श्री गुरु जी प्रेरक प्रसंग
"श्रीगुरु जी : स्वयंसेवक के परिवार में रुकने के अभ्यासी"
संघ पर से प्रतिबंध हटने के बाद एक बार श्री गुरुजी मैनपुरी आये थे। सभी स्वयंसेवकों में बड़ा उत्साह था। इस छोटे से नगर में हम किस प्रकार उनका योग्य स्वागत कर सके, यह हमारी प्रबल इच्छा थी। एक सुन्दर कोठी माँगकर हमने उनके ठहरने की व्यवस्था की थी। जिसकी कोठी में श्री गुरुजी के ठहरने की व्यवस्था की थी, वह व्यक्ति स्वयंसेवक नहीं था।
नगर के बाहर ही हमने श्री गुरुजी का स्वागत किया। बातचीत में ही यह जानकर कि आवास की व्यवस्था किसी स्वयंसेवक के परिवार में नहीं है, तो उन्होंने कहा- क्या तुम्हारे पास मकान नहीं है ? मैं वहीं ठहरूंगा।
मेरा मकान पुराना तथा जैसा तैसा ही था। मैं बड़े संकोच में पड़ गया। उन्होंने फिर कहा परिवार में ठहराना नहीं चाहते?
विनयपूर्वक मैने कहा- वह स्थान आपके लिये उपयुक्त नहीं है। इसलिये हमने आपकी आवास व्यवस्था अलग की है।
श्री गुरुजी मुक्त कंठ से हँसे और कहने लगे- चलो, अब तो वहीं रुकूँगा ।
घर में प्रवेश करते ही उन्होंने कहा - कितना साफ सुथरा है अरे, मैं धर्मशाला में नहीं परिवार में ही रुकने का अभ्यासी हूँ। हम सभी गद्गद् हो गये।
- - श्री गुरुजी के प्रेरक संस्मरण
- - संकलनकर्ता- दि.भा. घुमरे

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