभारंभ हुआ,1977: भारत के विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पहली बार संयुक्त राष्ट्र महासभा को हिंदी में संबोधित किया,अक्टूबर को विश्व पशु कल्याण दिवस
5 अक्टूबर- विश्व शिक्षक दिवस,गढ़मंडला की वीर रानी दुर्गावती की जयन्ती (1524 ई.)। केरल में हिन्दू शक्ति के सर्जक व संघ के प्रथम प्रान्त प्रचारक भास्कर राव कलम्बी की जयन्ती (1919 ई.)
7 अक्टूबर- संघ व कल्याण आश्रम के वरिष्ठ प्रचारक तिलकराज कपूर जी की पुण्यतिथि (2007 ई.)। दशम् गुरु श्री गुरु गोविन्द जी की पुण्यतिथि (1708 ई.)
8 अक्टूबर- को भारतीय वायु सेना दिवस, महान सामाजिक लेखक मुंशी प्रेम चन्द की पुण्यतिथि (1936 ई.)। गुरु गोविन्द सिंह जी द्वारा गुरु ग्रन्थ साहिब को खालसा गुरु घोषित किया (1708 ई.)। सप्तम सिक्ख गुरु हरिराय जी की पुण्यतिथि (1661 ई.)।
9 अक्टूबर- संघ में गृहस्थ प्रचारकों की परम्परा के जनक भैया जी दाणी की जयन्ती (1907 ई.)। उड़ीसा के महान स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार उत्कलमणि गोपबन्धुदास की जयंती (1877 ई.),विश्व डाक दिवस
10 अक्टूबर - विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस,वरिष्ठ संघ प्रचारक, विचारक दत्तोपंत ठेंगड़ी जी की जयन्ती (1920 ई.)। चीन-जापान युद्ध में प्रसिद्ध चीनी मित्र भारतीय डा. डी. एस. कोटणीस की जयन्ती (1910 ई.)।
11 अक्टूबर- संत तुकडोजी महाराज जयन्ती। पूर्व संघ प्रचारक, इंजीनियर, व्यवसायी डॉ. जगमोहन गर्ग की पुण्यतिथि (2007 ई.)। आधुनिक चाणक्य नानाजी देशमुख (श्री चण्डिकादास) की जयन्ती (1916 ई.), अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस
12 अक्टूबर- हैदराबाद में भारतभक्त बलिदानी शेफलुल्लाह की जयन्ती (1920 ई.)। उड़ीसा को संघमय बनाने वाले प्रान्त प्रचारक बाबूराव पलधीधर की पुण्यतिथि (2003 ई.)।
13 अक्टूबर- स्वामी विवेकानन्द की शिष्या भगिनी निवेदिता की पुण्यतिथि (1911 ई.)। महाराणा प्रताप व मुगल सेना के बीच हल्दीघाटी का द्वितीय युद्ध प्रारम्भ (1576 ई.),आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस
14 अक्टूबर – विश्व मानक दिवस,लाला हरदयाल जयंती (1884 ई.)। भगत सिंह-आजाद आदि क्रांतिकारियों की महान सहयोगी दुर्गाभाभी की पुण्यतिथि (1999ई.)।
15 अक्टूबर- भारत के पूर्व राष्ट्रपति, वैज्ञानिक डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की जयन्ती (1931 ई.)। महान हिन्दी कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला की पुण्यतिथि (1961 ई.), गर्भावस्था और शिशु हानि स्मृति दिवस,वैश्विक हाथ धुलाई दिवस ,विश्व सफेद बेंत दिवस, विश्व छात्र दिवस
16 अक्टूबर- को विश्व खाद्य दिवस ,विश्व एनेस्थीसिया,बॉस दिवस ,तमिलनाडू की पांडया रियासत नरेश कट्टबोमन का बलिदान (1799 ई.)। बंगाल विभाजन के विरोध में रविन्द्र नाथ टैगोर द्वारा नदी तटों पर रक्षाबन्धन मनाया गया (1905 ई.)।
17 अक्टूबर- स्वामी रामतीर्थ की जल समाधि पुण्यतिथि (1907ई.)। महमूद गजनवी का भारत पर आक्रमण (1024ई.),अंतर्राष्ट्रीय गरीबी उन्मूलन दिवस
18 अक्टूबर- काकोरी काण्ड के क्रांतिकारी रामकृष्ण खत्री की पुण्यतिथि (1906 ई.)।
19 अक्टूबर- लोकसंत पाण्डुरंग शास्त्री आठवले की जयन्ती (1920 ई.)। गरीब बलिदानी वीरांगना मातंगिनी हजारा की जयन्ती (1870 ई.)
20 अक्टूबर – विश्व सांख्यिकी दिवस,चीनी सेना का भारत पर धोखे से हमला (1962 ई.) भारतीय किसान संघ व संघ के वरिष्ठ प्रचारक ठाकुर संकटाप्रसाद सिंह की पुण्यतिथि (2017 ई.)
21 अक्टूबर- नेताजी सुभाष चन्द बोस द्वारा सिंगापुर में भारत की अस्थायी आजाद हिन्द सरकार का गठन (1943 ई.), दिल्ली में भारतीय जनसंघ की स्थापना (1951 ई.)
22 अक्टूबर- विद्वान संन्यासी स्वामी रामतीर्थ की जयन्ती (1873 ई.), काकोरी काण्ड के नायक अशफाक उल्ला खाँ की जयन्ती (1900 ई.)
23 अक्टूबर- महाकवि तुलसीदास की पुण्यतिथि (1623) ई.), प्रज्ञा परिषद व जनसंघ के अध्यक्ष प्रखर राष्ट्रवादी पं. प्रेमनाथ डोगरा की जयन्ती (1894 ई.),मोल दिवस
24 अक्टूबर - संयुक्त राष्ट्र दिवस,विश्व विकास सूचना दिवस,आजाद हिन्द फौज की कमाण्डर कैप्टन लक्ष्मी सहगल की जयन्ती (1914 ई.), चतुर्थ सिक्ख गुरु श्रीरामदास जी द्वारा अमृतसर शहर की स्थापना (1577 ई.)
25 अक्टूबर- राष्ट्रवादी पत्रकार, स्वतंत्रता सेनानी बलिदानी गणेश शंकर विद्यार्थी की जयन्ती (1890 ई.), महान मराठी संत ज्ञानेश्वर की पुण्यतिथि (1296 ई.)
26 अक्टूबर- जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह द्वारा अपने राज्य की भारत में पूर्ण विलय की घोषणा (1947 ई.),महान क्रांतिकारी श्री मन्मथनाथ गुप्त की पुण्यतिथि (2000 ई.)
27 अक्टूबर- हिन्दू रक्षक, बहादुर वीर बलिदानी बन्दा बहादुर वैरागी जयन्ती (1670 ई.), महान् क्रांतिकारी जतिन दास की जयन्ती (1904 ई.)
28 अक्टूबर- प्रमुख हिन्दी साहित्यकार श्री लाल शुक्ल की पुण्यतिथि (2011ई.)। भगिनी निवेदिता की जयन्ती (1867ई.)
29 अक्टूबर- क्रांतिकारी राजा महेन्द्र प्रताप द्वारा अफगानिस्तान में प्रथम निवार्सित भारत सरकार का गठन (1915 ई.), समाज सुधारक, स्वतंत्रता सेनानी, गांधीवादी महिला कमलादेवी चट्टोपाध्याय की पुण्यतिथि (1988 ई.)
30 अक्टूबर- भारत में परमाणु कार्यक्रमों के प्रणेता, वैज्ञानिक; डॉ. होमी जहांगीर भाभा की जयन्ती (1909 ई.),आर्य समाज संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती की पुण्यतिथि (1883 ई.) विश्व मितव्ययिता दिवस
31 अक्टूबर - राष्ट्रीय एकता दिवस या राष्ट्रीय एकता दिवस लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की जयन्ती (1875 ई.),स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षाविद् विचारक आचार्य नरेन्द्र देव की जयन्ती (1889 ई.)
अपने जीवन में सामाजिक कार्य करते हुए कुछ ऐसे कार्य किए होंगे जिनसे समाज को प्रेरणा मिले ऐसा कोई एक सामाजिक कार्य या सेवा का कार्य आप मुझको लिखकर भेजें, वह अन्य के लिए प्रेरणादायक रहेगा। हम एक पुस्तक प्रकाशित करने का विचार कर रहे हैं । जिसका नाम अभी सोचा है “सेवा के सोपन” आपका सहयोग अपेक्षित है । ‘शब्द सीमा 1500 या विषय अनुसार’ ।
कृपया लेख के साथ अपना नाम, फोटो व संक्षिप्त परिचय भेजें धन्यवाद जी आपका सतीश शर्मा संपादक जानकारी काल www.sumansangamaashray.com
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