कृष्ण लीला कथा-श्रीकृष्ण-कन्हैयां के दर्शन के लिए भोलेनाथ ब्रज भूमि पर पधारे।



 ॥ कृष्ण लीला कथा॥

’श्रीकृष्ण-कन्हैयां के दर्शन के लिए भोलेनाथ ब्रज भूमि पर पधारे।

*देव ऋषि नारद जी से कन्हैयां के बाल स्वरूप की चर्चा सुनकर महादेव शिव शंभु को श्री श्यामसुंदर के बाल-रूप के दर्शन करने की मंशा हुई और वे एक योगी का भेष बनाकर मैया यशोदा के द्वार गोकुल में नन्दभवन के बाहर पहुंच कर इस प्रकार आवाज़ लगाते हैं…!*

जोगी भेषधारी शिव शंभु : -अलख निरंजन......अलख निरंजन....कहां हो प्रभु? शिवजी गाने लगते हैं...

एक योगी आयो री तेरे द्वार....दिखा दे मुख लाल का…

ओ मैया दिखा दे मुख लाल का…तेरे पालने में पालनहार, दिखा दे मुख लाल का…ओ मैया दिखा दे मुख लाल का…लिए अंखियों में प्यास, योगी करे अरदास...ओ मैया दिखा दे मुख लाल का…मैया ऐसो संजोग ना टाल, दिखा दे मुख लाल का…ओ मैया दिखा दे मुख लाल का…"तेरे भरे रहेंगे भंडार, दिखा दे मुख लाल का…ओ मैया दिखा दे मुख लाल का…मैया यशोदा उस समय श्री श्यामसुंदर को नहला धुला कर उनका श्रृंगार करने में इतनी व्यस्त थी की बाहर खड़े योगी की आवाज़ न सुन पाई...योगी भेषधारी शिव भोले ने फिर से आवाज़ लगाई.... लेकिन अंदर से कोई जवाब नहीं आया...तभी वहां से एक ब्रज की वृद्धा गोपी गुजर रही थी…उसने उस योगी को प्रतीक्षारत देखा तो उनके पास गई...और कहने लगी…गोपी ने पूछा-: बाबा....किसे बुला रहे हों?

योगी बाबा बोले: गृहस्वामिनी को माई ,भिक्षा चाहिए!योगी बाब, हां माई!

गोपीबोली : यहां तो कोई नहीं दिखता, चलो मेरे घर....वहां तुम्हें भिक्षा मिल जाएगी....मैं तुम्हे भिक्षा दूंगी...

*योगी बाबा ने कहा कि: तुम माई, गोपी ने कहा हाँ मैं अन्न, वस्त्र , धन...तुम जो मांगोगे वही दूंगी*

योगी बाबा ने कहा: नहीं माई, मेरा एक नियम है,कि मैं एक ही द्वार पर जाकर अलख जगाता हूं....और यदि उस द्वार से कुछ मिल जाए तो अच्छा है....अन्यथा उस दिन किसी दूसरे द्वार पर नहीं जाता...

.हे भगवान् ! तो फिर भूखे ही रहोगे?

 हां! माई, जैसी प्रभु की इच्छा...!

गोपी : नहीं नहीं बाबा , हमारे गांव से कोई साधु भूखा चला जाए तो यह सारे गोकुल के लिए लज्जा की बात बन जाए…

 बाबा तुम यहीं ठहरो….मैं अंदर जाकर देखती हू, कि यशोदा रानी कहां हैं?..ऐसा कह वह वृद्धा गोपी नन्दभवन में गई देखती है की मैया यशोदा तो श्यामसुंदर का श्रृंगार करके उन्हें लोरी गा कर सुला रही थी…और इधर बाहर खड़े योगी भेषधारी भगवान शंकर ने मन ही मन कहा… प्रभु, दर्शन किए बगैर तो नहीं जाऊंगा!

 गोपी अंदर जाकर मैया यशोदा से कहती हैं : ओ यशोदा रानी...!

मैया यशोदा : आओ काकी, क्या बात है । यशोदा रानी....तेरे द्वार पर एक योगी कब से भिक्षा के लिए खड़ा है….तुमने उसकी आवाज़ नहीं सुनी क्या?

नहीं तो!अरी जल्दी से उसे भिक्षा दे दे… कोई बड़ा महात्मा लगता है! मैया यशोदा : अच्छा !

गोपी : ऐसा योगी मैंने कभी नहीं देखा…उसके मुख पर तो आंख ही नहीं टिकती!

क्यों नहीं टिकती? -: अरी! इतना तेज है उसके ललाट पर कि जैसे सूर्य का तेज होता है….और देखो कितना कड़ा नियम है उसका.... जिस द्वार पर भिक्षा के लिए खड़ा हो जाता है बस वही से भिक्षा लेता है… और भिक्षा न मिलने पर भूखा ही लौट जाता है!अच्छा तो ये बात है काकी तो चलो पहले योगी बाबा को भिक्षा दे दूं। मैया यशोदा ने कहा : काकी मैंने.... आटा, चावल, दाल, गुड, घी ये सब कुछ ले लिया है…दो चार दिन के लिए पर्याप्त होगा....अब चलो ! गोपी ने कहा अरी! दक्षिणा के लिए कुछ धन भी ले ले…बड़े दिव्य मूर्ति हैं....उसे प्रसन्न कर ले, आशीर्वाद पाएगी ! मैया यशोदा : ओह! दक्षिणा तो मैं भूल ही गई अभी लाती हूं ...फिर मैया यशोदा संदूक से धन और एक मोती की माला निकलते हुए कहती हैं : काकी.... बड़ी दिव्यात्मा है न....तो लो ये बहुमूल्य मोती की माला ही दे देती हूं...

 ’इधर बाहर शिव शंभु खड़े-खड़े अपने ही मन ही मन में श्यामसुन्दर से इस तरह बाते कर रहे थे : - प्रभु! दर्शन देने में इतना संकोच?

श्यामसुंदर ने उनके अंतर्मन में कहा : धन्य भाग्य,जो आप पधारे...मेरा प्रणाम स्वीकार करें !योगी भेषधारी शिव शंभु : आप तो हमें, अपना परम भक्त जान कर अपने बाल रूप के दर्शन करा दीजिए बस .....श्यामसुंदर ने फिर से कहा : बाल रूप तो इस समय मैया यशोदा के पास गिरवी रखा है....उन्ही से मांगना पड़ेगा…आहा ! लीजिए, मैया आ गई..मैया यशोदा श्यामसुंदर को पालने में सुलाकर और दक्षिणा की थाल लेकर उस वृद्धा गोपी के साथ नन्दभवन के बाहर आती है, जहा योगी भेष में शिव शंभु प्रतीक्षा कर रहे थे.....मैया यशोदा योगी रूपी शिव शंभु को प्रणाम करते हुए कहने लगी! यशोदा ने विलम्ब के लिए क्षमा मांगते हुए बोली बाबा.... मैं अपने लल्ला के श्रृंगार में व्यस्त थी...

योगी भेषधारी शिव शंभु : धन्य हो तुम मैय्या.... तुम्हें ऐसे दिव्य बालक की सेवा का सौभाग्य प्राप्त हुआ....माता मुझे भी उस परम दिव्य शिशु के दर्शन करवा दो...।

*मैया यशोदा : क्षमा बाबा...अभी अभी नहलाया है उसे...इस समय मैं उसे बाहर नहीं ला सकती.... ठंडी हवा लग जाएगी...योगी भेषधारी शिव शंभु : मैया, हवाओं का चलना न चलना, जिसके संकल्प मात्र पर निर्भर है, उसके लिए व्यर्थ की शंका मत करो…उसे एक बार मेरे पास लेकर आओ....उसके दर्शनों की लालसा में ही मैं तेरे द्वार पर आया हूं...मैया

 ’यशोदा : नहीं योगी बाबा...मैं उसे बाहर नहीं ला सकती।इसलिए.....अब यह भिक्षा ग्रहण कीजिए और मुझे क्षमा कीजिए ...।

योगी भेषधारी शिव शंभु भिक्षा की उस थाल को देख कर इस प्रकार मैया यशोदा से कहने लगे : मैया! ये मोती माणक, धन तो मेरे लिए पत्थर के टुकड़े है ...मेरे किस काम के?मुझे इनका लोभ नहीं, चाहो तो ऐसे हीरे, मोती, माणक मुझसे ले लो...पर मुझे अपने लल्ला का दर्शन करवा दो।वही हमारी भिक्षा है.. .फिर योगी भेषधारी भोले शिव शंकर ने अपने कमंडल से हीरे मोती निकाल कर मैया यशोदा जी के भिक्षा की थाल में रख दिए जिसे देख मैया यशोदा आश्चर्य चकित और चिंतित हो उस वृद्ध गोपी से कहने लगी...मैया यशोदा : काकी....ये कोई असली साधु नहीं….कोई मायावी है...वृद्धा गोपी मूक खड़ी यशोदा मैया का करुण चेहरा देखती रही...फिर मैया यशोदा अपने आंखों में अश्रु भर के योगी भेषधारी शिव शंभु से कहने लगी : देखो योगी बाबा....तुम जैसे कई मायावी इससे पहले भी आ चुके है.. सभी इसी प्रकार की चिकनी चुपड़ी बातें करते हैं….तेरा लाल तो बड़ा दिव्य बालक है....उसका दर्शन करा दे....उसे मेरी गोद में दे दे...और फिर सब के सब उसका अनिष्ट करने की चेष्टा करते हैं....मेरे लाल ने आप लोगों का क्या बिगाड़ा है...जो आप लोग उसके शत्रु बन गए. ..और फिर बहुत ही कड़े शब्दों में मैया यशोदा ने कहा : भिक्षा चाहिए तो लीजिए, अन्यथा अपने स्थान को पधारिए...मैं अपने लल्ला को बाहर नहीं लाऊंगी...योगी भेषधारी शिव शंभु : ओ मैया! ऐसे कठोर मत बनो...मैं बहुत दूर कैलाश पर्वत से आया हूं . ..मैया यशोदा फिर कठोर शब्दों में बोली : कैलाश में थे, तो वहीं भगवान शिव के साक्षात् दर्शन कर लिए होते ....यहां क्या काम है?

योगी भेषधारी शिव शंभु : भोली मैया! भगवान के साक्षात् दर्शन करना तो कोई कठिन कार्य नहीं हैं.....परन्तु उनके बाल स्वरुप के दर्शन करना अत्यंत दुर्लभ हैं ..उसी की लालसा में मैं तेरे द्वार पर आया हूं…कई युगों के पश्चात् ही यह दर्शन मिलते हैं..!

मैया यशोदा : नहीं नहीं योगी बाबा...मुझे क्षमा करो..मैं उसे बाहर नहीं लाऊंगी…मेरे पति की आज्ञा है, कि किसी भी अनजान व्यक्ति के सामने अपने लल्ला को मत लाना...मैया यशोदा को इस प्रकार अपने फैसले पर अडिग देख भगवान् श्यामसुंदर ने श्रीयोगमाया को पूरनमासी बुआ ( पूरनमासी बुआ...जो कि स्वयं भगवती योगमाया हैं....भगवान के जनम के पूर्व से ही गोकुल में आ गयी थी) के रूप में उस स्थान पर भेजा...जहां पर यह वाद-विवाद चल रहा था...पूरनमासी बुआ : ये अनजान व्यक्ति नहीं हैं यशोदा रानी...ये अनजान व्यक्ति नहीं हैं....मैं इन्हें अच्छी प्रकार से जानती हूं…मैंने कहा था न कि गोकुल में आने के पहले मैं काशी में रहती थी…वही इनके दर्शन किए थे…ये सचमुच परम दिव्य शक्ति हैं.....शक्ति पति हैं ये.....शक्ति पति हैं ये…."ऐसा कहते हुए पूरनमासी बुआ....आंखों में अश्रु की धार लिए भगवान् शिव के चरणों में अपना शीश रख उन्हें प्रणाम करती हैं… ।और उठ कर मैया यशोदा से कहती है : यशोदा! इन्हें लल्ला के दर्शन करा दे....यशोदा रानी....इन्हें लल्ला के दर्शन करा दे....इनका आशीर्वाद पाकर तेरा लल्ला भी बड़ा प्रसन्न हो जाएगा.।

..मैया यशोदा विस्मृत सी मुद्रा में पूरनमासी बुआ से बोली : " पूरनमासी बुआ! क्या तुम सच कह रही हो? तुम इन्हें जानती हो?पूरनमासी बुआ : हां री, यशोदा रानी! मैं इन्हें भली-भांति जानती हूं….अरी! यह तो तेरा सौभाग्य है जो तेरे लल्ला का प्रेम इन्हें तेरे द्वार पर ले आया.. .मैया यशोदा :परन्तु....इनकी भेष-भूषा तो देखिए…लम्बी लम्बी जटा....बदन में भभूत और गले में सर्पों की माला लगाये हुए हैं… लल्ला तो इनको देख कर वैसे ही डर जाएगा....ना बाबा ना…मैं लल्ला को नहीं लाऊंगी...बिचारी भोली-भाली मैया को क्या पता की उनके द्वार पर स्वयं सदाशिव पधारे हैं...मैया यशोदा से ऐसा सुन पूरनमासी बुआ ने कहा : नहीं यशोदा रानी…इनके दर्शन मात्र से ही समस्त भयों का नाश हो जाता है....समस्त बाधाएं दूर हो जाती हैं..—’मुझ पर विश्वास करो....मैं कभी तुमसे झूठ नहीं बोली...वृद्धा गोपी ने पूरनमासी बुआ का समर्थन करते हुए कहा : अरी! यशोदा रानी, ये पूरनमासी बुआ कभी झूठ नहीं बोलती…यशोदा रानी याद है तुम्हें …जब वो पहले-पहले गोकुल में आई थी तब इसी ने तुझे आशीर्वाद दिया था ना कि तुम्हें भी लल्ला होगा... ।उस समय तुम सब लोग तो आशा छोड़ चुके थे…ये सदा सच कहती है.. सो इसकी बात मान ले बेटी.. .

पूरनमासी बुआ : जा बेटी जा, लल्ला को ले आ...मैया यशोदा : पर मैं लल्ला को इनके हाथ में नहीं दूंगी...पूरनमासी बुआ : " अच्छा लल्ला को तो ले आ....ये दूर से ही आशीर्वाद दे देंगे.…जा जा ले आ लल्ला को यशोदा बेटी...फिर मैया यशोदा नन्दभवन के अन्दर जाती हैं, श्यामसुंदर को लाने के लिए…और अंदर जाकर श्यामसुंदर को अपनी गोद में उठा इस प्रकार कहती है : अरे ओ लल्ला...चल कोई तेरे दर्शन के लिए आए हैं…चल…मैया यशोदा श्यामसुंदर को बाहर ले आती हैं.…जिसे देख, योगी भेषधारी शिव शंभु प्रेम से गद गद हो, श्यामसुंदर के बाल स्वरुप को टकटकी लगाए निहारने लगे....जैसे पूर्णिमा की रात को चकोर चांद को टकटकी लगाये निहारते रहता है…मैया यशोदा कहती है : लो योगी बाबा....लल्ला को देख लो, और आशीर्वाद दे दो.... शिव शम्भू अपने प्रिय श्यामसुंदर के इस बाल स्वरुप को देख उन्हें नमस्कार करते हैं....और श्यामसुंदर भी चेहरे पर मधुर मधुर मुस्कान लिए उन्हें देखते रहते हैं....और फिर शिव शंभु मैया यशोदा से इस प्रकार कहते हैं...योगी भेषधारी शिव शंभु : मैया! आज्ञा हो तो इनके चरणों में अपना मस्तक रख लूं?मैया यशोदा : नहीं ...नहीं! मैं मेरे लल्ला को छुने नहीं दूंगी...फिर पूरनमासी बुआ योगी भेषधारी शिव शंभु से कहती है : - ’पहले अपनी चरण रज तो दीजिए. ..।ऐसा कह पूरनमासी बुआ, शिव शंभु की चरण रज ले लल्ला श्यामसुंदर के ललाट पर लगा देती है.....अंतर्यामी भोलेनाथ श्यामसुंदर से इस प्रकार कहते हैं : यह कहां का न्याय है प्रभु....कि हम इतनी दूर से आकर भी आपके बाल रूप का आलिंगन भी ना कर सके?जिन श्री चरणों से निकली पवित्र गंगा को हम अपने शीश पर धारण करते हैं... उन श्री चरणों को एक बार तो छु लेने दीजिए प्रभु।

फिर शिव शंभु अपने ही शरीर के एक अदृश्य प्रतिबिम्ब से श्री श्यामसुंदर के चरणों का स्पर्श करते हैं…. और उनकी स्तुति पुरुषसूक्त से करते हैं... जो कि भगवान श्री श्यामसुंदर को अति प्रिय हैं...उसके बाद योगी भेषधारी शिव शंभु मैया यशोदा से झूम-झूम के नाच-नाच कर कहते है - युग युग जीये तेरो लल्ला...ओ मैया…युग युग जीये.... मेरे नयना भये रे निहाल, निरख मुख लाल का…प्यासी अंखियाँ हुई रे निहाल, निरख मुख लाल का…फिर मैया यशोदा कहती हैं : योगी बाबा अपनी भिक्षा तो लेते जाइए....महादेव शिव शंभु ने झूमते हुए गाते हुए कहा - रख ले हीरे मोती तेरे, ये पत्थर किस काम के मेरे...योगी हो गया माला माल, निरख मुख लाल का…मैं तो हो गया माला माल, निरख मुख लाल का…"ऐसा कहते ही…योगी भेषधारी शिव शंभु वहां से अंतर्ध्यान हो जाते हैं…ऐसा अनुपम दृश्य देख स्वर्ग लोक से समस्त देवी-देवता प्रसन्न हो उस स्थान पर पुष्प की वर्षा करने लगते हैं .....!  शिवजी और भगवान श्रीकृष्ण मिलन की इस दिव्य प्रेममयी लीला को जो कोई पढ़ता व सुनता है वह अपने कर्मों के बंधनों से स्वतः ही छुट जाता है और प्रभु की करुणामयी भक्ति प्राप्त करता है !श्री श्यामसुंन्दर भगवान् की जय ,भोले भंण्डारी की जय      


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