शुकदेव जी और वैराग्य
शुकदेव जी और वैराग्य
शुकदेव जी 12 वर्षों तक माता के गर्भ में रहे थे। जब भगवान श्रीकृष्ण के आश्वासन पर वे बाहर आए, तो जन्म लेते ही उनके भीतर पूर्ण वैराग्य था। उन्होंने सामान्य बालकों की तरह न तो रुदन किया और न ही वे संसार की किसी वस्तु की ओर आकर्षित हुए।
जैसे ही शुकदेव जी का जन्म हुआ, वे तुरंत खड़े होकर उत्तर दिशा (पहाड़ों/गिरी) की ओर चल पड़े। उनके मन में न तो परिवार के प्रति मोह था और न ही शरीर के प्रति ममता।
पुत्र को जाते देख महर्षि वेदव्यास जी अत्यंत व्याकुल हो उठे। वे उनके पीछे-पीछे भागे और करुण स्वर में पुकारने लगे, "हे पुत्र! हे पुत्र! रुक जाओ।"
शुकदेव जी ने तो पीछे मुड़कर नहीं देखा, लेकिन उनके भीतर व्याप्त ब्रह्म-ज्ञान के कारण वृक्षों और पहाड़ों (गिरी) ने व्यास जी को उत्तर दिया। हवाओं की सरसराहट और पत्तों की खड़खड़ाहट में वही गूंज सुनाई दी कि आत्मा का न कोई पिता है, न कोई पुत्र; वह तो सर्वव्यापी है।
शुकदेव जी के वैराग्य की पराकाष्ठा को दर्शाने वाली एक प्रसिद्ध घटना उनके मार्ग में आने वाले एक जलाशय की है।
मार्ग में एक जलाशय में कुछ अप्सराएं स्नान कर रही थीं। जब पूर्णतः निर्वस्त्र शुकदेव जी वहां से गुजरे, तो अप्सराओं को कोई संकोच नहीं हुआ। उन्होंने अपने वस्त्र तक नहीं उठाए, क्योंकि उन्हें लगा कि शुकदेव जी की दृष्टि में स्त्री-पुरुष का भेद ही नहीं है। वे एक निष्पाप बालक के समान थे।
परंतु, जब उनके पीछे वृद्ध व्यास जी वहां पहुंचे, तो अप्सराओं ने तुरंत लज्जावश अपने वस्त्र धारण कर लिए। व्यास जी ने जब इसका कारण पूछा, तो अप्सराओं ने कहा— "आप ज्ञानी होकर भी भेद (स्त्री-पुरुष) देखते हैं, जबकि आपके पुत्र की दृष्टि में केवल ब्रह्म है, वहां कोई दूसरा 'भाव' ही नहीं है।"
व्यास जी के बहुत आग्रह पर शुकदेव जी ने ज्ञान की पूर्णता के लिए राजा जनक (विदेह) के पास जाने का निर्णय लिया। राजा जनक ने उनकी कठिन परीक्षा ली, जिसमें शुकदेव जी खरे उतरे। इसके बाद वे पूर्णतः सांसारिक बंधनों को त्याग कर सदा के लिए विचरने लगे।
शुकदेव जी का वैराग्य कोई अर्जित किया हुआ गुण नहीं था, बल्कि वह 'अमर कथा' सुनने के कारण उनके स्वभाव में रचा-बसा था। उन्होंने गिरी (पहाड़ों) की कंदराओं को अपना घर बनाया और अंततः राजा परीक्षित को मोक्ष दिलाने के लिए श्रीमद्भागवत का उपदेश दिया।

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