भारत के लिए स्वतंत्रता का महत्व
भारत के लिए स्वतंत्रता का महत्व
सतीश शर्मा
स्वतंत्रता का अर्थ केवल किसी बाहरी शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि बिना किसी दबाव के अपने विचारों और कार्यों को स्वतंत्र रूप से व्यक्त करने की क्षमता है। स्वतंत्रता किसी भी जीवित प्राणी, समाज और राष्ट्र के जीवन का आधार स्तंभ है, जिसके बिना मानव का बौद्धिक, सामाजिक और आर्थिक विकास असंभव है। यह मनुष्य को गरिमापूर्ण जीवन जीने और अपने अधिकारों का सही उपयोग करने का अवसर देती है। अपनी इच्छा से जीवन जीने और करियर चुनने का अधिकार। बिना किसी डर के अपने विचार और राय प्रकट करना। देश के नागरिकों को अपनी सरकार चुनने का लोकतांत्रिक अधिकार। आत्मनिर्भर बनने और व्यापार या आजीविका चुनने की आजादी यही स्वतंत्रता का अर्थ है ।
भारत ने ब्रिटिश साम्राज्य के लगभग 200 वर्षों के क्रूर शासन के बाद 15 अगस्त 1947 को अपनी स्वतंत्रता प्राप्त की थी। हजारों स्वतंत्रता सेनानियों के कड़े संघर्ष और सर्वोच्च बलिदान के बाद हमें यह अमूल्य धरोहर मिली है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में स्वतंत्रता सेनानियों का योगदान अतुलनीय और सर्वोपरि है, जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर भारत को ब्रिटिश गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराया। उनके इस महान संघर्ष और बलिदान के बिना आधुनिक, स्वतंत्र और लोकतांत्रिक भारत की कल्पना करना भी असंभव था। इन वीरों ने देश के कोने-कोने में देशभक्ति की अलख जगाई और एक शक्तिशाली साम्राज्य के खिलाफ एकजुट होकर लड़ाई लड़ी।
भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, और सुखदेव जैसे युवाओं ने ब्रिटिश सरकार की जड़ों को हिलाने के लिए अपनी जान दांव पर लगा दी। महात्मा गांधी ने सत्य, अहिंसा, और सत्याग्रह को अपना हथियार बनाकर पूरे देश को एक सूत्र में पिरोया और जन-आंदोलन खड़े किए। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने 'आजाद हिंद फौज' का गठन करके "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा" का नारा दिया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव बनाया। बाल गंगाधर तिलक और गोपाल कृष्ण गोखले जैसे नेताओं ने अपने विचारों और लेखों के माध्यम से जनता को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया। रानी लक्ष्मीबाई, बेगम हजरत महल, और सरोजिनी नायडू जैसी वीरांगनाओं ने साबित किया कि आजादी की लड़ाई में महिलाएं किसी से पीछे नहीं थीं।
1857 का विद्रोह स्वतंत्रता की पहली संगठित और बड़ी लड़ाई, जिसने ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी। 1920 मे महात्मा गांधी के नेत्रत्व मे देश के आम नागरिकों, छात्रों और किसानों ने असहयोग आंदोलन द्वारा ब्रिटिश सामानों और संस्थाओं का पूर्ण बहिष्कार किया। काकोरी ट्रेन एक्शन क्रांतिकारियों ने सरकारी खजाना लूटकर यह साबित किया कि वे संसाधनों के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। नमक सत्याग्रह (दांडी मार्च) द्वारा 1930 महात्मा गांधी, सरोजिनी नायडू आदि ने ब्रिटिश सरकार के नमक कानून के एकाधिकार को तोड़कर सविनय अवज्ञा की शुरुआत की। भारत छोड़ो आंदोलन 1942 में महात्मा गांधी ने "करो या मरो" के नारे के साथ अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर करने वाला अंतिम सबसे बड़ा जन-आंदोलन किया।
संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार पहले कांग्रेस में सक्रिय थे। उन्होंने 1921 के असहयोग आंदोलन और 1930 के जंगल सत्याग्रह में भाग लिया, जिसके लिए उन्हें जेल जाना पड़ा। संघ ने अपने स्वयंसेवकों को व्यक्तिगत स्तर पर स्वतंत्रता आंदोलनों (जैसे 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन) में भाग लेने की स्वतंत्रता दी थी। ब्रिटिश काल के दौरान संघ के कई पदाधिकारियों ने भूमिगत क्रांतिकारियों (जैसे राजगुरु) को छिपने के लिए सुरक्षित स्थान और सहायता प्रदान की। संघ का मानना था कि भारत की गुलामी का मुख्य कारण समाज का बिखराव था। युवाओं में चरित्र, अनुशासन और देशभक्ति जगाने पर ध्यान केंद्रित किया। संघ के स्वयंसेवकों ने 1954 में दादरा, नगर हवेली और गोवा मुक्ति संग्राम में पुर्तगालियों के खिलाफ अग्रिम भूमिका निभाई थी।
हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने केवल देश को भौगोलिक रूप से आजाद नहीं कराया, बल्कि हमें एक ऐसा स्वतंत्र वातावरण दिया जहाँ हम अपनी मर्जी से सांस ले सकें, पढ़ सकें और तरक्की कर सकें। आज हम जिस स्वतंत्र भारत में जी रहे हैं, वह उन्हीं के त्याग और बलिदान की नींव पर खड़ा है। भारतीय इतिहास में यह केवल एक तारीख नहीं, बल्कि देश के गौरव और संप्रभुता का प्रतीक है। स्वतंत्रता कभी भी मनमानी करने का लाइसेंस नहीं होती। हमारी आजादी वहीं तक है, जहाँ से दूसरे की आजादी प्रभावित न हो। देश को प्रगति के पथ पर ले जाने के लिए जिम्मेदारी से काम करना होगा।
स्वतंत्रता को बनाए रखना उसे प्राप्त करने से भी अधिक चुनौतीपूर्ण कार्य है। एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में हमें देश की एकता, अखंडता और सामाजिक सद्भाव को मजबूत रखने का निरंतर प्रयास करना चाहिए।
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