जानकारी काल हिन्दी मासिक - 2025
जानकारी काल
वर्ष-26 अंक - 05 सितंबर - 2025 , पृष्ठ 42 www.sumansangam.com
या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
अपनों से अपनी बात
लाल किले की प्राचीर से 15 अगस्त को प्रधानमंत्री का उद्बोधन भविष्य की नीतिगत दिशा का संकेतक है। यह भाषण भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने की यात्रा का खाका प्रस्तुत करता है। अगर हम यह कहें कि ये भाषण विचारों का दस्तावेज नहीं, बल्कि चुनौतियों का मानचित्र है। प्रधानमंत्री ने आत्मनिर्भर भारत की राह पर बल दिया, पर कुछ विषयों पर जैसे की कि बिना शिक्षा सुधार, शोध विस्तार और नवाचार प्रोत्साहन के आत्मनिर्भरता अधूरी ही रहेगी। विश्वविद्यालय, उद्योग और सरकार का समन्वय ही वह बिंदु है, जो संकल्प को धरातल पर ला सकता है। यह समझना होगा कि आत्मनिर्भरता केवल उत्पादन नहीं, बल्कि ज्ञान और तकनीक की स्वतंत्रता भी है। सुरक्षा और विदेश नीति की दृष्टि से यह भाषण सामरिक संतुलन पर केंद्रित दिखा, परंतु अमेरिका जैसे मित्र देशों से सहयोग लेते समय भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और आत्मनिर्भर निर्णय क्षमता की रक्षा एक बड़ी चुनौती है। यही वह मोड़ है जहां मित्रता और स्वाभिमान का संतुलन सुनिश्चित करना आवश्यक है। आर्थिक सुधारों, जीएसटी पारदर्शिता और कर-प्रशासन सुधार का उल्लेख सकारात्मक है, परंतु बेरोजगारी, स्वास्थ्य संकट, ग्रामीण विकास और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों का अपेक्षित विस्तार नहीं हुआ। यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि विकास का सही अर्थ तभी सिद्ध होगा जब गांव और शहर दोनों का विकास समान रूप से होगा। अतः प्रधानमंत्री के 'संकल्प' प्रेरणादायक हैं, पर इनकी सफलता घोषणाओं से आगे बढ़कर ठोस नीतिगत क्रियान्वयन, न्यायिक पारदर्शिता और समावेशी विकास पर निर्भर करेगी। स्वतंत्रता दिवस की 79 वीं वर्षगांठ पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा लालकिले की प्राचीर से भगवान श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र को इस युग में नया अवतार देते हुए, जो देश के शत्रुओं को ललकारा है, उसकी गूंज पाकिस्तान के बाहर अमेरिका और चीन तक पहुंची है। जिन्होंने भारत की सुरक्षा को भेदने के लिए पाकिस्तान को अपना मोहरा बनाया हुआ है और उसके मंसूबे पाल रखे हैं, उनके लिए यह चेतावनी है। परन्तु दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि पिछले छह दशकों में देश के शत्रुओं का सामना करने के लिए, चार युद्धों को झेलने के बाद भी, अभेद्य सुरक्षा पर क्यों विचार नहीं किया? यह बहुत महत्वपूर्ण निर्णय है, जिसमें देश के महत्वपूर्ण सैन्य, सामरिक और नागरिक प्रतिष्ठानों को सुदर्शन चक्र सुरक्षा प्रदान करेगा और आक्रांता पर वार भीं करेगा। इस सुरक्षा चक्र को विस्तार देकर सुदर्शन चक्र को पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर के लिए भी तैयार करना होगा, क्योंकि भविष्य के लिए यही रणक्षेत्र हो सकते हैं। दुश्मनों के कितने भी खतरनाक मंसूबे हों, देश की 140 करोड़ जनता का भी दायित्व और कर्तव्य है कि देश की सैन्य शक्ति किसी भी शत्रु को किसी भी दिशा से देश के भीतर से भी समूल नष्ट करने में सक्षम हो।
भारतीय शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा –
अनुसंधान में प्रमाण व्यवस्था
वासुदेव प्रजापति
जब हम अध्ययन-अनुसंधान विषय पर विचार करते हैं तो सबसे पहला विचारणीय बिन्दु प्रमाण व्यवस्था ध्यान में आता है। क्योंकि अध्ययन-अनुसंधान के समस्त ज्ञान व्यापार हेतु प्रमाण व्यवस्था की आवश्यकता होती है। आज के सारे प्रमाण पाश्चात्य हैं, भारतीय नहीं। क्या हम भारतीय प्रमाणों को ले सकते हैं? वेद और उपनिषद हमारे प्रमाण हो सकते हैं या नहीं? हमें सबसे पहले इसका निश्चय करना होगा। भगवान श्रीकृष्ण की वाणी ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ प्रमाण है या नहीं? पहले इस प्रश्न को सुलझाना होगा। जीवन के किस क्षेत्र में कौनसा ग्रन्थ प्रमाण है, हमें यह भी निश्चित करना होगा। यह निश्चय करना हमारे लिए बौद्धिक साहस दिखाने का नहीं, अपितु मानसिक साहस दिखाने का विषय है।
भारतीय प्रमाण ही आवश्यक क्यों?
हम वेद-उपनिषद आदि को ही प्रमाण क्यों मानना चाहते हैं? यदि कारण नहीं बतायेंगे तो आधुनिक शिक्षा प्राप्त विद्वान ही प्रश्न खड़े करेंगे। क्या वह हमारे पूर्वजों ने लिखे हैं, इसलिए? क्या इनकी रचना भारत में हुई है, इसलिए? क्या ये प्राचीनतम ग्रन्थ हैं, इसलिए? हम पश्चिम का कुछ भी नहीं लेना चाहते, इसलिए? क्या हम स्वमत आग्रही हैं, इसलिए? क्या हम पुराणपंथी हैं, इसलिए? क्या इन ग्रन्थों की भाषा देववाणी संस्कृत है, इसलिए?
इन सभी प्रश्नों का उत्तर होगा, नहीं। क्यों? इसलिए कि ज्ञान वैश्विक होता है। ज्ञानविश्व में कोई
अपना-पराया नहीं होता। स्वमत का आग्रह तत्त्वचिन्तन में नहीं चलता और दुराग्रह तो बिल्कुल नहीं चलता। विवेक ही ज्ञान का अधिष्ठान है इसलिए इसका निष्पक्ष होना ही अपेक्षित है। जो सत्य है उसे स्वीकार करना ही ज्ञानविश्व का धर्म है। जो शाश्वत है, उसमें प्राचीन और अर्वाचीन का भेद नहीं होता, वह चिरपुरातन नित्यनूतन होता है। अतः जो सत्य है, शाश्वत है और वैश्विक है उसे ही प्रमाण रूप में स्वीकार करना चाहिए। भारत का सिद्धान्त तो यही है। जो इसे स्वीकार नहीं करेगा, वह स्वतः ही ज्ञानविश्व से निष्कासित हो जाएगा।
हम वैश्विक किसे मानेंगे?
विश्व का अर्थ केवल भारत नहीं है। यह केवल भारतीयों से नहीं बना है। इस विश्व में सम्पूर्ण पृथ्वी पर रहने वाले सभी मनुष्य आते हैं। मनुष्यों के अतिरिक्त भी इस विश्व में अन्य प्राणी हैं, वृक्ष-वनस्पति हैं, कीट-पतंग हैं और पंचमहाभूत हैं। इन सबसे मिलकर ब्रह्मांड बनता है। इन सबका विचार करना ही वैश्विक विचार कहलाता है। अर्थात् जो सम्पूर्ण विश्व से सम्बन्धित है, वह वैश्विक है। सबका स्वतन्त्र रूप से विचार करते समय भी वैश्विक सन्दर्भ बना रहना चाहिए। यह वैश्विक दृष्टि अध्ययन व अनुसंधान हेतु प्रमाण निश्चित करने के लिए पहला निकष (कसौटी) है और इस विश्व का हित यह दूसरा निकष है। जिस विचार और व्यवहार से विश्व का हित होता है, वह स्वीकार्य है और जिससे अहित होता है, वह ताज्य है।
जिस विचार और व्यवहार से भूतमात्र का हित होता है, परम कल्याण होता है, वह सत्य है। परम कल्याण से तात्पर्य है सबको अपने-अपने निज स्वरूप का साक्षात्कार होना। इसे ही भारत में मोक्ष प्राप्त करना कहा गया है। इन सबके मूल में धर्म अवस्थित है। अर्थात् सत्य धर्म को वाणी में व्यक्त करता है, उसे वाणी का रूप देता है। धर्म विश्व को धारण करने वाला तत्त्व है। वैश्विकता, कल्याण और सत्य तीनों का धर्म में समावेश होता है। अतः प्रमाण तय करने के लिए हम यह कह सकते हैं कि जो कुछ भी धर्ममय है, वही परम प्रमाण है। धर्म वैश्विक है, इसलिए भारत ने इसे स्वीकार किया है। जो वैश्विक नहीं है, उसे भारत कभी स्वीकार नहीं करता। जो विश्व का कल्याण नहीं करता उसे भारत कभी स्वीकार नहीं करता। जो सत्य नहीं है, उसे भारत कभी नहीं बोलता। भारत धर्म विरोधी बात कभी नहीं करता, भारत सदैव धर्म की अविरोधी बात ही मान्य करता है।
वेद-उपनिषदादि प्रमाण क्यों हैं?
वेद-उपनिषद, रामायण-महाभारत और दर्शन आदि ग्रन्थ हमारे लिए प्रमाण इसलिए हैं कि ये वैश्विक हैं, परम कल्याण करने वाले हैं, सत्य और धर्ममय हैं। युगों-युगों के काल प्रवाह में वे सिद्ध हुए हैं, इसलिए प्रमाण हैं। समाज जीवन की सभी व्यवस्थाओं और स्थितियों में खरे उतरे हैं, इसलिए प्रमाण हैं। आज की परिस्थिति में भी इन सभी मूल विषयों पर कोई भी इनकी परीक्षा कर सकता है। यदि हमें भी आवश्यक लगता है तो इन्हें प्रमाण रूप में स्वीकार करने से पूर्व हमें इनकी परीक्षा कर लेनी चाहिए, ताकि हमारा स्वयं का विश्वास नहीं डिगे।
प्रमाण के मुख्य दो आयाम हैं, एक बुद्धि प्रमाण और दूसरा धर्म प्रमाण। वेद और उपनिषदों के समान
ही सभी अन्य ग्रन्थों के लिए बुद्धि प्रमाण निकष बन सकता है, पश्चिम इसे ही मान्य करता है। भारत की मान्यता है कि बुद्धि प्रामाण्य और धर्म प्रामाण्य दोनों एक साथ होने चाहिए। भारत और पश्चिम में यही अन्तर है। पश्चिम बुद्धि प्रामाण्य को मुख्य और अनिवार्य मानता है जबकि भारत दोनों को आवश्यक मानता है। पश्चिम के लिए बुद्धि प्रामाण्य मुख्य है और धर्म प्रामाण्य गौण है, भारत में धर्म प्रामाण्य मुख्य है। अकेले बुद्धि प्रामाण्य को भारत मान्य नहीं कर सकता।
भारत में अनुभूति प्रमाण मुख्य है
भारत की ज्ञान परम्परा में बुद्धि प्रामाण्य और धर्म प्रामाण्य से भी आगे का मार्ग खोजा गया है, वह मार्ग है अनुभूति का। भारत में अनुभूति प्रमाण के रूप में प्रतिष्ठित है। हमारे यहाँ अनुभूति तक पहुँचने की प्रक्रिया को साधना कहा गया है। इस साधना के विविध मार्ग भी बताए गए हैं। अनुभूति को भी विविध शब्दों में व्यक्त किया गया है। कहीं उसे ‘स्वस्वरूप में अवस्थिति’ कहा गया है, कहीं ‘अहं ब्रह्मास्मि’ तो कहीं ‘सर्वं खलु इदं ब्रह्म’ भी कहा गया है। इसी प्रकार अनुभूति को आत्म- साक्षात्कार और ईश्वर साक्षात्कार भी कहा गया है।
अनुभूति के तत्त्व को तत्त्वचिन्तन से लेकर सामान्यजन तक ने मान्य किया है। सामान्यजन इसे अपनी-अपनी भाषा में बोलते व समझते हैं। कोई कहता है, ‘कण-कण में भगवान है’ कोई कहता है, ‘सचराचर में परमात्मा का वास है’ कोई कहता है, ‘नर ही नारायण है’ तो कोई इसे अन्तरात्मा कहता है। इन सबका तात्पर्य यही है कि अनुभूति-प्रमाण भारत में आदिकाल से स्वीकार्य है। मात्र स्वीकार्य ही नहीं अपितु इसे सर्वश्रेष्ठ प्रमाण की मान्यता दी गई है। इसलिए अनुभूति स्वतः प्रमाण के रूप में प्रतिष्ठित है। इसके विषय में किसी को भी आपत्ति नहीं है, परन्तु वर्तमान समय में अनुभूति प्राप्त महानुभावों की कमी है। अतः इसकी पुनः परीक्षा करने की आवश्यकता प्रतीत हो रही है।
पश्चिम की प्रमाण व्यवस्था संकुचित है
पश्चिमी जगत की प्रमाण व्यवस्था भारत की तुलना में संकुचित है। पश्चिम एक ओर बुद्धि प्रामाण्य को मानता है, वहीं दूसरी ओर वह भौतिक जगत को प्रमाण मानता है। उसकी तीसरी मान्यता है कि वह स्वयं को केन्द्र में रखकर स्वतः सापेक्ष प्रमाण को स्वीकार करता है। पश्चिम वैश्विकता को मान्य नहीं करता। वैश्विकता को मानना उसकी प्रवृत्ति नहीं है। उसकी तो जो अपना है वही वैश्विक है, मानने वाली प्रवृत्ति है। इस प्रकार भारत व पश्चिम एक दूसरे के बिल्कुल विपरीत भावभूमि पर खड़े हैं।
पश्चिमी जगत में अनुभूति जैसी कोई संकल्पना ही नहीं है। इसलिए वे अनुभूति को प्रमाण भी नहीं मानते। अंग्रेजी शब्द ‘रिअलाइजेशन’ का भारतीय भाषाओं में अनुवाद ‘अनुभूति’ किया गया है, परन्तु वह अनुभूति के पूर्ण अर्थ को व्यक्त नहीं करता। रिअलाइजेशन उनके वहाँ बुद्धि से जानने वाला शब्द ही है, जबकि हमारे यहाँ अनुभूति बुद्धि का विषय नहीं है, बुद्धि से परे का विषय है। श्रीमद् भगवद्गीता में कहा गया है –
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मन:।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धे: परतस्तु स:।।
इसका भावार्थ यह है कि इस शरीर से इन्द्रियाँ परे (श्रेष्ठ) हैं, इन्द्रियों से परे मन है, और मन से भी परे बुद्धि है, और जो बुद्धि से भी परे है, वह आत्मा है।
हमारा शरीर स्थूल है जबकि अन्त:करण (मन, बुद्धि, अहंकार व चित्त) सूक्ष्म है। अन्त:करण सूक्ष्म होते हुए भी जड़ है, और आत्मा चेतन है। पश्चिम का चिन्तन भौतिकवादी है। सभी भौतिक पदार्थ जड़ हैं, इसलिए वह जड़ तक ही सीमित है, चेतन तत्त्व बुद्धि से परे का विषय होने के कारण उनकी समझ से बाहर है। अतः उनका रिअलाइजेशन जड़ का विषय है और हमारी अनुभूति चेतन का विषय है, इसलिए वह श्रेष्ठ है।
आज अनुभूति मान्य प्रमाण नहीं है
आज हमारे देश की स्थिति ऐसी बन गई है कि पश्चिमी विद्वानों से प्रभावित भारतीय विद्वान भी अनुभूति को प्रमाण रूप में स्वीकार नहीं करते। अनुभूति के स्थान पर बुद्धि प्रामाण्य को ही मानते हैं। भारतीय ज्ञान परम्परा में वेद और उपनिषद धर्म प्रामाण्य से तो स्वीकार्य है ही, उससे भी अधिक अनुभूति प्रामाण्य से स्वीकार्य है। परन्तु आज भारत का ही विद्वज्जन इसे नकार रहा है। आज हमारे देश में एक ऐसा वर्ग भी है, जो भारतीयता का पक्षधर तो है, परन्तु वेद-उपनिषदादि से अपरिचित है। वे लोग इन्हें प्रमाण मानना या नहीं, इसी दुविधा में जी रहे हैं, इसलिए अनुभूति को प्रमाण मानना इन्हें भी मान्य नहीं है।
अनुभूति प्रमाण हो भी सकती है या नहीं, इस बात का लेशमात्र विचार किए बिना ही यह निर्णय कर लेना कि अनुभूति प्रमाण नहीं हो सकती, उनकी अज्ञानता को ही दर्शाता है। भारतीय विद्वान वेद-उपनिषद, धर्म, अनुभूति आदि प्रमाण हो सकते हैं, इस तथ्य पर ही सन्देह करते हैं या उन्हें सीधा अमान्य ही करते हैं। इसका कारण उनका संस्कृत भाषा का अज्ञान तो है ही,साथ ही साथ वैचारिक अज्ञान भी है।
भारत की प्रमाण व्यवस्था व्यापक है
विचार के क्षेत्र में हमारे सामने दो समूह हैं। एक धर्म प्रमाण, वेद प्रमाण, अनुभूति प्रमाण और आत्म प्रमाण वाला समूह और दूसरा केवल बुद्धि प्रमाण व भौतिक प्रमाण वाला समूह। इस दृष्टि से पश्चिम की प्रमाण व्यवस्था सीमित है, जबकि भारत की प्रमाण व्यवस्था व्यापक है। दोनों में व्यापकता का अन्तर है। इसलिए भारतीय ज्ञानविश्व के लिए यह गौरव का विषय है कि भारत ने कभी व्यापकता को नहीं छोड़ा और परीक्षा के लिए कभी भी सरल व संकुचित निकष नहीं अपनाएँ।
इतना सब कुछ स्पष्ट होने के बाद भी भारत के वर्तमान विश्वविद्यालयों की स्थिति यह है कि इनमें अनुभूति के लिए कोई स्थान नहीं है। विश्वविद्यालय का एक भी प्राध्यापक अपने आपको अनुभूति के स्तर तक ले जाने की कल्पना भी नहीं कर सकता। यह साधना इनके पाठ्यक्रम से बाहर है। विश्वविद्यालयों की नियमावली के प्रावधानों से न अनुभूति प्राप्त की जा सकती है और न पीएचडी जैसी उपाधियाँ निर्मित की जा सकती है। अर्थात् अनुभूति का विषय विश्वविद्यालयों से परे का विषय मान लिया गया है।
अनुभूति को नकारना बुद्धिमानी नहीं है
भारत में अनुभूति को नकारना अज्ञानता है। यह तो उस अज्ञानी व्यक्ति जैसा व्यवहार है जो कीमती रत्नों को पत्थर के टुकड़े समझकर फेंक देता है और उसे तनिक भी दुख नहीं होता। दुख इसलिए नहीं होता कि वह नहीं जानता कि उसने क्या फेंका है। आज वही स्थिति विश्वविद्यालयों के उन प्राध्यापकों की है जो अनुभूति को नकार रहे हैं। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो यह मानते हैं कि उन्हें जो ज्ञात नहीं है, वह होता ही नहीं है। ऐसे लोग अहंकारी व क्षुद्र बुद्धि वाले होते हैं। भारत में ऐसे लोगों का होना शर्म की बात है। इसलिए कम से कम भारत में तो अनुभूति को परम प्रमाण व स्वतः प्रमाण मानना ही चाहिए। यह सम्पूर्ण विश्व के हित में है, इससे ज्ञानविश्व परिष्कृत होगा, समृद्ध होगा और सिद्ध होगा।
आज भी विश्वविद्यालय से बाहर के क्षेत्र में अनुभूति प्राप्त व्यक्ति मिल जाते हैं। परन्तु विश्वविद्यालयों का क्षेत्र श्रद्धावान नहीं है, पदवी, पद, प्रतिष्ठा और पैसा उनके लिए अवरोध बन जाते हैं। इसलिए विश्वविद्यालयों में शुद्ध अन्त:करण वाले अध्यापकों को अनुभूति प्राप्त करने की तपश्चर्या करनी चाहिए। अन्त:करण को शुद्ध करके ज्ञान की उपासना करने वाले साधक को जब मन्त्रदर्शन होता है, तब वह ऋषि कहलाता है। भारत में सदैव ऐसे ऋषि ही ज्ञान और विज्ञान के प्रवर्तक रहे हैं। आज ये बातें कपोल-कल्पित लग सकती हैं, परन्तु जब ऐसी बातें बार-बार कही जाती हैं तो वे संभव लगने लगती हैं। अतः हमें वेद प्रामाण्य और अनुभूति प्रामाण्य को विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में लाना चाहिए। जब तक यह कार्य नहीं होगा, तब तक भारतीय शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा होना भी सम्भव नहीं है। विश्वविद्यालय ज्ञान प्रवाह के मूल हैं, उन्हें अपना दायित्व स्वीकार करना चाहिए।
(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सचिव है।)
विद्या ददाति विनयं, विनयात् याति पात्रताम् ।
पात्रत्वाद् धनमाप्नोति, धनाद् धर्मः ततः सुखम् ।।
नम्रता से व्यक्ति योग्यता प्राप्त करता है। योग्यता से धन प्राप्त करता है। धन से धर्म का आचरण करता है और धर्म से सुख पाता है। अर्थात् :- विद्या मनुष्य को नम्रता प्रदान करती है।
न्याय की देवी अहिल्याबाई होल्कर
सतीश शर्मा
शिव की परम उपासक - सनातन संस्कृति की रक्षक देवी अहिल्याबाई होल्कर एक अनन्य शिव भक्त रही है। शिव शंकर के परम उपासकों में प्रसिद्ध देवी अहिल्याबाई ने कभी अपने नाम का हस्ताक्षर नहीं किया, अपने हस्ताक्षर के रूप में सदैव श्रीशंकर लिखा। उनका हर आदेश भगवन् शिव का आदेश माना जाता था।
अहिल्याबाई का जन्म 31 मई, 1725 में वर्तमान अहमदनगर जिले के जामखेड़ तहसील के चौडी ग्राम में मणकोजी शिंदे के घर में हुआ। एक बार पेशवा महाराजा मालवा से पुणे जा रहे थे, उस दौरान चौंडी ग्राम में उनका पड़ाव हुआ। प्रातःकाल टहलते समय शिव मन्दिर में पूजा में लीन एक बालिका उन्होंने देखी। उन्होंने मल्हार राव से कहा, 'आपके पुत्र खंडेराव के लिए वह बालिका सुयोग्य है, आप उसे अपनी पुत्रवधू बनाओगे तो कुल का नाम उज्ज्वल करेगी।' बालिका को देखकर मल्हार राव भी प्रसन्न हुए थे। पेशवा महाराज ने मणकोजी शिंदे को बुलाकर यह प्रस्ताव रखा। उन्होंने प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार कर लिया। 20 मई, 1737 को खंडेराव होलकर के साथ अहिल्याबाई का विवाह सम्पन्न हुआ।
धीरे-धीरे वह अपने राज्य प्रशासन की बारीकियों के अध्ययन में रूचि लेने लगीं और हाथ बंटाने लगीं। मल्हार राव लड़ाईयों में जाते समय अहिल्या पर राज्य की जिम्मेदारी सौंपकर जाते। अधिकारियों को उचित सूचना देते थे कि राज्य की व्यवस्था देखना, लाभ-हानि का विचार करना आदि अहिल्याबाई के आदेश से ही होगा।
कुशल प्रशासक - 24 मार्च, 1754 को कुंभेरी की लड़ाई में युद्ध के दौरान पति को वीरगति प्राप्त होने के उपरांत प्रशासक के अभाव में राज्य लावारिस एवं शासन हीन न हो, अहिल्याबाई ने राज्य की शासक पुत्र बन रुढ़िवादी परम्पराओं को समाप्त किया। उनके ससुर मल्हार राव व सास गौतमाबाई
का आशीवीद भी सदैव उनके साथ रहा। उनके कुशल नेतृत्व व प्रशासन के कारण प्रजा ने उन्हें देवी की उपाधि दी। जिसके बाद उन्हें अहिल्यादेवी होल्कर पुकारा जाने लगा। वह सनातनी हिन्दुत्वनिष्ठ महारानी के रूप में विख्यात हुईं। उन्होंने अपने शासनकाल में अनेक धार्मिक कार्यों को सम्पन्न करवाया।
सनातन संस्कृति की रक्षक - 18वीं सदी में राजधानी माहेश्वर में नर्मदा नदी के किनारे एक भव्य अहिल्या महल बनवाया। द्वारिका, रामेश्वर, बद्रीनारायण, सोमनाथ, अयोध्या, जगन्नाथपुरी, काशी, गया, मथुरा, हरिद्वार, आदि स्थानों पर कई प्रसिद्ध एवं बड़े मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाया और धर्मशालाओं का निर्माण करवाया। दुनिया भर में प्रसिद्ध वाराणसी स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था। वहीं, अपने शासनकाल में सिक्कों पर 'शिवलिंग और नंदी' अंकित करवाए।
न्याय की देवी भारत की हर नारी को सशक्त बनाने में उनका योगदान है। न्याय प्रिय मां अहिल्याबाई के जीवन की यूं तो बहुत सी सत्य कहानियां है। उनमें से एक सबसे महत्वपूर्ण है, न्याय की देवी अहिल्याबाई का अपने स्वयं के पुत्र को मृत्यु दण्ड की सजा सुनाना। कहते है नारी की शक्ति ममत्व के समक्ष समझौता कर लेती है और पुत्र मोह तो नारी को सदैव प्राणों से प्रिय होता है। अपने पुत्र के प्रेम में एक नारी दुनिया की किसी भी कसौटी से टकराने से नहीं डरती है। अक्सर माँ ऐसी परिस्थिति में सही ग़लत को मानने से भी इंकार कर देती है। परन्तु न्याय के प्रति सदैव सजग रहने वाली देवी अहिल्याबाई होल्कर ने इस कहावत को स्वयं पर चरितार्थ नहीं होने दिया। कुशल प्रशासक, वीरांगना, सनातन संस्कृति रक्षक, शक्ति स्वरूप अहिल्याबाई के बेटे मालोजी राव एक बार अपने रथ से सवार होकर राजबाड़ा के पास से गुजर रहे थे। तभी रास्ते में एक गाय का छोटा-सा बछड़ा खेल रहा था। जैसे ही मालोराव का रथ वहाँ से गुजरा वो बछड़ा रथ की चपेट में आकर बुरी तरह घायल हो गया। और चंद मिनटों में तड़प-तड़प कर बछड़ा मर गया। मालोजी राव ने इस घटना पर ध्यान नहीं दिया और अपने रथ सहित आगे बढ़ गए। वो गाय अपने बछड़े के पास पहुंची और बछड़े को मरा हुआ देखकर वहीं सड़क पर बैठ गई। तभी वहां से अहिल्याबाई का रथ गुजरा। वो ये नजारा देखकर वहीं ठिठक गईं।
आसपास के लोगों से पूछने लगीं कि ये घटना कैसे हुई। किसी की ये हिम्मत नहीं पड़ रही थी कि वो मालोजी राव का नाम बता पाए। परन्तु जैसे ही घटना का पूरा वृतांत पता चला। अहिल्याबाई सीधे अपने घर पहुंचीं। वहां अपनी बहू को बुलाया। उन्होंने अपनी बहू से पूछा कि अगर कोई माँ के सामने उसके बेटे पर रथ चढ़ा दे और रुके भी नहीं तो क्या करना चाहिए। उनके इस सवाल पर उनकी बहू मैनाबाई ने कहा कि ऐसे आदमी को मृत्युदंड देना चाहिए। फिर जब वो सभा में पहुँची तो आदेश दिया कि उनके बेटे मालोजीराव के हाथ-पैर बांध कर ठीक वैसे ही रथ से कुचलकर मृत्यु दंड दिया जाए, जैसे गाय के बछड़े की मौत हुई थी। अहिल्याबाई का यह आदेश सुनकर सभी चौक गए। क्योंकि यह कोई आम शासकीय आदेश नहीं था, अपितु ममतामयी मां का दूसरी मां के प्रति न्याय था।
कोई भी उस रथ की लगाम पकड़ने को तैयार नहीं हुआ। काफी देर इंतजार के बाद स्वयं उठीं और
आकर रथ की लगाम थाम ली। लेकिन जैसे ही रथ को आगे बढ़ाने लगीं, तभी एक ऐसी घटना हुई जिसने सभी को एक नई जीवंत मिसाल दिखाई। क्योंकि जैसे ही वो रथ को आगे बढ़ाने लगीं, तभी वही गाय आकर उनके रथ के सामने खड़ी हो गई। उन्होंने उस गाय को रास्ते से हटाने के लिए कहा, लेकिन वो बार बार आकर रथ के सामने खड़ी हो जाती।
इस घटना से प्रभावित दरबारी और मंत्रियों ने कहा कि आप इस गाय का इशारा समझें वो भी चाहती हैं कि आप बेटे पर दया करें। मानों कह रही है कि किसी मां को अपने बेटे के खून से अपने हाथ नहीं रंगने चाहिए। घटना से मालोजी राव बहुत कुछ सीख चुके थे। यह घटनाक्रम सिर्फ कहानी मात्र नहीं है। यह वह सत्य है जो बताता है, एक शासक का राज्य देश का हर कण, पशु-पक्षी, हर मानव जीवन, कल्याण संसाधन समान न्याय के अन्तर्गत आता है और आना चाहिए।
अहिल्याबाई ने मालवा की रानी के रूप में 28 साल तक न्यायिक श्रेष्ठ सुशासन किया। ओंकारेश्वर के समीप नर्मदा के प्रति असीम श्रद्धा होने कारण उन्होंने महेश्वर को अपनी राजधानी बनाया। भारत के इतिहास की श्रेष्ठ योद्धा रानी अहिल्याबाई होल्कर राजनीति, रणनीति की अनेक शिक्षायें हमें देकर गई है।
वृक्ष ही जीवन हैं
"वृक्षाः रक्षन्तु जीवान्ति, वृक्षाः रक्षन्ति धारिणः। वृक्षाः रक्षन्ति प्राणान्ति, वृक्षाः रक्षन्ति धर्मिणः।" "पेड़ जीवन की रक्षा करते हैं, पेड़ धारण करने वाले को बचाते हैं। पेड़ प्राणियों की रक्षा करते हैं, पेड़ धर्म की रक्षा करते हैं।"
हमारे जीवन में पेड़ों का बहुत महत्व है। हम सबको कम से कम पांच पेड़ अवश्य लगाने चाहिए । ये पेढ है पीपल नीम जामुन आम और बढ़ यह पांच पेड़ हर मनुष्य को लगाने चाहिए ।
क्या आप जानते हैं? एक वयस्क वृक्ष प्रतिदिन 227 लीटर ऑक्सीजन छोड़ता है। एक व्यक्ति प्रतिदिन 550 लीटर ऑक्सीजन पेड़ों से प्राप्त करता है। इस प्रकार से केवल ऑक्सीजन लेने के लिये हमें दो बड़े वृक्षों की आवश्यकता रहती है। एक लीटर ऑक्सीजन का बाजार मूल्य लगभग 15 रुपये है। इस प्रकार 550 लीटर ऑक्सीजन का बाजार मूल्य लगभग रुपये 8250 आता है। वह ऑक्सीजन हम प्रतिदिन दो पेड़ों से प्राप्त करते हैं। एक सामान्य पेड़ सालभर में 20 किलो धूल सोखता है। हर साल करीब 700 किलोग्राम ऑक्सीजन का उत्सर्जन करता है। प्रतिवर्ष 20 टन कार्बन डाइऑक्साइड को रोकता है।
गर्मी में एक बड़े पेड़ के नीचे औसतन 4 डिग्री तक तापमान क रहता है। 80 किलो ग्राम पारा लिथियम लेड आदि जहरीली धातुओं के मिश्रण को सोखने की क्षमता रखता है। हर साल लगभग 100000 वर्ग मीटर दूषित हवा को फिल्टर करता है। घर के करीब एक पेड़ ध्वनिरोधक दीवार की तरह काम करता है। एक वर्षा ऋतु में एक पेड़ औसतन 22000 लीटर पानी को निगल सकता है जो जल आपूर्ति में स्थिरता बनाये रखने और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाताओं से बचाव में मदद करता है।
अल्हड़ी
गोरी कुशवाहा
‘‘नमस्कार जज अंकल,’’ मैं ट्रेन में सीट पर सामान रख कर बैठा ही था कि सामने बैठी एक खूबसूरत व संभ्रांत घर की लगने वाली युवती ने मुझे प्यार व अपनत्व वाली आवाज में अभिवादन किया.
मुझे आश्चर्य हुआ कि यह युवती कौन है और यह मुझे कैसे जानती है कि मैं जज हूं ? और साथ में अंकल का भी संबोधन ? हो सकता है कि यह मेरे किसी भूतपूर्व कलीग जज की बेटी हो या फिर उस की नजदीकी रिश्तेदार हो.
मैं यह सब सोच ही रहा था कि उस ने मुझे प्रश्नवाचक मुद्रा में देख कर मुसकरा कर कहा, ‘‘जज अंकल, आप मुझे नहीं पहचानेंगे. मैं जब आप के कोर्ट में आई थी तब मैं सिर्फ 10 वर्ष की थी. उस समय आप सूर्यपुर में जिला फैमिली कोर्ट में जज थे।
.’’ अरे यह तो बहुत वर्षों पुरानी बात है और मुझे रिटायर हुए भी 5 साल हो गए. किसी को भी इतनी पुरानी बातें कहां से याद आएंगी? और मेरी कोर्ट में तो दिन में सैकड़ों लोग आते थे.
सब के बारे में कैसे कोई याद रख पाएगा? सोचते हुए मैं उसे अभी तक प्रश्नवाचक दृष्टि से देख रहा था और वह शायद समझ गई थी कि मैं उसे अभी तक पहचान नहीं पाया हूं.
‘‘अंकल मैं अल्हड़ी, उस समय आप के कोर्ट में मेरे मम्मी पापा के तलाक का केस चल रहा था और उस केस की कार्यवाही के दौरान आप ने एक दिन मुझ से पूछा था कि बेटा, तुम्हें किस के साथ रहना है? उस ने मुझे याद कराया. वह आगे कुछ बोलती कि मेरे मुंह से अचानक निकला,
‘‘अरे अल्हड़ी.’’ इस लड़की व इस के मम्मी पापा केस को मैं कैसे भूल सकता हूं ? रोज के झगड़े
निबटाते निबटाते मुझे कई बार उकताहट भी होती थी. पर मेरी फैमिली कोर्ट में ड्यूटी के दौरान एक केस ऐसा भी आया था जिस के परिणाम से मैं बहुत खुश था.
इस केस का अंत आश्चर्यजनक व सुखद था. मैं तो क्या इस केस से संबंधित जो भी था, वह इस छोटी लड़की को कैसे भूल सकता है?
‘‘अरे बेटा अल्हड़ी तुम कैसी हो? तुम्हारे मम्मी पापा कैसे हैं ?
’’ मुझे सच में उस से मिल कर खुशी हुई. और ज्यादा खुशी तो उसे खुश देख कर हुई. मैं सच में जानना चाहता था कि क्या उस के मम्मी पापा अभी भी साथ रह रहे हैं?
‘‘अंकल, मैं आप के कारण बहुत खुश हूं. मेरे मम्मीपापा तो एक दूसरे के बिना रह ही नहीं पाते. मैं इस साल सिविल सर्विस में चयनित हुई हूं और प्रशिक्षण के लिए शिमला जा रही हूं. आप उस दिन व्यक्तिगत रुचि नहीं लेते तो शायद मैं भी सिंगल पेरैंट की प्रौब्लमैटिक चाइल्ड होती,’’ उस ने मुझ से भावुक हो कर कहा.
'‘नहीं बेटा, अगर उस दिन तुम कोर्ट में समझदार बच्ची की तरह नहीं बोलतीं, तो शायद तुम्हारे मातापिता जिंदगी की सचाई समझ नहीं पाते और अपने व्यक्तिगत अहम से जिंदगी भर का नुकसान कर लेते. बेटा, तुम सच में बहुत समझदार लड़की हो,’’ मैं ने अपनत्व से कहा.
मैं उस समय सूर्यपुर की फैमिली कोर्ट में जज था और उस दिन अल्हड़ी के मातापिता के तलाक का केस था. पतिपत्नी को मैं ने उन की बच्ची सहित बुलाया था.दोनों ने आते ही शुरू से ही तलाक की मांग जोरदार तरीके से की. पर यह एक जिंदगी भर का फैसला था जिस से कई सारी जिंदगियां जुड़ी हुई थीं, इसलिए मैं ने उन्हें
1 महीने का विचारने का समय दिया गया था. पर वे लोग तलाक पर अडिग थे. अब प्रश्न केवल यह था कि बच्ची किस के साथ रहेगी.
मैं हमेशा यह प्रश्न बच्चों पर ही छोड़ता था. अल्हड़ी 10 साल की बच्ची थी. देखने में सुंदर और साथ में बहुत ही मासूम. उस का चेहरा बता रहा था कि वह कोर्ट में आने से पहले वह बहुत रोई होगी. वह गवाह के कठघरे में आई तो मैं ने हमेशा की तरह उस से भी पूछा कि बेटा किस के साथ रहना चाहती हो?
सामान्यतया बच्चा जिस के करीब होता है उस के साथ रहने को कहता है, क्योंकि बच्चे को यह पता नहीं होता है कि वहाँ क्या हो रहा है.उस ने कुछ देर बाद बोलना शुरू किया,
‘‘मेरा जन्म इन्हीं से हो क्या यह मेरा फैसला था? यदि मेरे जन्म का फैसला मेरे हाथ में होता तो मैं शायद ही इन के द्वारा जन्म लेती. मेरे जन्म के लिए ये लोग साथ रह सकते थे, तो पालने के समय ये लोग किस अधिकार से अलग हो सकते हैं? जब मेरे जन्म का फैसला मेरे हाथ में नहीं था, तो पलने का फैसला मैं कैसे कर सकती हूं? जज अंकल, आप जो भी फैसला करें वह मुझे मंजूर है,’’ उस ने अपने आंसू रोकते हुए बेबसी से कहा.
एक छोटी सी बच्ची के मुंह से इतनी गंभीर बात सुन कर पूरे कोर्टरूम में सन्नाटा छा गया. शायद मुझे जिंदगी में पहली बार पिनड्रौप साइलैंस का मतलब समझ में आ रहा था.
अचानक कोर्टरूम में जोरजोर से हिचकहिचक कर रोने की आवाज सुनाई दी. अल्हड़ी के मातापिता दोनों जोरजोर से रो रहे थे. ‘‘मुझे तलाक नहीं चाहिए जज साहब. मेरा पति भले ही दारू पिए, मुझे मारे या फिर बाहर गुलछर्रे उड़ाए, मैं उस के साथ रहने चली जाऊंगी. मेरे जीवन या मेरी भावनाओं से ज्यादा मेरी बेटी की जिंदगी जरूरी है. उसे अपने मां और पिता दोनों की छत्रछाया की जरूरत है ,
" तलाक लेने पर अड़ने वाली उस की मां यामिनी बोली.
‘‘मुझे माफ कर दो यामिनी, मैं बच्ची की कसम खा कर कहता हूं अब मैं कभी दारू नहीं पिऊंगा,’’ हाथ जोड़ कर अपनी पत्नी से माफी मांगते हुए उस का पिता बोला.
हद से ज्यादा कू्रर दिखने वाला व्यक्ति आज जैसे दया का पात्र लग रहा था. ‘‘जज साहब, हम अपनी तलाक की अर्जी वापस लेते हैं,’’
दोनों ने हाथ जोड़ कर मुझ से कहा. ‘‘बहुत अच्छी बात है. बच्ची का सुखद भविष्य इसी में है. कोर्ट आशा रखती है कि आप लोग हमेशा साथ रहेंगे और एक दूसरे से अच्छा बरताव करेेंगे.
किसी ने सच ही कहा है कि बच्चे रेल की पटरियों को जोड़ने वाले स्लीपर की तरह होते हैं,’’
मैं ने खुशी जताते हुए मुकदमे के अंत पर मुहर लगाई. सच बताऊं मेरी जिंदगी में इतना दिलचस्प केस
कोई और नहीं था. उस दिन सच में मेरी कोर्ट फैमिली कोर्ट लग रही थी, जहां एक फैमिली का मिलन हुआ था।
पहेलियां
1. आतंकी सा आता है, इक खलबजी मचाता है, इंजेक्सन बिमारी का, ताली से मर जाता है ?
2. पीली बस मोटा कर सकती है, खतरनाक है ज्यादा लाल, इसका दुश्मन रोता मिलता, जलन सनसनी से बेहाल ?
3. एक कहे बोरी से ढॉप, दूजा भागे थर-थर काँप, उनको ऐसा क्या दिखा? भाँप सके तो भाँप ?
4. मालिक से मालिश करवाता, वह है एक अनोखा दास काला, उजला या भूरा है, उसमें कुछ तो होता खास ?
5. अक्ल भले ज्यादा न हो, मेहनत में सिरपौर है पा वैशाख मुटाने वाला, धोबी के घर ठौर है?
उत्तर 1. मच्छर,2. बरैया,3. साँप,4. घोड़ा,5. गधा
एक व्यक्तित्व - अलख पांडेय
सस्ती सी एक क़मीज़ पहने एक लड़का यूपी रोडवेज़ के बस में चढ़ा कोई सीट ख़ाली नहीं थी। तो पीछे जाकर खड़ा हो गया। और फिर अचानक से फुट फुटकर रो पड़ा। जितना ख़ुद को रोकने की कोशिश करता उतना ही रोना आता। कंडक्टर ने उसे पानी पिलाई और किराया लेनें से मना कर दिया। मगर लड़का देने पर अड़ा रहा। और रोते रोते अगले स्टॉप पे उतर गया। फ़ोन पे बहन की रिंग बज रही थी। उसने उठाया और रो पड़ा कि "दीदी मेरा सेलेक्शन नहीं हुआ। कोचिंग वालों ने कहा है की मैं बड़ा टीचर नहीं बन सकता।
उधर से बहन ने डाँटा। रोना बंद करो, एक दिन तुम्हें इससे भी बड़ा बनना है अलख पांडेय। लड़का चुप हो गया। बहन की प्रेमभरी डाँट ने दावानल को शांत कर दिया।
कट टू 2022
उत्तरप्रदेश का फ़िज़िक्सवाला बना यूनिकॉर्न की खबरें तैरने लगीं। जगह जगह अलख पांडेय के इंटरव्यू होने लगे।
पर ये सबकुच्छ आसान नहीं था। अलख के पिता बेहद निश्छल हृदय थे। इसी निश्छलता में सबकुछ गँवा बैठे। घर तक बिक गया। बहन अठारह हज़ार की जॉब करती उसमे अपना, भाई का और घर का तीनों खर्च उठाती।
2016 में अलख ने यूट्यूब पर पढ़ाना शुरू किया। शुरू में सफलता नहीं मिली लेकिन एकबार मिली तो मिलती चली गई। जो कोचिंग अलख पांडेय को एक मास्टर की नौकरी पर रखने को तैयार नहीं थी। वो उन्हें करोड़ों का पैकेज ऑफर कर रही थी।
पर अलख की ज़िद्द थी। शिक्षा को गरीब बच्चों तक पहुँचाने की। अलख ने अपने दोस्तों के साथ
फ़िज़िक्स वाला बनाई। और चार हज़ार में Neet और JEE का कंटेंट देना स्टार्ट कर दिया। allen, goal, Akash जैसे प्रतिष्ठित संस्थान हिल गए। सबको अपना फ़ीस कम करना पड़ गया। एक बार अनअकेडमी ने फ़िज़िक्स वाला के टीचर पोच कर लिये। बच्चों ने हंगामा काट दिया। अलख पांडेय को लाइव आकर उन्हें शांत करना पड़ा।
अलख ने ऑनलाइन फ़िज़िक्स के प्रयोगों को दिखाना शुरू किया और ये इतना पॉपुलर हुआ की आज भतेरे टीचर ये कर रहे हैं।
कट टू 2024
नीट परीक्षा में धांधली हुई। बच्चों को समझ नहीं आ रहा था क्या करें। पर अकेले अलख पांडेय ने माहौल बना दिया। कोटा से NV सर जैसे कई प्रतिष्ठित टीचर NTA ऑफिस पहुँच गये।
अलख ने कई वीडियो पोस्ट और इंटरव्यू की माध्यम से जागरूकता फैलाई। विपक्ष से लेकर मीडिया तक इस मुद्दे को उठाने लगा। फिर देश के नामी वकील जे साईं दीपक को हायर किया और सुप्रीम कोर्ट गए। जहां आज NTA ने ग्रेस वाली धांधली स्वीकार करके, ग्रेस मार्क रद्द कर दिया है।
पेपर लीक के मुद्दे पर अभी भी उनका केस सुप्रीम कोर्ट सुन रहा है। ऐसे लोग हैं देश का भविष्य और यहीं लोग किसी भी महान राष्ट्र का निर्माण करते हैं ।
स्वास्थ जीवन के लिये धारण करने योग्य वातें
1. रोज प्रातःकाल सूर्योदय से पहले उठो। उठते ही भगवान को प्रणाम करो, फिर हाथ-मुँह धोकर उषःपान करो। ठंडे जल से आँखें घोओ। 2. प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान करके सूर्य को अघ्य दो। 3. दोनों समय (प्रातः और संध्या) नियमपूर्वक श्रद्धा के साथ भगवत्प्रार्थना या संध्या करो। 4. भोजन के समय जल न पीयो या बहुत थोड़ा पियो । 5. हजामत और नख न बढ़ने दो, परंतु शौक से दिन में दो बार बनाओ भी नहीं। 6. अपरिचित व्यक्ति से दवा न लो, जादू-टोना किसी से भी न करवाओ 7. जहाँ भी रहो किसी वयोवृद्ध अनुभवी पुरुष को अपना हितैषी जरुर बना लो । विपत्ति के समय उसकी सलाह बहुत काम देगी। 8. जहाँ रहो अपनी ईमानदारी, वफादारी, होशियारी, कार्य-कुशलता, मीठे वचन, परिश्रम और सच्चाई से अपनी जरुरत पैदा कर दो अपना स्थान स्वयं बना लो । 9. बिना ही करण मान-बड़ाई के लिए न तरसो, गरीबी से ना डरो बेईमानी और बुरी आदतों से अवश्य भय करो। 10. सदा अशुभ भावनाओं से अपने को न घिरा रहने दो। उनको दूर भगाये रखो। 11. दूसरों के दोष न देखो, अपने देखो। किसी को छोटा न समझो अपना दोष स्वीकार करने को सदा तैयार रहो।12. अपने दोषों की डायरी रखो, रात को उसे रोज देखो और कल ये दोष नहीं होंगे, ऐसा दृढ़ निश्चय करो। 13. जीवन का प्रधान लक्ष्य एक ही है, यह दृढ़ निश्चय कर लो, वह लक्ष्य है- 'भगवान की उपलब्धि' । 14. विषय चिन्तन, अशुभचिन्तन का त्याग करके यथासाध्य भगवच्चिन्तन का अभ्यास करो
खिंचाव माटी का
बालेश्वर गुप्ता नोयडा
तेजस जी के बहनोई सुनील अमेरिका में जॉब करते थे।जब कभी भारत आते तो तेजस जी से भी मिलने आते।खूब सारे अमेरिकन गिफ्ट भी लाते।तेजस जी को किसी चीज की कमी नही थी खुद सम्पन्न थे,पर जब सुनील अमेरिकन गिफ्ट लाते तो उनमें एक हीन भावना घर जाती।एक कशिश दिल मे उठ जाती कि वे खुद अमेरिका नही जा पाये।उनके मन मे ये लालसा अधूरी रह गयी थी।तेजस जी के एक ही बेटा था,प्यार से उसे वे विक्की पुकारते थे।वह हाई स्कूल का एग्जाम दे चुका था।तेजस जी ने मन मे यह निश्चय कर लिया था कि वे भले ही अमेरिका न जा पाये हो पर वे अपने विक्की को हर हालत में अमेरिका भेजेंगे।
अपनी इस अभिलाषा को उन्होंने अपनी पत्नी उषा के अतिरिक्त किसी को जाहिर नही किया,हाँ विक्की को जरूर जताते रहते बेटा जल्द आई टी कर ले तुझे अमेरिका में ही नौकरी करनी है।विक्की को यह सुनकर अच्छा तो लगता फिर कहता पर वहां मम्मी पापा मेरे पास नही होंगे तो मैं आप बिन कैसे रहूंगा?अरे उसकी चिंता मत कर हम साल दो साल में तेरे पास आते रहेंगे।
तेजस जी के सोचने का दायरा मात्र इतना रह गया था कि उनका बेटा अमेरिका अवश्य चला जाये, वहां जॉब करेगा तो उनका सपना पूरा होगा आखिर वह समय भी आ ही गया।विक्की का जॉब अमेरिका में लग गया,तेजस जी पूरे उत्साह के साथ विक्की के जाने की तैयारी में लग गये।अपनी जान पहचान में अपनी रिश्तेदारी में शायद ही कोई बचा हो जिसे तेजस जी ने गर्व पूर्वक ये न बताया हो कि उनका बेटा अमेरिका जा रहा है।
विक्की अमेरिका चला गया,तेजस जी भी साल डेढ़ साल में तीन तीन महीने को विक्की के पास अमेरिका हो आते।वही एक बार उनका परिचय एक भारतीय परिवार से हो गया।शंकरलाल जी के पिता कभी अमेरिका आये थे,तो यही रह गये। शंकर लाल जी की परवरिश अमेरिका में ही हुई थी,शादी अवश्य भारतीय लड़की से हुई थी।शंकरलाल जी का भारत जाना न के बराबर होता,सही बात तो यह है कि उन्होंने एक प्रकार से अमेरिकी कल्चर अपना ली थी,इसी परिवेश में शंकरलाल जी के बच्चे भी पले बढ़े।उनकी बेटी शर्मिला और बेटा हरीश भी देखने मे भारतीय लगते थे पर अमेरिकी संस्कृति में वे भी पगे थे।अमेरिका प्रवास के दौरान तेजस जी और शंकरलाल जी की अच्छी खासी मित्रता हो गयी।दोनो परिवारों में आना जाना हो गया।
इसी मित्रता पूर्ण वातावरण में शंकरलाल जी ने अपनी बेटी शर्मिला की विक्की से शादी का प्रस्ताव रख दिया।तेजस जी को प्रस्ताव बुरा नही लगा।शर्मिला सुंदर थी,जॉब भी करने लगी थी और सबसे बड़ी बात वह भी अमेरिका में ही रहती थी।
विक्की ने अपने पिता से विरोध प्रकट किया,विक्की का कहना था,पापा मैं भारतीय लड़की से शादी करना चाहता हूँ।शर्मिला भारतीय जैसी दिखती तो जरूर है पर वह भारतीय संस्कार नही
रखती।शंकरलाल जी ने अधिकार पूर्ण स्वर में कहा देखो बेटा तुमने खुद कोई लड़की पसंद कर रखी हो तो बात दूसरी है,अन्यथा तुम्हारे लिये शर्मिला सर्वथा उपयुक्त है।
विक्की शर्मिला की शादी हो गयी।दोनो अमेरिका में ही रहते थे,दोनो ने अमेरिकन नागरिकता ली हुई थी,इस कारण कोई समस्या नही आयी।शर्मिला एक डोमिनेटिंग नेचर की लड़की थी,वह विक्की पर हावी रहती,उसे विक्की का भारत अपने माता पिता के पास जाना पसंद नही था।धीरे धीरे तेजस जी एवम विक्की का संपर्क मात्र वीडियो कॉल तक सीमित हो गया।तेजस जी उम्र के साथ कमजोर भी होने लगे थे,शुगर,कोलेस्ट्रॉल जैसी बीमारियों ने घेर लिया था।उनकी पहले जैसी चुस्ती दुरुस्ती सपना बन गयी थी।उन्हें अहसास होने लगा था कि इस उम्र में उनका बेटा उनके पास होना चाहिये था,पर दोष किसे दे,भेजा तो उन्होंने ही था।उन्हें कभी कभी अपने पर झुंझल आती,क्यों उन्होंने अपने बेटे को अपनी ही जड़ो से काट दिया।वे अपनी पीड़ा को अवसर देख विक्की से कह भी देते,बेटा अब अकेले नही रहा जाता,लौट आ।
विक्की अपने पिता के मनोभावों को समझ तो रहा था,पर करे तो क्या करे,सब कुछ करा धरा को उसके पिता का ही था।इधर शर्मिला भारत बिल्कुल भी नही जाना चाहती थी।विक्की को क्रोध अपने पिता पर तो था ही कि उन्होंने खुद उसे विदेश भेजा और उसकी शादी भी यही करा दी जो एक प्रकार से विदेशी ही हो चुके थे,उसका क्रोध अपनी पत्नी शर्मिला पर भी था जो उसकी इच्छा, उसके माता पिता को बिल्कुल भी महत्व नही दे रही थी।बेबसी के इस वातावरण में उसने भारत की कंपनियों में भी जॉब के लिये आवेदन कर दिया, बिना शर्मिला को बताये।
तेजस जी को हल्का सा हार्ट अटैक आया,तो उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया।तेजस का मन चीत्कार कर उठा।उसे पिता के पास होना चाहिये पर शर्मिला बिल्कुल भी तैयार नही थी।आखिर उसने निर्णय
लिया और शर्मिला से बोला शर्मील देखो मेरे माता पिता को मेरी जरूरत है,मुझे उनके साथ रहना चाहिये, प्लीज तुम्हें मेरी पत्नी होने के कारण मेरा सहयोग करना चाहिये।उनकी जीवन यात्रा रह ही कितनी गयी है।हम वहां संतोष महसूस करेंगे,शर्मिल चलो भारत चले।शर्मिला ने स्पष्ट इनकार कर दिया,साथ ही चेतावनी भी दे दी कि यदि वह जायेगा तो वह तलाक ले लेगी।विक्की अवाक सा शर्मिला का मुँह देखता रह गया।तलाक जैसी बात एकदम से उसके मुंह से सुन विक्की अंदर तक दरक गया।उसने सोचा कि आखिर उसने पाया क्या,न तो वह माँ पिता को पा सका और पत्नी को पाया तो ऐसे जो उसकी भावनाओं को तलाक के साथ तराजू में तौल रही हो।
कई दिनों के उहा पोह के बाद विक्की एक दिन बोला शर्मिल मैं भारत वापस जा रहा हूँ,मैं चाहता हूं मेरी पत्नी भी मेरे साथ चले।शर्मिला के पुनः मना करने पर विक्की शर्मिला से यह कहकर कि ठीक है शर्मिल मैं जा रहा हूं, तुम्हारा इंतजार करूँगा।यदि मेरे प्रति जरा भी अनुराग पनपे तो शर्मिल आ जाना मेरे पास,मैं स्वागत ही करूँगा।
विक्की भारत आ गया अपने पापा मम्मी के पास।विक्की के जाने के बाद शर्मिला को तन्हाई में विक्की के साथ बिताये पल याद आते तो वह बेचैन हो जाती।उसके सामने कभी तो विक्की का प्यार
भरा हँसता चेहरा घूमता तो कभी वह मासूम सा चेहरा जो कह रहा हो आ जाओ ना शर्मिल,मैं अकेला हूँ।ये भावनाये शायद अमेरिकन संस्कृति पर उसके भारतीय जीन्स के कारण हावी हो रही थी।एकांत में उसे क्रोध आता कि वह क्यो नही विक्की से तलाक ले रही? कौनसी शक्ति उसे रोक रही है?भारतीय संस्कृति या विक्की का प्यार?निर्णय तो न कर सकी पर यह स्पष्ट हो गया कि वह विक्की के बिना रह नही पायेगी।
सुबह की फ्लाइट में बैठी शर्मिला आंखे बंद कर सोच रही थी कि पता नही भारत कैसा होगा,मेरा विक्की तो मेरी राह देखता ही होगा तो भारत भला अच्छा क्यो नही होगा?
मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत् ।
आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः ।।
अर्थात् :- दूसरे की स्त्री को अपनी माता के समान,दूसरे के धन को मिट्टी के समान एवं सभी जीवों को अपने (स्वयं के) ही समान देखता व समझता है वही वास्तव में पण्डित (ज्ञानी) है।
गजल
जिन्हें हम प्यार से दिन रात पलकों पर बिठाते हैं
वही अक्सर हमें क्यूँ ख़ून के आंसू रुलाते हैं
पड़े जब काम तो वो आपको मक्खन लगाते हैं
निकल जाए जब उनका काम तो दामन छुड़ाते हैं
थमा कर हाथ अपना हम जिन्हें चलना सिखाते हैं
वही इक दिन हमें अपने इशारों पर नचाते हैं
हज़ारों आरियाँ चलती हैं सीने पर हमारे जब
हमारी आँख के तारे हमें आँखें दिखाते है
अलग हैं रास्ते सबके अलग हैं मंज़िलें भी फिर
किसी के रास्ते में लोग क्यूँ काँटे बिछाते हैं
जो बचपन में ही पा लेते हैं मंज़िल अपनी मेहनत से
बड़े हो कर वो अक्सर चैन की वंशी बजाते हैं
हवा देते हैं पहले तो ये सब ग़मख़्वार ज़ख़्मों को
बहा कर चार आँसू उनपे फिर मरहम लगाते हैं
हुआ क्या है ये दौर-ए-नौ के इंसानों को या मौला
ये हर इक बात पर क्यूँ आसमाँ सर पर उठाते हैं
ग़ज़ल कहना नहीं है खेल बायें हाथ का “मधुमन “
इसे कहने में शाइर के पसीने छूट जाते हैं
कलियुग का लक्ष्मण
नेहा
" भैया, परसों नये मकान पे हवन है। छुट्टी (रविवार) का दिन है। आप सभी को आना है, मैं गाड़ी भेज दूँगा।" छोटे भाई लक्ष्मण ने बड़े भाई सागर से मोबाईल पर बात करते हुए कहा।
" क्या छोटे, किराये के किसी दूसरे मकान में शिफ्ट हो रहे हो ?"
" नहीं भैया, ये अपना मकान है, किराये का नहीं ।"
" अपना मकान", भरपूर आश्चर्य के साथ सागर के मुँह से निकला।
"छोटे तूने बताया भी नहीं कि तूने अपना मकान ले लिया है।"
" बस भैया ", कहते हुए लक्ष्मण ने फोन काट दिया।
" अपना मकान" , " बस भैया " ये शब्द भरत के दिमाग़ में हथौड़े की तरह बज रहे थे।
सागर और लक्ष्मण दो सगे भाई और उन दोनों में उम्र का अंतर था करीब पन्द्रह साल। लक्ष्मण जब करीब सात साल का था तभी उनके माँ-बाप की एक दुर्घटना में मौत हो गयी। अब लक्ष्मण के पालन-पोषण की सारी जिम्मेदारी सागर पर थी। इस चक्कर में उसने जल्द ही शादी कर ली कि जिससे लक्ष्मण की देख-रेख ठीक से हो जाये।
प्राईवेट कम्पनी में क्लर्क का काम करते सागर की तनख़्वाह का बड़ा हिस्सा, दो कमरे के किराये के मकान और लक्ष्मण की पढ़ाई व रहन-सहन में खर्च हो जाता। इस चक्कर में शादी के कई साल बाद तक भी सागर ने बच्चे पैदा नहीं किये। यह सोच कर कि, जितना बड़ा परिवार उतना ज्यादा खर्चा।
पढ़ाई पूरी होते ही लक्ष्मण की नौकरी एक अच्छी कम्पनी में लग गयी और फिर जल्द ही शादी भी हो गयी। बड़े भाई के साथ रहने की जगह कम पड़ने के कारण उसने एक दूसरा किराये का मकान ले लिया।
वैसे भी अब सागर के पास भी दो बच्चे थे, लड़की बड़ी और लड़का छोटा।
मकान लेने की बात जब भरत ने अपनी बीबी को बताई तो उसकी आँखों में आँसू आ गये।
वो बोली, " देवर जी के लिये हमने क्या नहीं किया। कभी अपने बच्चों को बढ़िया नहीं पहनाया। कभी घर में महँगी सब्जी या महँगे फल नहीं आये। दुःख इस बात का नहीं कि उन्होंने अपना मकान ले लिया, दुःख इस बात का है कि ये बात उन्होंने हम से छिपा कर रखी।"
रविवार की सुबह लक्ष्मण द्वारा भेजी गाड़ी, सागर के परिवार को लेकर एक सुन्दर से मकान के आगे खड़ी हो गयी। मकान को देखकर सागर के मन में एक हूक सी उठी। मकान बाहर से जितना सुन्दर था अन्दर उससे भी ज्यादा सुन्दर।
हर तरह की सुख-सुविधा का पूरा इन्तजाम था। उस मकान के दो एक जैसे हिस्से देखकर सागर ने मन ही मन कहा, " देखो छोटे को अपने दोनों लड़कों की कितनी चिन्ता है। दोनों के लिये अभी से एक जैसे दो हिस्से (portion) तैयार कराये हैं। पूरा मकान सवा-डेढ़ करोड़ रूपयों से कम नहीं होगा। और एक मैं हूँ, जिसके पास जवान बेटी की शादी के लिये लाख-दो लाख रूपयों का इन्तजाम भी नहीं है।"
मकान देखते समय सागर की आँखों में आँसू थे जिन्हें उन्होंने बड़ी मुश्किल से बाहर आने से रोका।
तभी पण्डित जी ने आवाज लगाई, " हवन का समय हो रहा है, मकान के स्वामी हवन के लिये अग्नि-कुण्ड के सामने बैठें।"
लक्ष्मण के दोस्तों ने कहा, " पण्डित जी तुम्हें बुला रहे हैं।"
यह सुन लक्ष्मण बोले, " इस मकान का स्वामी मैं अकेला नहीं, मेरे बड़े भाई सागर भी हैं। आज मैं जो भी हूँ सिर्फ और सिर्फ इनकी बदौलत। इस मकान के दो हिस्से हैं, एक उनका और एक मेरा।"
हवन कुण्ड के सामने बैठते समय लक्ष्मण ने सागर के कान में फुसफुसाते हुए कहा, " भैया, बिटिया की शादी की चिन्ता बिल्कुल न करना। उसकी शादी हम दोनों मिलकर करेंगे ।"
पूरे हवन के दौरान सागर अपनी आँखों से बहते पानी को पोंछ रहे थे, जबकि हवन की अग्नि में धुँए का नामोनिशान न था ।
ॐ श्री श्याम देवाय नमः
महा मंत्र का जाप करने से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।
पौधा नकली अजवायन
चित्र में दिख रहा पौधा नकली अजवायन का हैं क्योंकि अधिकतर लोग इसे अजवायन ही समझते हैं और इस भ्रम का मुख्य कारण इसकी अजवायन की तरह आने वाली खुशबु हैं...... इसमे फूल नहीं आते तो फिर अजवायन आना तो बहुत दूर की बात हैं....... ये कटिंग से ही लग जाता हैं....इसकी पत्तियां मोटी, रसदार और खुशबूदार होती हैं यह न सिर्फ खाने में स्वाद और सुगंध बढ़ाती हैं इनके पत्तों की बेशन के साथ पकौड़ी भी बन जाती है चाय में भी इसकी पत्ती डाल सकते हो अच्छी सुगंध आती है असल में इस पौधे को आमतौर पर मैक्सिकन मिंट, क्यूबन ऑरेगैनो, भारतीय बोरेज या अजवाइन के पत्तों के नाम से जाना जाता है। यह अपनी सुगंधित पत्तियों और विभिन्न पारंपरिक औषधीय उपयोगों के लिए जाना जाता है....इसके पकौड़े बहुत स्वादिष्ट बनते हैं.....
आइए जाने इस नकली अजवायन के बेशुमार लाभ.....
श्वसन स्वास्थ्य: पत्तियों का उपयोग पारंपरिक रूप से सर्दी, खांसी, गले में खराश, नाक बंद होने और साइनस की समस्याओं से राहत पाने के लिए किया जाता है। इनमें कफ निस्सारक तत्व होते हैं जो श्वसन मार्ग से बलगम और कफ को साफ करने में मदद करते हैं......
पाचन स्वास्थ्य: इसका उपयोग पेट फूलने जैसी पाचन संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए किया जाता है....
मूत्रवर्धक गुण: भारतीय बोरेज एक मूत्रवर्धक के रूप में कार्य कर सकता है, जो पेशाब की मात्रा बढ़ाकर शरीर से विषाक्त पदार्थों को निकालने में सहायता करता है और अतिरिक्त नमक, वसा और पानी को नियंत्रित करने में मदद करता है, जो गुर्दे और लसीका प्रणाली के कार्य का समर्थन करता है.....
एंटीऑक्सीडेंट गुण: इसकी पत्तियां एंटीऑक्सीडेंट्स और बायोएक्टिव यौगिकों से भरपूर होती हैं.....
त्वचा की स्थिति: पारंपरिक चिकित्सा में, इसका उपयोग विभिन्न त्वचा संबंधी स्थितियों के उपचार के लिए भी किया जाता रहा है......
इसकी पत्तियां मोटी, रसदार और खुशबूदार होती हैं। यह न सिर्फ खाने में स्वाद और सुगंध बढ़ाती हैं बल्कि औषधीय गुणों से भी भरपूर है।
कैसे ले?
खांसी-जुकाम में रामबाण – पत्तियों का रस या चाय लेने से गले की खराश और खांसी में आराम।
पाचन में सहायक – गैस, अपच, पेट दर्द में अजवायन पत्ते की चाय बेहद लाभकारी।
सर्दी के मौसम में प्रतिरक्षा बढ़ाए – विटामिन और मिनरल्स से भरपूर।
त्वचा रोगों में उपयोगी – पत्ते का लेप लगाने से फोड़े-फुंसी में राहत। 2–3 पत्ते धोकर हल्का सा मसल लें और अदरक के साथ पानी में उबालकर पिएं। खास बात यह हैं कि ये पौधा आसानी से गमले में उगाया जा सकता है, ज्यादा देखभाल की जरूरत नहीं।
सामान्य ज्ञान
1. हड्डियों की मजबूती के लिए हमारे भोजन में कौन सा तत्व होना आवश्यक है ? 2. किस मुगल बादशाह ने फतेहपुर सीकरी को अपनी राजधानी बनाया था ? 3. ऐश्वर्या राय ने कौन सी अन्तर्राष्ट्रीय सौन्दर्य प्रतियोगिता जीती थी ? 4. रामायण में भरत की माता कौन थी ? 5. 'हितोपदोश' मूलतः किस भाषा में लिखा गया ? 6. पहला राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार कब और किसको दिया गया ? 7. कौन सा कीड़ा अपने शिकार को पकड़ने के लिए जाला बुनता है? 8. ओलिम्पिक खेलों में सबसे छोटी दौड़ कौन सी है ? 9. पुराणों के अनुसार यक्षों का राजा कौन है? 10. 1982 के एशियाई खेलों में शुभंकर का क्या नाम था ? 11. पहले और अन्तिम जैन तीर्थकर कौन थे ? 12. हमारे किस अंग में हड्डी नहीं होती ? उत्तर 1. कैल्शियन, 2. अकबर, 3. मिस वर्ल्ड, 4. कैकेयी, 5. संस्कृत. 6. 1992, विश्वनाथ आनन्द, 7. मकड़ी, 8. 100 मीटर, 9. कुबेर, 10. अप्पू, 11. कादिनाथ, महावीर, 12. जीभ ।
सितंबर मास 2025 का पंचांग
भारतीय व्रतोत्सव सितंबर -2025
दि. 2- रामदेवजी का मेला (नवल.),दि. 3- पद्मा एकादशी व्रत, जलझूलनी मेला, श्रीचार-भुजा नाथ गणगौर (मेवाड़),दि. 4- वामन जयंती,दि. 5- प्रदोष व्रत,दि. 7- सत्य व्रत, खग्रास चन्द्रग्रहण, प्रौष्ठपदी पूर्णिमा श्राद्ध, भागवत सप्ताह समाप्त,दि. 10-गणेश चतुर्थी व्रत,दि. 14-श्री महालक्ष्मी व्रत समाप्त, कालाष्टमी,दि. 17-संक्रांति पुण्य, इंद्रा एकादशी व्रत,दि. 19-प्रदोष व्रत,दि. 20-मास शिवरात्रि,टि 21-अमावस्या पण्य,दि.22-नवरात्र प्रारम्भ, अग्रसेन जयंती,दि.25-विनायक चतुर्थी व्रत,दि. 26-उपांग ललिता जयंती,दि.29-सरस्वती आवाहन,दि.30-दुर्गाष्टमी, महाष्टमी व्रत, सरस्वती पूजन
मूल विचार सितंबर -2025
दि. 31 अग. को 17/27 से दि. 2 को 21/51 तक, दि. 9 को 18/07 से दि. 11 को 13/57 तक, दि. 18 को 6/32 से दि. 20 को 8/05 तक, दि. 28 को 1/08 से दि. 30 को 6/16 बजे तक गण्ड मूल नक्षत्र हैं।
ग्रह स्थिति सितंबर -2025
दि. 2 बुधास्त पूर्व,दि. 13 तुला में मंगल,दि. 14 सिंह में शुक्र,दि. 15 कन्या में बुध,दि. 16 कन्या में सूर्य
पंचक विचार सितंबर -2025
पंचक विचार -(धनिष्ठा नक्षत्र के तृतीय चरण से रेवती नक्षत्र तक) पंचको में दक्षिण दिशा की ओर यात्रा करना मकान दुकान आदि की छत डालना चारपाई पलंग आदि बुनना,दाह संस्कार,बांस की चटाई दीवार प्रारंभ करना आदि स्तंभ रोपण तांबा पीतल तृण काष्ट आदि का संचय करना आदि कार्यों का निषेध माना जाता है समुचित उपाय एवं पंचक शांति करवा कर ही उक्त कार्यों का संपादन करना कल्याणकारी होगा ध्यान रहेगा पंचर नक्षत्रों का विचार मात्र उपरोक्त विशेष कृतियों के लिए ही किया जाता है विवाह मंडल आरंभ गृह प्रवेश प्रवेश उपनयन आदि मुद्दों से तो पंचक नक्षत्रका प्रयोग शुभ माना जाता है पंचक विचार- दिनांक 06 को 11-21 से दिनांक 10 को 16-03 बजे तक पंचक है |
अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527,9560518227
भद्रा विचार सितंबर -2025
भद्रा काल का शुभ अशुभ विचार - भद्रा काल में विवाह मुंडन, गृह प्रवेश, रक्षाबंधन आदि मांगलिक कृत्य का निषेध माना जाता है परंतु भद्रा काल में शत्रु का उच्चाटन करना,स्त्री प्रसंग में,यज्ञ करना,स्नान करना,अस्त्र शस्त्र का प्रयोग,ऑपरेशन कराना, मुकदमा करना,अग्नि लगाना,किसी वस्तु को काटना,भैस,घोड़ा व ऊंट संबंधी कार्य प्रशस्त माने जाते हैं सामान्य परिस्थिति में विवाह आदि शुभ मुहूर्त में भद्रा का त्याग करना चाहिए परंतु आवश्यक परिस्थितिवश अतिआवश्यक कार्य भूलोक की भद्रा ,भद्रा मुख छोड़कर कर भद्रा पुच्छ में शुभ कार्य कर सकते है |
दि 3 को 16/08 से दि. 4 को 4/22 तक, दि. 7 को 1/41 से 12/43 तक, दि. 10 को 5/03 से 15/38 तक, दि. 13 को 7/23 से 18/13 तक, दि. 16 को 12/53 स दि. 17 को 0/22 तक, दि. 19 को 23/37 से दि. 20 को 11/53 तक, दि. 25 को 20/19 से दि. 26 को 9/33 तक, दि. 29 को 16/31 से दि. 30 को 5/20 बजे तक भद्रा है।
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सर्वार्थ सिद्धि योग सितंबर -2025
दैनिक जीवन में आने वाले महत्वपूर्ण कार्यों के लिए शीघ्र ही किसी शुभ मुहूर्त का अभाव हो,किंतु शुभ मुहर्त के लिए अधिक दिनों तक रुका ना जा सकता हो तो इन सुयोग्य वाले मुहर्तु को सफलता से ग्रहण किया जा सकता है | इन से प्राप्त होने वाले अभीष्ट फल के विषय में संशय नहीं करना चाहिए यह योग हैं सर्वार्थ सिद्धि,अमृत सिद्धि योग एवं रवियोग | योग्यता नाम तथा गुण अनुसार सर्वांगीण सिद्ध कारक है|
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चौघड़िया मुहूर्त
चौघड़िया मुहूर्त, ज्योतिष में शुभ और अशुभ समय जानने की एक प्रणाली है। यह 24 घंटों को 8 भागों में विभाजित करता है, जिन्हें चौघड़िया कहा जाता है। प्रत्येक चौघड़िया एक निश्चित अवधि का होता है, और इन्हें शुभ और अशुभ कार्यों के लिए उपयुक्त माना जाता है।
चौघड़िया मुहूर्त क्या है? 24 घंटों को 16 भागों में बांटा जाता है, जिन्हें चौघड़िया कहा जाता है। प्रत्येक चौघड़िया लगभग 1- 30 घंटे का होता है।
शुभ-अशुभ - कुछ चौघड़िया शुभ माने जाते हैं, जैसे अमृत, शुभ, लाभ, और चर। कुछ अशुभ माने जाते हैं, जैसे रोग, उद्वेग, और काल। चौघड़िया का उपयोग शुभ कार्यों, जैसे विवाह, यात्रा, और व्यापार शुरू करने के लिए शुभ समय जानने के लिए किया जाता है। चौघड़िया के प्रकार,दिन का चौघड़िया,
सूर्योदय से सूर्यास्त तक के समय को दिन का चौघड़िया कहा जाता है। रात का चौघड़िया,सूर्यास्त से अगले दिन के सूर्योदय तक के समय को रात का चौघड़िया कहा जाता है।
चौघड़िया का महत्व - चौघड़िया मुहूर्त का उपयोग किसी भी शुभ कार्य को शुरू करने के लिए एक अच्छे समय का चयन करने के लिए किया जाता है। यह माना जाता है कि यदि कोई कार्य शुभ चौघड़िया में शुरू किया जाता है, तो उसके सफल होने की संभावना अधिक होती है।
सुर्य उदय- सुर्य अस्त सितंबर -2025
राहू काल
राहुकाल -राहुकाल दक्षिण भारत की देन है,दक्षिण भारत में राहु काल में कृत्य करना अच्छा नहीं माना जाता, राहु काल में शुभ कृतियों में वर्जित करने की परंपरा अब हमारे उत्तरी भारत में भी अपनाने लगे हैं राहुकाल प्रतिदिन सूर्यादि वारों में भिन्न-भिन्न समय पर केवल डेढ़ डेढ़ घंटे के लिए घटित होता है |
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मांगलिक दोष विचार परिहार
वर अथवा कन्या दोनों में से किसी की भी कुंडली में 1,4,7,8 व 12 भाव में मंगल होने से ये मांगलिक माने जाते हैं,मंगली से मंगली के विवाह में दोष न होते हुए भी जन्म पत्रिका के अनुसार गुणों को मिलाना ही चाहिए यदि मंगल के साथ शनि अथवा राहु केतु भी हो तो प्रबल मंगली डबल मंगली योग होता है | इसी प्रकार गुरु अथवा चंद्रमा केंद्र हो तो दोष का परिहार भी हो जाता है |इसके अतिरिक्त मेष वृश्चिक मकर का मंगल होने से भी दोष नष्ट हो जाता है | इसी प्रकार यदि वर या कन्या किसी भी कुंडली में 1,4,7,9,12 स्थानों में शनि हो केंद्र त्रिकोण भावो में शुभ ग्रह, 3,6,11 भावो में पाप ग्रह हों तो भी मंगलीक दोष का आंशिक परिहार होता है, सप्तम ग्रह में यदि सप्तमेश हो तो भी दोष निवृत्त होता है |
स्वयं सिद्ध मुहूर्त
स्वयं सिद्ध मुहूर्त चैत्र शुक्ल प्रतिपदा वैशाख शुक्ल तृतीया अक्षय तृतीया आश्विन शुक्ल दशमी विजयदशमी दीपावली के प्रदोष काल का आधा भाग भारत में से इसके अतिरिक्त लोकाचार और देश आचार्य के अनुसार निम्नलिखित कृतियों को भी स्वयं सिद्ध मुहूर्त माना जाता है बडावली नामी देव प्रबोधिनी एकादशी बसंत पंचमी फुलेरा दूज इन में से किसी भी कार्य को करने के लिए पंचांग शुद्धि देखने की आवश्यकता नहीं है परंतु विवाह आदि में तो पंचांग में दिए गए मुहूर्त व कार्य करना श्रेष्ठ रहता है।
पद्मा एकादशी
यह एकादशी, भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी, भगवान विष्णु के वामन अवतार को समर्पित है। के अनुसार. इस दिन व्रत रखने और भगवान विष्णु की पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह एकादशी भगवान विष्णु के वामन अवतार को समर्पित है। इस दिन व्रत रखने और भगवान विष्णु की पूजा करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है। यह एकादशी मोक्ष प्रदान करने वाली मानी जाती है। इस दिन भगवान विष्णु अपनी योगनिद्रा में करवट बदलते हैं।
पद्मा एकादशी व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, सतयुग में बलि नामक एक दानव राजा था, जो तीनों लोकों का स्वामी था। वह अत्यंत बलशाली और धर्मात्मा था, लेकिन भगवान विष्णु के प्रति उसकी भक्ति नहीं थी। एक बार, बलि ने देवताओं को पराजित करके स्वर्ग पर अधिकार कर लिया, जिससे देवता भयभीत होकर भगवान विष्णु की शरण में गए।
देवताओं की रक्षा के लिए, भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया और बलि के यज्ञ में भिक्षा मांगने पहुंचे। बलि ने वामन रूपी भगवान को तीन पग भूमि दान करने का वचन दिया। वामन भगवान ने अपना आकार बढ़ाया और दो पग में ही तीनों लोकों को नाप लिया। तीसरे पग के लिए, बलि ने अपना सिर झुका दिया, और वामन भगवान ने अपना पैर उसके सिर पर रखा, जिससे बलि पाताल लोक में चला गया।
इंदिरा एकादशी
इंदिरा एकादशी, अश्विन मास के कृष्ण पक्ष में आती है और इसे पितृ पक्ष के दौरान मनाया जाता है। इस एकादशी का व्रत करने से न केवल व्रत करने वाले के पाप नष्ट होते हैं, बल्कि उसके पूर्वजों को भी मोक्ष मिलता है, जो नर्क में वास कर रहे हैं।यह व्रत पितृ पक्ष में आता है, इसलिए इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। यह व्रत न केवल अपने पापों को नष्ट करता है, बल्कि पितरों को भी मोक्ष दिलाता है।
इंदिरा एकादशी व्रत कथा
एक समय, युधिष्ठिर महाराज ने भगवान कृष्ण से अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी के बारे में पूछा। भगवान कृष्ण ने उत्तर दिया कि इस एकादशी को इंदिरा एकादशी कहा जाता है। यह एकादशी पितृ पक्ष में आती है और इसका व्रत करने से पितरों को मोक्ष मिलता है। कथा के अनुसार, सतयुग में महिष्मतीपुरी का राजा इंद्रसेन था। वह भगवान विष्णु का भक्त था और प्रजा का पालन करता था। एक दिन, नारद मुनि राजा के दरबार में आए। राजा ने उनका स्वागत किया और उनसे अपने पिता के बारे में पूछा। नारद मुनि ने बताया कि राजा के पिता यमलोक में कष्ट भोग रहे हैं, क्योंकि उन्होंने अपने जीवन में एकादशी का व्रत भंग कर दिया था।
नारद मुनि ने राजा को इंदिरा एकादशी का व्रत करने और उसका फल अपने पिता को देने की सलाह दी। राजा ने नारद मुनि से इंदिरा एकादशी व्रत का विधान पूछा। नारद मुनि ने बताया कि दशमी तिथि को पितरों का श्राद्ध करें, एकादशी को उपवास करें और द्वादशी को ब्राह्मणों को भोजन कराएं।
राजा इंद्रसेन ने नारद मुनि के बताए अनुसार इंदिरा एकादशी का व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उनके पिता को विष्णु लोक में स्थान प्राप्त हुआ। इंदिरा एकादशी का व्रत करने से राजा इंद्रसेन को भी मृत्यु के बाद विष्णु लोक में स्थान मिला।
आश्विन मास
सनातन परंपरा में आश्विन मास का विशेष महत्व है। धर्म शास्त्रों के अनुसार आश्विन मास का प्रत्येक दिन अपने आप में काफी विशेष होता है। आश्विन मास में जहां 15 दिन पितृ पक्ष चलता है वहीं 9 दिन शारदीय नवरात्रि की धूम रहती है। इस माह में नवरात्रि, दशहरा जैसे कई पवित्र व्रत और त्योहार आते हैं। इन व्रत त्योहारों में भक्त श्रद्धापूर्वक ढंग से पूजा और अर्चना करते हैं। इसके अलावा अपने पितरों की आत्मा की शांति और उनका आशीर्वाद पाने के लिए लोग कई तरह के उपाय इस माह में करते हैं। इस मास में मां दुर्गा को समर्पित है। इस महीने में देव पूजन भी किया जाता है। इस महीने से सूर्य देव धीरे-धीरे कमजोर होने लगते हैं। इस साल आश्विन मास 8 सितंबर से शुरू हुआ है और 6 अक्टूबर तक रहेगा।
अश्विन मास का महत्व - अश्विन मास के कृष्ण पक्ष में पितृ पक्ष होता है, जिसमें पितरों का श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जाता है। मान्यता है कि इस दौरान पितर धरती पर आते हैं और अपने परिजनों से प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं । अश्विन मास के शुक्ल पक्ष में शारदीय नवरात्रि मनाई जाती है, जिसमें मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा धरती पर आती हैं और अपने भक्तों को आशीर्वाद देती हैं अश्विन मास में दशहरा, शरद पूर्णिमा जैसे अन्य महत्वपूर्ण त्योहार भी मनाए जाते हैं. अश्विन मास में दान-पुण्य का विशेष महत्व है। इस महीने में ब्राह्मणों, गरीबों और जरूरतमंदों को दान देने से शुभ फल की प्राप्ति होती है. अश्विन मास में शुभ कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश आदि वर्जित माने जाते हैं, लेकिन पितृ पक्ष और नवरात्रि में पितरों और देवी-देवताओं की पूजा
करना शुभ माना जाता है.
नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा करें और व्रत रखें. गरीबों और जरूरतमंदों को दान दें.
इस महीने में नकारात्मक विचारों से बचें और सकारात्मक रहें. गंगा स्नान करना भी शुभ माना जाता है,
इस महीने में धूप में ज्यादा घूमने से बचना चाहिए.इस महीने में शरीर को ढककर रखना चाहिए.
अश्विन मास एक महत्वपूर्ण महीना है, जिसमें पितरों और देवी-देवताओं की पूजा का विशेष महत्व है। इस महीने में दान-पुण्य करने और सकारात्मक रहने से शुभ फल की प्राप्ति होती है ।
पितृ पक्ष
अश्वनी मास कृष्ण पक्ष में श्राद्ध की तिथियां
अपने पूर्वज पितरों के प्रति श्रद्धा भावना रखते हुए आश्विन कृष्ण पक्ष में पितृ तर्पण एवं श्राद्धकर्म करना नितान्त आवश्यक है। इससे स्वास्थ्य, समृद्धि, आयु, सुख-शान्ति, वंशवृद्धि एवं उत्तम सन्तान की प्राप्ति होती है। श्रद्धापूर्वक किए जाने के कारण ही इसका नाम 'श्राद्ध' है। इस बात का भी ध्यान रहे कि श्राद्धकृत्य 'अपराह्नकाल' व्यापिनी तिथि में किए जाते हैं।
बुढ़ापे में अकेलापन
जब बुढ़ापे में अकेला ही रहना है तो औलाद क्यों पैदा करें उन्हें क्यों काबिल बनाएं जो हमें बुढ़ापे में दर-दर के ठोकरें खाने के लिए छोड़ दे।
क्यों दुनिया मरती है औलाद के लिए...
हमेशा की तरह मैं आज भी, परिसर के बाहर बैठे भिखारियों की मुफ्त स्वास्थ्य जाँच में व्यस्त था।
स्वास्थ्य जाँच और फिर मुफ्त मिलने वाली दवाओं के लिए सभी भीड़ लगाए कतार में खड़े थे।
अनायाश सहज ही मेरा ध्यान गया एक बुजुर्ग की तरफ गया, जो करीब ही एक पत्थर पर बैठे हुए थे। सीधी नाक, घुँघराले बाल, निस्तेज आँखे, जिस्म पर सादे, लेकिन साफ सुथरे कपड़े।
कुछ देर तक उन्हें देखने के बाद मुझे यकीन हो गया कि, वो भिखारी नहीं हैं। उनका दाँया पैर टखने के पास से कटा हुआ था, और करीब ही उनकी बैसाखी रखी थी।
फिर मैंने देखा कि,आते जाते लोग उन्हें भी कुछ दे रहे थे और वे लेकर रख लेते थे। मैंने सोचा ! कि मेरा ही अंदाज गलत था, वो बुजुर्ग भिखारी ही हैं।
उत्सुकतावश मैं उनकी तरफ बढ़ा तो कुछ लोगों ने मझे आवाज लगाई :
"उसके करीब ना जाएँ डॉक्टर साहब,
वो बूढा तो पागल है । "
लेकिन मैं उन आवाजों को नजरअंदाज करता, मैं उनके पास गया। सोचा कि, जैसे दूसरों के सामने वे अपना हाथ फैला रहे थे, वैसे ही मेरे सामने भी हाथ करेंगे, लेकिन मेरा अंदाज फिर चूक गया। उन्होंने मेरे सामने हाथ नहीं फैलाया।
मैं उनसे बोला : "बाबा, आपको भी कोई शारीरिक परेशानी है क्या ? "
मेरे पूछने पर वे अपनी बैसाखी के सहारे धीरे से उठते हुए बोले : "Good afternoon doctor...... I think I may have some eye problem in my right eye .... "
बढ़िया अंग्रेजी सुन मैं अवाक रह गया। फिर मैंने उनकी आँखें देखीं।
पका हुआ मोतियाबिंद था उनकी ऑखों में ।
मैंने कहा : " मोतियाबिंद है बाबा, ऑपरेशन करना होगा। "
बुजुर्ग बोले : "Oh, cataract ?
I had cataract operation in 2014 for my left eye in Ruby Hospital."
मैंने पूछा : " बाबा, आप यहाँ क्या कर रहे हैं ? "
बुजुर्ग : " मैं तो यहाँ, रोज ही 2 घंटे भीख माँगता हूँ सर" ।
मैं : " ठीक है, लेकिन क्यों बाबा ? मुझे तो लगता है, आप बहुत पढ़े लिखे हैं। "
बुजुर्ग हँसे और हँसते हुए ही बोले : "पढ़े लिखे ?? "
मैंने कहा : "आप मेरा मजाक उड़ा रहे हैं, बाबा। "
बाबा :
" Oh no doc... Why would I ?.
.. Sorry if I hurt you ! "
मैं : " हर्ट की बात नहीं है बाबा, लेकिन मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा है। "
बुजुर्ग : " समझकर भी, क्या करोगे डॉक्टर ? "
अच्छा "ओके, चलो हम, उधर बैठते हैं, वरना लोग तुम्हें भी पागल हो कहेंगे। "(और फिर बुजुर्ग हँसने लगे)
करीब ही एक वीरान टपरी थी। हम दोनों वहीं जाकर बैठ गए।
" Well Doctor, I am Mechanical Engineer...."--- बुजुर्ग ने अंग्रेजी में ही शुरुआत की--- "
मैं, कंपनी में सीनियर मशीन ऑपरेटर था।
एक नए ऑपरेटर को सिखाते हुए, मेरा पैर मशीन में फंस गया था, और ये बैसाखी हाथ में आ गई। कंपनी ने इलाज का सारा खर्चा किया, और बाद में कुछ रकम और सौंपी, और घर पर बैठा दिया। क्योंकि लंगड़े बैल को कौन काम पर रखता है सर ?"
"फिर मैंने उस पैसे से अपना ही एक छोटा सा वर्कशॉप डाला। अच्छा घर लिया। बेटा भी मैकेनिकल इंजीनियर है। वर्कशॉप को आगे बढ़ाकर उसने एक छोटी कम्पनी और डाली। "
मैं चकराया, बोला : " बाबा, तो फिर आप यहाँ, इस हालत में कैसे ? "
बुजुर्ग : " मैं...किस्मत का शिकार हूँ ...."
" बेटे ने अपना बिजनेस बढ़ाने के लिए, कम्पनी और घर दोनों बेच दिए। बेटे की तरक्की के लिए मैंने भी कुछ नहीं कहा। सब कुछ बेच बाचकर वो अपनी पत्नी और बच्चों के साथ जापान चला गया, और हम जापानी गुड्डे गुड़िया यहाँ रह गए। "
ऐसा कहकर बाबा हँसने लगे। हँसना भी इतना करुण हो सकता है, ये मैंने पहली बार अनुभव किया।
फिर बोला : " लेकिन बाबा, आपके पास तो इतना हुनर है कि जहाँ लात मारें वहाँ पानी निकाल दें। "
अपने कटे हुए पैर की ओर ताकते बुजुर्ग बोले : " लात ? कहाँ और कैसे मारूँ, बताओ मुझे ? "
बाबा की बात सुन मैं खुद भी शर्मिंदा हो गया। मुझे खुद बहुत बुरा लगा।
प्रत्यक्षतः मैं बोला : "आई मीन बाबा, आज भी आपको कोई भी नौकरी दे देगा, क्योंकि अपने क्षेत्र में आपको इतने सालों का अनुभव जो है। "
बुजुर्ग : " Yes doctor, और इसी वजह से मैं एक वर्कशॉप में काम करता हूँ। 8000 रुपए तनख्वाह मिलती है मुझे। "
मेरी तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा था। मैं बोला :
"तो फिर आप यहाँ कैसे ? "
बुजुर्ग : "डॉक्टर, बेटे के जाने के बाद मैंने एक चॉल में एक टीन की छत वाला घर किराए पर लिया। वहाँ मैं और मेरी पत्नी रहते हैं। उसे Paralysis है, उठ बैठ भी नहीं सकती। "
" मैं 10 से 5 नौकरी करता हूँ । शाम 5 से 7 इधर भीख माँगता हूँ और फिर घर जाकर तीनों के लिए खाना बनाता हूँ। "
आश्चर्य से मैंने पूछा : " बाबा, अभी तो आपने बताया कि, घर में आप और आपकी पत्नी हैं। फिर ऐसा क्यों कहा कि, तीनों के लिए खाना बनाते हो ? "
बुजुर्ग : " डॉक्टर, मेरे बचपन में ही मेरी माँ का स्वर्गवास हो गया था। मेरा एक जिगरी दोस्त था, उसकी माँ ने अपने बेटे जैसे ही मुझे भी पाला पोसा। दो साल पहले मेरे उस जिगरी दोस्त का निधन हार्ट अटैक से हो गया तो उसकी 92 साल की माँ को मैं अपने साथ अपने घर ले आया तब से वो भी हमारे साथ ही रहती है। "
मैं अवाक रह गया। इन बाबा का तो खुद का भी हाल बुरा है। पत्नी अपंग है। खुद का एक पाँव नहीं, घरबार भी नहीं,
जो था वो बेटा बेचकर चला गया, और ये आज भी अपने मित्र की माँ की देखभाल करते हैं।
कैसे जीवट इंसान हैं ये ?
कुछ देर बाद मैंने समान्य स्वर में पूछा : " बाबा, बेटा आपको रास्ते पर ले आया, ठोकरें खाने को छोड़ गया। आपको गुस्सा नहीं आता उस पर ? "
बुजुर्ग : " No no डॉक्टर, अरे वो सब तो उसी के लिए कमाया था, जो उसी का था, उसने ले लिया। इसमें उसकी गलती कहाँ है ? "
" लेकिन बाबा "--- मैं बोला "लेने का ये कौन सा तरीका हुआ भला ? सब कुछ ले लिया। ये तो लूट हुई। "
" अब आपके यहाँ भीख माँगने का कारण भी मेरी समझ में आ गया है बाबा। आपकी तनख्वाह के 8000 रुपयों में आप तीनों का गुजारा नहीं हो पाता अतः इसीलिए आप यहाँ आते हो"
बुजुर्ग : " No, you are wrong dr. 8000 रुपए में मैं सब कुछ मैनेज कर लेता हूँ। लेकिन मेरे मित्र की
जो माँ है, उन्हें, डाइबिटीज और ब्लडप्रेशर दोनों हैं। दोनों बीमारियों की दवाई चल रही है उनकी। बस 8000 रुपए में उनकी दवाईयां मैनेज नहीं हो पाती"
" मैं 2 घंटे यहाँ बैठता हूँ लेकिन भीख में पैसों के अलावा कुछ भी स्वीकार नहीं करता। मेडिकल स्टोर वाला उनकी महीने भर की दवाएँ मुझे उधार दे देता है और यहाँ 2 घंटों में जो भी पैसे मुझे मिलते हैं वो मैं रोज मेडिकल स्टोर वाले को दे देता हूँ। "
मैंने अपलक उन्हें देखा और सोचा, इन बाबा का खुद का बेटा इन्हें छोड़कर चला गया है और ये खुद किसी और की माँ की देखभाल कर रहे हैं।
मैंने बहुत कोशिश की लेकिन खुद की आँखें भर आने से नहीं रोक पाया।
भरे गले से मैंने फिर कहा : "बाबा, किसी दूसरे की माँ के लिए, आप, यहाँ रोज भीख माँगने आते हो ? "
बुजुर्ग : " दूसरे की ? अरे, मेरे बचपन में उन्होंने बहुत कुछ किया मेरे लिए। अब मेरी बारी है। मैंने उन दोनों से कह रखा है कि, 5 से 7 मुझे एक काम और मिला है। "
मैं मुस्कुराया और बोला : " और अगर उन्हें पता लग गया कि, 5 से 7 आप यहाँ भीख माँगते हो, तो ? "
बुजुर्ग : " अरे कैसे पता लगेगा ? दोनों तो बिस्तर पर हैं। मेरी हेल्प के बिना वे करवट तक नहीं बदल पातीं। यहाँ कहाँ पता करने आएँगी.... हा....हा... हा...."
बाबा की बात पर मुझे भी हँसी आई। लेकिन मैं उसे छिपा गया और बोला : " बाबा, अगर मैं आपकी माँ जी को अपनी तरफ से नियमित दवाएँ दूँ तो ठीक रहेगा ना। फिर आपको भीख भी नहीं मांगनी पड़ेगी। "
बुजुर्ग : " No dr, आप भिखारियों के लिए काम करते हैं। माजी के लिए आप दवाएँ देंगे तो माजी भी तो भिखारी कहलाएंगी। मैं अभी समर्थ हूँ डॉक्टर, उनका बेटा हूँ मैं। मुझे कोई भिखारी कहे तो चलेगा, लेकिन उन्हें भिखारी कहलवाना मुझे मंजूर नहीं। "
" OK Dr, अब मैं चलता हूँ। घर पहुँचकर अभी खाना भी बनाना है मुझे। "
मैंने निवेदन स्वरूप बाबा का हाथ अपने हाथ में लिया और बोला : " बाबा, भिखारियों का डॉक्टर समझकर नहीं बल्कि अपना बेटा समझकर मेरी दादी के लिए दवाएँ स्वीकार कर लीजिए। "
अपना हाथ छुड़ाकर बाबा बोले : " डॉक्टर, अब इस रिश्ते में मुझे मत बांधो, प्लीज, एक गया है, हमें छोड़कर...."
" आज मुझे स्वप्न दिखाकर, कल तुम भी मुझे छोड़ गए तो ? अब सहन करने की मेरी ताकत नहीं रही...."
ऐसा कहकर बाबा ने अपनी बैसाखी सम्हाली। और जाने लगे, और जाते हुए अपना एक हाथ मेरे सिर पर रखा और भर भराई, ममता मयी आवाज में बोले : "अपना ध्यान रखना मेरे बच्चे..."
शब्दों से तो उन्होंने मेरे द्वारा पेश किए गए रिश्ते को ठुकरा दिया था लेकिन मेरे सिर पर रखे उनके हाथ के गर्म स्पर्श ने मुझे बताया कि, मन से उन्होंने इस रिश्ते को स्वीकारा था।
उस पागल कहे जाने वाले मनुष्य के पीठ फेरते ही मेरे हाथ अपने आप प्रणाम की मुद्रा में उनके लिए जुड़ गए।
हमसे भी अधिक दुःखी, अधिक विपरीत परिस्थितियों में जीने वाले ऐसे भी लोग हैं।
हो सकता है इन्हें देख हमें हमारे दु:ख कम प्रतीत हों, और दुनिया को देखने का हमारा नजरिया बदले....
हमेशा अच्छा सोचें, हालात का सामना करे...
कहानी से कुछ प्रेरणा मिले तो जीव मात्र पर दया करना ओर परोपकार की भावना बच्चों में जरूर दें ।
बंगाल फाइलस
मिथलेश कुमार
कल एक विशेष प्रीमियर में यह फिल्म देखी... यह झकझोर देने वाली फिल्म है। इसका प्रस्तुतीकरण सचमुच स्तब्ध कर देने वाला है।
फिल्म के प्रीमियर पर निर्माता निर्देशक ने बताया......
"यह फिल्म हिंदू जनसंहार (Hindu Genocide) पर आधारित है।
विश्व इतिहास में यह अपने आप में एक अद्वितीय उदाहरण है, जहाँ लगभग 1200 वर्षों तक एक समुदाय, जिसे आज बहुसंख्यक माना जाता है, लगातार उत्पीड़न और दमन का शिकार रहा। विशेष बात यह है कि यह उत्पीड़न तथाकथित "अल्पसंख्यकों" (Minorities) के हाथों हुआ।"
फिर भी, इस ऐतिहासिक सच्चाई को वह स्वर और पहचान कभी नहीं मिल पाई, जिसकी यह हक़दार थी।
पश्चिमी दुनिया (Western World) हिंदुओं के जनसंहार को मान्यता नहीं देती, क्योंकि उनके बौद्धिक ढांचे (conceptual framework) में यह कल्पना ही मौजूद नहीं है कि किसी "अल्पसंख्यक" समुदाय द्वारा "बहुसंख्यक" समुदाय का दमन या उत्पीड़न किया जा सकता है। उनके लिए यह हमेशा एकतरफ़ा परिभाषा है—बहुसंख्यक ही अल्पसंख्यक को दबाता है।
इसी कारण पश्चिमी अकादमिक और राजनीतिक विमर्श नए-नए नैरेटिव गढ़ता है—जैसे Islamophobia या Dismantling Hindutva—ताकि वास्तविक ऐतिहासिक घटनाओं से ध्यान हटाया जा सके।
जस्टिस जी. डी. खोसला की पुस्तक "Stern Reality", जिसे सच्चिदानंद चतुर्वेदी ने हिंदी में "देश विभाजन का खूनी इतिहास" नाम से अनूवादित किया है, लगभग 15–20 वर्ष पहले पढ़ी थी। उस
पुस्तक को पढ़कर मैं अत्यंत विचलित हो गया था।
1947 में (आज के बांग्लादेश) नोआखली का कत्लेआम, कोलकाता के डायरेक्ट एक्शन डे से कहीं अधिक भीषण था। वहाँ लगभग सभी हिंदुओं को जबरन धर्म परिवर्तन के लिए बाध्य किया गया। जिन्होंने धर्म परिवर्तन स्वीकार नहीं किया, उन्हें नृशंस रूप से मौत के घाट उतार दिया गया। कोई भी हिंदू स्त्री बलात्कार की भयावहता से बची नहीं। हज़ारों स्त्रियों को बलात्कार के बाद भी निर्दयतापूर्वक मार डाला गया। पतियों, पिताओं और बेटों के सामने ही महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किए गए। छोटे-छोटे बच्चों तक पर ऐसे अमानवीय अत्याचार ढाए गए कि उन्हें शब्दों में व्यक्त करना कठिन है।
नोआखली नरसंहार का मुख्य सरगना गुलाम सरवर था, जो पाँच वक्त का नमाज़ी था। मुस्लिम नेशनल गार्ड के गुंडे हिंदुओं के कटे हुए सिर उसे भेंट स्वरूप प्रस्तुत किया करते थे। कुएँ, नाले और गलियाँ हिंदुओं के सड़े-गले शरीर और अंगों से भर गई थीं। पूरे नोआखली क्षेत्र में बिखरे शवों की दुर्गंध महीनों तक फैली रही। इन सड़ते शवों पर गिद्ध, चील और कुत्ते लंबे समय तक दावत उड़ाते रहे।
भारत विभाजन पर लिखी अनेक पुस्तकों में मैंने नोआखली नरसंहार से संबंधित घटनाएँ पढ़ीं। किन्तु राजेंद्र लाल रायचौधरी के परिवार के साथ जो कुछ घटा, उसका हृदयविदारक विवरण जस्टिस खोसला ने एक प्रत्यक्षदर्शी की गवाही के आधार पर लिखा है। वह दृश्य शब्दों और चित्रण से परे है, परंतु निर्देशक ने उसे फिल्म में दर्शाने का साहसिक प्रयास किया है।
नोआखली नरसंहार के समय शरद पूर्णिमा की रात, राजेंद्र लाल रायचौधरी के घर पर गुलाम सरबर का आक्रमण और उनका निर्मम संघर्ष – इन दृश्यों की पृष्ठभूमि में बजता प्रसिद्ध बंगला गीत "धन्य धान्ये पुष्पे भरा....!" वातावरण को और भी अधिक स्तब्धकारी और रोमांचक बना देता है।
फिल्म का कथानक और निर्देशन अत्यंत प्रभावशाली है। केंद्रीय पात्र "भारती बनर्जी" के माध्यम से पूरी कथा आगे बढ़ती है।
- मिथुन चक्रवर्ती और पल्लवी जोशी की अभिनय-क्षमता अनुपम है, उनका कोई प्रतिस्पर्धी नहीं।
- परंतु कुछ अन्य कलाकार भी अपने पात्रों से गहरी छाप छोड़ते हैं –
1. देवेंदु भट्टाचार्य – राजेंद्र लाल रायचौधरी
2. सस्वता चटर्जी – सरदार हुसैनी
3. प्रियांशु चटर्जी – जस्टिस बनर्जी
4. नमाशी चक्रवर्ती – गुलाम सरवर
इन सभी कलाकारों ने अपने अभिनय से दर्शकों को चौंकाया और फिल्म को बेहद प्रबल बनाया है।
Vivek Ranjan Agnihotri जी निरंतर ऐसी विचारोत्तेजक फिल्में बनाकर समाज के समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं—वे वास्तव में सराहना और बधाई के पात्र हैं।
यह फिल्म केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक दस्तावेज है। हर भारतीय को इसे अवश्य देखना चाहिए।
भगवद गीता
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन
भगवद गीता, या गीता, एक मार्गदर्शक ग्रंथ है जिसमें 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। इसमें भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध के मैदान में जीवन, धर्म, कर्म और भक्ति का सार समझाया है। यह कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग जैसे विभिन्न आध्यात्मिक मार्गों का वर्णन करती है और आत्मा, परमात्मा, मोक्ष, और जीवन-मृत्यु चक्र की गहन चर्चा करती है। गीता का मुख्य संदेश है कि व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए निष्काम कर्म करना चाहिए, क्रोध, वासना और लोभ का त्याग करना चाहिए, और ईश्वर में पूर्ण विश्वास रखना चाहिए। गीता जीवन के विभिन्न पहलुओं, कर्तव्यों और आदर्शों पर केंद्रित एक उपदेशात्मक ग्रंथ है। यह कर्मयोग के सिद्धांत पर जोर देती है, जिसके अनुसार हमें कर्म करना चाहिए, लेकिन उसके फल की इच्छा नहीं रखनी चाहिए। गीता आत्मा और परमात्मा के संबंध की व्याख्या करती है और आत्मा की अमरता, जन्म-मृत्यु के चक्र और मोक्ष प्राप्त करने के तरीकों पर प्रकाश डालती है। यह ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और प्रेम को भक्ति मार्ग बताती है, जो आत्मा को ईश्वर से जोड़ता है। इसमें मन को नियंत्रित करने, क्रोध, वासना और लोभ का त्याग करने का महत्व बताया गया है, क्योंकि ये आत्मा के पतन का कारण बनते हैं। यह धर्म, कर्म, आत्मा, परमात्मा, और प्रकृति के विभिन्न गुणों जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा करती है।
गीता का सार है कि व्यक्ति को अपना कर्तव्य करते हुए, ईश्वर पर विश्वास रखते हुए जीवन की हर परिस्थिति का सामना करना चाहिए। यह ग्रंथ मनुष्य को मानसिक और आध्यात्मिक रूप से सशक्त बनाने का मार्ग दिखाता है, जिससे वह जीवन के सभी बंधनों से मुक्त हो सके।
सितंबर माह 2025 के महत्वपूर्ण दिवस
1 सितंबर - राष्ट्रीय पोषण सप्ताह
2 सितंबर - विश्व नारियल दिवस
2 सितंबर - भारत के आदित्य एल-1 मिशन का प्रक्षेपण
3 सितंबर - गगनचुंबी इमारत दिवस
4 सितम्बर 1669 ई. - बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक काशी विश्वनाथ मंदिर का विध्वंस
5 सितंबर - शिक्षक दिवस, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जयंती (1888 ई.),
7 सितंबर – ब्राज़ील का स्वतंत्रता दिवस,अंतर्राष्ट्रीय पुलिस सहयोग दिवस
8 सितंबर - अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस
9 सितंबर - 1949 भारत की संविधान सभा ने हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया।
10 सितंबर - विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस
11 सितंबर 1895 - विनोबा भावे- · 1901 - आत्माराम रावजी देशपांडे , 1911 - लाला अमरनाथ- सब का जन्म हुआ
13 सितम्बर 1929 ई. महान् क्रांतिकारी यतीन्द्र नाथ दास द्वारा लाहौर जेल में 64 दिन के अनशन के बाद देह त्याग।
13 सितंबर – अंतर्राष्ट्रीय चॉकलेट दिवस
14 सितंबर - हिंदी दिवस
15 सितंबर - इंजीनियर दिवस (भारत),15 सितम्बर- एम. विश्वेसरैय्या जयन्ती (1861 ई.)
16 सितंबर - विश्व ओजोन दिवस
17 सितंबर - प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन
17 सितम्बर - विश्वकर्मा जयन्ती।
18 सितंबर - विश्व बांस दिवस,एचआईवी/एड्स और वृद्धावस्था जागरूकता दिव
19 सितंबर- गणेश चतुर्थी
19 सितम्बर 1726 - खण्डोबल्लाल का निधन।
20 सितम्बर 1928 - नारायण गुरु का निधन। केरल के महान् क्रांतिकारी संत
21 सितंबर - अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस (संयुक्त राष्ट्र)
21 सितंबर - विश्व अल्जाइमर दिवस
22 सितंबर - कैंसर रोगियों के कल्याण दिवस, या विश्व गुलाब दिवस
22 सितंबर - विश्व गैंडा दिवस
22 सितम्बर- (आश्विन कृष्ण पक्ष 5) द्वितीय गुरु अंगददेव को गुरु गद्दी प्राप्त।
23 सितंबर को आयुर्वेद दिवस
24 सितंबर - विश्व समुद्री दिवस
24 सितम्बर 1861 मादाम भीकाजी कामा का जन्म।
25 सितंबर - विश्व फार्मासिस्ट दिवस
25 सितम्बर - अंत्योदय दिवस, पं. दीनदयाल जयंती (1916 ई.)
26 सितंबर - विश्व गर्भनिरोधक दिवस
26 सितंबर - यूरोपीय भाषा दिवस
27 सितंबर – गूगल की जयंती
28 सितंबर, 1907 को शहीद भगत सिंह का जन्म,28 सितंबर को विश्व समुद्री दिवस मनाया जाता है
29 सितंबर - विश्व हृदय दिवस
30 सितम्बर 1978 ई- पूर्व सरकार्यवाह माधवराव मुले का निधन।
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