जानकारीकाल दिसंबर - 2025, हिन्दी मासिक

 जानकारी काल 



   वर्ष-26   अंक - 08    दिसंबर - 2025 ,  पृष्ठ 40   www.sumansangamaashray.com    



प्रकाश के साथ अंधेरे में जाना प्रकाश को जानना है।

अँधेरे को जानने के लिए अँधेरे में जाओ। बिना देखे जाओ,

और पाते हैं कि अंधेरा भी खिलता है और गाता है,

और यह काले पैरों और काले पंखों द्वारा यात्रा करता है।



 प्रधान संपादक व  प्रकाशक

 सतीश शर्मा 



 कार्यालय

 ए 214 बुध नगर इंद्रपुरी

 नई दिल्ली 110012


 मोबाइल

  9312002527


 संपादक मंडल

 सौरभ  शर्मा,

कपिल शर्मा,

गौरव शर्मा,

डॉ अजय प्रताप सिंह,

 करुणा ऋषि, 

डॉ मधु वैध,

राजेश शुक्ल  


प्रकाशक व मुद्रक 

सतीश शर्मा के लिय ग्लैक्सी प्रिंटर-106 F,

कृणा नगर नई दिल्ली 110029, A- 214 बुध नगर इन्दर पूरी नई दिल्ली  110012 से प्रकाशित |


सभी लेखों पर संपादक की सहमति आवश्यक नहीं है पत्रिका में किसी भी लेख में आपत्ति होने पर उसके विरुद्ध कार्रवाई केवल दिल्ली कोर्ट में ही होगी 

R N I N0-68540/98

मूल्य 02-50 


sumansangamaashray.com

jaankaarikaal.blogspot.com

अनुक्रमणिका


अपनों से अपनी बात - 3 

कुटुंब प्रबोधन मजबूत पारिवारिक बंधन - 4 लेख

 समाज में पनपत्ति गाली गलौज प्रवृत्ति का तरूणों पर नकारात्मक प्रभाव और निवारण - 7 लेख

ऐसे थे अपने लाल बहादुर शास्त्री - 12 व्यक्तित्व

 वापसी  - 14 कहानी 

पुनर्जन्म - 16 कहानी 

सिलकुटवा काका - 19 प्रेरक प्रसंग

पगली कहीं की - 21 कहानी 

अनुमय का जन्म दिन - 23 कहानी

 पर्यावरण बना सहारा - 26 कहानी 

परिधान - 28 कविता 

सफला एकादशी - 29 व्रत कथा 

चित्रा नक्षत्र - 31 ज्योतिष 

नीलम रत्न - 32 ज्योतिष 

कन्या राशि - 33 ज्योतिष 

पुत्रदा एकादशी - 34 व्रत कथा 

दिसंबर मास का पंचांग,व्रत त्यौहार,पंचक- 35

दिसंबर 2025 के महत्वपूर्ण दिवस - 38




अपनों से अपनी बात 

बिहार के विधानसभा चुनाव परिणामों ने भारतीय राजनीति को एक बार फिर अचंभित किया है। इस बार के जनादेश ने नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को सत्ता के शिखर पर पहुंचाया है, वह न केवल राज्य की राजनीतिक दिशा बदलने वाला होगा बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी एक बड़ा संकेत माना जा रहा है। विपक्ष के 'वोट चोरी' के थोथे आरोप और हवा-हवाई चुनावी वादों को खारिज करते हुए बिहार की जनता ने जिस तरह से एकतरफा चुनावी फैसला दिया है उसके दूरगामी राजनीतिक परिणाम देखने को मिलेंगे। बिहार एक बार फिर स्थिर शासन की ओर कदम बढ़ाएगा। यह चुनाव जनता की जातिगत व्यवस्था से हट कर, अपेक्षाओं, राजनीतिक मूल्यों और विकास के नए मानकों की अभिव्यक्ति है। बिहार लंबे समय से राजनीतिक उठापटक और गठबंधन परिवर्तनों का केंद्र रहा है, लेकिन इस बार का फैसला अपेक्षा से कहीं अधिक स्पष्ट और निर्णायक है। इससे देशभर में यह संदेश गया है कि जनता बार-बार अस्थिरता, अनिर्णय और नकारात्मक राजनीति को नकार रही है। नीतीश कुमार की वापसी अनुभव, विश्वसनीयता और प्रशासन का भरोसा है। नीतीश कुमार पिछले दो दशकों से बिहार की राजनीति का केंद्रीय चेहरा रहे हैं। भले ही वे कई बार राजनीतिक गठजोड़ों में बदलाव करते रहे हों, लेकिन एक बात सदैव कायम रही है और वो उनकी प्रशासनिक विश्वसनीयता है। बिहार के समुन्नत विकास की आकांक्षा पालने  के साथ बिहारी जनमानस ने जातिगत समीकरणों सम्मिश्रणों को धता बता कर एक बार फिर मोदी और नीतीश के सुशासन में विश्वास व्यक्त किया है, जिसने बिहार में प्रचंड बहुमत के साथ बनने वाली डबल इंजन सरकार की जिम्मेदारी बढ़ा दी है। बिहार में न ज्ञान की कमी है न मेहनतकश लोगों की, बस इस ज्ञान और मेहनत को सही दिशा और प्रोत्साहन की आवश्यकता है। बिहार के मेहनतकश मजदूर अपनी रोजी-रोटी के लिए दूसरे राज्यों में न जाएं इसके लिए बिहार में निवेश के लिए अनुकूल वातावरण बनाना व निवेश लाना होगा । इंजीनियर, डाक्टर सहित अन्य क्षेत्रों की प्रतिभा को न केवल बिहार में ही सुअवसर उपलब्ध कराने होंगे व पुणे, बेंगलुरु, गुरुग्राम, नोएडा की तरह बिहार के भी किसी शहर को पटना , बेगुसराय जैसे शहरों को आइटी हब बनाने की जरूरत है। उच्च स्तरीय के विश्वविद्यालय, तकनीकी, चिकित्सा और कृषि संबंधी शिक्षा संस्थानों की स्थापना के साथ समुन्नत नगरी और ग्रामीण विकास की आकांक्षा है बिहार की  आकांक्षी जनता ने प्रचंड बहुमत देकर अपना संकेत दे दिया है अब इनकी बारी है।






कुटुंब प्रबोधन, मजबूत पारिवारिक बंधन

परिवार जन्म, विवाह या गोद लेने से जुड़े लोगों का एक समूह है जो एक साथ रहते हैं और समाज की बुनियादी इकाई माने जाते हैं। यह सदस्यों को सुरक्षा, पूर्वानुमान और भावनात्मक संतुष्टि प्रदान करता है और सामाजिक व सांस्कृतिक मूल्यों के हस्तांतरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। परिवार का महत्व सुरक्षा, सहयोग और भावनात्मक सहारा प्रदान करने में है। यह वह पहली जगह है जहाँ हम संस्कार, मूल्य और सामाजिक व्यवहार सीखते हैं। परिवार हमें आत्मविश्वास देता है और जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए एक मजबूत नींव प्रदान करता है।सुरक्षा और सहारा: परिवार एक सुरक्षित और स्नेहपूर्ण माहौल प्रदान करता है। मुश्किल समय में यह एक मजबूत सहारा होता है, जहाँ सदस्य एक-दूसरे पर भरोसा कर सकते हैं। परिवार ही वह पाठशाला है जहाँ हमें शुरुआती संस्कार और नैतिक मूल्य मिलते हैं। यहीं हम संवेदनशीलता और सहनशीलता सीखते हैं। परिवार प्यार और अपनापन प्रदान करता है, जो भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक विकास के लिए आवश्यक है। इससे आत्मविश्वास बढ़ता है। परिवार हमें संवाद करने, सामाजिक मेलजोल रखने और दूसरों के साथ तालमेल बिठाना सिखाता है। परिवार हमें पहचान देता है और समाज में हमारा अस्तित्व स्थापित करता है। परिवार एक ऐसा वातावरण प्रदान करता है जहाँ हम एक-दूसरे से सीखते हैं, अनुभव साझा करते हैं और एक साथ आगे बढ़ते हैं। 

 परिवार में आमतौर पर पति, पत्नी और बच्चे शामिल होते हैं, लेकिन इसमें अन्य रक्त संबंधी और विवाह से जुड़े व्यक्ति भी हो सकते हैं, जैसे दादा-दादी, चाचा-चाची आदि। सदस्यों के बीच संबंध जन्म, विवाह या गोद लेने से बनता है। परिवार समाज की एक बुनियादी इकाई है और यह व्यक्ति के विकास 


और सामाजिक व्यवस्था का आधार बनती है। यह सदस्यों के समाजीकरण, भावनात्मक सहयोग, आर्थिक सहयोग और सामाजिक नियमों व मूल्यों को सिखाने का कार्य करता है। परिवार सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक गतिविधियों का केंद्र रहा है, और यह अपनी संपत्ति के अधिकार और हस्तांतरण का भी कार्य करता है। 

कुटुंब प्रबोधन का अर्थ है परिवार के सदस्यों को भारतीय संस्कृति, संस्कार और मूल्यों से जोड़ना ताकि एक मजबूत और जिम्मेदार परिवार का निर्माण हो सके। इसमें परिवार के सदस्यों के बीच आपसी समझ, समर्पण और त्याग की भावना को बढ़ावा देना शामिल है। इसके तहत नियमित रूप से एक साथ बैठना, भोजन करना, भारतीय परंपराओं पर चर्चा करना और समाजसेवा जैसे कार्य किए जाते हैं। 

संस्कारों को बढ़ावा देना: पारिवारिक मूल्यों और संस्कारों को नई पीढ़ी तक पहुंचाना ताकि वे संस्कारहीनता और संबंधहीनता से बच सकें।

जिम्मेदारी की भावना जागृत करना - परिवार के सदस्यों में अपने घर और देश के प्रति जिम्मेदारी की भावना पैदा करना।

वसुधैव कुटुम्बकम का आदर्श -  "विश्व एक परिवार है" के आदर्श को परिवार के स्तर पर साकार करना।

सामुदायिक विकास -  एक सशक्त और जागरूक परिवार एक सशक्त समाज की नींव रखता है, जो प्रगतिशील राष्ट्र के निर्माण में सहायक होता है। 

गतिविधियां

एक साथ भोजन करना = सप्ताह में कम से कम एक बार परिवार के साथ मिलकर भोजन करना।

सांस्कृतिक चर्चा: परंपराओं, रीति-रिवाजों और पुरखों के बारे में बातचीत करना।

साहित्य और स्तोत्र पाठ: परिवार के साथ धार्मिक या प्रेरणादायक साहित्य का पाठ करना।

सोशल मीडिया का विवेकपूर्ण उपयोग - मोबाइल और टीवी का उपयोग विवेकपूर्ण तरीके से करना।

समाजसेवा: जन्मदिवस जैसे अवसरों पर समाजहित के उपक्रमों में भाग लेना और सामाजिक संस्थाओं को सहयोग करना।

कुटुंब प्रबोधन में मजबूत पारिवारिक बंधन, सामाजिक समरसता और एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण शामिल है। इसके तहत परिवार के सदस्यों के बीच बेहतर संचार, आपसी समझ और एकता को बढ़ावा मिलता है, जिससे पारिवारिक समस्याओं का समाधान होता है। यह पीढ़ी दर पीढ़ी संस्कारों और मूल्यों को हस्तांतरित करने में भी मदद करता है।

मजबूत पारिवारिक संबंध - परिवार के सदस्यों के बीच संवाद और आपसी समझ बढ़ने से रिश्ते मजबूत होते हैं। यह तनाव और संघर्ष को कम करता है और एकता को बढ़ावा देता है।

संस्कारों और मूल्यों का संचार: यह परिवार के सदस्यों, विशेषकर बच्चों को बचपन से ही सही संस्कार, नैतिक मूल्यों और सांस्कृतिक ज्ञान प्रदान करता है।


सामाजिक समरसता और राष्ट्रवाद -  मजबूत परिवार एक सामंजस्यपूर्ण समाज की नींव रखते हैं, जो बदले में राष्ट्र की प्रगति में योगदान देता है। इससे देशभक्ति और जिम्मेदारी की भावना बढ़ती है।

सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव: यह लोगों को अपनी परंपराओं, संस्कृति और गौरवशाली इतिहास से जोड़े रखने में मदद करता है, जो राष्ट्र की पहचान के लिए महत्वपूर्ण है।

पारिवारिक समस्याओं का समाधान - यह परिवार के सदस्यों को मिलकर भोजन करने, अच्छी बातें साझा करने और समस्याओं का मिलकर समाधान करने के लिए प्रोत्साहित करता है।

बेहतर नागरिकता का निर्माण: यह बच्चों को अनुशासित और जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए तैयार करता है, जो समाज में सकारात्मक योगदान करते हैं।

गीता से 

ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्‌ ।

छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्‌ ॥ 

श्री भगवान ने कहा - हे अर्जुन! इस संसार को अविनाशी वृक्ष कहा गया है, जिसकी जड़ें ऊपर की ओर हैं और शाखाएँ नीचे की ओर तथा इस वृक्ष के पत्ते वैदिक स्तोत्र है, जो इस अविनाशी वृक्ष को जानता है वही वेदों का जानकार है। 

अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।

अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ 

इस संसार रूपी वृक्ष की समस्त योनियाँ रूपी शाखाएँ नीचे और ऊपर सभी ओर फ़ैली हुई हैं, इस वृक्ष की शाखाएँ प्रकृति के तीनों गुणों द्वारा विकसित होती है, इस वृक्ष की इन्द्रिय-विषय रूपी कोंपलें है, इस वृक्ष की जड़ों का विस्तार नीचे की ओर भी होता है जो कि सकाम-कर्म रूप से मनुष्यों के लिये फल रूपी बन्धन उत्पन्न करती हैं। 

न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।

अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल मसङ्‍गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥ 

 इस संसार रूपी वृक्ष के वास्तविक स्वरूप का अनुभव इस जगत में नहीं किया जा सकता है क्योंकि न तो इसका आदि है और न ही इसका अन्त है और न ही इसका कोई आधार ही है, अत्यन्त दृड़ता से स्थित इस वृक्ष को केवल वैराग्य रूपी हथियार के द्वारा ही काटा जा सकता है।

ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।

तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥ 

 वैराग्य रूपी हथियार से काटने के बाद मनुष्य को उस परम-लक्ष्य के मार्ग की खोज करनी चाहिये, जिस मार्ग पर पहुँचा हुआ मनुष्य इस संसार में फिर कभी वापस नही लौटता है, फिर मनुष्य को उस परमात्मा के शरणागत हो जाना चाहिये । 


समाज में पनपतीं गाली गलौज प्रवृत्ति का तरुणों पर नकारात्मक प्रभाव और निवारण

डॉ. बालाराम परमार ‘हँसमुख’

आजकल समाज में सभी उम्र के नर नारी में बात बात पर गाली गलौज करने की आदत बढ़ती ही जा रही है। सामान्य और सहज लगने वाली गाली गलौज लोगों की जीवन शैली का हिस्सा बन कर एक गंभीर सामाजिक समस्या बन गई है। जिसके फलस्वरूप तरुणों तरुणों की प्राथमिक और द्वितीयक समाजीकरण की प्रक्रिया दूषित हो कर उनके कोमल मन-मस्तिष्क पर नकारात्मक प्रभाव देखने को मिल रहा है। आजकल अबोध बालक भी घर आंगन गाली गलौज करने में आत्मग्लानि महसूस नहीं करते! यह सभ्य समाज के लिए चिंता करने का विषय है। गाली गलौज से द्वेष और इर्शा की प्रवृत्ति पनपतीं है,जो न केवल व्यक्तिगत संबंधों को प्रभावित करती है, बल्कि सामाजिक संबंधों में भी खटास पैदा करती है और  तरुणों के मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य और आत्मसम्मान को भी नुकसान पहुंचाती  है। फिल्म जगत और साहित्य रचना में बढ़ती गाली गलौज की प्रवृत्ति के कारण तरूण अपने दैनिक वातावरण में असहज महसूस करने लगते हैं और उनके आत्मविश्वास में कमी आती है।

सुसंस्कृत होने का दावा करने वाले सफेदपोश लोगों पर प्रो. सुनील जागलान द्वारा “आपके राज्य में कितने प्रतिशत गाली देते हैं”, विषय पर किये गये सर्वे का अध्ययन चौंकाने वाला खुलासा करता है। अध्ययन में पाया गया है कि भारत के सभी प्रान्तों के संभ्रांत और अप्रतिष्ठित दोनों वर्ग के लोग में अपशब्दों के प्रयोग किए जाने की प्रवृत्ति पाई जाती है।

उत्तरी राज्य दिल्ली में 80%, पंजाब में 78%, उत्तर प्रदेश और बिहार में 74%, राजस्थान में 68%, महाराष्ट्र में 58% एवं गुजरात में 55% परिवारों में गाली गलौज करने का प्रचलन है। जबकि दक्षिणी और पूर्वोत्तर राज्यों में क्रमशः प्रतिशत कम है। सिक्किम, जम्मू कश्मीर और लद्दाख में 15%  लोग गाली गलौज करते हैं।

इन शोध परख आंकड़ों ने राष्ट्र निर्माताओं और भारत को विश्व गुरु बनाने की राह खोजने व प्रशस्त करने वाले चिंतकों का  ध्यान आकर्षित होना और कान खड़े होना स्वाभाविक है! क्योंकि भारत की शिक्षा व्यवस्था में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 तथा राष्ट्रीय पाठ्यचर्या 2023 में ज्ञान आधारित तथा जीवन मूल्य आधारित गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के माध्यम से देश की अगली पीढ़ी को गढ़ने की एक नई दृष्टि दी है।

फिल्मी दुनिया के चमकते सितारों, चुनाव जीत कर सरकार चलाने वाले राजनीतिक दलों के नेताओं, सफ़ेदपोश उलेमाओं, समाजवाद का चोला पहनकर मसीहा बनने वाले और अट्टालिकाओं में रहने वालों की दुनिया की शान शौकत को आमजन आदर्श मानते हैं। लेकिन अगर इन सफेदपोश लोगों के चाल चरित्र को थोड़ा खुर्रेचे तो एक आदमखोर चिंताजनक प्रवृत्ति सामने आती है, और वह यह है कि इन धवल कपड़ों की आड़ में गाली गलौज की शर्मनाक संस्कृति फल फूल रहीं हैं? आजकल फिल्मों, सोशल मिडिया पर लिखी जाने वाली सामग्री में गाली गलौज आम बात होती जा रही है।

फलस्वरूप, गाली गलौज के स्वीकारोक्ति वातावरण में पढ़े-लिखे तरुण यह मानने लगे हैं कि उन्होंने बचपन में माता-पिता, आस पड़ोस और यहां तक कि उनके अध्यापक के मुखाग्र से गलियां सुनी है और कभी-कभी खुद भी इसके शिकार हुए हैं। इसलिए इसे काम का तनाव या जोश का प्रतीक मानकर गाली बकने के आदी होते जा रहे हैं।

तरुण वर्ग गाली गलौज करने में सहज क्यों होता जा रहा है? इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार करने पर पाया गया है कि तरुण अबोध अवस्था से ही हरामी, साला, हरामखोर , कुत्ता, कमीना, नीच, सुअर, चाण्डाल, और अंग्रेजी शब्द शीट, एस्सहोल और बुलशिट आदि के साथ ही साथ इससे भी गई गुजरी आवाज़ घर-आंगन, आस-पड़ोस व बड़े बुजुर्गो से सुनते आए हैं। फिर हर्ज क्या है!!

घर-आंगन, आस-पड़ोस और समाज में ऐसी अशोभनीय प्रवृत्ति क्यों पाई जाती है, के संदर्भ में खोजबीन करने से ज्ञात होता है कि परिवार और समाज के लोग किसी के दम्भ को तोड़ने के लिए गली का प्रयोग करते हैं। अधिकांश लोग अपना काम समय पर पूरा नहीं होने के तनाव और दबाव अथवा समय की कमी के कारण आपा खो देते हैं और गलियों का सहारा लेते हैं। भारतीय समाज में गाली गलौज की बढ़ती प्रवृत्ति को देखकर हास्य-व्यंग्य कलाकार एवं कविग्राम पत्रिका के संपादक चिराग जैन इसे गली-गलौज का स्वर्ण युग मानते हैं।

दो या दो से अधिक लोगों के बीच अपशब्द या घृणित शब्द का धड़ल्ले से प्रयोग करने की प्रवृत्ति का सोशल मीडिया पर विकृत असर दिखने लगा है। अभद्रता का मामला सार्वजनिक स्थानों पर होता देख कर आपत्तिजनक टिप्पणियों पर देश के सर्वोच्च न्यायालय ने भी चिंता जताई है।

शोध और बोध में मजेदार तथ्य यह उजागर होता है कि अलग-अलग संस्कृतियों में अच्छी और बुरी गलियों का मापदंड भी अलग-अलग होता है। किसी किसी समाज में सगे संबंधियों को विशेष कर ‘मां- बहन’ से जुड़ी गालियां दी जाती है और कोई प्रतिकार नहीं होता! कुछ संभ्रांत समाज और समुदाय में 


जानवरों और कीड़े मकोड़े से तुलना संबंधी गाली दी जाती है। पुर्तगाली और स्पेनिश में ‘वाका और जोर्रा’ शब्दों का प्रयोग करके गाली दी जाती है।

जिसका मतलब लोमड़ी और गाय होता है। जब किसी महिला को यह गलियां दी जाती है तो इसका मतलब खराब चरित्र की महिला, और जब यही गलियां पुरुषों को दी जाती है तो इसका अर्थ चालक और ताकतवर सांड हो जाता है।”

ज्ञान पिपासा शांत करने के उद्देश्य से भारतीय प्राचीन ग्रंथों के अवलोकन के सिलसिले में  श्री भर्तृहरि के  वैराग्यशतक के “संकीर्णश्लोक २५” में गाली गलौज नहीं करने संबंधी एक श्लोक मिला। यथा –

‘‘ददतु ददतु गालीं गालिमन्तो भवन्तः,वयमपि तदभावाद् गालिदानेऽसमर्थाः।

जगति विदितमेतद् दीयते विद्यमानम्,न हि शशकविषाणं कोऽपि कस्मै ददाति॥’’

जिसमें गाली का प्रतिवाद अर्थात गाली को बुराई मानते हैं और समाज को नैतिक शिक्षा देते हैं कि –

“दीजिए, दीजिए गालियाँ आप तो गाली वाले हैं, उसके (अर्थात गाली के) अभाव से हम तो गाली देने में असमर्थ हैं। संसार में ये बात प्रसिद्ध है कि विद्यमान वस्तु (जो कुछ है) को ही दिया जाता है, कोई भी किसी के लिए खरगोश के सींग नहीं देता है।”

इस प्रसंग से सिद्ध होता है कि एक-दो अपवाद जैसे कि चेदि राज्य के राजा और श्रीकृष्ण के मौसेरे भाई ने राजसूय यज्ञ के दौरान श्रीकृष्ण का अपमान करते हुए भले-बुरे वचन को छोड़कर सनातन धर्म में गाली गलौज की परंपरा आदि अनादि काल से नहीं रही है।

अलबत्ता रोमन सभ्यता में 8वीं शताब्दी ईसा पूर्व में पश्चिमी रोमन कवियों द्वारा सार्वजनिक तौर पर राजनीतिक हस्तियों के लिए गलियों का प्रयोग किये जाने का प्रमाण मिलता है। जैसे कि – ‘क्या तुम मुर्गियां हो’? ‘आप अपनी परछाई से डरते हो’? ‘आप बहरे गूंगे हो’? आदि।

पाश्चात्य साहित्य का अध्ययन करने पर पता चलता है कि विलियम शेक्सपियर 16वीं और 17वीं शताब्दी के लेखक थे, जिन्होंने ‘हैमलेट’, ‘रोमियो और जूलियट’, और मैकबेथ आदि रचनाओं में गाली गलौज को भरपूर स्थान दिया गया है।

बानगी देखें – ‘वह विकृत, टेढ़ा, बुढ़ा और शुष्क है’, ‘उसका चेहरा खराब है, शरीर खराब है, हर जगह बेडौल है’, ‘दुष्ट, असभ्य मूर्ख, रूखा, निर्दयी, कलंकित करने वाला मन से बुरा है।”

फ्रांस के कवियों की रचनाओं से एक की बानगी देखें- ‘‘तुम हमें डरा नहीं सकते, अंग्रेज सूअर-कुत्तों। मूर्खों की औलाद।”

क्या कहता है मनोविज्ञान?

तरुणों पर गाली-गलौज के दुष्प्रभाव को और गहराई से समझने के लिए मनोवैज्ञानिक नजरिया से परखने पर ज्ञात होता है कि गाली गलौज का युवाओं पर नकारात्मक प्रभाव बहुत गंभीर हो सकता है।

गाली गलौज से युवाओं में आत्मसम्मान और आत्मविश्वास कम हो सकता है, जिससे वे अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में असमर्थ हो सकते हैं।



गाली गलौज के आदि होने पर युवाओं में आक्रामकता और हिंसा की प्रवृत्ति बढ़ सकती है, जो उनके व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन को बर्बाद कर सकता है।

गाली गलौज से युवाओं के सामाजिक संबंधों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, जिससे वे अपने दोस्तों, परिवार और समाज से दूर हो सकते हैं।

गाली गलौज के आदि होने के कारण युवाओं में तनाव, चिंता और अवसाद जैसी मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं, जो उनके भविष्य को अंधेरे में धकेल सकतीं हैं।

समाज में गाली गलौज को बढ़ावा देने वाले कुछ समूह जैसे कि पुलिस, ड्राइवर, चोर-उचक्के  और धनाढ्य घमंडी।  इस समूह के लोग बिना गाली दिए ठीक से कोई बात ही नहीं कर पाते? उन्हें एहसास नहीं होता कि कब उनके मुंह से गाली निकल गई।

सरकार, समाज और परिवार की भूमिका क्या हो?

संविधान के अनुसार हमारे देश में कानून का राज है। प्रत्येक नागरिक के लिए कानून का पालन अनिवार्य होता है। इस संदर्भ में गाली गलौज के खिलाफ संसद और विधानसभाओं में ‘सी आर पी सी’की धारा 154 के तहत ‘एफ आर आई’ दर्ज करने तथा भारतीय दंड संहिता की धारा 294 कानून और नीतियों का सार्वजनिक रूप से प्रचार प्रसार किये जाने के प्रावधान पर युवाओं के चाल चरित्र निर्माण पर केंद्रित फिर से गंभीरतापूर्वक विचार किया चाहिए और उनका पालन नहीं करने वालों पर कठोर दंड का प्रावधान होना चाहिए। कार्यालय एवं सार्वजनिक स्थानों पर गाली देने को पूर्णतः गैर कानूनी घोषित कर देना चाहिए। यह सभ्य समाज की मांग है।

ज्ञातव्य है कि बालक के अंदर गुणों के विकास में समाजीकरण प्रक्रिया अहम भूमिका निभाती है। अतः समाज के लिए यह अनिवार्य हो जाता है कि वह सामुदायिक रूप से सकारात्मक और सम्मानजनक व्यवहार को बढ़ावा दे।  सार्वजनिक स्थान पर एकत्रिकरण के समय उच्च कोटि के आचरण का प्रदर्शन करें और अच्छे आचरण, उज्जवल चाल चरित्र वाले सज्जन को सार्वजनिक रूप से सम्मानित किये जाने की प्रथा शुरू की जानी चाहिए।

परिवार बालक की प्रथम पाठशाला है। अतः घर के मुखिया को परिवार में गाली गलौज से बचने के लिए एक सकारात्मक और सम्मानजनक वातावरण निर्माण करने की जवाबदेही लेनी चाहिए। बच्चों को गाली गलौज के नकारात्मक प्रभाव के बारे में शिक्षित करते रहना चाहिए और उनके साथ संवाद करने और उनकी भावनाओं को समझने के लिए समय निकालना चाहिए।

इस तरह परिवार, सरकार, समाज और समुदायिक धार्मिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के मिले-जुले प्रयास से प्रत्येक स्तर पर प्रेम, सौहार्द , भाई-चारा, सहिष्णुता और सहजता का व्यवहार करके आदर्श वातावरण तैयार कर हम हमारे तरुणों को गाली गलौज के इस नासूर बनी सामाजिक बुराइयों से बचा सकते हैं।








 सुमन संगम आश्रय (रजि)

इतिहास बदला नहीं जा सकता ,पर बनाया जा सकता है

आओ नवयुग की प्रतिमा मे करें प्रतिष्ठा प्राण की 

sumansangamaashray.com   मो  9560518227    sumansangamaashray2025@gmail.com

हम गरीब और वंचित पृष्ठभूमि के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के लिए समर्पित है। हमारा मानना है कि शिक्षा ही गरीबी के दुष्चक्र को तोड़ने और उज्ज्वल भविष्य बनाने की कुंजी है।

हमारे क्षेत्र में कई बच्चे ऐसे हैं जो अत्याधिक गरीबी के कारण स्कूल जाने में असमर्थ हैं। उनके परिवार दैनिक ज़रूरतें पूरी करने के लिए भी संघर्ष करते हैं, जिससे शिक्षा उनके लिए एक विलासिता बन जाती है।

हमारा लक्ष्य इन बच्चों को आवश्यक शैक्षिक सामग्री (किताबें, कापियाँ, यूनिफार्म), शिक्षण शुल्क, और अन्य सहायता प्रदान करना है ताकि वे बिना किसी रुकावट के अपनी पढ़ाई जारी रख सकें। इस धर्मार्थ कार्य को जारी रखने के लिए, हमें आपके जैसे परोपकारी व्यक्तियों और संगठनों के समर्थन की आवश्यकता है। आपके द्वारा किया गया एक छोटा सा दान भी एक बच्चे के जीवन में बड़ा बदलाव ला सकता है। हम आपसे अनुरोध करते हैं कि कृपया इन बच्चों के भविष्य को संवारने के लिए उदारतापूर्वक दान दें। आपका योगदान सीधे तौर पर बच्चों की शिक्षा के लिए उपयोग किया जाएगा।

आप अपना दान निम्नलिखित माध्यमों से दे सकते हैं - 

बैंक हस्तांतरण (Bank Transfer) -

खाताधारक का नाम - Suman Sangam Aashray 

खाता संख्या - 44629950112                 IFSC कोड -     SBIN0061208 

बैंक का नाम और शाखा - State Bank Of India Sector 77,Noida

चेक/ड्राफ्ट द्वारा - आप Suman Sangam Aashray  के पक्ष में एक चेक या ड्राफ्ट भेज सकते हैं।

आपके बहुमूल्य समर्थन और सहयोग के लिए हम अग्रिम रूप से आभारी हैं। हम आपको हमारे काम की प्रगति और बच्चों के विकास के बारे में नियमित अपडेट प्रदान करने में खुशी होगी। अपना नाम व पता निम्नलिखित मोबाइल नंबर पर व्हाट्सएप करें । 9560518227


ऐसे थे अपने लाल बहादुर शास्त्री 

1965 की जंग में अमेरिका के राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने लाल बहादुर शास्त्री को चेतावनी दी की अगर पाकिस्तान के खिलाफ लड़ाई नहीं रुकी तो वह भारत को भेजे जाने वाला PL-480 गेहूं रोक देंगे 

उस कोई समय भारत गेहूं के उत्पादन में आत्मनिर्भर नहीं था और इसके विदेशी आयात पर निर्भर था। शास्त्री जी को यह बात बहुत चुभी क्योंकि वो स्वाभिमानी व्यक्ति थे।

उन्होंने देशवासियों से कहा कि हम हफ्ते में एक वक्त भोजन नहीं करेंगे उसकी वजह से अमेरिका से आने वाले गेहूं की आपूर्ति न होने पर भी कोई बाधा उत्पन्न नहीं होगी लेकिन इस अपील से पहले उन्होंने अपनी पत्नी ललिता शास्त्री से कहा कि क्या आप ऐसा कर सकती हैं कि आज शाम हमारे यहां खाना ना बने।

 मैं कल देशवासियों से एक वक्त का खाना ना खाने की अपील करने जा रहा हूं। शास्त्री ने कहा कि मैं देखना चाहता हूं कि मेरे बच्चे भूखे रह सकते हैं या नहीं। जब उन्होंने देख लिया कि उनके बच्चे एक वक्त बिना खाने के रह सकते हैं तो उन्होंने देशवासियों से भी ऐसा करने के लिए कहा।

शास्त्री ने कहा अमेरिका के दबाव से बचने के लिए भारत को खेती में आत्मनिर्भर बनना होगा इसलिए उन्होंने "जय जवान जय किसान" का नारा दिया और हरित क्रांति को बढ़ावा दिया।



उन्होंने अपने भाषण में कहा," पेट पर रस्सी बांधो, साग सब्जी ज्यादा खाओ, सप्ताह में 1 दिन एक 

वक्त उपवास करो, देश को अपना मान दो।"

शास्त्री जी के आह्वान पर देशवासियों का गहरा असर हुआ शहर और गांव के सभी महिलाएं, बच्चे, पुरूष, बुजुर्ग सप्ताह में एक दिन भूखे रहते और देश के लिए अपना योगदान देते किसी ने कोई शिकायत नहीं की।

 लाल बहादुर शास्त्री एक ऐसे नेता थे जिनकी आवाज पर देश एकजुट हुआ और उन्होंने जो कहा पहले खुद पर अमल किया। यही उनका सच्चा स्वाभिमान और जन सेवा का उदाहरण है 

ऐसे भारत मां के लाल को शत-शत नमन।

प्रेरक प्रसंग 

संघ की पत्रिका "राष्ट्रधर्म" के प्रथम प्रकाशक राधेश्याम प्रसाद जी एक प्रसंग में लिखते हैं:-

'एक दिन नाना जी देशमुख मेरी दुकान पर आए और बोले, 'प्रेस आकर हिसाब-किताब तो देख लो।' 

उन दिनों राष्ट्रधर्म का प्रकाशन सदर बाजार से होता था। दुकान बंद करके एक रात मैं प्रेस गया। वहां देखा कि हॉल में दोनों ओर तार लगाकर कपड़े के परदों से केबिन बना दिए गए हैं। अंदर एक मेज और बरामदे में एक तख्त। 

गर्मियों के दिन थे। 

रात में काम खत्म हुआ तो दीनदयाल जी ने मुझे दरी, चादर और तकिया दे दिया। मुझे उन लोगों से पूछने का भी ध्यान नहीं रहा और तख्त पर सो गया। प्रात: काल नींद खुली तो वहां के दृश्य देख अचंभित रह गया। आंखों में आंसू भी आ गए। 

दृश्य यह था कि मेरे ही बराबर नीचे जमीन पर दीनदयाल जी और अटल जी चटाई पर सो रहे थे। तकिया के स्थान पर दोनों लोगों ने अपने सिर के नीचे एक-एक ईंट लगा रखी थी। मैं हड़बड़ा कर उठा और दोनों लोगों को जगाया। फिर कहा, 'आप लोगों ने तो बड़ा अनर्थ कर दिया। ऊपर सोइए।' 

पं. दीनदयाल उपाध्याय बोले, 'आदत न खराब करिये।' 

अटल जी ने हंसते हुए कहा, 'जमीन छोड़ दी तो पैर कहां ठहरेंगे।' 

शत-शत नमन ऐसी महान पुण्यात्माओ को। वन्देमातरम् ।






वापसी 

डॉ प्रभा कुमारी 

कुछ साल पहले की बात है।मेरी इमरजेंसी ड्यूटी थी। रात के 9:00 बजे थे । 24 घंटे जागे रहने वाला हॉस्पिटल दौड़ लगाते लगाते थककर चूर हो अपनी  उनींदी आंखों से दर्द और कष्ट को बिस्तर पर करवटें बदलते, कुछ को राहत पाकर बिस्तर पर घुलटते देख रहा था। हर अहसास की गंध होती है विश्वास ना हो तो हॉस्पिटल जाकर देखें , वहां आपको हर जगह मिल जाएगा कहीं दर्द की गंध,राहत 

की गंध, परेशानी की गंध, विश्वास और भरोसा के गंध।इन अहसास के गाढ़े गंधो के साथ घुले मिले मिलेंगे डिटाल ,बिटाडिन, भिन्न-भिन्न दवाओं,खून और पस के गंध। इमर्जेंसी रूम में थोड़ी भीड़ थी।एक एक कर आते बीमारी से परेशान लोगों को देखती जा रही थी।तभी एक सीआईएसफ का जवान सर दर्द से परेशान अपनी बीवी को लेकर आया । मैं उसे वोवेरन का इंजेक्शन देकर दूसरे मरीज की तरफ मुड़ गई । 

    कुछ देर बाद अचानक वह जवान आया और बोला,' मैम चलिए उसकी हालत ठीक नहीं लग रही।

   बीपी - पल्स चेक की ।बीपी लो था ।डेकसोना इंजेक्शन लगाने और ड्रिप चलाने की सिस्टर को हिदायत दे दूसरे इंतजार करते मरीज से मुखातिब हुई।

    कुछ देर बाद फिर वह जवान आया ,' मैडम वह तो कुछ बोल नहीं रही है।' 

   जाकर उसे देखी। नब्ज़ नहीं चल रहा था, बीपी भी नहीं मिल रहा था । मेरी आंखों के आगे एक बार पूरा ब्रह्मांड घूम गया बेड पर बैठी स्टर्नम पर हाथ पैर हाथ रख सीपीआर देना शुरू की।

  चिल्लाई ,'सिस्टर एंड्रालिन दो डेकसोना दो ।' जवान मायुस सा हो खड़ा था । धीरे से बोला ,'मैम ये नोवालजिन की कई गोलियां एक साथ निगल गई है'।

  वे केरल से आए थे। जवान तो  हिंदी बोल समझ लेता था पर बीवी बिल्कुल भी नहीं ।सीपीआर चालू रखी कुछ देर बाद देखी पल्स धीमी गति पकड़ लिया है , बीपी भी रिकॉर्ड हुआ ।धीरे-धीरे उसके सारे 


वाइटल्स नॉर्मल हो गए। मैंने सांस में सांस लिया । सुबह अस्पताल से जाने से पहले उसके पास गई उसकी आंखें हंसी , कुछ बोली समझ नहीं आया ।फिर वह पति की तरफ मुंह कर के  कुछ बोली ।जवान  हाथ जोड़कर एक करूण दृष्टि से मुझे देखा और बिना कोई शब्द एक कृतज्ञता उसके आंखों से प्रवाहित हो मेरे दिल में बरस गई ।

    इसके कुछ दिनो बाद ही सीआईएसएफ से मुझे सीपीआर पर कुछ बोलने के लिए निमंत्रित किया गया तब उसे पर मैंने यह एस कविता बनाई थी और उसे वहां जाकर सब के समक्ष सुनाई।

      इजहारे मोहब्बत का यह आलम हुआ

 रफ्ता रफ्ता दिल , नजर कातिल से घायल हुआ

 ना पूछो कितना सितम सहा है दिल ने 

बस ठहर न जाए धड़कन इतना सितम ढाया तुमने 

कभी दिल रुक जाए राहे मोहब्बत में थककर 

 नाजुक होठों से अपनी पिला देना फूंककर

दो बार सांसों की रवानगी तेरी इनायत होगी 

हृदय पर हथेली पर हथेली रख 15 आघात लगानी होगी

 आघात इतना हो कि 2 इंच सीना धस जाए 

हृदय की प्रेशर से रक्त पहुंच दिमाग तक जाए 

जी उठूंगा फिर से प्यार में इतना दम होगा अगर 

नहीं सांस लिया तो यह क्रिया दुहराना बार बार

एक मिनट में सौ बार यह क्रिया करनी होंगी 

उठ न पाऊं तो एड्रीनलीन की कृपा लेनी होगी 

ना हो फिर भी करॉटिड आर्टरी में रुधिर की आवारगी 

डिफिब्रीलेटर से १५० जुल का करंट दिल पर लगानी होगी

 उठ न पाऊं तो दो बार और बिजली का झटका देना

नजरों से नहीं उस दिन डिफिब्रीलेटर  से बिजली गिरा देना 

जी जाऊंगा फिर से तेरी मेहरबानी होगी 

दिल की धड़कन मेरी, तुम्हारी निशानी होगी 

भूल तो ऐसे भी कभी सकता नहीं मैं

इसके बाद तो मैं दिया ये दिल तेरी बाती होगी।

पुनर्जन्म

अपनी पत्नी के अंतिम संस्कार में, जब पति ने उसके पेट में हलचल देखी — तो सामने आई उसके पूरे परिवार की चौंकाने वाली सच्चाई

अपनी पत्नी की अंतिम विदाई में, आरव मल्होत्रा एकदम जड़ हो गया था।

आग की लपटें उठने को थीं, जो अब उसकी पत्नी के शरीर को निगलने वाली थीं।

लेकिन तभी… उसने देखा, उसकी पत्नी के पेट में कुछ हिला।

जो आगे हुआ — उसने उसकी पूरी दुनिया हिला दी और उसके परिवार का सबसे गहरा राज़ उजागर कर दिया।

आरव मल्होत्रा और अमृता शर्मा की शादी को दो साल हुए थे।दिल्ली का सफल आर्किटेक्ट आरव एक अमीर परिवार से था,जबकि लखनऊ की अमृता एक दयालु और निस्वार्थ नर्स थी।अमृता का प्यार सच्चा था, लेकिन आरव की माँ — सावित्री मल्होत्रा — उसे कभी स्वीकार नहीं कर पाईं।

शुरू से ही वह कहती थीं,

“यह लड़की इस घर की नहीं है… और इसका बच्चा भी नहीं।”

आरव ने कई बार अपनी पत्नी का बचाव किया,पर उसकी माँ की कटु बातें उसकी ज़िंदगी पर साए की तरह छा गईं।फिर भी, वह अमृता से बेहद प्यार करता था।

जब अमृता गर्भवती हुई, तो उसने कसम खाई — “अब चाहे जो हो, मैं उसे हर हाल में बचाऊँगा।”पर सावित्री की नफ़रत और गहरी होती चली गई। वह अक्सर “मदद” के बहाने घर आने लगीं,लेकिन उनकी आँखों में वही पुरानी घृणा झलकती रहती थी।

एक सुबह, वह एक कप हर्बल चाय लेकर आईं।“ये बच्चे के लिए अच्छी है,” उन्होंने मीठी मुस्कान के साथ कहा। “हमारे खानदान का पुराना नुस्खा है — माँ और बच्चे दोनों के लिए आशीर्वाद।”अमृता ने 



मना न करते हुए वह चाय पी ली।एक घंटे के भीतर — वह ज़मीन पर गिर पड़ी।आरव तुरंत उसे अपोलो हॉस्पिटल, दिल्ली ले गया।

डॉक्टरों ने घंटों कोशिश की, लेकिन अंत में उन्होंने कहा — “माँ और बच्चा दोनों ने प्रतिक्रिया देना बंद कर दिया है।” आरव की दुनिया बिखर गई।जब डॉक्टर ने अंतिम संस्कार की बात की, तो आरव बुदबुदाया,“वह हमेशा कहती थी… उसे आग से डर लगता है। वह दफ़न होना चाहती थी।”पर सावित्री ने ज़ोर देकर कहा,“अंत्येष्टि ही सम्मानजनक तरीका है।”टूटा हुआ आरव चुपचाप मान गया।सावित्री ने अमृता के मायके वालों को भी सूचना नहीं दी —“ऐसे ही ठीक है… आत्मा को शांति मिलेगी।”

अगले दिन, वाराणसी के हरिश्चंद्र घाट पर,आरव काँपते हुए खड़ा था।पंडित मंत्र पढ़ रहे थे, जब शव को चिता पर रखा गया।

और तभी — असंभव हुआ।रेशमी चादर ज़रा सी हिली।अमृता का पेट… कांपा — एक बार, फिर दोबारा। पहले तो आरव को लगा वह भ्रम देख रहा है,पर फिर उसने साफ़ देखा — अंदर से हल्की सी हरकत।“रुको!” वह चिल्लाया, “अभी आग मत लगाओ!”सब लोग सन्न रह गए।पंडित पीछे हट गए।

आरव भागकर आगे आया, कपड़ा हटाया — और देखा,अमृता की छाती बहुत हल्के से उठ-गिर रही थी।वह साँस ले रही थी! घबराहट फैल गई। तुरंत एम्बुलेंस बुलाई गई, और अमृता को अस्पताल ले जाया गया। घंटों बाद, एक युवा डॉक्टर बाहर आया, चेहरा पीला था। “मल्होत्रा जी,” उसने कहा, “आपकी पत्नी ज़िंदा है, लेकिन हालत नाज़ुक है। उसके खून में एक दुर्लभ ज़हर मिला है — जो शरीर की गति को धीमा कर देता है और मौत जैसा भ्रम पैदा करता है। अगर आपने चिता जलने दी होती… तो वो सच में मर जाती।”आरव के पैर जवाब दे गए।

“ज़हर? ये कैसे हो सकता है?”डॉक्टर ने पूछा,“क्या उन्होंने हाल ही में कोई हर्बल चाय या घरेलू दवा ली थी?”और तभी — आरव को याद आया… वो चाय।उस रात, वह अस्पताल के कमरे में बैठा उसकी ठंडी हथेली थामे फुसफुसाया,“मुझे तुम्हारी रक्षा करनी थी…”पुलिस आई, और आरव ने वह चाय का पैकेट सौंप दिया।टेस्ट रिपोर्ट ने पुष्टि की — उसमें ज़हर था।सावित्री से पूछताछ हुई।पहले वह चिल्लाईं,मैं क्यों ऐसा करूँगी? वो तो मेरे पोते को जनने वाली थी!”लेकिन लैब रिपोर्ट आने के बाद उनका चेहरा उतर गया।

“उस औरत ने मेरे बेटे की ज़िंदगी बर्बाद कर दी!”“वो उसे मुझसे दूर ले गई!”आरव का दिल टूट गया।

जिस औरत ने उसे जन्म दिया था, वही उसकी दुनिया की सबसे प्यारी इंसान को मारने पर उतारू थी।

अगले दिन अखबारों में सुर्खियाँ थीं —“दिल्ली की महिला का अंतिम संस्कार रुकवाया गया — सास ने ज़हर देकर मारा था!”

कुछ दिन बाद, अमृता को होश आया।आरव की आँखों से आँसू बह रहे थे।अमृता ने काँपती आवाज़ में पूछा,“आपकी माँ… ने हमें मारने की कोशिश की?”आरव ने सिर हिलाया।हाँ… लेकिन अब तुम और हमारा बच्चा सुरक्षित हो।”डॉक्टरों ने इसे चमत्कार कहा — बच्चे की धड़कन अब भी मजबूत थी।




दोनों बच गए। कुछ महीनों बाद, अमृता ने एक स्वस्थ बेटे को जन्म दिया।

उन्होंने उसका नाम रखा — अर्जुन (रक्षक)। सावित्री अब जेल में थीं। पर आरव के दिल में नफ़रत नहीं 

थी — बस दुःख। अर्जुन को गोद में लेकर, अमृता ने कहा,“नफ़रत भी ज़हर होती है, आरव। ठीक तुम्हारी माँ की चाय की तरह — जो धीरे-धीरे मारती है।”उसके शब्द आरव के मन में गूंजते रहे। मुकदमे के दिन, जब सावित्री को अदालत में लाया गया,वह थकी और टूटी हुई दिख रही थीं।

अमृता उनके पास गई।“मिसेज़ मल्होत्रा,” उसने धीरे से कहा,“आपने मुझसे सब कुछ छीनने की कोशिश की…लेकिन मैं आपको माफ़ करती हूँ।आपके लिए नहीं — अपने लिए, और अपने बेटे के लिए।” सावित्री की आँखों से आँसू बह निकले। “मैं… माफ़ी चाहती हूँ…” एक साल बाद, आरव और अमृता अलीबाग के शांत समुद्र तट पर रहने लगे।अर्जुन की हँसी समुंदर की हवा में घुल जाती थी।

एक शाम, सूरज डूबते हुए आरव ने कहा,“उस दिन जब मैंने तुम्हारे पेट में हलचल देखी थी…लगा जैसे भगवान ने मुझे दूसरी ज़िंदगी दी।” अमृता मुस्कुराई,“और तुमने उसे थाम लिया।”वह अपने बेटे को रेत में खेलते देखती रही।“हम सचमुच राख से फिर जन्मे हैं, आरव।”आरव ने उसका माथा चूमा।“इस बार, सिर्फ़ प्यार ही जलेगा।”समुद्र की हवा शांति से बह रही थी —उस आग से बहुत दूर, जिसने कभी सब कुछ निगलने की कोशिश की थी। क्योंकि जब प्यार सच्चा होता है… तो वह राख से भी फिर जन्म लेता है।

पर्यावरण संरक्षण 

एक अध्ययन के अनुसार, चेन्नई में एक व्यस्त बाज़ार में दिन में आठ घंटे साँस लेने वाला व्यक्ति प्रतिदिन लगभग 190 प्लास्टिक कण साँस के ज़रिए अंदर ले सकता है, जबकि कोलकाता में यह आँकड़ा 370 और दिल्ली में 300 है। मैक्रोप्लेस्टिक कण यूँ ही गायब नहीं हो जाते; ये हमारे पर्यावरण में जमा हो जाते हैं - और संभवतः हमारे शरीर में भी।

 प्लास्टिक से जुड़े रसायनों और बीमारियों के बीच चिंताजनक संबंधों का खुलासा हुआ है।एक शोध में पाया गया है कि सांस लेने योग्य उभरते प्रदूषकों (आरईसी) से भरे आईएमपीएस का साँस के ज़रिए शरीर में जाना शहरी वायुमंडलीय एक्सपोज़म की एक अज्ञात लेकिन महत्वपूर्ण परत का प्रतिनिधित्व करता है।  ऐसे 28 रसायनों की पहचान की है—जिनमें कार्सिनोजेन्स, अंतःस्रावी विघटनकारी, न्यूरोटॉक्सिकेंट्स और श्वसन संबंधी परेशान करने वाले तत्व शामिल हैं—जिनमें से कई रोज़मर्रा के उपभोक्ता उत्पादों जैसे वाहनों, सफाई एजेंटों और व्यक्तिगत देखभाल की वस्तुओं से उत्पन्न होते हैं।

 आईएमएससी टीम ने 72 रोगों से इनके संबंध पाए, जिनमें कैंसर सबसे अधिक रिपोर्ट किया गया, उसके बाद अंतःस्रावी, जठरांत्र, स्तन और श्वसन संबंधी विकार थे। इससे पता चलता है कि हवा में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक केवल निष्क्रिय वाहक नहीं हैं - वे सक्रिय रासायनिक मिश्रणों का परिवहन कर सकते हैं जो स्वास्थ्य पर कई तरह के प्रभाव डाल सकते हैं।


सिलकुटवा काका

आज से पच्चीस साल पहले की बात है । बच्चों को स्कूल भेजकर पतिदेव का नाश्ता तैयार कर रही थी तभी कानों में आवाज सुनाई दी ...

"कुटवा लो सिल कुटवा लो ।"

"अरे ओ सिलकुटवा काका रुको ना !"अंदर से मैं चिल्लाई ।आज ही कामवाली कह रही थी , "दीदी सिल कुटवा लेना ,बहुत मेहनत लगता है मसाला पीसने में ।" मेरी आवाज़ का ही  इंतजार  था शायद उसे ,पलक झपकते ही मेरे गेट पर था । मैंने इशारे से उसे अंदर बुलाया । घुटनों तक मटमैली घिसी हुई पुरानी धोती और उसपर जगह जगह से सिलाई की हुई कमीज । माथे पर अंगोछा और कांधे परएक झोला,जिसमें शायद उसके औजार होंगे सिल कूटने वाले । " कितना लोगे काका ,मैंने पूछा ! "

"दस रुपया लेबऊ ।" उसने कहा । ठीक है ,लाती हूँ सिललोढ़ा ।

उसे मैंने घर के ओसारे में बैठाया और अंदर आ गई ।अंदर से समान लाकर दिया । तभी उसने पानी माँगा , मैंने पतिदेव की तरफ इशारा किया और उन्हें वहाँ बैठने के लिए बोला । पानी के साथ बिस्किट भी प्लेट में रखा और उसे लाकर दिया ।अपनी माँ से मैंने सीखा था किसी को भी  छूछे पानी नहीं देना चाहिए ।फिर यूं ही चाय के लिए पूछा ।उसने तुरंत हामी भरी ।

चाय चढ़ाकर वापस आई तो देखा वो अपने काम में मगन था ।मैंने बात करने की गरज से पूछा , "कहाँ से आए हैं !"

" खूंटी", उसने तुरंत कहा । "पौ फटते ही निकल गया था बाबू  , पहला गाहंकी आप ही हो ।"

"कैसे आए हो ? मैंने फिर पूछा ।" "पैदल" !  "क्या !!" मेरे मुँह से तुरंत निकला । अपनी राँची से खूंटी पैंतीस किलोमीटर है । आप पैदल चले आए । "कुछ खाया है या भूखे हैं ?"  मैंने पूछा । "रात के बासी माड़ पिले हऊ । घर में एक छटांक चाउर ना हऊ । आज कमाई होतवू त राते सभन भर पेट खाना खईबो ।"

मेरा पूरा शरीर सिहर गया । वो बासी माड़ पीकर भी संतुष्ट था । मैं सोचने लगी ,भात पसाने में  हम जिसे फालतू समझ  फेंक देते हैं उससे किसी भूखे की पेट की जठाराग्नि बूझ जाती है । मैं तुरंत रसोई में गयी और एक प्लेट नाश्ते का लगाया । चाय के साथ नाश्ता भी लेकर आई ।

"लो काका इसको खालो फिर काम करना । " मैंने कहा । उसने संशय निगाहों से मुझे देखा और बोला ,पैसा देबहीं न ।" हाँ-हाँ उसकी चिंता ना करो । "दस रुपया में एको रुपया कम ना करबऊ । "

मैंने उसकी आँखों में संशय के बादल देखे थे । मैंने तुरंत उसके पैसे उसके हाथ में रख दिए और हाथ धुलवाकर नाश्ता कराया । रोटी सब्जी उसने बड़े चाव से खाया ।

"वर्षों के बाद आज नसीब से रोटी मिली ऐसा उसने कहा ।"

सब प्रभु की लीला है काका ।"हम कौन होते हैं खिलाने वाले" पीछे से पतिदेव ने कहा । "भरपेट खाना खिला देना काका को" , ऐसा बोलकर पतिदेव काम पर निकल *गये*। तभी काम वाली भी आ गई ।

" घर में  दू गो छवुआ है ,जे भूखले है ओकरे ला आज निकलल हऊ । सर्पदंश से बेटा बहू ना बचलऊ । अब हमीन बूढ़ा बूढ़ी हऊ और दुई गो पोता ।"

ये सब बोलते उसकी आँखें छलक उठीं । मैने उसकी मदद करनी चाही और पचास रुपये का नोट बढ़ाया साथ ही  कहा कि ," आप घर जाते समय बस में जाना । "

उसने पैसे लेने से इंकार कर दिया और बोला , "ना बेटा एकरा ना लेबऊ , इ ना पचतऊ , खाली आपन मेहनत के लेबऊ । "

मेरी मेड ने भी समझाया पर उसकी एक ही रट थी , "ना हम ना लेबऊ । " तब मैंने कुछ सोचा और अपने आसपास के पड़ोसियों को भी सिल कुटवाने के लिए राजी कर लिया ।आज चालीस रुपये की कमाई हुई थी उसकी । जाने से पहले वो मुझसे मिलने आया था और मेरे सर पर हाथ रखकर आशीष भी दिया । साथ ही बोला , "बेटी आज तोर प्रयास से ही हमार कमाई भइले ।महादेव तोर सभ दिन रक्षा करें ।तोरा कभी कौनो चीज के कमी ना रहे । "

मेरी आँखों मे आँसू  छलक गयें। उन्हे जाते मैं देखती रही और सोचने लगी इनका पूरा परिवार भूखा है फिर भी वो ईमानदार हैं ।


पेड़ पृथ्वी पर जीवन की रीढ़ हैं। उनकी रक्षा करने का मतलब है अपने अस्तित्व की रक्षा करना। एक नए अध्ययन में पाया गया है कि भारत के प्रमुख शहर अत्यधिक भूजल निष्कर्षण और मृदा संपीडन के कारण डूब रहे हैं। जमीन का धीरे-धीरे धंसना, तब होता है जब भूमिगत जल को प्राकृतिक रूप से पुनःपूर्ति की तुलना में अधिक तेजी से पंप किया जाता है, जिसके कारण मिट्टी और चट्टान की परतें संकुचित हो जाती हैं।



पगली कहीं की

"बहू, क्या बना रही हो आज?? ,, रसोई में खड़ी अपनी बहू सुहानी से आशा जी ने पूछा।

" कुछ समझ में नहीं आ रहा माँ जी,  रोज रोज यही सब्जियां खाते खाते तो हम सब उब गए हैं...। ,, असमंजस में पड़ी सुहानी बोली।

" चल तूं इधर आ  , आज सब्जी मैं बनाती हूँ... । आज मैं बेसन की सब्जी बनाऊंगी । जतिन को तो बहुत पसंद थी मेरे हाथों की बनी बेसन की सब्जी  ।,,

" बेसन की सब्जी!! हाँ हाँ मम्मी जी.. एक बार ये भी बोल रहे थे......लेकिन मेरे सामने तो आपने कभी बनाई नहीं  !! ,, सुहानी बोली।

" अरे वो तो शादी से पहले तेरी ननदें काम नहीं करने देती थीं। फिर तूने आकर रसोई संभाल ली तो मेरी भी आदत छूट गई  । चल आज बनाकर खिलाती हूँ  ।,,

आशा जी आज पहले की तरह ही स्फूर्ति से अपने बेटे की मनपसंद बेसन की सब्जी बनाने में लग गईं।   काफी साल हो गए थे रसोई में खाना बनाए तो हाथ थोड़ा कांप रहे थे लेकिन चेहरे पर अलग हीं उत्साह था।

  कुछ देर में बनने वाली सब्जी को बनाने में आज लगभग एक घंटा लग गया।   जतिन भी आफिस से घर आ चुका था और खाना लगाने की बोल कर हाथ मुंह धोने चला गया।

सुहानी ने फटाफट फुलके बनाकर बेसन की सब्जी के साथ थाली लगा दी । जतिन थाली देखते ही बोला अरे वाह!! बेसन की सब्जी!! पहला कौर तोड़कर मुंह में डाला हीं था कि उसका मुंह बिगड़ गया..... " ये क्या सब्जी बनाई है.. इतना नमक!! तुम्हें नहीं बनानी आती थी तो माँ से पूछ लेती  ... माँ बहुत अच्छी सब्जी बनाती है । ,,  जतिन बोला।

बगल में बैठी आशा जी भी बेटे की प्रतिक्रिया सुनने को बेताब थीं लेकिन जतिन की बात सुनकर उनका सारी बेताबी उदासी में बदल गई  ।

तभी सुहानी बोली, " जी वो मैंने पहली बार बनाई थी ना तो अंदाजा नहीं आया... लेकिन अगली बार माँ जी से अच्छी तरह पूछकर बनाऊंगी  या फिर माँ जी को बोल दूंगी कि वही बना दें । अभी मैं दिन की सब्जी गर्म करके ला देती हूँ  । ,,

  पास बैठी आशा जी के चेहरे पर बहु की बात सुनकर मुस्कान आ गई " कितनी पगली है ये बहू, साफ- साफ बोल देती माँ ने ही बनाई है ..... खराब बन गई तो अपना नाम लगा दिया ।,,

कुछ दिनों बाद सक्रांति का त्यौहार आने वाला था तो सुहानी के मायके से सभी के लिए उपहार और मिठाईयाँ आई थीं...

सुहानी के लिए हरे रंग की और आशा जी के लिए नीले रंग की साड़ी आई थी।

 सुहानी को याद आया कि एक दिन आशा जी बोल रही थीं कि मुझे नीला रंग पसंद नहीं.. मैं नीला रंग कभी नहीं पहनती  .. ये याद आते हीं सुहानी ने झट से अपनी हरी साड़ी से वो नीली साड़ी बदल ली.....  और वो हरी साड़ी अपनी सास आशा जी को दे दी  । आशा जी समझ गई थीं लेकिन सुहानी की भावना का मान रखने के उन्होंने कुछ नहीं कहा । हाँ त्यौहार पर सुहानी को देने के लिए चुपके से एक सुंदर सी साड़ी लाकर रख ली । हाँ मन ही मन बोल रही थीं " सच में पगली है ये बहू अपनी पसंद की साड़ी मुझे दे दी और खुद वो साड़ी ले ली....

सुहानी की तबियत आज कुछ ठीक नहीं थी इसलिए वो दवा लेकर आराम कर रही थी । आशा जी के पास उनकी बेटी स्मृति का फोन आया कि वो और उसके ससुराल वाले देवी माता के दर्शन के लिए उनके शहर आ रहे हैं तो कुछ देर के लिए घर पर भी आएंगे।  ...दोपहर का खाना वहीं खाएंगे  ... ये सुनकर आशा जी के हाथ पैर फूलने लगे...  बहु तो बीमार है और मुझसे तो इतने जनों का खाना बनना बहुत मुश्किल है ।  कुछ सोचकर उन्होंने फोन लगाया थोड़ी देर में एक आदमी थैला भरकर सामान ले कर आ गया । उसे देखकर सुहानी ने पूछा, " माँ जी, ये क्या है?? ,,

" अरे बहू वो स्मृति के ससुराल वाले खाने पर आ रहे हैं। ये कुछ खाना मैंने पास के ढाबे से मंगवा लिया है.. बाकी हम दोनों मिलकर गर्म गर्म पूरियां तल लेंगे... ।,,

" लेकिन माँ जी, मैं बना देती   ,, सुहानी सकुचाते हुए बोली

" हाँ तो, तूने ही तो बनाया है  , वैसे भी इतना खराब खाना तो तूं ही बना सकती है। और सुन ये ढाबे वाली बात राज है..,, आशा जी ने शरारत से कहा तो सुहानी मुस्कुरा उठी  ।

 सब ने खाने की तारीफ की और साथ में सुहानी की भी।

स्मृति की सास बोली, " वाह बहन जी, आपकी बहू तो बहुत अच्छा खाना बनाती है । बिलकुल होटल के जैसा है।,, आशा जी बोलीं, " हाँ बहन जी, तभी तो मैं भी खा खाकर फैलती जा रही हूँ ।,,

सभी हंसने लगे और दोनों सास बहू एक दूसरे को स्नेह से देख रही थीं.।  सच में दोस्तों, परिवार में एक दूसरे की गलतियां निकालने की जगह उनकी खूबियों को देखें तो रिश्ते कितने सहज हो जाते हैं... एक दूसरे के साथ और सहयोग से ही एक परिवार खुशहाल बन सकता है। 




अनुमय का जन्मदिन 

आकांक्षा प्रफुल्ल पाण्डेय (मुम्बई)          

   दिन जैसे लम्हों में बीते जा रहे हों. 21 वर्षों का हर मिनट, मन पर रौशन–रौशन ...कभी लगता है, कल शाम ही हॉस्पिटल की मद्धम रौशनी में तुझे पहली बार देखा था.. जैसे रुई का कोई गुनगुना फाहा सा... और तब से आज तक दिन कब गए, शाम कब हुई पता ही नहीं..हर बदलते लम्हे के साथ बढ़ते, मुझ से फुट–डेढ़ फुट लंबा कब हो चला..  दादी के ऐन सीरियल के टाइम पर कार्टून के लिए छुटर–मुटर मचलते, कब उन्हें दोस्त दादी बनाया..कब क्यूट झबलों को पहनता ,पापा की अलमारी से शर्ट्स लेने लगा...और घुटनों के बल चलता मेरा नन्हा, कब फुटबॉल टूर्नामेंट्स में जाने लगा..

                  कुछ दिनों पहले , तेरे पापा ने कहा –आकांक्षा, मुझे लगता है, अब बेटे के लिए एक बाइक लेनी चाहिए. बाइक? अभी से.. अभी तो छोटा है. कैसे संभालेगा? छोटा नहीं भई, इंजीनियरिंग थर्ड ईयर में है. अब नहीं तो कब?? हां पर अभी कुछ ही दिन तो हुए हैं, कार की ड्राइविंग सीट पर आपकी गोद में बैठा, स्टीयरिंग यूं पकड़ता, जैसे बड़ा सधा हुआ ड्राइवर हो.. दादी को कहता देखिए– आपको बुआ के घर सेफली पहुंचा दिया ना? चलो वेरी गुड बोलो... कभी आपके साथ बाइक पर जाते हुए मेरी गोद में बैठता था. वापस आ कर दोनों हाथों को हैंडल बना, पूरे घर में व्रूम...व्रूम..शोर मचाते भागा करता.  इस काल्पनिक बाइक पर नाना को भी उसकी कमर पकड़े पीछे–पीछे भागना होता.. वो भी सीटबेल्ट लगा कर.  अभी तो वो अतरंगे खेल–खिलौने ठीक से छूटे भी नहीं.. क्या समय सचमुच इतनी तेजी से भागता है. 

                             रोज़ नई फीलिंग्स तेरे साथ..आज दोपहर जब घर में केवल तू और मैं थे. तू अपनी पढ़ाई में व्यस्त, और मैं सोफे पर अपनी किताब में खोई हुई. पता नहीं कब आंख लगी. थोड़ी देर में महसूस हुआ, एक चादर बहुत ऐहतियाद से मुझे ओढ़ाई गई, कि कच्ची नींद डिस्टर्ब न हो. पर्दे चुपके से बंद किए गए, और पंखे की स्पीड हल्की बढ़ाई गई. बहुत कोमल स्पर्श के साथ मेरा माथा 

चूमा गया. मेरा मन किया कि तुरन्त उठ कर तुझे गले से लगा लूं. पर इतनी देर से की जाती रही परवाह, और मम्मा से प्यार जताने के, चुपके से अंदाज पर खलल पड़े, यह किसे मंज़ूर था भला. जागते हुए सोने का अभिनय में, इस पल को भरपूर पाना था मुझे... 

            वो हमेशा से ऐसा ही है. सामने हो तो – मम्मा आप आजकल ठीक से मेरी केयर नहीं करते, देखो मेरी अलमारी कितनी फैल गई है..आज रूम साफ किया था, पक्का .. लेकिन मेड आंटी आ के मेरा सामान इधर उधर रख दीं.. अच्छा तू साफ किया और वो बिखेर दी.. वाह रे.. चल अभी उठ और समेट सब.. अच्छा दस मिनट बाद..मम्मी, सुबह जल्दी उठा देना, क्लास है मेरी.. हे भगवान नमय सब बच्चे अपने आप उठते हैं , तैयार हो जाते हैं. घर के काम भी करते हैं.. एक तू है, घोड़े की तरह ऊंचा हो गया..पर जब देखो मम्मी मम्मी. नहीं मेरी कॉफी आप बनाओ, और टिफीन भी आज मेरी पसन्द का..निवी की पसन्द का कल बना था.. और सुनो, टिफिन में पनीर या भिंडी हो तो 12–15 पराठे रखा करो.. हैं ? पर तू तो 3 से ज्यादा नहीं खाता?  हां तो मेरे दोस्त भी खायेंगे ना.. क्यों उनकी मम्मियां टिफिन नहीं देंगी क्या.. देंगी मम्मा, पर क्या है न आप थोड़ा ठीक–ठाक बना लेते हो.. पर फिर भी आप बुआ जैसी पानीपुरी, मौसी वाली भिंडी, और नानी जैसा खाना बनाना सीख लो. और अच्छा बनाओगे. चल भाग यहां से.. हर बात में नानी, मौसी बुआ ही परफेक्ट हैं, तो जा वहीं रहना चमचा कहीं का. 

             आपको पता है, कॉलेज में स्टडीज और एक्टिविटीज के लिए मुझे प्राइज मिलेगा.. पेरेंट्स को बुलाया है.. आपको तो नहीं ले जाऊंगा.. पापा और निवि बेस्ट हैं.. हां तो ले जाना मैं घर में आराम से रहूंगी.. आराम से?? नहीं नहीं, फिर  तो आप भी चलो, क्या याद करोगे.. अरे दुष्ट मेरे आराम से इतना क्या कष्ट है ?? हां है तो सही ..तू कितना तंग करता  है रे नमय.. कितना करता हूं बताऊं?? बहुत... हे हे....आज आप  सब काम छोड़ो, मुझे आपके साथ बात करनी है.पर बेटा आज बहुत व्यस्त हूँ.. नहीं मेरे पास बैठो. और फिर दुनिया भर की बातें .. किताबों से लेकर दोस्तों तक.. कॉलेज कैंटीन की पाव भाजी से लेकर, फेवरेट रेस्टोरेंट्स तक, और दादी को चिट्ठी में क्या लिखूं से नानी की सरप्राइज़ बर्थडे प्लानिंग तक..  और ले, तेरी बातों में गया मेरा पूरा दिन..

               पर खूब समझती हूं मेरे बच्चे, ये सब तेरे नखरे, लाड़ और परवाह जताने के तरीके हैं..जो पूरे घर परिवार में भी रोज़ ही चला करते हैं..दाल चावल के कौर, नानी की कहानियों से ही निगले जाएंगे. मौसी से लम्बी चौड़ी राजदारियां कायम होंगी..मम्मा की शिकायत बड़ी मम्मी से की जा सकती है. करियर एडवाइस के लिए मामा को फोन लगाओ. फेवरेट सब्जी का नाम बुआ के कान में ही बताएगा. आज कहां  टॉफी लेने जाना है, ये केवल चाचा को पता है. जन्मदिन उपहार के तौर पर तेरी नई बाइक आई, और तेरे भाइयों के फोन भी.. अरे वाह चाची, हम सब भाइयों के लिए एक बाइक, अब मुम्बई में भी आ गई... बहनों की ठुनक – चाची इसको बोल दो, हमको जहां जाना हो पहुंचाने जाएगा हां.. और इस हां को सबसे ज्यादा ठीक से निवी ने समझा.. 200 मीटर दूर की कोचिंग हो या सहेली का घर, भाई है ना.. निवी का तुझ पर जितना अधिकार, उतना स्नेह भी.. भाई की बॉटल, बैग, 


प्रोजेक्ट राइटिंग सब करीने से समय पर.. लेकिन साथ ही– भाई मेरा सिर दबा.. भाई बाहर के 10– 15 काम की लिस्ट भेजी हूं, कर देना तो... हर सांस के साथ दस बार भाई... 

              तेरे लिए लिखूं, तो 21 सालों की 21 हजार कहानियां लिखती रहूं.. मन में खूब सुख और सुकून है मेरे लाड़ले.. कि तेरे आस पास बुने ये गठीले रिश्ते, खूब सुनहरे चमकते हैं...ये भाई बहनों का तुझ पर अधिकार, और मामा, बड़े पापा–चाचा का सम्मान हमेशा बनाए रखना.. तेरी मम्मा हूं तो हर क्षण तेरे लिए प्रार्थनाएं करती हूं.. पर शायद कम पड़ जाती हूं उन प्रार्थनाओं के सामने, जो तेरी दादी, नानी और बड़ी मम्मियों ने तेरे लिए की हैं.. तेरी मौसी और बुआओं ने मुझसे भी ज्यादा दुआएं दी हैं तुझे.. जन्मदिन पर तुझे क्या कहूं मेरे दिल के टुकड़े, बस यही, कि तुझ पर यह प्यार लुटाने वाले रिश्ते ऐसे ही भरपूर हों.. तू बड़ा हो तो अपने पापा जैसा ही बने... तुझ पर ईश्वर की कृपा बरसती रहे.. दीर्घायु हो.. सत्कर्मों और ,पुण्यों में वृद्धि हो.. हर आशीर्वाद फलित हो..और मेरी उम्र तुझे लग जाए.. हैप्पी बर्थडे नमय... खूब खुश रह बेटा… –तेरी मम्मा 


जीवन में विश्वास

विश्वास मानव जीवन की अनमोल संपदा है। सब कुछ खो जाने पर भी यदि हमने जीवन में अपने विश्वास को नहीं खोया है तो आज नहीं तो कल विश्वास के बल पर उन सब को दुबारा से प्राप्त कर ही लिया जायेगा। विश्वास स्वयं पर होना चाहिए, विश्वास अपने कर्मों पर होना चाहिए और विश्वास परमात्मा पर होना चाहिए। जहाँ विश्वास होता है, वहीं धैर्य भी जन्म ले पाता है और जहाँ धैर्य का जन्म होता है, वहाँ नैराश्य का विलय एवं पुरुषार्थ का उदय भी हो जाता है।

विश्वास के अभाव में ये प्रकृति किसी को कुछ भी नहीं दे सकती है। वृक्ष की प्राप्ति के लिए हमें बीज पर विश्वास होना ही चाहिए और फल की प्राप्ति के लिए हमें वृक्ष पर भी विश्वास होना चाहिए। विश्वास में अद्भुत सामर्थ्य है। विश्वास के बल से ही पाण्डवों ने बाहुबल और संख्याबल में बहुत कम होने के बावजूद भी महाभारत जैसे युद्ध को जीतकर अपने खोये हुए स्वाभिमान को पुनः प्राप्त किया।


अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् । परोपकारःपुण्याय पापाय परपीडनम् ।।

अर्थ- महर्षि वदेव्यास जी ने अठारह पुराणों में दो विशिष्ट बातें कहीं हैं। पहली- परोपकार करना पुण्य होता है और दूसरी- पाप का अर्थ होता है दूसरों को दुख देना।

होये।

त्रेतायां मंत्र-शक्तिश्च ज्ञानशक्तिः कृते युगे। द्वापरे युद्ध-शक्तिश्च, संघशक्तिः कलौ युगे ॥

अर्थ - सत्ययुग में ज्ञान शक्ति, त्रेता में मंत्र शक्ति तथा द्वापर में युद्ध शक्ति प्रबल थी, किन्तु कलियुग में संगठन की शक्ति ही प्रधान है।

पर्यावरण बना सहारा 

युगल जोशी

दमयन्ती जी 67 की हो चुकी हैं, थोड़ा सुस्त रहने लगी हैं, कुछ समझ ही नहीं आता कि क्या ही करें, चारों ओर सन्नाटा ही लगता है। ऐसा नहीं कि उनका कोई नहीं दो बेटे हैं, दो बहुएं हैं, एक बेटी है जो करीब 60 किलोमीटर की दूरी पर अपने परिवार के साथ खुशी खुशी रहती है। इसके अलावा छः नाती-पोते हैं सभी उन्हें बहुत प्यार करते हैं, बस वही हैं कि अब खुश नहीं रह पातीं। करें भी क्या? तीन वर्ष पूर्व हुई पति की मृत्यु ने उन्हें काफी अकेला कर दिया है, दोनों पति पत्नी में बहुत प्यार था, ऐसा नहीं कि कभी मन मुटाव या झगड़ा नहीं हुआ हो, मगर इस सब के चलते अच्छी समझ-बूझ थी दोनों पति पत्नी में। मगर अब दमयन्ती जी को ये अकेलापन हमेशा घायल सा किये रहता, जब तब बस पति की याद आने लगती है उनकी छवि ही नहीं हटती आंखों से और चलचित्र की तरह सब कुछ घूमने लगता है। हालांकि वह समझती हैं कि बहु-बेटों की भी अपनी जिन्दगी है, जिम्मेदारियां और दुनियादारी भी है। किस किस से क्या क्या कहें. अपने एकाकीपन को कैसे काटें यही सोच उन्हें कचोटती रहती है। इस सबसे वे इतना दुखी हो गयीं कि उदास उदास सी रहने लगीं, घुटन महसूस होने के साथ ही अब तो चिड़चिड़ेपन ने भी उनके अन्दर घर बना लिया। न कुछ खास खाने पीने को मन करता है और न ही कुछ अच्छा पहनने को। जबकि पति के जीवित रहते लोग उन्हें ईर्ष्या की दृष्टि से देखते थे, उनके पहनावे की नकल की जाती और हमेशा सराहा जाता मगर अब मानो सबकुछ खत्म ही हो गया। मगर आज न जाने क्यों ये सब छलावा सा ही लगता है। इधर पिछले कुछ समय से दमयन्ती जी अपनी बीती यादों को लेकर बहुत उदास और खिन्न सी भी हो गयी हैं।

आज जब वे घर के आंगन में बैठी थीं तो अचानक उनका ध्यान उस चिड़ी चिड़े के घोंसले की ओर गया 


जहां आज सिर्फ एक चिड़िया ही रह रही थी। इन चिड़ियों का जोड़ा पिछले कई वर्षों से उनके आंगन में घोंसला बना कर रह रहा था, हालांकि ये घोंसला हटाने की बात कई बार घर में हुई मगर दमयन्ती जी ने ही जोर देकर उसे नहीं हटाने को कहा, जबकि वे कई बार आंगन को गन्दा भी कर देते थे, घास-तिनके व दूसरे कूड़े से, इस सब के चलते भी दमयन्ती जी को वे अच्छे लगते और कभी कभी वे घंटों तक उनके कियाकलाप व अठखेलियां देखती रहतीं। इस बीच उनके बच्चे भी हुए और फुर्र भी हो गये, मगर ये चिड़ि-चिड़े का जोड़ा वहीं बना रहा। आज जब उन्होंने देखा कि यहां तो सिर्फ एक चिड़िया ही है तो वे कुछ दिनों तक ध्यान देती रहीं और कन्फर्म हो गया कि शायद चिड्डा भगवान को प्यारा हो गया होगा।

कभी कभी तो चिड़िया बहुत उदास दिखती, मगर फिर अपनी दिनचर्या में लग जाती। अपना घोंसला संवारती, दाना पानी खाती और अपना जीवन जीती। दमयन्ती जी ने बहुत दिनों तक उसको देखा और उसके क्रिया कलापों का अध्ययन किया और समझने लगीं कि सही ही तो है, जब हमें जन्म से ही यह पाठ पढ़ाया जाता है कि एक दिन हम सभी को जाना है और ये रिश्ते-नाते, मान सम्मान, पैसा-दौलत तो यहीं रह जाना है तो फिर क्यों नहीं हम इन विराधी भावनाओं से आजाद होने का प्रयास करें, और उन यादों में पागल से न हो जाएं जिन्हें हम किसी भी हालात में ठीक कर ही नहीं सकते। आखिर ये सब क्या है? भगवान श्रीकृष्ण ने यही तो समझाया है कि यह आत्मा अमर है, जो आया है वह जायेगा ही, तो क्यों न हम उन बिछुड़ गये व्यक्तियों की स्मृतियों में उनके जीवन से प्रेरणा लेकर अपने को और सर्वोत्तम बनाएं न कि दुखी रहें। अपने प्रिय को जीवंत और अपनी स्मृतियों में पिरोए रखकर याद करने का यही एकमात्र उपाय है। वे सोचने लगीं इस चिड़िया को ही देखो यदि ये अपने घोंसले में पड़ी रहती तो इसका क्या हश्र होता। इसका तो जीवन ही नरक बन जाता।

बस यही एक जीवंत सुखद आभास था जिसने उनके जीवन जीने के उद्देश्य दशा और दिशा ही बदल दी। अब वे सही से खातीं, पहनतीं और परिवार के साथ खुशी-खुशी रहने का आनन्द लेती हैं। अब जब भी उन्हें अपने पति की याद आती तो वे किसी जरूरतमन्द की खाने-पीने या कपड़े या किसी और जरूरत के सामान से मदद करती हैं। इस सबसे उन्हें लगा कि इतने समय के बाद अब ही उन्हें जीवन जीने का असल सही मतलब पता चला है और वे बहुत सुखी और हलका भी महसूस करती हैं और सबकी चहेती भी बनी हुई है।

दमयन्ती जी का जीवन हमें भी एक बड़ी प्रेरणा देता है कि अपनी उपयोगिता कैसे बनाए रखें और जीवन जीने नजरिये को बदल इसका आनन्द लें और अपने वर्तमान को समृद्ध करें।












परिधान

रिँकू शर्मा (अंबाला)

पंचतत्व की काया है और पंचतत्व संसार है

रोटी कपड़ा और मकान जीवन का आधार हैं

खाल ओढ़कर पत्ते पहनकर आदि मानव हर्षाया

तन ढ़ाँकने का गुण उसने सबसे पहले अपनाया

सूत कातकर धागा बुनकर पहला कपड़ा जब बनाया

तन पर अपने लपेट कर उसे अपने कौशल पर इतराया

सहयोग देने जब सूई भी आई तब तो बस कमाल हुआ

कपड़े को सिलकर पहना तो स्वयं पर ही अभिमान हुआ

रंग - बिरंगे  परिधानों  से सजता  सब  संसार गया 

एक सूत्र में बंध गए सब भाई - चारा और प्रेम बढ़ा

बौद्धिकता कुछ अधिक हुई तो अलग ही परिधान बने

धोती-कुर्ता, लहंगा-चोली भिन्न स्थलों की पहचान बने

विदेशी शक्तियों ने आकर फिर भारत को भरमाया

अपने परिधानों से सारे राष्ट्र को पथ से भटकाया

एकता का प्रतीक परिधान टुकड़ों में फिर बँट गया

जाति धर्म का चिह बना अलगाव वाद में फँस गया

पाश्चात्य पहनावे ने तो लाज शर्म को भुला दिया

संस्कृति तो मिटा दी सारी अंधकार में डुबो दिया

तन ढ़कने की वस्तु उपभोक्तावाद की भेंट चढी है

पहनावे की दलदल में सारी युवा पीढ़ी डूब चली है

उड़ गए दुपट्टे सिरों से फटी जींस अब आई है

नैतिक मूल्य भुला दिए पाश्चात्य संस्कृति अपनाई है

परिधान है पहचान हमारी आओ इसे अपनाएँ हम

तन ढकने के साथ साथ संस्कृति को भी बचाएँ हम

नवाचार परिधानों से हम सारे विश्व को सजाएँगे

अपनी कला व संस्कृति को चारों ओर फैलाएँगे


सफला  एकादशी व्रत

यह व्रत पौष कृष्ण पक्ष एकादशी को किया जाता है। इस दिन भगवान अच्युत की पूजा का विशेष विधान है। इस व्रत को धारण करने वाले को चाहिए कि प्रात स्नान करके भगवान की आरती करे तथा भोग लगाये। ब्रह्मणों तथा गरीबों को भोजन अथवा दान देना चाहिए। रात्रि में जागरण करते हुए कीर्तन पाठ करना अत्यन्त फलदायी होता है। इस व्रत को करने से समस्त कार्यों में सफलता मिलती है। इसलिए इसका नाम 'सफला' एकादशी है।

सफला  एकादशी व्रत की कथा

प्राचीन समय में महिष्मत नामक एक राजा चम्पावती नाम की प्रसिद्ध नगरी में राज करता था।

 उसका बड़ा बेटा लुम्पक बड़ा दुराचारी था। मांस, मदिरा, परस्त्री मगन, वेश्याओं का संग इत्यादि कुर्कमों से परिपूर्ण था। पिता ने उसे अपने राज्य से निकाल दिया। वन में एक पीपल का वृक्ष था जो भगवान को भी प्रिय था। सब देवताओं की क्रीड़ा स्थली भी वहीं थी। ऐसे पतित पावन वृक्ष के सहारे लुम्पक भी रहने लगा। परन्तु फिर भी उसकी चाल टेढ़ी ही रही। पिता के राज्य में चोरी करने चला जाता तो पुलिस पकड़कर छोड़ देती थी। एक दिन पौष मास के कृष्ण पक्ष की दशमी की रात्रि को उसने लूट मार एवं अत्याचार किया तो पुलिस ने उसके वस्त्र उतारकर वन को भेज दिया। वह बेचारा पीपल की शरण में आ गया। इधर हेमगिरि पर्वत की पवन भी आ पहुंची। लुम्पक पापी के सब अंगों में गठिया रोग ने प्रवेश किया, हाथ-पांव अकड़ गए। अतः सूर्योदय होने के बाद कुछ दर्द कम हुआ, पेट का गम लगा, जीवों के मारने में आज असमर्थ था। वृक्ष पर चढ़ने की शक्ति भी नहीं थी। नीचे गिरे हुए 

फल बीन लाया और पीपल की जड़ में रखकर कहने लगा-हे प्रभो! वन फलों का आप ही भोग 

लगाइए। मैं अब भूख हड़ताल करके शरीर को छोड़ दूंगा। मेरे कष्ट भरे जीवन से मौत भली। ऐसा 


कहकर प्रभु के ध्यान में मग्न हो गया। रातभर नींद न आई। भजन, कीर्तन, प्रार्थना करता रहा परन्तु प्रभु ने उन फलों का भोग न लगाया। प्रातः काल हुआ तो एक दिव्य अश्व आकाश से उतरकर उसके सामने प्रकट हुआ और आकाशवाणी द्वारा नारायण कहने लगे-तुमने अनजाने में सफला एकादशी का व्रत किया। उसके प्रभाव से तेरे समस्त पाप नष्ट हो गए। अग्नि को जान के या अनजाने हाथ लगाने से हाथ जल जाते हैं। वैसे ही एकादशी भूलकर रखने से भी अपना प्रसाद दिखाती है। अब तुम इस घोड़े पर सवार होकर पिता के पास जाओ. राज मिल जाएगा। सफला एकादशी सर्व सफल करने वाली है. प्रभु आज्ञा से लुम्पक पिता के पास आया। पिता उसे राजगद्दी पर बिठाकर आप तप करने वन को चला गया। लुम्पक के राज्य में प्रजा एकादशी व्रत विधि सहित किया करती थी। सफला एकादशी की कथा सुनने से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है।





वर वधू की तलाश है तो निम्नलिखित फार्म भरे 

https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSfedPV8_-DJ3X_jN8dqfmu99JIXX0zU7T2A8gRh4BwpTMTaYw/viewform?usp=sf_link

आपको अगर कोई समस्या परेशान कर रही है तो संपर्क करें 

शर्मा जी 9312002527,9560518227

ज्ञानवर्धक कहानियां व अध्यात्मिक विषय पर प्रवचन सुनने के लिए क्लिक करें

https://youtube.com/@satishsharma7164?si=ea3mZzKWzFD9MDWl

ज्ञानवर्धक कहानियां व अध्यात्मिक विषय पर लेख पढ़ने के लिए क्लिक करें

www.sumansangamaashray.com

अपनी जिज्ञासा,सुझाव व लेख निम्नलिखित ईमेल पर मेल करें

sumansangamaashray2025@gmail.com

मेरा ब्लॉग पढ़ने के लिए क्लिक करें 

sumansangamaashray1957.blogspot.com 





चित्रा नक्षत्र

जब चंद्र ग्रह मेष राशि और अश्विनी नक्षत्र में प्रवेश करता है और 15 वें दिन चित्रा नक्षत्र में पूर्ण हो जाता है तब चैत्र का महीना शुरू होता है। इस महीने में चित्रा नक्षत्र लगता है।आकाशीय मंडल में चौदहवाँ नक्षत्र है। चित्रा नक्षत्र के देवता त्वष्टा हैं जो एक आदित्य हैं। इस नक्षत्र के प्रथम दो चरण कन्या राशि में आते हैं।चूंकि चित्रा नक्षत्र को 'एकान्त तारा' के रूप में भी जाना जाता है, इस नक्षत्र मे जन्मे लोग आयुर्वेद को जानने वाले होते हैं। साथ ही वे शिल्पकार भी होते  हैं। वे स्त्री-संतान से सुखी रहते हैं और वे सबके साथ मिलकर काम करना पसंद करते हैं। उन्हें चीजें बनाना और उन्हें सुंदर बनाना बहुत पसंद है।यह काफी आशावादी होते हैं, यही गुण इनको हमेशा आगे बढ़ाने में सहायक होता है चित्रा नक्षत्र में जन्मे व्यक्ति बुद्धिमान साहसी धनवान दानी सुशील,  सुंदर शरीर, संतान सुख, स्त्री सुख युक्त होते हैं इनकी हस्तलिखित लिपि बहुत सुंदर होती है धर्म में आस्था रखते हैं आयुर्वेद को जानने वाले होते हैं भवन निर्माण में विशेष रूचि होती है लेकिन पैसा बहुत कम ठहरता है नीति कुशल सौंदर्य प्रेमी अपने मन का भेद कभी किसी को नहीं बताते चित्रकला व अभिनय के जानकार होते हैं बहुमूल्य वस्तुओं के व्यापारी बन सकते हैं प्रभावशाली व्यक्तित्व होता है इनका इनको देखकर दूसरे व्यक्ति इन पर आसक्त हो सकते हैं गाने का शोक होने के कारण ये गायक भी हो सकते हैं। गायन गणित औषधी व लेखन कला में धनोपार्जन कर सकते हैं । साधारण तय चित्रा नक्षत्र के लोग धनी पाए जाते हैं। 33-38 वर्ग में इनका भाग्योदय होता है। क्रुर ग्रह की दशा में गुरु बुध शुक्र के अंतर में शत्रु कष्ट चोरी का भय बना रहता है।


नीलम रत्न 

नीलम शनि का मुख्य रत्न है हिंदी में नीलम तथा अंग्रेजी में फायर कहते हैं असली नीलम चमकीला चिकना मोर पंख के समान वर्ण जैसा,  नीली किरणो से युक्त एवं पारदर्शी होता है। असली नीलम को गाय के दूध में डाल दिया जाए तो दूध का रंग नीला हो जाता है पानी से भरे कांच के गिलास में डाला जाए तो नीली किरणे दिखाई देंगी। सूर्य की धूप में रखने से नीले रंग की किरणे दिखाई देंगी। नीलम धारण करने से धन-धान्य,यश-कीर्ति, बुद्धि-चातुर्य, सर्विस एवं व्यवसाय तथा वंश मे वृद्धि होती है स्वास्थ्य सुख का लाभ होता है बहुदा नीलम 24 घंटे के भीतर ही प्रभाव करना शुरू कर देता है यदि नीलम अनुकूलन ना  बैठे तो भारी नुकसान की आशंका हो जाती है अतः परीक्षा के तौर पर कम से कम 3 दिन तक पास रखने पर यदि बुरे सपने आएं, रोग उत्पन्न हो या चेहरे की बनावट में अंतर आए तो नीलम ना पहले नीलम धारण करने या औषधि रूप में ग्रहण करने से दमा क्षय कुष्ठ रोग हृदय रोग से संबंधित रोगों में लाभकारी होता है नीलम 5,7,9,12 अथवा अधिक रति के वजन का पंचधातु लोहे अथवा सोने की अंगूठी में शनिवार को शनि की होरा में एवं पुष्प उ भा चित्रा स्वाति धनिष्ठा या शतभिषा नक्षत्रों में नीलम को पहने। नीलम को शुद्ध करके व अभिमंत्रित कर पहने। 





कन्या राशी 

कन्या राशि का व्यक्ति कोमल शरीर लिए लेकिन कद छोटा स्त्री वर्गीय स्वभाव मधुर भाषी, कोमल बोलने वाला अपनी बातों से दूसरों को प्रभावित करने वाला और बहुत ही अच्छी स्मरण शक्ति रखने वाला बहुत लंबे समय तक किसी भी चीज को याद रख सकता है विचारशील बहुत विषय पर विचार कर सकता है और किसी भी विषय पर निर्णय लेने से पहले उस पर अनेकों बार उसके सभी पक्षों पर विचार करके कार्य करने वाला धैर्यवान आसानी से धैर्य नहीं खोता इसे  कितने संकट आ जाए | ऐसा व्यक्ति मनोवैज्ञानिक गणितज्ञ साहित्य प्रेमी वाणिज्य व्यवसाय में कुशल सहनशील अति नर्म सावधानी से कार्य करने वाला बुद्धि वादी तार्किक अपने सभी कार्य गुप्त रखने वाला आसानी से किसी को बताना नहीं कि मैं क्या करूंगा | बुढ़ापे का प्रभाव दीर्घायु लेकिन कभी-कभी आपने पर  विश्वास कम होता है | ऐसे लोग व्यापारी विक्रेता खजांची मुनीम मंत्री अध्यापक साहित्यकार या मनोवैज्ञानिक भी हो सकते हैं |  किंतु नौकरी से विशेष लाभ की संभावना रहती है | इन लोगों की मैत्री मकर मीन लग्न वालों से शुभ रहती है बुध एवं शुक्र ग्रह शुभ  रहते हैं चंद्र मंगल गुरु अशुभ है और शनि अशुभ ग्रह है शुक्र अधिक शुभ ग्रह हैं ऐसे लोगों की भाग्य उन्नति 16 से 22 25 30 35 35 36 वें वर्ष में होती है पेट की समस्या ज्यादातर रहती है तो ऐसे लोगों के लिए सलाह है कि तला भुना और ज्यादा मिर्च मसाले वाला खाना ना खाएं बासी खाने से परहेज करें | कन्या राशि वालों की कुंडली में सूर्य शुक्र या सूर्य चंद्र कहीं किसी भी भाव में एक साथ बैठे हो तो सूर्य की दशा में विशेष धन लाभ मिलता है सम्मान एवं ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है कभी-कभी इस व्यक्ति का संबंध पत्नी के अतिरिक्त अन्य कई स्त्रियों से जीवन भरा रहता है |



https://youtu.be/GVCBOXMx1eg

 पुत्रदा एकादशी

पौष मास की शुक्ल पक्ष एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहते हैं। शास्त्रों के अनुसार पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत और अनुष्ठान करने से भद्रावती के राजा सुकेतु को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी। तभी से इसका नाम पुत्रदा अर्थात पुत्र देने वाली एकादशी पड़ा। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा का विधान है। इस व्रत के करने से सन्तान की प्राप्ति होती है।

पुत्रदा एकादशी की कथा

प्राचीन काल में भद्रावती नामक नगरी में सुकेतु नाम के राजा राज्य करते थे। राजा तथा उनकी स्त्री शैव्या दानशील तथा धर्मात्मा थे। सम्पूर्ण राज्य, खजाना धन-धान्य से पूर्ण होने के बावजूद भी राजा संतानहीन होने के कारण अत्यन्त दुखी थे। एक बार वे दोनों राज्य भार मंत्रियों के ऊपर छोड़कर वनवासी हो गए तथा आत्माहत्या के समान कोई दूसरा पाप नहीं। इसी उधेड़बुन में वे दोनों वहां आये, जहां मुनियों का आश्रय व जलाशय था। राजा रानी मुनियों को प्रणाम कर बैठ गए। मुनियों ने योगबल से राजा के दुख का कारण जान लिया और राजा रानी को आशीर्वाद देते हुए 'पुत्रदा एकादशी 'व्रत रखने को कहा। राजा रानी ने पुत्रदा एकादशी व्रत रखकर विष्णु भगवान की पूजा की और पुत्र रत्न प्राप्त किया और अंत में करने पर बैकुंठ लोक को गया, इस प्रकार एकादशी की कथा जो सुनते हैं सुनते हैं पढ़ते हैं और व्रत करते हैं भगवान उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं, उनके मन में मानसिक शांति का संचार करते हैं। बोलो लक्ष्मी नारायण भगवान की जय, ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।




 दिसम्बर मास 2025 का पंचांग 

भारतीय व्रतोत्सव दिसम्बर -2025

दि. 1- मोक्षदा एकादशी व्रत, श्री गीता जयंती,दि. 2- भौम प्रदोष व्रत,दि. 4- श्री दत्तात्रेय जयंती, सत्य व्रत, त्रिपुर भैरव जयंती, अन्नपूर्णा जयंती,दि. 7- श्री गणेश चतुर्थी व्रत,दि. 11-कालाष्टमी,दि. 15-सफला एकादशी व्रत,दि. 16-संक्रांति पुण्य,दि. 17-प्रदोष व्रत,दि. 18-मास शिवरात्रि,दि. 19-अमावस्या पुण्य,दि. 24-विनायक चतुर्थी व्रत,दि.27-गुरु गोविन्द सिंह जयंती,दि.28-श्री दुर्गाष्टमी,दि.30-पुत्रदा 11 व्रत (स्मा.),दि.31-पुत्रदा एकादशी व्रत (वै.)

मूल विचार दिसम्बर -2025

मूल विचार - दि. 1 को 1/10 से दि.2 को 20/51 तक, दि. 9 को 2/52 से दि. 11 को 2/44 तक, दि. 18 को 20/06 से दि. 21 को 1/21 तक, दि. 28 को 8/43 से दि. 30 को 6/04 बजे तक गण्ड मूल हैं।

ग्रह स्थिति दिसम्बर -2025 

ग्रह स्थिति - दि. 5 गुरु मिथुन में,दि. 6 वृश्चिक में बुध,दि. 7 धनु में मंगल,दि. 11 शुक्रास्त पूर्व,दि. 15 धनु में सूर्य,दि. 20 धनु में शुक्र,दि. 29 धनु में बुध

पंचक विचार दिसम्बर -2025  

पंचक विचार -(धनिष्ठा नक्षत्र के तृतीय चरण से रेवती नक्षत्र तक) पंचको में दक्षिण दिशा की ओर यात्रा करना मकान दुकान आदि की छत डालना चारपाई पलंग आदि बुनना,दाह संस्कार,बांस की चटाई दीवार प्रारंभ करना आदि स्तंभ रोपण तांबा पीतल तृण काष्ट आदि का संचय करना आदि कार्यों का निषेध माना जाता है समुचित उपाय एवं पंचक शांति करवा कर ही उक्त कार्यों का संपादन करना कल्याणकारी होगा ध्यान रहेगा  पंचर नक्षत्रों का विचार मात्र उपरोक्त विशेष कृतियों के लिए ही किया जाता है विवाह मंडल आरंभ गृह प्रवेश प्रवेश उपनयन आदि मुद्दों से तो पंचक नक्षत्रका प्रयोग शुभ माना जाता है, 01 को 23-18 बजे तक,दि 24 को 19-46 से 29 को 07-40 तक पंचक हैं।

 अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527,9560518227

भद्रा विचार दिसम्बर -2025 

भद्रा काल का शुभ अशुभ विचार - भद्रा काल में विवाह मुंडन, गृह प्रवेश, रक्षाबंधन आदि मांगलिक कृत्य का निषेध माना जाता है परंतु भद्रा काल में शत्रु का उच्चाटन करना,स्त्री प्रसंग में,यज्ञ करना,स्नान करना,अस्त्र शस्त्र का प्रयोग,ऑपरेशन कराना, मुकदमा करना,अग्नि लगाना,किसी वस्तु को काटना,भैस,घोड़ा व ऊंट संबंधी कार्य प्रशस्त माने जाते हैं सामान्य परिस्थिति में विवाह आदि शुभ मुहूर्त में भद्रा का त्याग करना चाहिए परंतु आवश्यक परिस्थितिवश अतिआवश्यक कार्य भूलोक की भद्रा ,भद्रा मुख छोड़कर कर भद्रा पुच्छ में शुभ कार्य कर सकते है

दि. 1 को 8/16 से 19/01 तक, दि. 4 को 8/37 से 18/40 तक, दि. 7 को 7/51 से 18/25 तक, दि. 10 को 13/46 से दि 11 को 1/57 तक, दि. 14 को 5/43 से 18/49 तक, दि. 18 को 2/32 से 15/47 तक, दि. 24 को 0/41 से 13/11 तक, तू दि. 27 को 13/10 से दि. 28 को 0/34 तक, दि. 30 को 18/26 से दि. 31 को 5/00 बजे तक भद्रा है।

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527,9560518227

सर्वार्थ सिद्धि योग दिसम्बर -2025  

दैनिक जीवन में आने वाले महत्वपूर्ण कार्यों के लिए शीघ्र ही किसी  शुभ मुहूर्त का अभाव हो,किंतु शुभ मुहर्त के लिए अधिक दिनों तक रुका ना जा सकता हो तो इन सुयोग्य वाले मुहर्तु  को सफलता से ग्रहण किया जा सकता है | इन से प्राप्त होने वाले अभीष्ट फल के विषय में संशय नहीं करना चाहिए यह योग हैं सर्वार्थ सिद्धि,अमृत सिद्धि योग एवं रवियोग | योग्यता नाम तथा गुण अनुसार सर्वांगीण सिद्ध कारक  है| 

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527,9560518227

दिनांक

प्रारंभ

दिनांक

समाप्त

02

07-01

02

20-51

03

17-59

04

07-02

08

04-11

09

02-52

09

07-06

10

02-22

14

07-09

14

08-18

17

17-11

18

20-06

22

03-35

22

07-71

28

07-17

28

08-43

31

03-58

01

07-19


चौघड़िया मुहूर्त 

चौघड़िया मुहूर्त, ज्योतिष में शुभ और अशुभ समय जानने की एक प्रणाली है। यह 24 घंटों को 8 भागों में विभाजित करता है, जिन्हें चौघड़िया कहा जाता है। प्रत्येक चौघड़िया एक निश्चित अवधि का होता है, और इन्हें शुभ और अशुभ कार्यों के लिए उपयुक्त माना जाता है। 

चौघड़िया मुहूर्त क्या है - 24 घंटों को 16 भागों में बांटा जाता है, जिन्हें चौघड़िया कहा जाता है। प्रत्येक चौघड़िया लगभग 1.30 घंटे का होता है। 

शुभ-अशुभ - कुछ चौघड़िया शुभ माने जाते हैं, जैसे अमृत, शुभ, लाभ, और चर। कुछ अशुभ माने जाते हैं, जैसे रोग, उद्वेग, और काल। चौघड़िया का उपयोग शुभ कार्यों, जैसे विवाह, यात्रा, और व्यापार शुरू करने के लिए शुभ समय जानने के लिए किया जाता है। 

चौघड़िया के प्रकार - दिन का चौघड़िया,सूर्योदय से सूर्यास्त तक के समय को दिन का चौघड़िया कहा जाता है। 

रात का चौघड़िया,सूर्यास्त से अगले दिन के सूर्योदय तक के समय को रात का चौघड़िया कहा जाता है। 

चौघड़िया का महत्व - चौघड़िया मुहूर्त का उपयोग किसी भी शुभ कार्य को शुरू करने के लिए एक अच्छे समय का चयन करने के लिए किया जाता है। यह माना जाता है कि यदि कोई कार्य शुभ चौघड़िया में शुरू किया जाता है, तो उसके सफल होने की संभावना अधिक होती है।   

सुर्य उदय- सुर्य अस्त  -2025  


दिनांक 

01 

05 

10 

15

20 

25 

30

उदय 

06-58

07-01

07-04

07-08

07-14

07-16

07-15

अस्त 

17-22

17-22

17-23

17-25 

17-27

17-30

17-33


 राहू काल 

 राहुकाल -राहुकाल दक्षिण भारत की देन है,दक्षिण भारत में राहु काल में कृत्य करना अच्छा नहीं माना जाता, राहु काल में शुभ कृतियों में वर्जित करने की परंपरा अब हमारे उत्तरी भारत में भी अपनाने लगे हैं राहुकाल प्रतिदिन सूर्यादि वारों में भिन्न-भिन्न समय पर केवल डेढ़ डेढ़ घंटे के लिए घटित होता है |

संक्रांति विचार

इस मास की संक्रान्ति धनु पौष कृष्ण एकादशी सोमवार दि. 15/16 दिसम्बर को रात्रि के चौथे पहर 28/18 बजे पर 15 मु. उठी धापी, उत्तर गमन ईशान दृष्टि किये वायुमण्डल में प्रवेश करेगी। गतवार 2, गत नक्षत्र 3, वार नाम ध्वांक्षी वैश्य सुखी, नक्षत्र नाम महोदरी-चोर सुखी। सोमवारी संक्रान्ति होने से सभी धान्य, अन्नादि, मूंगा, मोती मन्दा। सोना, चांदी में घटबढ़। लोहा, तांबा, पीतल, सभी तिलहन वस्तु, कपास आदि में तेजी चलेगी

आकाश लक्षण

ग्रहचाल, नाड़ी परिवर्तन और शुक्रास्त प्रभाव से मध्य भारत में बादल चाल वर्षा हो, ठण्ड का प्रभाव बढ़ेगा। कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखण्ड आदि पर्वतीय क्षेत्रों में जोरदार शीत लहर चलेगी। हिमपात होगा। मासान्त में चार-पांच ग्रहों की युति के प्रभाव में कहीं प्राकृतिक आपदा से हानि हो।

  मांगलिक दोष विचार परिहार

वर अथवा कन्या दोनों में से किसी की भी कुंडली में 1,4,7,8 व 12 भाव में मंगल होने से ये मांगलिक माने जाते हैं,मंगली से मंगली के विवाह में दोष न होते हुए भी जन्म पत्रिका के अनुसार गुणों को मिलाना ही चाहिए यदि मंगल के साथ शनि अथवा राहु केतु भी हो तो प्रबल मंगली डबल मंगली योग होता है | इसी प्रकार गुरु अथवा चंद्रमा केंद्र हो तो दोष का परिहार भी हो जाता है |इसके अतिरिक्त मेष वृश्चिक मकर का मंगल होने से भी दोष नष्ट हो जाता है | इसी प्रकार यदि वर या कन्या किसी भी कुंडली में 1,4,7,9,12 स्थानों में शनि हो केंद्र त्रिकोण भावो में शुभ ग्रह, 3,6,11 भावो में पाप ग्रह हों तो भी मंगलीक दोष का आंशिक परिहार होता है, सप्तम ग्रह में यदि सप्तमेश हो तो भी दोष निवृत्त होता है |

स्वयं सिद्ध मुहूर्त

 स्वयं सिद्ध मुहूर्त चैत्र शुक्ल प्रतिपदा वैशाख शुक्ल तृतीया अक्षय तृतीया आश्विन शुक्ल दशमी विजयदशमी दीपावली के प्रदोष काल का आधा भाग भारत में से इसके अतिरिक्त लोकाचार और देश आचार्य के अनुसार निम्नलिखित कृतियों को भी स्वयं सिद्ध मुहूर्त माना जाता है बडावली नामी देव प्रबोधिनी एकादशी बसंत पंचमी फुलेरा दूज इन में से किसी भी कार्य को करने के लिए पंचांग शुद्धि देखने की आवश्यकता नहीं है परंतु विवाह आदि में तो पंचांग में दिए गए मुहूर्त व कार्य करना श्रेष्ठ रहता है।

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527,9560518227

दिसंबर 2025 के महत्वपूर्ण दिवस

1 दिसंबर: विश्व एड्स दिवस

2 दिसंबर: गुलामी उन्मूलन के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस, विश्व कंप्यूटर साक्षरता दिवस

3 दिसंबर: विकलांग व्यक्तियों का अंतर्राष्ट्रीय दिवस

4 दिसंबर: भारतीय नौसेना दिवस

5 दिसंबर: विश्व मृदा दिवस, अंतर्राष्ट्रीय स्वयंसेवक दिवस

6 दिसंबर- डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर की पुण्यतिथि,बाबरी मस्जिद विध्वंस: 1992 में,होमगार्ड संगठन की स्थापना- 1946 

7 दिसंबर: सशस्त्र बल झंडा दिवस

 8 दिसंबर-उदय शंकर का जन्म भारत के प्रसिद्ध शास्त्रीय नृतक और नृत्य निर्देशक उदय शंकर का जन्म 8 दिसंबर, 1900 को हुआ था। भारतीय जनता पार्टी का गठन- 1980,जनरल बिपिन रावत का निधन 2021 

9 दिसंबर: नरसंहार के पीड़ितों की स्मृति और सम्मान का अंतर्राष्ट्रीय दिवस, अंतर्राष्ट्रीय भ्रष्टाचार विरोधी दिवस

10 दिसंबर: मानवाधिकार दिवस

11 दिसंबर: यूनिसेफ दिवस

12 दिसंबर: अंतर्राष्ट्रीय तटस्थता दिवस

13 दिसंबर-2001: भारतीय संसद पर आतंकवादी हमला हुआ था, जिसमें नौ जवान शहीद हुए थे। 2003: इराक के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को उनके गृह नगर के पास गिरफ्तार किया गया था। 1921: प्रिंस ऑफ वेल्स ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का उद्घाटन किया था। 1996: कोफी अन्नान संयुक्त राष्ट्र के महासचिव चुने गए थे। 1961: मंसूर अली खान पटौदी ने दिल्ली में इंग्लैंड के खिलाफ अपना टेस्ट मैच करियर शुरू किया था। 1947: यरुशलम और जाफ़ा में हुए बम विस्फोटों में कम से कम 16 लोग मारे गए थे। 1916: ऑस्ट्रिया के टायरॉल में हिमस्खलन से 24 घंटे में 10,000 ऑस्ट्रियाई और इतालवी सैनिकों की मौत हुई थी। 1920: हेग, नीदरलैंड में लीग ऑफ नेशंस का अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय स्थापित किया गया था। 1642: डच नाविक एबेल तस्मान ने न्यूजीलैंड के दक्षिणी द्वीप को देखा था। राष्ट्रीय अश्व दिवस,राष्ट्रीय कोको दिवस,सेंट लूसिया दिवस 

14 दिसंबर: राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण दिवस

15 दिसंबर: अंतर्राष्ट्रीय चाय दिवस

16 दिसंबर - इस दिन को  भारत में विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है, जो साल 1971 में पाकिस्तान पर भारत की निर्णायक जीत का प्रतीक है। इस दिन, 1971 के युद्ध में भारतीय सेना के सामने पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया था, जिसके परिणामस्वरूप बांग्लादेश को आज़ादी मिली। 

17 दिसंबर: राइट ब्रदर्स दिवस

18 दिसंबर: अंतर्राष्ट्रीय प्रवासी दिवस

19 दिसंबर - गोवा मुक्ति दिवस के रूप में मनाया जाता है राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान और ठाकुर रोशन सिंह - की शहादत के रूप में भी मनाया जाता है, जिन्हें 1927 में इसी दिन फांसी दी गई थी। राष्ट्रीय हार्ड कैंडी दिवस: यह दिन मीठी कैंडी को समर्पित है।राष्ट्रीय पुनर्स्थापन दिवस: यह दिन कार्यालयों में उपहारों के आदान-प्रदान को याद करता है, जो आमतौर पर क्रिसमस से पहले के गुरुवार को मनाया जाता है।1946 को वियतनामी राष्ट्रवादी स्वतंत्रता सेना 'वियत मिन्ह' ने फ्रांस के खिलाफ प्रथम इंडोचीन युद्ध शुरू किया था। 

20 दिसंबर: अंतर्राष्ट्रीय मानव एकजुटता दिवस

21 दिसंबर -  को भारत में गुरु गोविंद सिंह के चार पुत्रों की शहादत को याद करने के लिए शहीदी सप्ताह की शुरुआत के रूप में भी मनाया जाता है, जो 27 दिसंबर तक चलता है। 

 इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र ने इसे विश्व ध्यान दिवस घोषित किया है, जिसका विषय "आंतरिक शांति, वैश्विक सद्भाव" है। इस दिन शीतकालीन संक्रांति होती है, जो उत्तरी गोलार्ध में वर्ष का सबसे छोटा दिन और सबसे लंबी रात होती है

22 दिसंबर - राष्ट्रीय गणित दिवस,रामानुजन का जन्म 1887 को हुआ था और उन्होंने गणित के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया था।

23 दिसंबर - इस दिन भारत में राष्ट्रीय किसान दिवस मनाया जाता है, जो पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की जयंती है। इस दिन को किसानों के योगदान का सम्मान करने और उनके अधिकारों के लिए लड़ने वाले चौधरी चरण सिंह को याद करने के लिए समर्पित किया गया है। 

24 दिसंबर - को भारत में राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य उपभोक्ताओं के अधिकारों और उनके कर्तव्यों के बारे में जागरूकता बढ़ाना है, क्योंकि 1986 में इसी दिन भारत में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम पारित हुआ था।

25 दिसंबर -  भारत में सुशासन दिवस (अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती) और तुलसी पूजन दिवस मनाया जाता है। दुनिया भर में इस दिन को क्रिसमस के रूप में मनाया जाता है। 

26 दिसंबर - स्वतंत्रता सेनानी सरदार उधम सिंह का जन्म 1899 को हुआ था। 1925 में, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना कानपुर में हुई थी।

27 दिसंबर: अंतर्राष्ट्रीय महामारी तैयारी दिवस 

28 दिसंबर - भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का स्थापना दिवस है, जिसकी स्थापना 1885 में हुई थी। शामिल हैं। इसके अलावा, यह "पवित्र मासूम दिवस" और राष्ट्रीय लघु फिल्म दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। धीरूभाई अंबानी, रतन टाटा व अरुण जेटली भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री, जिनकी जयंती है।

30 दिसंबर 1906: ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना हुई थी। 1943: नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने पोर्ट ब्लेयर, अंडमान में भारत का झंडा फहराया था। 1949: भारत ने चीन को मान्यता दी थी। 2006: इराक के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को फांसी दी गई थी। 2024: इस दिन पौष अमावस्या (सोमवती अमावस्या) थी और राष्ट्रीय संकल्प योजना दिवस भी था। 1879: आध्यात्मिक गुरु रमण महर्षि का जन्म हुआ था। 1922: भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी सौरभ वर्मा का जन्म हुआ था।  प्रकाश वीर शास्त्री और वेद प्रताप वैदिक की जयंती भी इसी दिन होती है। रिज़ल दिवस (फिलीपींस): फिलीपींस के राष्ट्रीय नायक जोस रिज़ल की याद में मनाया जाता है। बेकन दिवस (अमेरिका): यह दिन 'बेकन' का जश्न मनाने के लिए है। 

31 दिसम्बर बैरवा दिवस: अखिल भारतीय बैरवा महासभा द्वारा महर्षि गुरु बालीनाथ जन्म दिवस के उपलक्ष्य में मनाया जाता है।विश्व आध्यात्मिकता दिवस: जो लोग अपने जीवन में आध्यात्मिकता को महत्व देते हैं, उनके लिए यह दिन आध्यात्मिकता को समर्पित होता है। शांति का सार्वभौमिक घंटा: कुछ जगहों पर इस दिन शांति का संदेश देने के लिए "शांति का सार्वभौमिक घंटा" मनाया जाता है। 

विषय मौलिक विधा रोला

मदन सिंह शेखावत वरेण्य

मौलिक तव पहचान,समझ अब मेरे भाई।देश रखे हम मान , काम मन सदा  सुहाई।

राष्ट्र करें सब प्रेम , खुशी की  नदी  बहाये।पूर्ण ध्यान  कर्तव्य , देश  खुशहाली  लाये।।

मौलिक जो अधिकार,सभी है अच्छे  भैया।करते नित उपयोग , पार  सब  करले  नैया।

ध्यान रखे  हम देश , कर्तव्य पालन  करना। दुरुपयोग को त्याग,नहीं फिर किससे डरना।।


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

जुलाई मास 2025 का पंचांग

जानकारी काल अगस्त - 2025 हिन्दी मासिक

शुक्र ग्रह की जानकारी व उपाय,श्री लक्ष्मी चालीसा व आरती