प्रदोष व्रत कथा व विधि


 

प्रदोष व्रत कथा व विथि

प्रदोष व्रत, जो हर महीने के दोनों पक्षों (कृष्ण और शुक्ल) की त्रयोदशी तिथि को भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित होता है, इसे करने से जीवन में सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य, और संतान सुख की प्राप्ति होती है। यह व्रत पापों का नाश कर मानसिक शांति प्रदान करता है और सभी मनोकामनाएं पूरी करता है। 

प्रदोष व्रत करने के प्रमुख लाभ मे है कि पापों से मुक्ति मिलती है, इस व्रत को करने से पूर्व जन्म और वर्तमान जीवन के पाप नष्ट हो जाते हैं। प्रदोष काल (सूर्यास्त के समय) में भगवान शिव की पूजा करने से व्यक्ति की सभी इच्छाएं पूरी होती हैं। विशेषकर रविवार और मंगलवार के दिन प्रदोष व्रत रखने से बीमारियों से मुक्ति और उत्तम स्वास्थ्य मिलता है। जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और ऐश्वर्य की वृद्धि होती है।

संतान सुख और वैवाहिक सुख: यह व्रत संतान प्राप्ति और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए भी किया जाता है। 

दिन के अनुसार प्रदोष व्रत का महत्व निम्नलिखित हैं 

सोम प्रदोष: इच्छाओं की पूर्ति।

भौम प्रदोष (मंगलवार): रोगों से मुक्ति और स्वास्थ्य।

बुध प्रदोष: ज्ञान, बुद्धि और संतान सुख।

गुरु प्रदोष: शत्रुओं का नाश।

शुक्र प्रदोष: सौभाग्य और समृद्धि।

शनि प्रदोष: पुत्र प्राप्ति और नौकरी।

रवि प्रदोष: लंबी आयु और आरोग्य। 

यदि आप व्रत नहीं रख सकते हैं, तो शाम के समय भगवान शिव पर जल और बेलपत्र अर्पित करके भी इस व्रत का फल प्राप्त किया जा सकता है।

   प्रदोष व्रत से पुरानी  कथा जुड़ी हुई है और व्रत के दिन उस कथा को पढ़ना बेहद शुभ माना जाता है | प्रदोष  व्रत कर  इस कथा को  पढ़ने से  भोलेनाथ प्रसन्न हो  कर आशीर्वाद देते है | 

प्रदोष व्रत की कथा - पौराणिक ग्रंथों  कथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक निर्धन पुजारी अपनी पत्नी ओर बेटे के साथ एक गाँव मे रहता था | पुजारी की मौत हो जाने के बाद उसकी विधवा पत्नी अपने बेटे के साथ भीख मांग कर गुजारा करने लगी | एक दिन घूमते हुए  विधवा पुजारिन की मुलाकात विदर्भ देश के राजकुमार से हुई | राजकुमार भी अपने पिता की मृत्यु के बाद निराश्रित होकर दर बदर  भटक रहा था |  पुजारी की पत्नी को उसपर दया आई और वह उसे भी  अपने साथ ले गई और पुत्र की तरह पालने लगी | एक बार पुजारी की पत्नी दोनों पुत्रों के साथ ऋषि शांडिल्य के आश्रम में गई | उसने ऋषि को अपनी सारी समस्या विस्तार से कही | ऋषि ने उन्हे प्रदोष व्रत के बारे मे बताया | विधवा पुजारिन वहां प्रदोष व्रत की विधि और कथा सुनी और घर आकर उसने व्रत रखना शुरू कर दिया |

एक दिन दोनो  बालक वन में घूम रहे थे | पुजारी का बेटा घरपर  लौट आया लेकिन राजा का बेटा वन में गंधर्व कन्या से मिला और उसके साथ समय गुजारने लगा | उस  गंधर्व  कन्या का नाम अंशुमति था | दूसरे दिन भी राजकुमार उस स्थान पर पहुंचा जहां अंशुमाती के माता पिता रहते थे  | राजकुमार को देख कर  अंशुमति के माता-पिता ने उसे पहचान लिया और उससे अपनी पुत्री का विवाह करने की इच्छा प्रकट की | राजकुमार भी उस से विवाह करना चाहता था इसलिए  दोनों का विवाह हो गया | राजकुमार ने गंधर्वों की विशाल सेना के साथ  विदर्भ पर आक्रमण कर दिया |विथर्व का  युद्ध जीतने के बाद राजकुमार विदर्भ का राजा बन गया | राजकुमार ने  पुजारी की पत्नी और उसके बेटे को भी राजमहल में बुला लिया | अंशुमति के पूछने पर राजकुमार ने उसे प्रदोष व्रत के बारे में बताया | इसके बाद अंशुमति भी नियमित रूप से प्रदोष का व्रत रखने लगी | प्रदोष  व्रत के प्रभाव से इस लोक मे सुख भोग कर अंत मे शिव लोक मे गए |


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